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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 164 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 6
    ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन्पृ॑च्छामि वि॒द्मने॒ न वि॒द्वान्। वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अचि॑कित्वान् । चि॒कि॒तुषः॑ । चि॒त् । अत्र॑ । क॒वीन् । पृ॒च्छा॒मि॒ । वि॒द्मने॑ । न । वि॒द्वान् । वि । यः । त॒स्तम्भ॑ । षट् । इ॒मा । रजां॑सि । अ॒जस्य॑ । रू॒पे । किम् । अपि॑ । स्वि॒त् । एक॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन्पृच्छामि विद्मने न विद्वान्। वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अचिकित्वान्। चिकितुषः। चित्। अत्र। कवीन्। पृच्छामि। विद्मने। न। विद्वान्। वि। यः। तस्तम्भ। षट्। इमा। रजांसि। अजस्य। रूपे। किम्। अपि। स्वित्। एकम् ॥ १.१६४.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 6
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 15; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    अचिकित्वानहं चिदत्र चिकितुषः कवीन् विद्वान् विद्मने न पृच्छामि। यः षडिमा रजांसि वितस्तम्भ। अजस्य रूपे किं स्विदप्येकमासीत्तद्यूयं ब्रूत ॥ ६ ॥

    पदार्थः

    (अचिकित्वान्) अविद्वान् (चिकितुषः) (चित्) अपि (अत्र) अस्मिन् विद्याव्यवहारे (कवीन्) पूर्णविद्यानाप्तान् (पृच्छामि) (विद्मने) विज्ञानाय (न) इव (विद्वान्) विद्यावान् (वि) (यः) (तस्तम्भ) स्तभ्नाति (षट्) (इमा) इमानि (रजांसि) पृथिव्यादीनि स्थूलानि तत्त्वानि (अजस्य) प्रकृतेर्जीवस्य वा (रूपे) (किम्) (अपि) (स्वित्) (एकम्) ॥ ६ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। यथा अविद्वांसो विदुषः पृष्ट्वा विद्वांसो भवन्ति तथा विद्वांसोऽपि परमविदुषः पृष्ट्वा विद्या वर्द्धयेयुः ॥ ६ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    (अचिकित्वान्) अविद्वान् मैं (चित्) भी (अत्र) इस विद्याव्यवहार में (चिकितुषः) अज्ञानरूपी रोग के दूर करनेवाले (कवीन्) पूरी विद्यायुक्त आप्तविद्वानों को (विद्वान्) विद्यावान् (विद्मने) विशेष जानने के लिये (न) जैसे पूछे वैसे (पृच्छामि) पूछता हूँ, (यः) जो (षट्) छः (इमा) इन (रजांसि) पृथिवी आदि स्थूल तत्त्वों को (वि, तस्तम्भ) इकट्ठा करता है (अजस्य) प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण वा जीव के (रूपे) रूप में (किम्) क्या (स्वित् अपि) ही (एकम्) एक हुआ है इसको तुम कहो ॥ ६ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अविद्वान् विद्वानों को पूछ के विद्वान् होते हैं, वैसे विद्वान् भी परम विद्वानों को पूछ कर विद्या की वृद्धि करें ॥ ६ ॥

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    विषय

    प्रश्नकर्ता

    पदार्थ

    १. (अचिकित्वान्) = अविद्वान् होता हुआ, इस शरीर और शरीरी के रूप को ठीक-ठीक क्रान्तदर्शी न समझता हुआ (चित्) = ही (अत्र) = इस मानव जीवन में (चिकितुषः कवीन्) = ज्ञानी, आपसे (पृच्छामि) = पूछता हूँ । मानव देह की सफलता के लिए मैं आप विद्वानों से इस अध्यात्म के प्रश्न को जानने का प्रयत्न करता हूँ । २. आप ज्ञानी हैं, क्रान्तदर्शी हैं। इसके विपरीत मैं न (विद्वान्) = नासमझ हूँ। मेरे लिए तो सारा संसार पहेली-सा बना हुआ है। मैं वादविवाद के लिए नहीं अपितु जिज्ञासु के रूप में (विद्मने) = ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ। आप कवि हैं। मैं आपके प्रकाश से अपने हृदयान्धकार को दूर करने के लिए उस प्रभु के विषय में कुछ पूछता हूँ (यः) = जो (इमा) = इन (षट्) = छह रजांसि लोकों को (वि) = अलग अलग- अपने-अपने स्थान में (तस्तम्भ) = थामे हुए है। सभी लोक उस प्रभु के आश्रय में अत्यधिक तीव्र गति से चलते हुए भी टकराते नहीं, क्या अद्भुत व्यवस्था है ! ४. मैं छह लोकों के धारक प्रभु के विषय में जानना चाहता हूँ। मैंने ऐसा सुना है कि सातवाँ लोक जो (अजस्य) = अजन्मा प्रभु के (रूपे) = स्वरूप में ही विद्यमान है, (एकं किमपि स्वित्) = वह एक जो इन लोकों की भाँति लोक है भी या नहीं। वह तो प्रभु का अपना रूप ही है। 'सत्यम्' यह उस लोक का नाम है। इस प्रभु के विषय में ही मैं पूछता हूँ ।

