यजुर्वेद - अध्याय 2/ मन्त्र 19
ऋषिः - परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - अग्निवायू देवते
छन्दः - भूरिक् पङ्क्ति,
स्वरः - पञ्चमः
159
घृ॒ताची॑ स्थो॒ धुर्यौ॑ पातꣳ सु॒म्ने स्थः॑ सु॒म्ने मा॑ धत्तम्। य॒ज्ञ नम॑श्च त॒ऽउप॑ च य॒ज्ञस्य॑ शि॒वे सन्ति॑ष्ठस्व॒ स्विष्टे॒ मे॒ संति॑ष्ठस्व॥१९॥
स्वर सहित पद पाठघृ॒ताची॑। स्थः॒। धुर्य्यौ॑। पा॒त॒म्। सु॒म्ने। स्थः॒। सु॒म्ने। मा॒। ध॒त्त॒म्। यज्ञ॑। नमः॑। च॒। ते॒। उप॑। च॒। य॒ज्ञस्य॑। शिवे॑। सम्। ति॒ष्ठ॒स्व॒। स्विष्टे॒ इति॑ सुऽइ॑ष्टे। मे॒। सम्। ति॒ष्ठ॒स्व॒ ॥१९॥
स्वर रहित मन्त्र
घृताची स्थो धुर्या पातँ सुम्ने स्थः सुम्ने मा धत्तम् । यज्ञ नमश्च तऽउप च यज्ञस्य शिवे सन्तिष्ठस्व स्विष्टे मे सन्तिष्ठस्व ॥
स्वर रहित पद पाठ
घृताची। स्थः। धुर्य्यौ। पातम्। सुम्ने। स्थः। सुम्ने। मा। धत्तम्। यज्ञ। नमः। च। ते। उप। च। यज्ञस्य। शिवे। सम्। तिष्ठस्व। स्विष्टे इति सुऽइष्टे। मे। सम्। तिष्ठस्व॥१९॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
अथोक्तेन यज्ञेन किं भवतीत्युपदिश्यते॥
अन्वयः
यावग्निवायू यज्ञस्य धुर्य्ये सुम्ने स्थो घृताची स्थः सर्वं जगत् पातं रक्षतस्तौ मया सम्यक् प्रयोजितौ सुम्ने सुखे मा मां धत्तं धारयतः। यज्ञो नमश्च ये यथा ते तव शिवे उपसंतिष्ठेते मे ममाप्येते तथैव संतिष्ठेताम्। तस्माद् यथाहं तस्य यज्ञस्यानुष्ठाने संतिष्ठे तथा त्वमप्यत्र संतिष्ठस्व। यथाऽहं यज्ञमनुष्ठाय सुखे संतिष्ठे तथा त्वमपि तत्र संतिष्ठस्व॥१९॥
पदार्थः
(घृताची) घृतमुदकमञ्चत इति घृताची अग्निवाय्वोर्धारणाकर्षणक्रिये। अत्र पूर्वसवर्णादेशः घृतमित्युदकनामसु पठितम् (निघं॰१.१२) (स्थः) स्तः। अत्र सर्वत्र पुरुषव्यत्ययः (धुर्य्यौ) धुरं यज्ञस्याग्रं मुख्याङ्गं वहतस्तौ। अत्र धुरो यड्ढकौ (अष्टा॰४.४.७७) इति यत् प्रत्ययः (पातम्) रक्षतः (सुम्ने) सुखकारिके उक्ते क्रिये। सुम्नमिति सुखनामसु पठितम् (निघं॰३.६) (स्थः) भवतः (सुम्ने) अत्युत्कृष्टे सुखे (मा) मां यज्ञानुष्ठातारम् (धत्तम्) धारयतः। (यज्ञ) इज्यते सर्वैर्जनैः स यज्ञ ईश्वरस्तत्सम्बुद्धौ, क्रियासाध्यो वा, अत्रान्त्ये पक्षे सुपां सुलुक् [अष्टा॰७.१.३९] इति सोर्लुक् (नमः) नम्रीभावार्थे (च) समुच्चये (ते) तुभ्यं तस्य वा (उप) सामीप्ये क्रियायोगे। उपेत्युपजनं प्राह (निरु॰१.३) (च) पश्चादर्थे (यज्ञस्य) ज्ञानक्रियाभ्यामनुष्ठेयस्य (शिवे) कल्याणसाधिके॥ सर्वनिघृष्व॰ (उणा॰१.१५३) इत्ययं सिद्धः (संतिष्ठस्व) संतिष्ठते। अत्र लडर्थे लोट् (स्विष्टे) शोभनमिष्टं याभ्यां ते (मे) मम (संतिष्ठस्व) सुष्ठुसाधने स्थिरो भव, संतिष्ठो वा॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.८.३.२७) व्याख्यातः॥१९॥
