यजुर्वेद - अध्याय 2/ मन्त्र 26
स्व॒यं॒भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र॒श्मिर्व॑र्चो॒दाऽअ॑सि॒ वर्चो॑ मे देहि। सूर्य॑स्या॒वृत॒मन्वाव॑र्ते॥२६॥
स्वर सहित पद पाठस्व॒यं॒भूरिति॑ स्वय॒म्ऽभूः। अ॒सि॒। श्रेष्ठः॑। र॒श्मिः। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। अ॒सि॒। वर्चः॑। मे॒। दे॒हि॒। सूर्य्य॑स्य। आ॒वृत॒मित्या॒ऽवृत॑म्। अनु॑। आ। व॒र्त्ते॒ ॥२६॥
स्वर रहित मन्त्र
स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चादाऽअसि वर्चा मे देहि । सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते ॥
स्वर रहित पद पाठ
स्वयंभूरिति स्वयम्ऽभूः। असि। श्रेष्ठः। रश्मिः। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। असि। वर्चः। मे। देहि। सूर्य्यस्य। आवृतमित्याऽवृतम्। अनु। आ। वर्त्ते॥२६॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
अथ सूर्य्यशब्देनेश्वरविद्वदर्थावुपदिश्येते॥
अन्वयः
हे जगदीश्वर! विद्वन्वा त्वं श्रेष्ठो रश्मिः स्वयंभूरसि, वर्च्चोदा असि, त्वं मे वर्च्चो देहि। अहं सूर्य्यस्य तवावृतमाज्ञापालनमन्वावर्त्ते॥२६॥
पदार्थः
(स्वयंभूः) स्वयं भवत्यनादिस्वरूपः (असि) अस्ति वा (श्रेष्ठः) अतिशयेन प्रशस्तः (रश्मिः) प्रकाशकः प्रकाशमयो वा (वर्चोदाः) वर्चो विद्यां दीप्तिं वा ददातीति (असि) भवसि (वर्चः) विज्ञानं प्रकाशनं वा (मे) मह्यम् (देहि) ददाति वा। (सूर्य्यस्य) चराचरस्यात्मनो जगदीश्वरस्य विदुषो जीवस्य वा ‘सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (यजु॰७.४२) अनेनेश्वरस्य ग्रहणम्। सूर्य इति पदनामसु पठितम् (निघं॰५.६) इति गत्यर्थेन ज्ञानरूपत्वादीश्वरो व्यवहारप्रापकत्वाद् विद्वानेवाऽत्र गृह्यते (आवृतम्) समन्ताद् वर्त्तन्ते यस्मिन् तमीश्वराज्ञापालनमुपदेशप्रकाशनं वा (अनु) पश्चादर्थे (आ) अभ्यर्थे (वर्त्ते) स्पष्टार्थः॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.९.३.१५-१७) व्याख्यातः॥२६॥
भावार्थः
नैव परमेश्वरस्य विदुषो जीवस्य वा कौचिन्मातापितरौ कदाचित् स्तः किंत्वयमेव सर्वस्य माता पिता चास्ति। तथा नैतस्मात् कश्चिदुत्तमः प्रकाशहेतुर्विद्याप्रदो वा पदार्थोऽस्ति। अतः सर्वैर्मनुष्यैरस्यैवाज्ञायामनुवर्त्तनीयम्॥२६॥
विषयः
अथ सूर्य्यशब्देनेश्वरविद्वदर्थावुपदिश्येते ॥
सपदार्थान्वयः
हे जगदीश्वर! विद्वन् वा! त्वं श्रेष्ठः अतिशयेन प्रशस्तो रश्मिः प्रकाशकः प्रकाशमयो वा स्वयम्भूः स्वयं भवतीत्यनादिस्वरूपः असि (अस्ति वा), वर्च्चोदाः वर्च्चो=विद्यां दीप्तिं वा ददातीति असि भवसि, त्वं मे मह्यं वर्च्चो विज्ञानं प्रकाशनं वा देहि (ददाति वा)।
अहं सूर्यस्य चराचरस्याऽऽत्मनो जगदीश्वरस्य विदुषो जीवस्य वा तव आवृतम्=आज्ञा-पालनं समन्ताद्वर्त्तन्ते यस्मिन् तमीश्वराऽऽज्ञापालनमुपदेशप्रकाशनं वा अनु+आ+वर्त्ते पश्चादाभिमुख्येन [वर्तमानो भवेयम्] ॥२ । २६ ॥
