ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 52
ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः
देवता - सरस्वान् सूर्यो वा
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
दि॒व्यं सु॑प॒र्णं वा॑य॒सं बृ॒हन्त॑म॒पां गर्भं॑ दर्श॒तमोष॑धीनाम्। अ॒भी॒प॒तो वृ॒ष्टिभि॑स्त॒र्पय॑न्तं॒ सर॑स्वन्त॒मव॑से जोहवीमि ॥
स्वर सहित पद पाठदि॒व्यम् । सु॒ऽप॒र्णम् । वा॒य॒सम् । बृ॒हन्त॑म् । अ॒पाम् । गर्भ॑म् । द॒र्श॒तम् । ओष॑धीनाम् । अ॒भी॒प॒तः । वृ॒ष्टिऽभिः॑ । त॒र्पय॑न्तम् । सर॑स्वन्तम् । अव॑से । जो॒ह॒वी॒मि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भं दर्शतमोषधीनाम्। अभीपतो वृष्टिभिस्तर्पयन्तं सरस्वन्तमवसे जोहवीमि ॥
स्वर रहित पद पाठदिव्यम्। सुऽपर्णम्। वायसम्। बृहन्तम्। अपाम्। गर्भम्। दर्शतम्। ओषधीनाम्। अभीपतः। वृष्टिऽभिः। तर्पयन्तम्। सरस्वन्तम्। अवसे। जोहवीमि ॥ १.१६४.५२
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 52
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 23; मन्त्र » 6
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अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 23; मन्त्र » 6
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः सूर्यदृष्टान्तेन विद्वद्विषयमाह ।
अन्वयः
हे मनुष्या यथाऽहमवसे दिव्यं सुपर्णं वायसं बृहन्तमपां गर्भमोषधीनां दर्शतं वृष्टिभिरभीपतस्तर्पयन्तं सरस्वन्तं सूर्यमिव वर्त्तमानं विद्वांसं जोहवीमि तथैतं यूयमप्यादत्त ॥ ५२ ॥
पदार्थः
(दिव्यम्) दिव्यगुणस्वभावम् (सुपर्णम्) सुपर्णा रश्मयो विद्यन्ते यस्मिँस्तम् (वायसम्) अतिगन्तारम्। वा गतिगन्धनयोरित्यतोऽसुन् युडागमश्चोणादिः। (बृहन्तम्) सर्वेभ्यो महान्तम् (अपाम्) अन्तरिक्षस्य। आप इत्यन्तरिक्षना०। निघं० १। ३। (गर्भम्) गर्भइव मध्ये स्थितम् (दर्शतम्) यो दर्शयति तम् (ओषधीनाम्) सोमादीनाम् (अभीपतः) अभित उभयत आपो यस्मिँस्तस्मात् (वृष्टिभिः) (तर्पयन्तम्) (सरस्वन्तम्) सरांस्युदकानि बहूनि विद्यन्ते यस्मिँस्तम् (अवसे) रक्षणाद्याय (जोहवीमि) भृशमाददामि ॥ ५२ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यलोको भूगोलानां मध्यस्थः सन् सर्वान् प्रकाशयति तथैव विद्वान् सर्वलोकमध्यस्थः सन् सर्वेषामात्मनः प्रकाशयन्ति यथा सूर्यो वर्षाभिस्सर्वान् सुखयति तथैव विद्वान् विद्यासुशिक्षोपदेशवृष्टिभिः सर्वान् जनानानन्दयति ॥ ५२ ॥अत्राग्निकालसूर्यविमानादीश्वरविद्वत्स्त्रियादिगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम् ॥ इति चतुष्षष्ट्युत्तरं शततमं सूक्तं त्रयोविंशो वर्गो द्वाविंशोऽनुवाकश्च समाप्तः ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर सूर्य के दृष्टान्त से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (अवसे) रक्षा आदि के लिये (दिव्यम्) दिव्य गुण, स्वभावयुक्त (सुपर्णम्) जिसमें सुन्दर गमनशील रश्मि विद्यमान (वायसम्) जो अत्यन्त जानेवाले (बृहन्तम्) सबसे बड़े (अपाम्) अन्तरिक्ष के (गर्भम्) बीच गर्भ के समान स्थित (ओषधीनाम्) सोमादि ओषधियों को (दर्शतम्) दिखानेवाले (वृष्टिभिः) वर्षा से (अभीपतः) दोनों ओर आगे पीछे जल से युक्त जो मेघादि उससे (तर्पयन्तम्) तृप्ति करनेवाले (सरस्वन्तम्) बहुत जल जिसमें विद्यमान उस सूर्य के समान वर्त्तमान विद्वान् को (जोहवीमि) निरन्तर ग्रहण करते हैं, वैसे इसको तुम भी ग्रहण करो ॥ ५२ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक भूगोल के बीच स्थित हुआ सबको प्रकाशित करता है, वैसे ही विद्वान् जन सब लोकों के मध्य स्थिर होता हुआ सबके आत्माओं को प्रकाशित करता है। जैसे सूर्य वर्षा से सबको सुखी करता है, वैसे ही विद्वान् विद्या उत्तम शिक्षा और उपदेशवृष्टियों से सब जनों को आनन्दित करता है ॥ ५२ ॥ इस सूक्त में अग्नि, काल, सूर्य, विमान आदि पदार्थ तथा ईश्वर, विद्वान् और स्त्री आदि के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह एकसौ चौंसठवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग और बाईसवाँ अनुवाक पूरा हुआ ॥
विषय
आचार्य के गुण
पदार्थ
(सरस्वन्तम्) = ज्ञान के समुद्र आचार्य को (अवसे) = रक्षा के लिए (जोहवीमि) = पुकारता हूँ। ज्ञान मनुष्य की रक्षा करता है, उसे पापों से बचाकर अन्त में मोक्ष प्राप्त कराता है। प्राचीनकाल में विद्यार्थी आचार्य को पुकारता था और आचार्य से स्वीकृति मिलने पर उसके सामने उपस्थित होकर श्रद्धा से ज्ञान का श्रवण करता था। इस आचार्य की विशेषताएँ निम्न हैं- १. (दिव्यम्) = आचार्य दिव्य हो। वह दिव्य गुणों को अपने में अवतरित करनेवाला हो। २. (सुपर्णम्) = विद्यार्थियों का उत्तम प्रकार से पालन करनेवाला हो। ३. (वायसम्) = [वय् गतौ] आचार्य क्रियाशील होना चाहिए। वह आलसी व प्रमादी न हो । ४. (बृहन्तम्) = आचार्य सदा विशाल हृदय हो । ५. (अपां गर्भः) = [आपः=रेतः] वीर्यशक्ति का ग्रहण करनेवाला, उसे अपने अन्दर ही सुरक्षित रखनेवाला हो । ६. (दर्शतं ओषधीनाम्) = आचार्य ओषधियों में सबसे अधिक सुन्दर है। ओषधि का अर्थ है दोषों को जलानेवाली। जैसे ओषधियाँ स्थूल शरीर के मलों को जला देती हैं, इसी प्रकार आचार्य मानस व बौद्धिक मलों का दहन कर देते हैं । ७. अन्त में आचार्य (अभीपतः) = चारों ओर से आनेवाले जिज्ञासुओं को (वृष्टिभिः) = ज्ञान की वृष्टि से (तर्पयन्तम्) = तृप्त करते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- उपर्युक्त सात गुणों से अलंकृत आचार्य ही आदर्श युवकों का निर्माण करके राष्ट्र का कल्याण करते हैं ।
विषय
सर्वाधार सहस्वान् मेववत् प्रभु।
भावार्थ
(दिव्य) आकाश में स्थित, तेजोमय, (सुपर्णं) उत्तम रश्मियों से युक्त, (वायसं) अति वेग से गमन करने वाले, (बृहन्तम्) सब की वृद्धि करने वाले और स्वयं महान्, (अपां गर्भम्) जलों को रश्मियों द्वारा अन्तरिक्ष में धारण कर लेने वाले, (दर्शतम्) सबको तेज से दिखाने वाले, स्वयं दर्शनीय, (ओषधीनाम्) ओषधियों को (अभीपतः) ऊपर और नीचे दोनों और से प्राप्त होने वाली (वृष्टिभिः) जलों से (तर्पयन्तं) तृप्त करने वाले (सरस्वन्तम्) जलों से पूर्ण मेघ या सूर्य को जिस प्रकार सभी आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार मैं साधक (दिव्यं) अति कमनीय, कान्तिमय, दिव्य, (सुपर्णः) उत्तम पालनकारी और ज्ञानमय, (वायसं) ज्ञान और बल में सबसे महान् (बृहन्तम्) सबसे बड़े (अपां गर्भम्) प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को भी अपने वश रखने हारे, (दर्शतम्) परम दर्शनीय, अति सुन्दर, (ओषधीनाम्) देह में ताप या जीवन को धारण करने वाले चराचर जगत् को (अभीपतः) सब तरफ की (वृष्टिभिः तर्पयन्तम्) मेघ के समान सुखों की जल धाराओं से तृप्त, एवं आनन्दित करते हुए (सरस्वन्तम्) उत्तम ज्ञान और कर्म के भण्डार, समुद्र के समान अगाध परमेश्वर की (अवसे) ज्ञान