ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 2
ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा। त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॑मन॒र्वं यत्रे॒मा विश्वा॒ भुव॒नाधि॑ त॒स्थुः ॥
स्वर सहित पद पाठस॒प्त । यु॒ञ्ज॒न्ति॒ । रथ॑म् । एक॑ऽचक्रम् । एकः॒ । अश्वः॑ । व॒ह॒ति॒ । स॒प्तऽना॑मा । त्रि॒ऽनाभि॑ । च॒क्रम् । अ॒जर॑म् । अ॒न॒र्वम् । यत्र॑ । इ॒मा । विश्वा॑ । भुव॑ना । अधि॑ । त॒स्थुः ॥
स्वर रहित मन्त्र
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा। त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ॥
स्वर रहित पद पाठसप्त। युञ्जन्ति। रथम्। एकऽचक्रम्। एकः। अश्वः। वहति। सप्तऽनामा। त्रिऽनाभि। चक्रम्। अजरम्। अनर्वम्। यत्र। इमा। विश्वा। भुवना। अधि। तस्थुः ॥ १.१६४.२
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 2
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 14; मन्त्र » 2
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अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 14; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथोक्ताग्निप्रयोगतो विमानादियानविषयमाह ।
अन्वयः
यत्र एकचक्रं रथं सप्तनामा एकोऽश्वो वहति यत्र सप्त कला युञ्जन्ति यत्रेमा विश्वा भुवनाऽधितस्थुस्तत्राऽनर्वमजरं त्रिनाभिचक्रं शिल्पिनः स्थापयेयुः ॥ २ ॥
पदार्थः
(सप्त) (युञ्जन्ति) (रथम्) विमानादियानम् (एकचक्रम्) एकं सर्वकलाभ्रमणार्थं चक्रं यस्मिन् तम् (एकः) असहायः (अश्वः) आशुगामी वायुरग्निर्वा (वहति) प्रापयति (सप्तनामा) सप्त नामानि यस्य (त्रिनाभि) त्रयो नाभयो बन्धनानि यस्मिन् (चक्रम्) चक्रम् (अजरम्) जरादिरोगरहितम् (अनर्वम्) प्राकृताश्वयोजनरहितम् (यत्र) (इमा) (विश्वा) अखिलानि (भुवनानि) लोकाः (अधि) (तस्थुः) तिष्ठन्ति ॥ २ ॥
भावार्थः
ये विद्युदग्निजलाद्यश्वयुक्तं यानं विधाय सर्वलोकाऽधिष्ठान आकाशे गमनाऽगमने सुखेन कुर्य्युस्ते समग्रैश्वर्यं लभेरन् ॥ २ ॥
हिन्दी (3)
विषय
अब अग्नि के प्रयोग से विमान आदि यान के विषय को कहते हैं ।
पदार्थ
(यत्र) जहाँ (एकचक्रम्) एक सब कलाओं के घूमने के लिये जिसमें चक्कर है उस (रथम्) विमान आदि यान को (सप्तनामा) सप्तनामोंवाला (एकः) एक (अश्वः) शीघ्रगामी वायु वा अग्नि (वहति) पहुँचाता है वा जहाँ (सप्त) सात कलों के घर (युञ्जन्ति) युक्त होते हैं वा जहाँ (इमा) ये (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकलोकान्तर (अधि, तस्थुः) अधिष्ठित होते हैं वहाँ (अनर्वम्) प्राकृत प्रसिद्ध घोड़ों से रहित (अजरम्) और जीर्णता से रहित (त्रिनाभि) तीन जिसमें बन्धन उस (चक्रम्) एक चक्कर को शिल्पी जन स्थापन करें ॥ २ ॥
भावार्थ
जो लोग बिजुली और जलादि रूप घोड़ों से युक्त विमानादि रथ को बनाय सब लोकों के अधिष्ठान अर्थात् जिसमें सब लोक ठहरते हैं, उस आकाश में गमनाऽगमन सुख से करें, वे समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥ २ ॥
विषय
सब भुवनों का वाहक रथ
पदार्थ
१. (रथम्) = इस शरीररूप रथ में (सप्त) = सात प्रदीप (युञ्जन्ति) = जुड़े हुए हैं। 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्'– इन शब्दों में वेद इन दीपकों का उल्लेख कर रहा है। शब्द के लिए दो कान, गन्धज्ञान के लिए दो नासाविवर, रूप को दिखाने के लिए दो आँखें तथा रस-विज्ञान के लिए जिह्वा । इन सातों दीपकों के ठीक प्रज्वलित रहने पर हमारा रथ प्रकाश में गति करेगा। इनके बुझ जाने पर अन्धकार में टकराकर टूट-फूट जाएगा। २. यह शरीर-रथ (एकचक्रम्) = विलक्षण चक्रोंवाला है। इसमें मूलाधार से लेकर सहस्रार तक सारे ही चक्र अद्भुत एवं विलक्षण हैं । ३. इस शरीररूपी रथ को (एकः अश्वः) = मुख्य प्राण जोकि (सप्तनामा) = सात नामोंवाला है, (वहति) = वहन कर रहा है। 