    भावार्थ

    भावार्थ - नासमझ होने के कारण मनुष्य ज्ञानियों की शरण में जाए और इस संसार तथा परमात्मा के सम्बन्ध में उनसे पूछे।

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    विषय

    सर्वाधार परमेश्वर विषयक प्रश्न।

    भावार्थ

    ( अत्र ) इस तत्व ज्ञान के लिये मैं ( चिकितुषः ) ज्ञानवान् क्रान्तदर्शी विद्वानों के समीप जाकर ( न विद्वान् ) स्वयं कुछ भी न जानता हुआ ( अचिकित्वान् ) अज्ञानी शिष्य के समान ( विद्मने ) ज्ञान लाभ करने के लिये ही ( पृच्छामि ) उस परमेश्वर या महान् शक्तिमान् के विषय में प्रश्न करता हूं। ( षड् रजांसि ) मुख्य प्राण जिस प्रकार छः गौण प्राणों और सूर्य जिस प्रकार छः ऋतुओं पर वशी है, उसी प्रकार इन (षड् रजांसि ) छहों लोकों को (यः) जो ( वि तस्तम्भ) विशेष रूप से और विविध प्रकारों से थाम रहा है। (अजस्य) अजन्मा, अनादि, सबके सञ्चालक उस परम तत्व के ( रूपे ) रूप में ( किमपि ) किसी ( एकम् ) एक, उस अद्वितीय पदार्थ का उपदेश करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    दीर्घतमा ऋषिः॥ देवता—१-४१ विश्वदेवाः। ४२ वाक् । ४२ आपः। ४३ शकधूमः। ४३ सोमः॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च। ४५ वाक्। ४६, ४७ सूर्यः। ४८ संवत्सरात्मा कालः। ४९ सरस्वती। ५० साध्या:। ५१ सूर्यः पर्जन्यो वा अग्नयो वा। ५२ सरस्वान् सूर्यो वा॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप्। ८, ११, १८, २६,३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप्। २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२, त्रिष्टुप्। १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२, १५, २३ जगती। २९, ३६ निचृज्जगती। २० भुरिक पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः। ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती। ५१ विराड् नुष्टुप्।। द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जसे अविद्वान विद्वानांना विचारून विद्वान होतात तसे आपल्यापेक्षा श्रेष्ठ विद्वानांना विचारून विद्येची वृद्धी करावी. ॥ ६ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Not knowing what I would know here as a man of knowledge should know, I ask of the men of knowledge and poets of divine vision what that single principle of power could be in the form and nature of the one unborn and eternal Supreme which holds these six higher and lower spheres and atmospheres of the universe.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    A scholar should seek knowledge from the high-ups.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Being myself ignorant, I search for the sages who know the Truth, not claiming as one who knows it. I do it for the sake of gaining knowledge. Who is that one pervading in the form of the matter or the soul (that are eternal and therefore unborn)? Who has upheld these six spheres and planets? Tell me about that one Supreme Being.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The uneducated persons become learned by seeking and putting questions from the learned persons about difficult subjects. That is how the learned persons become more learned and wiser by putting questions to more capable persons and getting satisfactory answers from them.

    Foot Notes

    (रजांसि ) पृथिव्यादीनि स्थूलानि तत्त्वानि = The earth and other gross elements. ( अजस्य ) प्रकृतेर्जीवस्य वा = Of the matter or the soul (both of which are eternal and therefore un-born).

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