पदार्थः
(स्वयंभूः) स्वयं भवतीत्यनादिस्वरूपः (असि) अस्ति वा (श्रेष्ठः) अतिशयेन प्रशस्तः (रश्मिः) प्रकाशकः प्रकाशमयो वा (वर्चोदाः) वर्चो विद्यां दीप्तिं वा ददातीति (असि) भवसि (वर्चः) विज्ञानं प्रकाशनं वा (मे) मह्यम् (देहि) ददाति वा (सूर्यस्य) चराचरस्यात्मनो जगदीश्वरस्य विदुषो जीवस्य वा॥ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च० ॥ य० ७ । ४२ ॥ अनेनेश्वरस्य ग्रहणम् । इति पदनामसु पठितम् निघं० ५॥ ६॥ इति गत्यर्थेन ज्ञानरूपत्वादीश्वरो व्यवहारप्रापकत्वाद्विद्वाने वाऽत्र गृह्ते (प्रावृतम्) समन्ताद्वर्तन्ते यस्मिन् तमीश्वराज्ञापालनमुपदेशप्रकाशनं वा (अनु) पश्चादर्थे (प्रा) अभ्यर्थे (वर्त्ते) स्पष्टार्थः ॥ अयं मंत्र: श० १।९।३।१५-१७ व्याख्यातः ॥ २६ ॥
भावार्थः
[हे जगदीश्वर अथवा विद्वन् ! वा त्वं रचयम्भूरसि]
नैव परमेश्वरस्य विदुषो जीवस्य वा कौचिन्माता पितरौ कदाचित्स्तः, किन्त्वयमेव सर्वस्य माता पिता चारित्त ।
[श्रेष्ठः, वर्चोदा असि]
तथा—नैतस्मात् कश्चिदुत्तमः प्रकाशहेतुर्विद्याप्रदो वा पदार्थोऽस्ति ।
[अहं सूर्यस्य तवावृतम्=आज्ञापालनमन्ववर्त्ते]
अतः सर्वैर्मनुष्यैरस्यैवाज्ञायामनुयर्तनीयम् ॥२।२६ ॥
भावार्थ पदार्थः
स्वयम्भूः=परमेश्वरो विद्वान् जीवो वा। यस्य कौचिन्मातापितरौ न स्तः, किन्त्वमेव सर्वस्य माता पिता चास्ति ॥ श्रेष्ठः=तस्मात्कश्चिदुत्तमः (ई०) । वर्चोदा=प्रकाशहेतुर्विद्याप्रदो वा (ई०। विद्वान्)
विशेषः
वामदेवः । ईश्वर:=ईश्वर और विद्वान्। उष्णिक् । ऋषभः ॥
हिन्दी (5)
विषय
अब अगले मन्त्र में सूर्य्य शब्द से ईश्वर और विद्वान् मनुष्य का उपदेश किया है॥
पदार्थ
हे जगदीश्वर! आप विद्वन् वा (श्रेष्ठः) अत्यन्त प्रशंसनीय और (रश्मिः) प्रकाशमान वा (स्वयंभूः) अपने आप होने वाले (असि) हैं तथा (वर्चोदाः) विद्या देने वाले (असि) हैं, इसी से आप (मे) मुझे (वर्चः) विज्ञान और प्रकाश (देहि) दीजिये, मैं (सूर्य्यस्य) जो आप चराचर जगत् के आत्मा हैं, उनके (आवृतम्) निरन्तर सज्जन जन जिसमें वर्त्तमान होते हैं, उस उपदेश को (अन्वावर्ते) स्वीकार करके वर्त्तता हूं॥२६॥
भावार्थ
परमेश्वर और [विद्वान्] जीव का कोई माता वा पिता नहीं है, किन्तु यही सब का माता पिता है तथा जिससे बढ़ कर कोई विज्ञानप्रकाशक विद्या देने वाला नहीं है। जैसे सब मनुष्यों को इस परमेश्वर ही की आज्ञा में वर्त्तमान होना चाहिये, वैसे ही जो विद्वान् भी प्रकाश वाले पदार्थों में अवधिरूप और व्यवहारविद्या का हेतु है, जिस के उपदेशरूप प्रकाश को प्राप्त होकर प्रकाशित होते हैं, वह क्यों न सेवना चाहिये॥२६॥
भाषार्थ