भावार्थः
अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। ईश्वरोऽभिवदति हे मनुष्या! यूयमेतयोरसच्छेदकधारकयोर्जगत्पालनहेत्वोः सुखकारिणोः क्रियाकाण्डस्य निमित्तयोरूर्ध्वतिर्य्यग्गमनशीलयोरग्निवाय्वोः सकाशात् कार्य्याणि साधित्वा सुखेषु संस्थितिं कुरुत, मदाज्ञापालनं मां च सततं नमस्कुरुत। पूर्वमन्त्रोक्तैरुपकारैः परमं सुखं भवतीत्यनेनोक्तमिति॥१९॥
विषयः
अथोक्तेन यज्ञेन किं भवतीत्युपदिश्यते ॥
सपदार्थान्वयः
यावग्निवायू यज्ञस्य ज्ञानक्रियाभ्यामनुष्ठेयस्य धुर्य्यौ धुरं=यज्ञस्याऽग्रं मुख्याऽङ्गं वहतस्तौ सुम्ने सुखकारिके उक्ते क्रिये स्थः स्तः, घृताची घृतमुदकमञ्चत इति घृताची अग्निवाय्वोर्धारणाऽऽकर्षणक्रिये स्थो भवत, सर्वं जगत् पातम् रक्षतस्तौ मया सम्यक् प्रयोजितौ सुम्ने-सुखे अत्युत्कृष्टे सुखे मा=मां (माम् ) यज्ञस्याऽनुष्ठातारं धत्तम्-धारयतः ।
यज्ञ ! इज्यते सर्वैर्जनैः स यज्ञ ईश्वरस्तत्सम्बुद्धौ ! क्रियासाध्यो वा नमः नम्रीभावः च ये यथा ते=तव तुभ्यं तस्य वा शिवे कल्याणसाधिके उपसंतिष्ठेते, मे=मम अप्येते तथैव संतिष्ठेताम् ।
तस्माद्यथाऽहं तस्य यज्ञस्य ज्ञानक्रियाभ्यामनुष्ठेयस्य अनुष्ठाने संतिष्ठे तथा त्वमप्यत्र सम्+तिष्ठस्व सुष्ठु साधने स्थिरो भव (संतिष्ठते वा)॥२।१९॥
पदार्थः
(घृताची) घृतमुदकमंचत इति घृताची अग्निवाय्वोर्धारणकर्षणक्रिये। अत्र पूर्वसवर्णादेशः । धृतमित्युदत्कनामसु पठितम् ॥ निघं० १ । १२ ॥ (स्थः) स्तः । अत्र सर्वत्र पुरुषव्यत्ययः (धुर्यौ) धुरं यज्ञस्याग्रं मुख्याङ्गं वहतस्तौ । अत्र धुरी यङ्ढको' ॥ अ० ४ । ४ । ७७ ॥ इति यत्प्रत्ययः (पातम्) रक्षतः (सुम्ने) सुखकारिके उक्ते क्रिये । सुम्नमिति सुखनामसु पठितम् ॥ निघं० ३।६॥ (स्थः) भवतः (सुम्ने) अत्युत्कृष्टे सुखे (मा) मां यज्ञानुष्ठातारम् (धत्तम्) धारयतः । (यज्ञ) इज्यते सर्वैर्जनैः स यज्ञ ईश्वरस्तत्सम्बुद्धौ, क्रियासाध्यो वा अत्रान्त्ये पक्षे सुपां सुलुगिति सोर्लुक् (नमः) नम्रीभावार्थे (च) समुच्चये (ते) तुभ्यं तस्य वा (उप) समीप्ये क्रियायोगे । उपेत्युपजनं प्राह ॥ निरु० १ ॥ ३ ॥ (च) पश्चादर्थे (यजस्य) ज्ञानाक्रियाभ्यामनुष्ठेयस्य (शिवे) कल्याणसाधिके ॥ सर्वनिधृष्व० उ० ॥ १। १५१ ॥ इत्ययं सिद्धः (संतिष्ठस्व) संतिष्ठते । अत्र लडर्थे लोट् (स्विष्टे) शोभनमिष्टं याभ्यां ते (मे) मम (संतिष्ठस्व) सुष्ठुसाधने स्थिरो भव, संतिष्ठते वा ॥ अयं मंत्रः श० १। ८ । ३ । २७ व्याख्यातः ॥ १९ ॥
भावार्थः
[यावग्निवायू घृताची, सर्वं जगत् पातं=रक्षतः, सुम्ने, यज्ञस्य धुर्य्यौ.....सुम्ने मा=मां धत्तम्...शिख उपसंतिष्ठेते]
