ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 44
ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः
देवता - अग्निः सूर्यो वायुश्च
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
त्रय॑: के॒शिन॑ ऋतु॒था वि च॑क्षते संवत्स॒रे व॑पत॒ एक॑ एषाम्। विश्व॒मेको॑ अ॒भि च॑ष्टे॒ शची॑भि॒र्ध्राजि॒रेक॑स्य ददृशे॒ न रू॒पम् ॥
स्वर सहित पद पाठत्रयः॑ । के॒शिनः॑ । ऋ॒तु॒ऽथा । वि । च॒क्ष॒ते॒ । स॒व्ँम्व॒त्स॒रे । व॒प॒ते॒ । एकः॑ । ए॒षा॒म् । विश्व॑म् । एकः॑ । अ॒भि । च॒ष्टे॒ । शची॑भिः । ध्राजिः॑ । एक॑स्य । द॒दृ॒शे॒ । न । रू॒पम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
त्रय: केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्। विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ॥
स्वर रहित पद पाठत्रयः। केशिनः। ऋतुऽथा। वि। चक्षते। सव्ँम्वत्सरे। वपते। एकः। एषाम्। विश्वम्। एकः। अभि। चष्टे। शचीभिः। ध्राजिः। एकस्य। ददृशे। न। रूपम् ॥ १.१६४.४४
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 44
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 4
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अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 22; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्विद्वद्विषयमाह ।
अन्वयः
हे अध्यापकाऽध्येतृपरीक्षका यूयं यथा केशिनस्त्रयः सूर्यविद्युद्वायवः संवत्सरे ऋतुथा शचीभिर्विचक्षत एषामेको वपत एको विश्वमभिचष्ट एकस्य ध्राजी रूपं च न ददृशे तथा यूयमिह प्रवर्त्तध्वम् ॥ ४४ ॥
पदार्थः
(त्रयः) वायुविद्युत्सूर्याः (केशिनः) प्रकाशवन्तो ज्ञापकाः (ऋतुथा) ऋतुप्रकारेण (वि) (चक्षते) दर्शयन्ति (संवत्सरे) (वपते) बीजानि संतनुते (एकः) (एषाम्) त्रयाणाम् (विश्वम्) समग्रं जगत् (एकः) सूर्यः (अभि) अभितः (चष्टे) प्रकाशयति (शचीभिः) कर्मभिः। शचीति कर्मना। निघं० २। १। (ध्राजिः) गतिः (एकस्य) वायोः (ददृशे) दृश्यते (न) (रूपम्)। इयं निरुक्ते व्याख्याता । निरु० १२। २७। ॥ ४४ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या यूयं वायुसूर्यविद्युद्वदध्ययनाऽध्यापनादिभिर्विद्या वर्द्धयत यथात्मनो रूपं चक्षुषा न दृश्यते तथा विदुषां गतिर्न लक्ष्यते यथा ऋतवः संवत्सरमारभन्तं समयं विभजन्ति तथा कर्मारम्भं विद्याऽविद्ये धर्माऽधर्मो च विभजन्तु ॥ ४४ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे पढ़ने-पढ़ानेवाले लोगों के परीक्षको ! तुम जैसे (केशिनः) प्रकाशवान् वा अपने गुण को समय पाय जतानेवाले (त्रयः) तीन अर्थात् सूर्य, बिजुली और वायु (संवत्सरे) संवत्सर अर्थात् वर्ष में (ऋतुथा) वसन्तादि ऋतु के प्रकार से (शचीभिः) जो कर्म उनसे (वि, चक्षते) दिखाते अर्थात् समय-समय के व्यवहार को प्रकाशित कराते हैं (एषाम्) इन तीनों में (एकः) एक बिजुलीरूप अग्नि (वपते) बीजों को उत्पन्न कराता (एकः) सूर्य (विश्वम्) समग्र जगत् को (अभि, चष्टे) प्रकाशित करता और (एकस्य) वायु की (ध्राजिः) गति और (रूपम्) रूप (न) नहीं (ददृशे) दीखता वैसे तुम यहाँ प्रवर्त्तमान होओ ॥ ४४ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम वायु, सूर्य और बिजुली के समान अध्ययन-अध्यापन आदि कार्मों से विद्याओं को बढ़ाओ। जैसे अपने आत्मा का रूप नेत्र से नहीं दीखता वैसे विद्वानों की गति नहीं जानी जाती। जैसे ऋतु संवत्सर को आरम्भ करते हुए समय को विभाग करते हैं, वैसे कर्म्मारम्भ विद्या-अविद्या और धर्म्म-अधर्म्म को पृथक्पृथक् करें ॥ ४४ ॥