हे जगदीश्वर अथवा विद्वन्! आप (श्रेष्ठः) अत्यन्त प्रशंसनीय (रश्मिः) सब को प्रकाश देने वाले तथा स्वयं प्रकाशमान (स्वयम्भूः) अनादि-स्वरूप (असि) हो, (वर्च्चोदाः) विद्या वा प्रकाश देने वाले (असि) हो, आप (मे) मुझे (वर्च्चः) विज्ञान वा प्रकाश (देहि) दीजिए अथवा देते ही हो।
मैं (सूर्य्यस्य) चराचर जगत् के आत्मा व्यापक तुझ जगदीश्वर अथवा विद्वान् जीव के (आवृतम्) सज्जन लोग जिसमें सदा वर्तमान रहते हैं उस आज्ञापालन अथवा उपदेशों को प्रकाशित करने में (अनु-आ-वर्त्ते) सदा लगा रहूँ॥२।२६॥
भावार्थ
परमेश्वर और विद्वान् जीव के कोई माता पिता नहीं है किंतु यह ईश्वर ही सब का माता और पिता है। और--इससे उत्तम, प्रकाश का हेतु तथा विद्याप्रदान करने वाला नहीं है।
इस लिये सब मनुष्य ईश्वर और विद्वान् की आज्ञा में रहें॥२।२६॥
भाष्यसार
१. ईश्वर--यहाँ सूर्य शब्द के श्लेष से दो अर्थ हैं--एक ईश्वर और दूसरा विद्वान्। प्रथम ईश्वर अर्थ कहते हैं--जगदीश्वर सब से उत्तम, सूर्य आदि पदार्थों को प्रकाशित करने वाला एवं स्वयं प्रकाशमय है। ईश्वर के माता-पिता कोई नहीं वही सब का माता-पिता है क्योंकि वह ‘स्वयम्भू’ है। प्रकाश एवं विद्या को देने वाला है, विज्ञान का दाता भी वही है। हम सदा ईश्वर की आज्ञा में रहें।
२. विद्वान्--विद्वान् पुरुष मनुष्यों में सब से श्रेष्ठ होता है, समाज के लिये प्रकाश देने वाला और स्वयं प्रकाश से भरपूर होता है। यहां विद्वान् को आत्मा की दृष्टि से कहा गया है कि जीव के माता-पिता कोई नहीं होते क्योंकि आत्मा भी अनादि होने से से स्वयम्भू है। विद्वान् विद्या और विज्ञान का देने वाला है। अतः अन्य पुरुष विद्वान् की आज्ञा में रहें॥
विषय
‘विष्णु’ की प्रार्थना व आराधना
पदार्थ
गत मन्त्र का विष्णु प्रभु का आराधन निम्न शब्दों में करता है— १. ( स्वयम्भूः असि ) = आप स्वयं होनेवाले हो। ‘आप किसी और पर आश्रित हों’—ऐसी बात नहीं है। आप आत्म-निर्भर हैं। आपकी कोई भी आवश्यकता नहीं है, तभी तो आप ( श्रेष्ठः ) = श्रेष्ठता के दृष्टिकोण से ( परमेष्ठी ) = परम स्थान में स्थित हैं। मैं भी आत्म-निर्भर बनकर श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करूँ।
२. आप ज्ञान-किरणों के पुञ्ज हो अथवा आप इस सारे ब्रह्माण्ड का नियमन करनेवाले हो [ रश्मि = लगाम ]। मैं भी आपका उपासक बनकर ( रश्मिः ) = ज्ञान-किरणोंवाला बनूँ, अपने जीवन पर पूर्ण नियन्त्रणवाला होऊँ। मनरूप लगाम को काबू करके मैं अपने जीवन को बड़ा संयत बना पाऊँ।
३. ( वर्चोदा असि ) = हे प्रभो! आप अपने उपासकों को वर्चस् देनेवाले हैं, ( मे ) = मुझे भी ( वर्चः ) = शक्ति ( देहि ) = दीजिए। वस्तुतः ‘संयत जीवन’ का ही परिणाम ‘शक्ति की प्राप्ति’ है। जैसे आत्म-निर्भरता—बाह्य वस्तुओं पर निर्भर न रहना ‘श्रेष्ठता’ का साधन है [ स्वयम्भू = श्रेष्ठ ], उसी प्रकार ज्ञान व संयत जीवन ‘वर्चस्’ के उपाय हैं।