'प्राणा वाव इन्द्रियाणि' प्राण ही ये सब इन्द्रियाँ हैं, अतः नाक, आँख आदि ये सभी नाम उस प्राण के ही हैं। इन सातों नामोंवाला यह मुख्य प्राण ही इस शरीर का धारक व संचालक है। ४. यह (चक्रम्) = शरीर-चक्र (त्रिनाभि) = तीन बन्धनोंवाला है [ह | बन्धने] । शरीर में ये तीन बन्धन 'इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि' हैं। ये तीन ही मनुष्य के महान् शत्रु [काम] का अधिष्ठान बनते हैं। ये तीनों (अजरम्) = अत्यन्त गतिशील [agile] हैं । इन्द्रियाँ और मन तो चञ्चल हैं ही, वासनात्मक बुद्धि भी कभी समाहित व स्थिर नहीं होती। ये तीनों (अनर्वम्) = अहिंसित, नष्ट न होनेवाले हैं, अतः मनुष्य को स्थूल शरीर पर शक्ति न लगाकर इनके ही उत्कर्ष में जुटना चाहिए । ५. यह शरीररूपी रथ वह है (यत्र) = जहाँ (इमा विश्वा भुवना) = इस ब्रह्माण्ड के सभी लोक (अधितस्थुः) = ठहरे हुए हैं। मस्तिष्क द्युलोक है, हृदय अन्तरिक्ष है तथा पाँव पृथिवीलोक हैं। इन सब लोकों में रहनेवाले देव भी इस पिण्ड के अन्दर रह रहे हैं। सूर्य चक्षु के रूप में, चन्द्रमा मन के रूप में तथा अग्नि वाणी के रूप में यहाँ विद्यमान है। इस प्रकार यह शरीर ब्रह्माण्ड के सभी देवों का अधिष्ठान है ।
भावार्थ
भावार्थ - यह शरीररूप रथ अद्भुत है। यह सब लोकों का अधिष्ठान है। उन लोकों के अधिपति सब देव भी यहाँ उपस्थित हैं।
विषय
सात कलायुक्त यन्त्रवत् आत्मा, सूर्य, संवत्सरात्मक चक्र का वर्णन, एक, त्रिनाभि अनर्व चक्र का रहस्य।
भावार्थ
जिस प्रकार ( एकचक्रं रथम् ) बड़े एक चक्र वाले गमनशील महायन्त्र के साथ ( सप्त युञ्जन्ति ) सात यन्त्र कला युक्त हों (सप्तनामा) उन सातों को नमाने या अपने अधीन चलाने वाला उन सब को ( एकः अश्वः वहति ) एक ही वेगवान् अग्नि या मुख्य शक्ति धारण करता है। और वह ( चक्रम् ) महाचक्र ( त्रिनाभि ) तीन मुख्य बंधनों से युक्त हो, ( अजरम् ) कभी नाश न होने वाला, दृढ़, ( अनर्वम् ) अन्य किसी वाह्य शक्ति, अश्व आदि से रहित होता है (यत्र) जिसके आश्रय पर ( इमा विश्वा भुवना ) ये सब अन्य नाना यन्त्र कलाएं स्थित होती हैं उसी प्रकार यह आत्मा से संयुक्त देह ( एकचक्रम् रथम् ) एक आत्मा रूप कर्त्ता से युक्त रथ के समान है। रमण साधन होने से देह रथ है। आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ॥ उप० ॥ उस देह रथ को ( सप्त युंजन्ति ) सात गौण प्राण, सात अश्वों के समान जुतते हैं और ( एकः ) एक ही मुख्य प्राण ( अश्वः ) गाड़ी में लगे अश्व के समान बलवान् और कर्म फलों का भोक्ता आत्मा ( वहति ) धारण करता और उसे चलाता फिराता है। वह आत्मा स्वर्ग ( सप्तनामा ) पूर्व कहे सातों प्राण रूप अश्वों के नामों वाला है। उनको अपने अधीन रखने वाला और उनके कार्यों को करता हुआ वह उनके नामों को स्वयं धारण करता है । देखने से आत्मा ही चक्षु और सूंघने से वही नाक, सुनने से वही कान कहा जाता है। वह ( चक्रम् ) एक मात्र कर्त्ता (त्रिनाभि) शरीर में तीन प्रकृति, तीन गुण, या वात, पित्त, कफ तीन धातु या अग्नि, जल, वायु तीन तत्वों द्वारा बंधा होने से 'त्रिनाभि' है। ( अजरम् ) वह कभी नाश को प्राप्त न होने से 'अजर' है । अथवा स्वयं अचर या अचल, अभोक्ता, कूटस्थ होने से 'अजर' है। उसके चैतन्य के लिये (अनर्वम्) दूसरा कोई सञ्चालक कारण अपेक्षित नहीं होने से वह स्वयं 'अर्वा' होकर 'अनर्वा' है। वह स्वयं सञ्चालक होकर अन्यों से सञ्चालित नहीं होता । ( यन्त्र ) जिसके आश्रय (इमा ) ये सब (भुवना ) प्राणि गण ( अधि तस्थुः ) स्थिर हैं। ( २ ) सूर्य एक सप्त चक्र रथ है । गतिमान् होने से वह 'रथ' है। व्यापक होने से 'अश्व' है। सात ग्रह उसमें लगते हैं। वह सातों को धारण करता और नमाता है। स्वयं अपने, ग्रह और उपग्रह तीनों को बांधने से 'त्रिनाभि' है। अथवा तीनों लोकों को बांधने से 'त्रिनाभि' है। ध्रुव होने से अजर या अचर है। स्वतः गतिमान् होने से 'अनर्वा' है। ये सब पृथिवी आदि लोक उसी पर आश्रित हैं। (३) परमेश्वर पक्ष में—यह आत्मा और परमेश्वर ( रथम् ) रस स्वरूप होने से और और सबका सञ्चालक होने से 'रथ' है। उसको ( सप्त ) सातों