विषय
तीन केशियों का ज्ञान
पदार्थ
१. (त्रयः) = तीन (केशिन:) = [काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा) प्रकाशमय पदार्थ हैं। प्रकृति हिरण्यमयचमकती है। आत्मा जब तक है शरीर को चमकाये रखता है। प्रभु तो सहस्रों सूर्यों के समान चमकीले हैं ही। ज्ञानी लोग 'छोटे उक्षाओं' को ऋतुथा = [ऋत= light, splendour] प्रकाश के अनुसार, अर्थात् जितना-जितना इन पदार्थों का ज्ञान सम्भव है, उतना उतना (विचक्षते) = बतलाते हैं। ये ज्ञानशूर अपने शिष्यों को ज्ञान देकर परिपक्व करते हैं । २. एषाम् एकः = इन तीनों में से एक, अर्थात् प्रकृति संवत्सरे उचित काल में वपते बीजों का सन्तान करती है, एक बीज को अनेक बीजों में करके उनका फैलाव करती है [वप्-बीज का 'सन्तान' – फैलाव) । ३. परन्तु यह फैलाव प्रभु की अध्यक्षता में हो रहा है। एक अद्वितीय प्रभु (शचीभिः) = अपनी विविध शक्तियों से (विश्वम्) = इस सारे ब्रह्माण्ड को (अभिचष्टे) = देख रहा है। प्रभु की अध्यक्षता में प्रकृति के फैलाव में गलती नहीं होती। ४. (एकस्य) = एक जीव की (ध्राजि:) = दौड़-चहल-पहल (ददृशे) = दिखती है। यह शरीर में रहता हुआ इधर-उधर भागता हुआ नज़र आता है, परन्तु (रूपं न) = इसका रूप हमारी आँखों का विषय नहीं बनता।
भावार्थ
भावार्थ - वीर ज्ञानी लोग त्रैत- ईश्वर, जीव प्रकृति का ज्ञान देकर छोटे उक्षा का परिपाक करते हैं ।
विषय
तीन किसानों वत् वायु सूर्य के कार्य और उसी प्रकार विश्व के सृष्टि, पालन और सहरकारी प्रभु शक्ति के कार्यों का वर्णन ।
भावार्थ
जिस प्रकार (त्रयः केशिनः) तीन केश वाले जटिल पुरुष हों वे तीनों (ऋतुथा विचक्षते) ऋतु के अनुसार अपना २ कार्य देखते हों (एकः एषाम्) इनमें से एक (संवत्सरे वपते) संवत्सर में बीज बोये, (एकः विश्वं अभि चष्टे) और एक समस्त क्षेत्र को देखे, रखवारी करे । और (एकस्य ध्राजिः दृश्यते) तीसरे एक की वेग से चलती धार या दरांती या कांपता सूप आदि दीखे और उसका रूप न दीखे उसी प्रकार इस विश्व में—(त्रयः केशिनः) तीन केश अर्थात् किरणों और अपने २ ज्ञापक चिन्हों सहित पदार्थ विद्यमान हैं जो क्रम से विद्युत्, सूर्य, और वायु हैं । वे तीनों (ऋतुथा) अपनी २ ऋतु के अनुसार (विचक्षते) भिन्न २ विशेष लक्षणों से अपने आप को दिखलाते, बतलाते हैं (एषाम् एकः) इनमें से एक विद्युत् वर्षते मेघ के साथ प्रकट होता है, वह (संवत्सरे) वर्ष में एक बार (वपते) समस्त ओषधियों और प्राणियों के बीजों को वपन करता है। वे मौसम में उत्पन्न होते हैं। उनमें से (एकः) एक सूर्य ज्येष्ठ आदि मास में (विश्वम्) समस्त विश्व को (शचीभिः) किरणों से (अभि चष्टे) सब प्रकार से देखता और प्रकाशित करता है। और (एकस्य) तीसरे वायु का (ध्राजिः दृश्यते) वेग तो देखने में आता है, वह पतझड़ में वेग से बहता है, परन्तु उसका (रूपं न दृश्यते) रूप नहीं देख पड़ता। वायु का रूप नहीं होता। (२) इसी प्रकार विश्व के प्रति परमेश्वर के तीन रूप हैं वे (ऋतुथा) अपने काल गति के अनुसार संसार को दीखते हैं । पहिला बीजों के समान सबको (वपते) उत्पन्न करता है, दूसरा सब प्रकार (शचीभिः) कर्मों से, शक्तियों से (अभि चष्टे) देखता, पालता है। तीसरा काल संहारकारी रूप उसका (ध्राजिः) वेग दीखता है रूप नहीं देखता, काल होकर सबका संहार करता है । अथर्व ०९। १०। २६।