४. इस वर्चस् की प्राप्ति के लिए मैं ( सूर्यस्य ) = सूर्य के ( आवृतम् अनु ) = आवर्तन के अनुसार ( आवते ) = अपने दैनिक कार्यक्रम का आवर्तन करता हूँ। जैसे सूर्य अपनी क्रियाओं में बड़ा नियमित है, उसी प्रकार मेरा कार्यक्रम भी सूर्य की भाँति चलता है। यह प्रकाशमय नियमित जीवन ही सम्पूर्ण शक्ति का कारण है।
भावार्थ
भावार्थ — हम आत्म-निर्भर बनकर श्रेष्ठ बनें, नियमित जीवनवाले होकर शक्तिशाली हों और सूर्य की भाँति अपनी क्रियाओं में लगे रहें।
पदार्थ
पदार्थ = हे जगदीश्वर ! आप ( स्वयम्भूः असि ) = अजन्मा अनादि हैं। ( श्रेष्ठः ) = अत्यन्त प्रशंसनीय, ( रश्मि: ) = प्रकाशमान ( वर्चोदा: ) = विद्या वा प्रकाश देनेवाले ( असि ) = हैं, ( वर्चो मे देहि ) = मुझे विद्या वा प्रकाश दो । ( सूर्यस्य ) = चराचर जगत् के आत्मा जो आप भगवान् वा इस भौतिक सूर्य के ( आवृतम् ) = आचरण को मैं ( अनु आवर्त्ते ) = स्वीकार करता हूँ ।
भावार्थ
भावार्थ = हे अजन्मा सर्वोत्तम ज्ञानस्वरूप विज्ञानप्रद परमात्मन्! आप बड़ेबड़े ऋषि महर्षियों को भी वैदिक ज्ञान और आत्मज्ञान के देनेवाले हैं, कृपया हमें भी ब्रह्मज्ञानरूप वर्चस् देकर श्रेष्ठ बनावें । चराचर जगत् के आत्मा सूर्य जो आप, आपकी आज्ञा का पालन करते हुए हम सबको उपदेश देकर आप का सच्चा ज्ञानी और प्रेमी-भक्त बनाएँ । यह भौतिक सूर्य जैसे अन्धकार का नाशक और सबका उपकार कर रहा है, ऐसे हम भी अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करते हुए सबके उपकार करने में प्रवृत्त होवें।
विषय
परमेश्वर से तेज और बल की प्रार्थना।
भावार्थ
हे परमेश्वर ! तू ( स्वयंभूः असि ) किसी की अपेक्षा विना किये, स्वतन्त्र समस्त जगत् के उत्पादन, पालन और संहार में स्वयं समर्थ है। तू सब से (श्रेष्ठः) प्रशंसनीय (रश्मिः) परम ज्योति अथवा रश्मि, सब को अपने वश में करने वाला है। तू ( वर्चोदाः असि) सूर्य के समान तेज का देनेहारा है। (मे वर्चः देहि) मुझे तेज प्रदान कर । मैं भी ( सूर्यस्य ) सूर्य के समान सब चराचर जगत् के प्रेरक उत्पादक परमेश्वर के ( आवृतम् ) उपदेश किये आचार या व्रत का ( अनु आवर्त्ते ) पालन करूं। अर्थात् जिस प्रकार सूर्य नियम से दिन रात का सम्पादन करता है और सबको प्रकाश देता और तपता है उसी प्रकार मैं नियम से सोऊं, जागूं, तेजस्वी बनूं, तप करूं । सूर्य के व्रत का पालन करूं ॥ शत० १ । ९ | ३|१६ । १७ ॥
टिप्पणी
२६ --ईश्वरो देवता । द० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
परमेष्ठी प्राजापत्यः, देवाः प्राजापत्या, प्रजापतिर्वा ऋषिः )
ईश्वरो देवता । उष्णिक् छन्दः । ऋषभः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
परमेश्वर व विद्वानांचा कोणी माता-पिता नसतो. तर तेच सर्वांचे माता-पिता असतात. त्यांच्यापेक्षा जास्त विज्ञानयुक्त अशी विद्या देणारा कोणीही नसतो.
