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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 164 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 13
    ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    पञ्चा॑रे च॒क्रे प॑रि॒वर्त॑माने॒ तस्मि॒न्ना त॑स्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तस्य॒ नाक्ष॑स्तप्यते॒ भूरि॑भारः स॒नादे॒व न शी॑र्यते॒ सना॑भिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पञ्च॑ऽअरे । च॒क्रे । प॒रि॒ऽवर्त॑माने । तस्मि॑न् । आ । त॒स्थुः॒ । भुव॑नानि । विश्वा॑ । तस्य॑ । न । अक्षः॑ । त॒प्य॒ते॒ । भूरि॑ऽभारः । स॒नात् । ए॒व । न । शी॒र्य॒ते॒ । सऽना॑भिः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा। तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पञ्चऽअरे। चक्रे। परिऽवर्तमाने। तस्मिन्। आ। तस्थुः। भुवनानि। विश्वा। तस्य। न। अक्षः। तप्यते। भूरिऽभारः। सनात्। एव। न। शीर्यते। सऽनाभिः ॥ १.१६४.१३

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 13
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे विद्वांसः पञ्चारे परिवर्त्तमाने तस्मिञ्चक्रे विश्वा भुवनान्यातस्थुः। तस्याक्षो न तप्यते, सनाभिर्भूरिभारः कालः सनात् नैव शीर्यते ॥ १३ ॥

    पदार्थः

    (पञ्चारे) पञ्च तत्त्वानि अरा यस्मिँस्तस्मिन् (चक्रे) चक्रवद्गम्यमाने (परिवर्त्तमाने) (तस्मिन्) (आ) (तस्थुः) तिष्ठन्ति (भुवनानि) लोकाः (विश्वा) सर्वाणि (तस्य) (न) निषेधे (अक्षः) पुरो भागः (तप्यते) (भूरिभारः) भूरि बहुर्भारो यस्मिन् सः (सनात्) सनातने (एव) (न) (शीर्यते) हिंस्यते (सनाभिः) समाना नाभिर्बन्धनं यस्य सः ॥ १३ ॥

    भावार्थः

    यथेदं चक्रं कारणकालाकाशदिगात्मकं जगत्परमेश्वरे व्याप्तं वर्त्तते तथैव कालाकाशदिक्षु कार्यकारणात्मकं जगद्व्याप्यमस्ति ॥ १३ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे विद्वानो ! (पञ्चारे) जिसमें पाँच तत्त्व अरारूप हैं (परिवर्त्तमाने) और जो सब ओर से वर्त्तमान (तस्मिन्) उस (चक्रे) पहिये के समान ढुलकते हुए पञ्चतत्त्व के पञ्चीकरण में (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक (आ, तस्थुः) अच्छे प्रकार स्थिर होते हैं (तस्य) उसका (अक्षः) अगला भाग अर्थात् जो उससे प्रथम ईश्वर है वह (न) नहीं (तप्यते) कष्ट को प्राप्त होता अर्थात् संसार के सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता (सनाभिः) और जिसका समान बन्धन है अर्थात् क्रिया के साथ में लगा हुआ है और (भूरिभारः) जिनमें बहुत भार हैं बहुत कार्य कारण आरोपित हैं वह काल (सनात्) सनातनपन से (नैव) नहीं (शीर्यते) नष्ट होता ॥ १३ ॥

    भावार्थ

    जैसे यह चक्ररूप कारण, काल, आकाश और दिशात्मक जगत् परमेश्वर में व्याप्त है, वैसे ही काल, आकाश और दिशाओं में कार्यकारणात्मक जगत् व्याप्य है ॥ १३ ॥

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    विषय

    भूगोल [The globe of our earth]

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित कालचक्र में पृथिवी आदि ग्रहों का निर्माण हुआ। हमारी पृथिवी भी एक चक्र के रूप में है । (तस्मिन्) = उस (परिवर्तमाने) = निरन्तर गतिशील में (पञ्चारे चक्रे) = पाँच अरोंवाले– पाँच भागों में विभक्त भूचक्र में (विश्वा भुवनानि) = सब प्राणी (आतस्थुः) = ठहरे हुए हैं। २. इस भूचक्र के अक्ष पर कितना भार है ! परन्तु (तस्य) = उस भूमि का (अक्षः) = अक्ष (भूरिभारः) = अत्यधिक भारवाला होता हुआ भी (न तप्यते) = सन्तप्त नहीं होता। 'कितना दृढ़ होगा वह अक्ष' – यह सोचकर ही मनुष्य का मस्तिष्क चकरा जाता है। इतना ही नहीं, सामान्य चक्रों में तो रगड़ से घिस घिसाकर चक्रनाभि शीर्ण हो जाती है, परन्तु यह चक्र (सनात्) = सदा से (सनाभिः) = समान नाभिवाला होता हुआ (एव) = भी (न) = नहीं (शीर्यते) = शीर्ण होता । लौकिक रथ का अक्ष तो भार से भग्न हो जाता है और नाभि चौड़ी-सी हो जाया करती है, परन्तु इस भूचक्र के अक्ष और नाभि कितने अद्भुत हैं कि उनमें किसी प्रकार का विकार अर्को वर्षों में भी नहीं-आ पाता। यह सोचकर निर्माता की अद्भुत महिमा का स्मरण हो जाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- इस निरन्तर गतिशील भूचक्र में पाँच भागों में बटे हुए सब प्राणी ठहरे हुए हैं। इसका अक्ष इतना सुदृढ़ है कि वह अत्यधिक भार का वहन करता हुआ भी जीर्ण-शीर्ण नहीं होता ।