अत्र लुप्तोपमालङ्कारः ॥ ईश्वरोऽभिवदति--हे मनुष्या ! यूयमेतयो रसच्छेदकधारकयोर्जगत्पालनहेत्वोः, सुखकारिणोः, क्रियाकाण्डस्य निमित्तयोरूर्ध्वतिर्यग्गमनशीलयोरग्नि- वाय्वोः सकाशात् कार्याणि साधित्वा' सुखेषु संस्थितिं कुरुत।
[यज्ञो नमश्च]
यथाऽहं यज्ञमनुष्ठाय [स्विष्टे]=सुखे शोभनमिष्टं याभ्यां ते संतिष्ठे तथा त्वमपि तत्र संतिष्ठस्व सुष्ठु साधने स्थिरो भव (संतिष्ठते वा) ॥ २ । १९ ॥
१. साधयित्वा ।
महायज्ञापालनं मां च सततं नमस्कुरुत ।
[मन्त्रसंगतिमाह-]
पूर्वमन्त्रोक्तैरुपकारैः परमं सुखं भवतीत्यनेनोक्तमिति ॥२।१९॥
भावार्थ पदार्थः
घृताची=रसच्छेदकधारक (अग्निवायू) सुम्ने=सुखकारिणौ। यज्ञस्य=क्रियाकाण्डस्य ।
विशेषः
परमेष्ठी प्रजापतिः । अग्निवायू । भुरिक् पंक्तिः। पंचमः ॥
हिन्दी (4)
विषय
अब उक्त यज्ञ से क्या होता है, सो अगले मन्त्र में प्रकाशित किया है॥
पदार्थ
जो अग्नि और वायु (धुर्य्यो) यज्ञ के मुख्य अङ्ग को प्राप्त कराने वाले (च) और (सुम्ने) सुखरूप (स्थ) हैं तथा (घृताची) जल को प्राप्त कराने वाली क्रियाओं को कराने हारे (स्थः) हैं और सब जगत् को (पातम्) पालते हैं, वे मुझ से अच्छी प्रकार उत्तम-उत्तम क्रिया-कुशलता में युक्त हुए (मा) मुझे, यज्ञ कराने वाले को (सुम्ने) सुख में (धत्तम्) स्थापन करते हैं। जैसे यह (यज्ञ) जगदीश्वर (च) और (नमः) नम्र होना (ते) तेरे लिये (शिवे) कल्याण में (उपसंतिष्ठस्व) समीप स्थित होते हैं, वे वैसे ही (मे) मेरे लिये भी स्थित होते हैं, इस कारण जैसे मैं (यज्ञस्य) यज्ञ का अनुष्ठान करके (सुम्ने) सुख में स्थित होता हूं, वैसे तुम भी उस में (संतिष्ठस्व) स्थित होओ॥१९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। ईश्वर कहता है कि हे मनुष्यो! रस के परमाणु करने, जगत् के पालन के निमित्त सुख करने, क्रियाकाण्ड के हेतु और ऊपर को तथा टेढ़े वा सूधे जाने वाले अग्नि और वायु के गुणों से कार्य्यों को सिद्ध करो। इस से तुम लोग सुखों में अच्छी प्रकार स्थिर हो तथा मेरी आज्ञा पालो और मुझ को ही बार-बार नमस्कार करो॥१९॥
विषय
अब उक्त यज्ञ से क्या होता है, यह उपदेश किया है ॥
भाषार्थ
जो अग्नि और वायु (यज्ञस्व) ज्ञान और क्रिया द्वारा अनुष्ठान-योग्य यज्ञ के (धुर्य्यो) यज्ञ की धुरा को वहन करने वाले हैं (च) और (सुम्ने) सुखकारक धारण-आकर्षण क्रिया वाले हैं, और (घृताची) जल को प्राप्त कराने वाले अग्नि और वायु की जो धारण-आकर्षण क्रिया (स्थः) हैं, वे सब जगत् की (पातम्) रक्षा करती हैं। वे दोनों अग्नि और वायु अच्छे प्रकार मेरे द्वारा प्रयोग किए हुए (सुम्ने) अत्यन्त उत्कृष्ट सुख (मा) मुझ यज्ञ करने वाले को (धत्तम्) प्रदान करते हैं।