टिप्पणी
सर्व माणसांनी परमेश्वराच्या आज्ञेचेच पालन केले पाहिजे. तसेच जे विद्वान पदार्थांची व व्यवहाराची विद्या शिकवितात तेही परमेश्वराचे उपदेशरूपी ज्ञान प्राप्त करून स्वतः प्रकाशित होतात. तेव्हा त्या परमेश्वराचा अंगीकार करणे योग्य नव्हे काय?
विषय
पुढील मंत्रात सूर्य या शब्दाने ईश्वर आणि विद्वान मनुष्य या दोन अर्थांचा बोध करविला आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ -हे जगदीश्वरा, तू विद्यावान ज्ञानवान आहेस. (श्रेष्ठ) प्रशंसनीय (रश्मि:) प्रकाशमान व (स्वयंभू:) स्वयंभू (असि) आहेस. (वर्च्चोदा) विद्या देणारा (असि) आहेस (मे) मला (वर्च्व:) विज्ञान आणि प्रकाश (देही) दे. (सूर्य्यस्य) चराचर जगताचा तू आत्मा आहेस. (आवृतम्) सज्जन तुझ्या उपदेश व आदेशाच्या अधीन राहून व्यवहार करतात. तुझ्या त्या उपदेशाचा (अत्वावर्ते) मी स्वीकार करतो. (तुझ्या आदेशा-उपदेशाप्रमाणे मी वागेन) ॥26॥
भावार्थ
भावार्थ- परमेश्वराचा आणि जीवाचा कोणी माता वा पिता नाहीं. (ईश्वर व जीव नित्य आणि अनादि आहेत) परमात्माच सूर्याचा पिता आहे. त्याच्यापेक्षा अधिक विज्ञान आणि प्रकाश (बुद्धी व प्रेरणा) देणारा कोणी नाही. मनुष्यांनी अशा या नित्य ज्ञान विज्ञानप्रदाता परमेश्वराच्या आज्ञेत रहावे. त्याचप्रमाणे मनुष्यांनी विद्वानांच्या उपदेशाचेही सेवन/पालन केले पाहिजे, कारण की ज्ञात, प्रकाशित व उत्पन्न पदार्थामधे जे गुण आहेत विद्वज्जन त्यां गुणांना जाणून व्यवहार आणि शिल्पादी विद्या सर्वांना शिकवितात. अशा विद्वानांच्या उपदेशाचे ग्रहण का बरे करूं नये ? ॥26॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Oh God Thou art Self-Existent, Most Excellent, and Self Effulgent, Giver art thou of knowledge. Give me knowledge. I follow the command of God.
Meaning
Lord of the universe, self-existent, self-refulgent, greatest of all, giver of light and honour, give me light and honour. I follow the path of the sun in orbit, the path of Dharma revealed by you.
Translation
O Lord, you are self-existent; you are the most sublime ray and bestower of lustre. (1) May you bestow lustre on me. May I follow the path of the sun. (2)
Notes
Svayambhuh. born of himself; not created by any one else; self-existent. Avrtam, आवर्तम्; course of the sun; path of the sun.