प्राप्ति और रक्षा के लिये (जोहवीमि) उपसना करता हूं, उसको पुकारता और उसका आश्रय लेता हूं। इति त्रयोविंशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ देवता-१-४१ विश्वेदेवाः । ४२ वाक् । ४२ आपः । ४३ शकधूमः । ४३ सोमः ॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च । ४५ वाक् । ४६, ४७ सूर्यः । ४८ संवत्सरात्मा कालः । ४९ सरस्वती । ५० साध्याः । ५१ सूयः पर्जन्या वा अग्नयो वा । ५२ सरस्वान् सूर्यो वा ॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप् । ८, १८, २६, ३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप् । २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२ त्रिष्टुप् । १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक त्रिष्टुप् । १२, १५, २३ जगती । २९, ३६ निचृज्जगती । २० भुरिक् पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः । ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती । ५१ विराड्नुष्टुप् ॥ द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्यलोक भूगोलात स्थित होऊन सर्वांना प्रकाशित करतो, तसा विद्वान सर्व लोकांमध्ये स्थिर होऊन सर्वांना प्रकाशित करतो. जसा सूर्य पर्जन्याने सर्वांना सुखी करतो तसेच विद्वान विद्येने, उत्तम शिक्षणाने व उपदेश वृष्टीने सर्वांना आनंदित करतो. ॥ ५२ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
For nourishment, protection and promotion of life on earth, I invoke, adore and constantly offer libations of homage and fragrant samits and havish to the heavenly, bright and blazing angel of cosmic wings, radiating centre of liquid energy and soothing ripener of herbs and greens, ever exuberant flood of generosity, which fills the thirsting earth with rain showers of fertility from the clouds of space.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The duties and attributes of the learned persons are told through the simile of the sun.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men ! I invoke a highly learned person for my protection and preservation who is like the majestic sun. It possesses rays of the sun, which is moving and the greatest of all planets and standing in the Centre of firmament like the womb. The sun is the cause of vision, turning the herbs more effective and delighting all with all planets the rains. I ask you to invite the learned person similarly.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As the solar world illuminates all, being in the Centre of all its related planets, so a learned man illuminates the souls of all because he is in the midst men. As the sun delights all of all by raining down water, so a learned person rejoices all people by giving wisdom, good education and the rains of sermons.
Foot Notes
(सुपर्णम्) सुपर्णा: रश्मयो विद्यन्ते यस्मिन् तम् = Possessed of the rays ( वायसम्) अतिगन्तारम् वा गतिगन्धनयोरित्यतोऽसुन युडागमश्चौणादिकः = Moving all (अपाम्) अन्तरिक्षस्य | आप इत्यन्तरिक्षनाम (NG-13 ) = Of the firmament.
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