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ देवता-१-४१ विश्वेदेवाः । ४२ वाक् । ४२ आपः । ४३ शकधूमः । ४३ सोमः ॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च । ४५ वाक् । ४६, ४७ सूर्यः । ४८ संवत्सरात्मा कालः । ४९ सरस्वती । ५० साध्याः । ५१ सूयः पर्जन्या वा अग्नयो वा । ५२ सरस्वान् सूर्यो वा ॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप् । ८, १८, २६, ३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप् । २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२ त्रिष्टुप् । १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक त्रिष्टुप् । १२, १५, २३ जगती । २९, ३६ निचृज्जगती । २० भुरिक् पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः । ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती । ५१ विराड्नुष्टुप् ॥ द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो! तुम्ही गतिमान वायू, प्रकाशवान सूर्य अग्निरूपी विद्युतप्रमाणे अध्ययन - अध्यापन इत्यादी कर्म करून विद्या वाढवा. जसे आपल्या आत्म्याचे रूप नेत्रांनी दिसत नाही तशी विद्वानांची गती जाणता येत नाही. ऋतू संवत्सराचा आरंभ करीत काळाची विभागणी करतात तसे कर्मारंभ विद्या-अविद्या व धर्म-अधर्म पृथक करावा. ॥ ४४ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Three powers of nature with their distinct identities express themselves and operate according to the cycle of the seasons in the year. One of these, fire, is lit once in the year and generates and germinates the seeds of life. Another the sun, with its action and operations, illuminates the world. The third is wind, the force of it can be perceived but not its shape and form.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
More about the learned persons.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O teachers and students examiners There three (Agni, Surya and Vayu) with a beautiful tresses-so to speak-look down in their several seasons upon the earth; one of them Agni-the ritual fire is established once in a year, comes annually shears the ground; the second one (the sun) by his acts illuminates the universe; while the course of the third one (air) is visible; though not in its form.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O men! like the Vayu, Surya and Agni-you should pool the entire knowledge of various sciences through studies and teaching. As the seasons divide the time (year), likewise you should divide time for different activities and distinguish between the knowledge and ignorance and also between Dharma (righteousness) and Adharma (unrighteousness).
Foot Notes
(केशिन:) प्रकशवन्तो ज्ञापका: Shining or indicators. (शचीभि:) कर्मभिः = By actions.
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