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    विषय

    पञ्चार चक्र, आत्मा।

    भावार्थ

    ( पञ्चारे चक्रे ) पांच अरों वाला चक्र ( परि वर्त्तमाने ) जो बराबर घूम रहा है उसके आश्रय में ही ( विश्वा भुवनानि तस्थुः ) समस्त भुवन स्थित हैं । ( तस्य ) उसका ( भूरिभारः ) बहुत से भार से युक्त ( अक्षः ) धुरा ( न तप्यते ) गरम नहीं होता वहः ( सनाभिः ) अपनी नाभि सहित ( सनात् एव ) चिर काल से नित्य, अनादि से चला आ रहा है तो भी ( न शीर्यते ) वह नहीं घिसता ( १ ) आदित्य या संवत्सर चक्र बराबर घूम रहा है । उसमें पांच ऋतु पांच अरे हैं। उसका अक्ष-अर्थात् अध्यक्ष बहुत से प्राणियों को भरण पोषण करने से 'भूरिभार' है। वह ( न तप्यते ) संतप्त नहीं होता, जिस प्रकार चक्र का धुरा बहुत भार लेकर चलता हुआ गरमा जाता है। उस प्रकार संवत्सर चक्र का केन्द्र तप्त नहीं होता, तो भी वह कालचक्र अनादि काल से चला आ रहा है, वह क्षीण नहीं होता। ( २ ) अध्यात्म में—पांच इन्द्रि पांच अरे हैं। उनसे युक्त आत्मा के आश्रय ही सब ( भुवनानि ) उत्पन्न होने हारे प्राणी गण स्थिर हैं उसका ( अक्षः ) अध्यक्ष आत्मा सबको धारण करके भी ( न तप्यते ) खिन्न नहीं होता, वह सर्व शक्तिमान् प्रभु अनादि काल से विद्यमान्, सबका समान रूप से नाभि अर्थात् आश्रय है, वह कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। ( ३ ) यह समस्त जगत् चक्र भी पांच भूत रूप अरों से युक्त है, उसका अध्यक्ष भी ईश्वर है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दीर्घतमा ऋषिः॥ देवता—१-४१ विश्वदेवाः। ४२ वाक् । ४२ आपः। ४३ शकधूमः। ४३ सोमः॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च। ४५ वाक्। ४६, ४७ सूर्यः। ४८ संवत्सरात्मा कालः। ४९ सरस्वती। ५० साध्या:। ५१ सूर्यः पर्जन्यो वा अग्नयो वा। ५२ सरस्वान् सूर्यो वा॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप्। ८, ११, १८, २६,३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप्। २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२, त्रिष्टुप्। १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२, १५, २३ जगती। २९, ३६ निचृज्जगती। २० भुरिक पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः। ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती। ५१ विराड् नुष्टुप्।। द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे हे चक्ररूप कारण, काल, आकाश व दिशात्मक जग परमेश्वरात व्याप्त आहे तसेच काल, आकाश व दिशांमध्ये कार्यकारणात्मक जग व्याप्य आहे. ॥ १३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Five are the spokes in the wheel of time-cum- prakrti, the temporal existence of physical world.$(These are the five elements of prakrti, akasha, vayu, agni, apah and prthivi, and their internal changes). This wheel of prakrti in time is ever on the move. In that wheel of time and physical change abide all the worlds of the universe. The axis of that carries the immense weight of existence but it never gets heated. With its centre-hold on this axis it has been going on since eternity and it will go on till eternity, but it never wears away. It is never destroyed. (The axis of the physio-temporal wheel is the constant substratum, original Prakrti, and the centre-hold is the Lord Supreme.)

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Relationship between time and world defined.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    All space planets and Panchabhootas abide in this five-spoked (the five spokes are the five elements) revolving wheel of Time. It's heavily loaded axle is never heated. The Time is heavily laden (so to speak) and has God as a support (axle) and it has no wear and tear.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    This Chakra ( circle) in the form Of the world consists of the cause (Karana), Time ( Kala ) Ether ( Akasha ), Directions (Disha) etc. and is pervaded by Omnipresent God. Likewise, the universe is pervaded by Time Ether and Directions.

    Foot Notes

    (पञ्चतारे) पञ्चतत्त्वानि अरा यस्मिन् तस्मिन् = Time having five spokes in the form of five elements. ( सनाभिः) समाना नाभिः बन्धनं यस्य सः = Having common binding power or support (God).

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