(यज्ञ !) हे सब जनों के पूज्य ईश्वर ! अथवा क्रिया-साध्य यज्ञ (नमः, च) और नम्रता, ये दोनों जैसे (ते) तेरे अथवा उस के (शिवे) कल्याण-साधक हैं, वैसे ही (मे) मेरे भी ये दोनों कल्याण-कारक हों। इसलिए जैसे मैं उस (यज्ञस्य) यज्ञ के अनुष्ठान में स्थिर होऊँ, वैसे तू भी इसमें (सम्+तिष्ठस्व) उत्तम रीति से स्थिर हों।
जैसे मैं यज्ञ का अनुष्ठान करके [स्विष्टे] सुख में स्थिर होता हूँ, वैसे तू भी उसमें (सम्+तिष्ठस्व) स्थिर हो॥२।१९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में लुप्तोपमा अलंकार है॥ ईश्वर उपदेश करता है-- हे मनुष्यो! तुम इन रस का छेदन और धारण करने वाले, जगत् के पालक, सुखकारी, कर्मकाण्ड के निमित्त,ऊपर और टेढ़ी-मेढ़ी गति करने वाले, अग्नि और वायु से कार्यों को सिद्ध करके स्थिर सुख प्राप्त करो।
मेरी आज्ञा का पालन और मुझे सदा नमस्कार करो।
पूर्वमन्त्र में कथित उपकारों से परम सुख होता है, यह इस मन्त्र में बतलाया गया है॥२।१९॥
भाष्यसार--यज्ञ का फल--यज्ञ ज्ञान और क्रिया के द्वारा सिद्ध होता है। अग्नि और वायु इस यज्ञ की धुरा का वहन करते हैं। यज्ञ से अग्नि और वायु सुखकारी तथा अपनी धारण और आकर्षण शक्ति से जल के प्रापक, तथा सब जगत् के रक्षक एवं यजमान के धारक होते हैं।
ईश्वर की आज्ञा का पालन करना यज्ञ है। ईश्वर को नमस्कार करने से अभिमान का त्याग और नम्रता की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की आज्ञा के पालन तथा नमस्कार से उपासक की कल्याण में संस्थिति होती है। इस यज्ञ कर्म के लिए अन्यों को भी प्रेरित कर के सुखी करें॥२।१९॥
भाष्यसार
यज्ञ का फल--यज्ञ ज्ञान और क्रिया के द्वारा सिद्ध होता है। अग्नि और वायु इस यज्ञ की धुरा का वहन करते हैं। यज्ञ से अग्नि और वायु सुखकारी तथा अपनी धारण और आकर्षण शक्ति से जल के प्रापक, तथा सब जगत् के रक्षक एवं यजमान के धारक होते हैं।
ईश्वर की आज्ञा का पालन करना यज्ञ है। ईश्वर को नमस्कार करने से अभिमान का त्याग और नम्रता की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की आज्ञा के पालन तथा नमस्कार से उपासक की कल्याण में संस्थिति होती है। इस यज्ञ कर्म के लिए अन्यों को भी प्रेरित कर के सुखी करें॥२।१९॥
विशेष
परमेष्ठी प्रजापतिः। अग्निवायू। भुरिक् पंक्तिः। पंचमः॥
विषय
यज्ञ और नमस्
पदार्थ
घृताची शब्द नपुंसकलिङ्ग का द्विवचन है। जहाँ पति-पत्नी दोनों के लिए कुछ कहना होता है, वहाँ नपुंसकलिङ्ग के व्यवहार की शैली है। प्रभु पति-पत्नी से कहते हैं— १. ( घृताची स्थः ) = तुम दोनों मलों के क्षरण से क्रिया के सञ्चालक हो [ घृ = दीप्ति, अञ्चू पूजन ]।
२. ( धुर्यौ ) = गृहस्थ की गाड़ी को उत्तमता से खींचनेवाले हो।