चित्त भूमियों पर स्थित साधक जन ( युञ्जन्ति ) योग द्वारा साक्षात् करते हैं। वह व्यापक होने से 'अश्व' है। वह सातों के प्रति, पुत्रों के प्रति माता के समान अमृत रस पान के लिये नमता है। अतः 'सप्तनामा' है। तीनों लोकों, प्रकृति के तीनों गुणों को बांधने वाला व्यवस्थापक होने से,कर्म कर्त्ता, और कर्मफल का व्यवस्थापक होने से 'त्रिनाभि' है। वह अविनाशी, स्वतः अद्वितीय, चिद्-घन है। उसमें ही समस्त लोक आश्रित हैं। (४) इसी प्रकार प्रजापति संवत्सरात्मक चक्र में अधिक मलमास सहित सात ऋतु युक्त है। सूर्य एक अश्व सातों को नमाने या परिणाम रूप से उत्पन्न करने वाला है। तीन ग्रीष्म, वर्षा, शरद् रूप में बद्ध है।
टिप्पणी
विशेष देखो ( अथर्व० का० ९ । सू० ९ । २ ॥ )
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः॥ देवता—१-४१ विश्वदेवाः। ४२ वाक् । ४२ आपः। ४३ शकधूमः। ४३ सोमः॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च। ४५ वाक्। ४६, ४७ सूर्यः। ४८ संवत्सरात्मा कालः। ४९ सरस्वती। ५० साध्या:। ५१ सूर्यः पर्जन्यो वा अग्नयो वा। ५२ सरस्वान् सूर्यो वा॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप्। ८, ११, १८, २६,३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप्। २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२, त्रिष्टुप्। १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक् त्रिष्टुप्। १२, १५, २३ जगती। २९, ३६ निचृज्जगती। २० भुरिक पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः। ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती। ५१ विराड् नुष्टुप्।। द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
जे लोक विद्युत व जल इत्यादीरूपी घोड्यांनी युक्त विमान इत्यादी रथ बनवून सर्व लोकांचे अधिष्ठान अर्थात् ज्यात सर्व लोक स्थित आहेत त्या आकाशात गमनागमन सुखाने करतील तेव्हा त्यांना संपूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त होईल. ॥ २ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Seven enjoin the one-wheel chariot, drawn by one horse of seven names. The wheel, the wheel of time, unaging and automotive, has three sub-wheels with three naves and rims, and in the orbit of this time and space abide all the worlds of the universe.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The carriers propelled by the use of AGNI are dealt.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
There is a one-wheeled chariot in the form of aircraft etc. Seven machines (spokes) are yoked there and it is drawn by one rapid fire in air. It has seven names. The artists should establish the wheel that is thrice exiled, sound and undecaying, free from the common horses in the sky; whereon rest all the regions or worlds.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
The persons who manufacture a vehicles with the proper assembling of electricity, fire and water like horses ( instruments), they travel (fly) comfortably in the sky. The Space is the support of all planets, and travelers attain all kinds of prosperity.
Foot Notes
(एक चक्रम् ) एक सर्वेकला भ्रमणार्थं चक्रम् यस्मिन् = In which there is a central wheel to move all machines. (त्निनाभि ) त्नयो नाभयोबन्धनानि यस्मिन् = With three names. (अनर्वम् ) प्राकृताश्वयोजनरहितम् = Free form the use of ordinary horses. The simile used in the mantra is of the solar system in which the sun having rays of seven colors beads. The three rows of the wheel of the Time are three main weathers of summer, rains and the cold weathers.
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