ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 164/ मन्त्र 50
ऋषिः - दीर्घतमा औचथ्यः
देवता - साध्याः
छन्दः - विराट्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन्। ते ह॒ नाकं॑ महि॒मान॑: सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः ॥
स्वर सहित पद पाठय॒ज्ञेन॑ । य॒ज्ञम् । अ॒य॒ज॒न्त॒ । दे॒वाः । तानि॑ । धर्मा॑णि । प्र॒थ॒मानि॑ । आ॒सन् । ते । ह॒ । नाक॑म् । म॒हि॒मानः॑ । स॒च॒न्त॒ । यत्र॑ । पूर्वे॑ । सा॒ध्याः । सन्ति॑ । दे॒वाः ॥
स्वर रहित मन्त्र
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
स्वर रहित पद पाठयज्ञेन। यज्ञम्। अयजन्त। देवाः। तानि। धर्माणि। प्रथमानि। आसन्। ते। ह। नाकम्। महिमानः। सचन्त। यत्र। पूर्वे। साध्याः। सन्ति। देवाः ॥ १.१६४.५०
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 164; मन्त्र » 50
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 23; मन्त्र » 4
Acknowledgment
अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 23; मन्त्र » 4
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्विद्वद्विषयमाह ।
अन्वयः
ये देवा यज्ञेन यज्ञमयजन्त यानि ब्रह्मचर्यादीनि धर्माणि प्रथमान्यासन्तानि सेवन्ते सेवयन्ति च ते ह यत्र पूर्वे साध्या देवाः सन्ति तत्र महिमानः सन्तो नाकं सचन्त ॥ ५० ॥
पदार्थः
(यज्ञेन) अग्न्यादिदिव्यपदार्थसमूहेन (यज्ञम्) धर्मार्थकाममोक्षव्यवहारम् (अयजन्त) यजन्ति संगच्छन्ते (देवाः) विद्वांसः (तानि) (धर्माणि) (प्रथमानि) आदिमानि ब्रह्मचर्य्यादीनि (आसन्) सन्ति (ते) (ह) किल (नाकम्) दुःखविरहं सुखम् (महिमानः) पूज्यतां प्राप्नुवन्तः (सचन्त) सचन्ते लभन्ते (यत्र) यस्मिन् (पूर्वे) अधीतविद्याः (साध्याः) अन्यैर्विद्यार्थं संसेवितुमर्हाः (सन्ति) वर्त्तन्ते (देवाः) विद्वांसः ॥ ५० ॥
भावार्थः
ये प्रथमे वयसि ब्रह्मचर्यसुशिक्षादीनि सेवितव्यानि कर्माणि प्रथमं कुर्वन्ति ते आप्तविद्वद्वद्विद्वांसो भूत्वा विद्यानन्दं प्राप्य सर्वत्र सत्कृता भवन्ति ॥ ५० ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
जो (देवाः) विद्वान् जन (यज्ञेन) अग्नि आदि दिव्य पदार्थों के समूह में (यज्ञम्) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के व्यवहार को (अयजन्त) मिलते प्राप्त होते हैं और जो ब्रह्मचर्य आदि (धर्माणि) धर्म (प्रथमानि) प्रथम (आसन्) हैं (तानि) उनका सेवन करते और कराते हैं (ते, ह) वे ही (यत्र) जहाँ (पूर्वे) पहिले अर्थात् जिन्होंने विद्या पढ़ ली (साध्याः) तथा औरों को विद्यासिद्धि के लिये सेवन करने योग्य (देवाः) विद्वान् जन (सन्ति) हैं वहाँ (महिमानः) सत्कार को प्राप्त हुए (नाकम्) दुःखरहित सुख को (सचन्त) प्राप्त होते हैं ॥ ५० ॥
भावार्थ
जो लोग प्रथमावस्था में ब्रह्मचर्य से उत्तम उत्तम शिक्षा आदि सेवन करने योग्य कामों को प्रथम करते हैं, वे आप्त अर्थात् विद्यादि गुण, धर्म्मादि कार्यों को साक्षात् किये हुए जो विद्वान्, उनके समान विद्वान् होकर विद्यानन्द को प्राप्त होकर सर्वत्र सत्कार को प्राप्त होते हैं ॥ ५० ॥