३. ( सुम्ने ) = [ सुम्न = A sacrifice ] यज्ञशील बनकर ( पात ) = अपनी रक्षा करो। यज्ञ मनुष्य को विलास और परिणामतः विनाश से बचाता है।
४. तुम दोनों सदा ( सुम्ने ) = [ A hymn, Joy ] स्तुति तथा आनन्द में ( स्थः ) = स्थित होते हो। प्रभु-स्तवन में तुम्हें आनन्द का अनुभव होता है।
५. ( मा ) = मुझे ( धत्तम् ) = अपने में धारण करो। प्रभु को धारण करना ही मानव-जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। ( यज्ञः नमः च ) = यज्ञ और नमन ( ते ) = तेरे ( उप ) = सदा समीप हों। तू यज्ञ करे और नम्रतापूर्वक उन यज्ञों को प्रभु-चरणों में अर्पित करनेवाला बन। यही तो ‘कुरु कर्म त्यजेति च’ है—करना और छोड़ना। करना तो सही, परन्तु उन कर्मों का अहंकार न करना। ( च ) = और तू ( यज्ञस्य ) = यज्ञ के ( शिवे ) = कल्याणकर मार्ग में ( सन्तिष्ठस्व ) = सम्यक्तया स्थित हो, अर्थात् तू यज्ञों से कभी दूर न हो।
७. ( स्विष्टे ) = [ सु+इष्टे ] मेरे अत्यन्त प्रिय [ इष्ट, इच्छ+क्त ] इन उत्तम यज्ञों [ इष्ट, यज्ञ्+क्त ] में स्थित होकर मे ( सन्तिष्ठस्व ) = मुझमें स्थित हो। यज्ञों के द्वारा हमें प्रभु में स्थिति प्राप्त होती है। इसी ‘ब्राह्मी स्थिति’ को प्राप्त करना जीवन-यात्रा का अन्तिम लक्ष्य है।
भावार्थ
भावार्थ — हमारा जीवन उत्तम यज्ञों से परिपूर्ण हो। उन यज्ञों को प्रभु-चरणों में अर्पित कर हम प्रभु में स्थित होनेवाले हों।
विषय
अग्नि और वायु नामक दो अधिकारी ।
भावार्थ
हे अग्नि और वायु ! अग्नि के समान शत्रुसंतापक और वायु के समान वेगवान्, एवं राष्ट्र के प्राणभूत राजपुरुषो ! आप दोनों ( घृताची स्थः ) घृत, तेज को धारण करने वाले हो । आप राष्ट्रशासन रूप यज्ञ में (धुर्यौ) अग्नि वायुके समान ही समस्त शासन भार के धुरा को उठाने में समर्थ हो। आप दोनों (पातम् ) राष्ट्र का पालन करो। आप दोनों अग्नि और वायु के समान ही ( सुम्ने =सुमने ) उत्तम ज्ञानपूर्ण एवं सुखप्रद हो ! ( मा ) मुझको ( सुम्ने ) सुख में या शुभमति में ( धत्तम् ) धारण करो, रखो ! हे (यज्ञ) पूजनीय प्रभो ! ( ते च ) तुझे हम नमस्कार करते हैं | और तू ( उप च ) खूब परिपुष्ट होओ । हे राजन् ! प्रभो ! आप (यज्ञस्य ) यज्ञ के ( शिवे ) कल्याणकारी स्वरूप में ( सं तिष्ठस्व ) उत्तम रीति से स्थित हो । ( मे ) मेरे ( सु-इष्टे ) उत्तम इष्ट कार्य में ( सं तिष्ठस्व ) लगा रह || शत० १।८।३ । २५ ॥
टिप्पणी
१९ - उत्तरार्वस्य सूर्यं पवमानः, ऋषिरुद्वालवान् धनान्नवान् इत्येते ऋषय इत्युव्वटः । अस्य मन्त्रस्य शूर्पयवान्, कृषिरुद्वालवान् धानान्तर्वान् इति पञ्च ऋषयः । यज्ञो देवता | इति महीधरः । प्रजापतिः परमेष्ठी ऋषिः । अग्निवायू देवते । द० ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