बंगाली (2)
विषय
অথ সূর্য়্যশব্দেনেশ্বরবিদ্বদর্থাবুপদিশ্যেতে ॥
এখন পরবর্ত্তী মন্ত্রে সূর্য্য শব্দ দ্বারা ঈশ্বর ও বিদ্বান্ মনুষ্যের উপদেশ প্রদান করা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে জগদীশ্বর ! আপনি বিদ্বান্ বা (শ্রেষ্ঠঃ) অত্যন্ত প্রশংসনীয় এবং (রশ্মিঃ) প্রকাশমান অথবা (স্বয়ম্ভূঃ) স্বয়ম্ভূ তথা (বর্চোদা) বিদ্যাদাতা (অসি) হন । এইজন্য আপনি (মে) আমাকে (বর্চ্চঃ) বিজ্ঞান ও প্রকাশ (দেহি) দিন । (সূর্য়্যস্য) আপনি যে চরাচর জগতের আত্মা তাঁহার (আবৃতম্) নিরন্তর সজ্জন জন যাহাতে বর্ত্তমান থাকে সেই উপদেশকে আমি (অন্বাবর্ত্তে) স্বীকার করিয়া ব্যবহার করি ॥ ২৬ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- পরমেশ্বর এবং (বিদ্বান্) জীবের কোনও মাতা-পিতা নেই কিন্তু ইনিই সকলের মাতা-পিতা তথা যাহা হইতে অধিক কোনও বিজ্ঞান প্রকাশক, বিদ্যাদাতা নেই । যেমন সব মনুষ্যদিগকে এই পরমেশ্বরেরই আজ্ঞায় বর্ত্তমান থাকা উচিত, সেইরূপই বিদ্বান্ও প্রকাশবান পদার্থে অবধিরূপ ও ব্যবহারবিদ্যার হেতু, যাঁহার উপদেশরূপ প্রকাশ প্রাপ্ত হইয়া প্রকাশিত হয় তাঁহাকে কেন সেবন করা উচিত নহে? ॥ ২৬ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
স্ব॒য়ং॒ভূর॑সি॒ শ্রেষ্ঠো॑ র॒শ্মির্ব॑র্চো॒দাऽঅ॑সি॒ বর্চো॑ মে দেহি । সূর্য়॑স্যা॒বৃত॒মন্বা ব॑র্তে ॥ ২৬ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
স্বয়ংভূরিত্যস্য ঋষিঃ স এব । ঈশ্বরো দেবতা । উষ্ণিক্ ছন্দঃ ।
ঋষভঃ স্বরঃ ॥
পদার্থ
স্বয়ংভূরসি শ্রেষ্ঠো রশ্মির্বর্চোদাঽসি বর্চো মে দেহি। সূর্যস্যাবৃতমন্বাবর্তে।।৮।।
(যজু ২।২৬)
পদার্থঃ হে জগদীশ্বর! তুমি (স্বয়ম্ভূঃ অসি) জন্মরহিত, অনাদি, (শ্রেষ্ঠঃ) অত্যন্ত প্রশংসনীয়, (রশ্মিঃ) প্রকাশমান, (বর্চোদাঃ) বিদ্যা বা প্রকাশ দানকারী (অসি) হও, (বর্চো মে দেহি) আমাকে বিদ্যা বা জ্ঞান প্রদান কর। (সূর্যস্য) চরাচর জগতের আত্মা যে ভগবান, তাঁকে অথবা এই ভৌতিক সূর্যের (আবৃতম্) আচরণকে আমি (অনু আবর্তে) স্বীকার করছি।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে জন্মরহিত, সর্বোত্তম, জ্ঞানস্বরূপ, বিজ্ঞানপ্রদ পরমাত্মন! তুমি বড় বড় ঋষি মহর্ষিদেরও বৈদিক জ্ঞান এবং আত্মজ্ঞানের দানকর্তা। কৃপা করে আমাদেরও ব্রহ্মজ্ঞানরূপ বিদ্যা দান করে শ্রেষ্ঠ বানাও। চরাচর জগতের আত্মারূপ সূর্যেরও প্রকাশকারী তুমি। তোমার আজ্ঞা পালন করে আমরা সবাইকে উপদেশ প্রদান করে তোমার সত্য জ্ঞানী এবং প্রেমী ভক্ত বানাব। এই ভৌতিক সূর্য যেমন অন্ধকারের নাশক এবং সবার উপকার করে থাকে, তেমনি আমরাও অজ্ঞানরূপী অন্ধকারের নাশ করে সবার উপকার করাতে প্রবৃত্ত হব।।৮।।
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