परमेष्ठी प्राजापत्यः, देवाः प्राजापत्या, प्रजापतिर्वा ऋषिः )
शूर्पं, यवमान् ऋषिः, उद्बालवान् › धानान्तर्वान् › एते पञ्च ऋषयः । स्रुचौ,
यज्ञोऽग्निवायू वा देवते । भुरिक् पंक्तिः । पञ्चमः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात लुप्तोपमालंकार आहे. ईश्वर म्हणतो की, हे माणसांनो ! रसाचे परमाणू करणे, जगाचे पालन करून सुख देणे, कार्य सिद्ध करणे, वक्र किंवा सरळ वर जाणे असे अग्नी व वायूचे गुण जाणून कार्य सिद्ध करा व स्थिर सुख प्राप्त करा. तसेच माझ्या आज्ञेचे पालन करून नम्रतेने वारंवार मला नमन करा.
विषय
यज्ञाने कोणकोणते कार्य सिद्ध होतात, याविषयी पुढील मंत्रात सांगितले आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - अग्नी आणि वायू (धुर्य्यौ) यज्ञाच्या मुख्य अंगाची (उद्दिष्टाची) प्राप्ती करून देणारे आहेत. (च) आणि (सुम्ने) दुखकारक आहेत. (घृताची) जलाची प्राप्ती होण्यासाठी आवश्यक त्या क्रिया व कार्य करणारे (स्थ:) आहेत. सर्व संसाराचे (पावम्) पालन करणारे आहेत. अशा या अग्नीचा आणि वायूचा मी चांगल्या प्रकारे व उत्तम क्रिया-कौशल्याद्वारे प्रयोग करतो, तेव्हा (मा) ते मला आणि यज्ञ करणार्यांना (सुम्ने) सुखात (धत्रम्) स्थापित करतात (मला आम्हाला सुख देतात. ज्याप्रमाणे (यज्ञ) ते जगदीश्वर (च) आणि (नम:) व्यापक श्रद्धा भाव ठेवणे (ते) हे याज्ञिक, तुझ्यासाठी (शिवे) कल्याणकारी होऊन (उपसंतिष्ठस्व) तुझ्याजवळ येतात, तुला अनुकूल होतात त्याप्रमाणे ते (ईश्वर आणि त्याची उपासना) माझ्यासाठी ही कल्याणकारी होतात. ज्याप्रमाणे मी यज्ञाचे अनुष्ठान करून (सुम्ने) सुखाचा स्वामी होतो, तद्वत तुम्ही देखील त्या यज्ञाविषयी (संतिष्ठसतव) दृढभाव ठेवा आणि यज्ञ करून सुखी व्हा.
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात लुप्तोपमालंकार आहे. ईश्वर उपदेश करीत आहे की हे मनुष्यांनो, हे अग्नी आणि वायू रसाचे परमाणू करतात, जगाचे पालन करून सर्वांस सुख देतात, क्रियाकांडाचे साधन व कारण आहेत. यांचा स्वभाव वरच्या दिशेला जाण्याचा तसेच वक्र आणि सरळ दिशेला जाण्याचा आहे. तुम्ही याच्या गुणांद्वारे आपले कार्य सिद्ध वा पूर्ण करा. याप्रमाणे करून तुम्ही लोक स्थिर सुख भोगा माझ्या आज्ञेचे पालन करा आणि मलाच वारंवार नमस्कार करा.॥19॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Oh fire and air, ye are the bringers of rain. Ye protect the yajna, and conduce to our comfort, bring comfort to me. God and humility are near me for my good, as they are for thine. Just as I derive happiness by the performance of yajna, so should you.
Meaning
Fire and wind are foremost movers of the wheels of yajna. Replete in nutriments such as ghee and water, they are nature’s agents of the growth and sustenance of humanity in comfort and joy. Yajna and humility are auspicious for you. Be firm in your devotion and performance and you will live happy in the protective shade of the Divine.
Translation
O capable executives (fire and wind), you two are pourers of rain water. Protect me. Both of you are happiness incarnate; lead me to happiness. (1) О sacrifice, our regards to you. Make my worship complete; fulfil all my good desires. (2)
Notes
Dhuryau, capable of carrying the burden; executives. Bullock is also called ‘dhurya’ as it pulls the cart. Ghrtaci, pourers of water. घृत इति उदकनामसु पठितम् Nigh. I. 12). Water also is called ghrta. Sumne, सुखस्वरूपे, happiness incarnate. Namah, reverence, regards; obeisance. Svista, good desire.
बंगाली (1)
विषय
অথোক্তেন য়জ্ঞেন কিং ভবতীত্যুপদিশ্যতে ॥
এখন উক্ত যজ্ঞ দ্বারা কী হয় তাহা পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- যে অগ্নি ও বায়ু (ধূর্য়্যৌ) যজ্ঞের মুখ্য অঙ্গ গ্রহণকারী (চ) এবং (সুম্নে) সুখরূপ (স্থ) হয় তথা (ঘৃতাচী) জল প্রাপ্ত করাইবার ক্রিয়া করায় এবং সব জগৎকে (পাতম্) পালন করে, তারা আমার সঙ্গে ভাল প্রকার উত্তমোত্তম ক্রিয়া-কুশলতায় যুক্ত (মা) আমাকে, যজ্ঞ যারা করে তাদেরকে (সুম্নে) সুখে (ধত্তম্) স্থাপন করে । যেমন এই (যজ্ঞ) জগদীশ্বর (চ) এবং (নমঃ) নম্র হওয়া (তে) তোমার জন্য (শিরে) কল্যাণে (উপসংতিষ্ঠস্ব) সমীপ স্থিত হয়, তাহারা সেইরূপ (মে) আমার জন্যও স্থিত হইয়া থাকে এই কারণে যেমন আমি যজ্ঞের অনুষ্ঠান করিয়া (সুম্নে) সুখে স্থিত থাকি সেইরূপ তোমরাও তাহাতে (সংতিষ্ঠস্ব) স্থিত হও ॥ ১ঌ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে লুপ্তোপমালংকার আছে । ঈশ্বর বলিতেছেন যে, হে মনুষ্যগণ । রসের পরমাণু করিবার, জগতের পালনের নিমিত্ত সুখ করিবার, ক্রিয়াকান্ডের হেতু এবং উপর, সোজা ও তির্য্যক গমন করিবার অগ্নি, বায়ুর গুণ দ্বারা কার্য্য সিদ্ধ কর । ইহা দ্বারা তোমরা সুখে ভাল প্রকার স্থিত হও তথা আমার আজ্ঞা পালন কর এবং আমাকেই বারবার নমস্কার কর ॥ ১ঌ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
ঘৃ॒তাচী॑ স্থো॒ ধুর্য়ৌ॑ পাতꣳ সু॒ম্নে স্থঃ॑ সু॒ম্নে মা॑ ধত্তম্ । য়॒জ্ঞ নম॑শ্চ ত॒ऽউপ॑ চ য়॒জ্ঞস্য॑ শি॒বে সংতি॑ষ্ঠস্ব॒ স্বি᳖ষ্টে॒ মে॒ সংতি॑ষ্ঠস্ব ॥ ১ঌ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ঘৃতাচী স্থ ইত্যস্য ঋষিঃ স এব । অগ্নিবায়ূ দেবতে । ভুরিক্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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