विषय
वे मुख्य धर्म
पदार्थ
१. (देवा:) = देव (यज्ञेन) = यज्ञ से (यज्ञम् अयजन्त) = यज्ञ का यजन पूजन करते हैं, यज्ञ से विष्णु की पूजा करते हैं। परमात्मा सर्वव्यापक और सबका हित करते हैं, इसी प्रकार अपनी मनोवृत्ति को व्यापक बनाकर हम भी सर्वव्यापक के उपासक बन पाते हैं। विष्णु बनने के लिए मनुष्य यज्ञशील बने । यज्ञ की भावना है – देवपूजा-बड़ों का आदर, संगतिकरण- अपने बराबरवालों के साथ मिलकर चलना, दान- अपने से छोटों को सदा कुछ देना। २. यज्ञ में ये ही तीन भावनाएँ हैं। देवों के कर्म इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत होते हैं। तानि धर्माणि ये तीन ही धर्म (प्रथमानि आसन्) = मुख्य व व्यापक धर्म थे। ते इन तीन धर्मों का पालन करनेवाले वे देव महिमानः = महिमावाले होते हुए, अर्थात् उत्तम यश को प्राप्त करते हुए ह निश्चय से नाकं सचन्त स्वर्ग का सेवन करते हैं, अर्थात् सुखमय स्थिति में विराजते हैं। उनका यह जीवन यशस्वी व सुखी होता है। ३. इस जीवन की समाप्ति पर वे उन लोकों को प्राप्त होते हैं यत्र जहाँ कि पूर्वे-अपने अन्दर यज्ञ की भावना का पूरण करनेवाले साध्याः = साधनामय जीवनवाले देवाः = ज्ञानी लोग सन्ति होते हैं, अर्थात् इन्हें उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। यज्ञ की भावना पूर्ण होने पर तो मोक्ष मिलता ही है । = = =
भावार्थ
भावार्थ – यज्ञमय जीवन के तीन लाभ हैं – (क) यश: प्राप्ति, (ख) सुखमय स्थिति और (ग) उत्तम लोकों की प्राप्ति । इन लाभों की प्राप्ति के लिए हमें अपना जीवन उत्तम बनाना ही चाहिए।
विषय
विद्वानों की यज्ञ द्वारा ईश्वरोपासना ।
भावार्थ
(देवाः) देव अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कामना करने वाले, दानशील, व्यवहारज्ञ एवं तेजस्वी विद्वान् पुरुष (यज्ञेन) अग्नि आदि पदार्थों से होने योग्य, या दान, परस्पर सत्संग और उपासना आदि श्रेष्ठ कर्मों से (यज्ञम्) उपास्य परमेश्वर की (अयजन्त) उपासना करते तथा (यज्ञम् अयजन्त) प्राप्त करने योग्य धर्मार्थ, काम, मोक्ष और पुरुषार्थों की साधना करते हैं। (तानि) वे नाना प्रकार के (धर्माणि) ब्रह्मचर्य अनुष्ठान आदि कर्त्तव्य (प्रथमानि) सबसे उत्तम (आसन्) हैं । (यत्र) जिन कर्त्तव्यों के बीच में रहकर (पूर्वे) प्रारम्भ के प्रथमाभ्यासी साधनाशील (देवाः) उत्तम पद की कामना करते हुए (सन्ति) रहते हैं और जिन कर्त्तव्यों पर दृढ़ रहकर ही (ते) वे पूर्वोक्त साधक पुरुष (महिमानः) बड़े सामर्थ्यवान् होकर (नाकं) सब प्रकार के दुःखों से रहित मोक्ष तक को (सचन्त) प्राप्त होते हैं। विशेष सप्रमाण विवेचन देखो अथर्व० ७। ५। १॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
दीर्घतमा ऋषिः ॥ देवता-१-४१ विश्वेदेवाः । ४२ वाक् । ४२ आपः । ४३ शकधूमः । ४३ सोमः ॥ ४४ अग्निः सूर्यो वायुश्च । ४५ वाक् । ४६, ४७ सूर्यः । ४८ संवत्सरात्मा कालः । ४९ सरस्वती । ५० साध्याः । ५१ सूयः पर्जन्या वा अग्नयो वा । ५२ सरस्वान् सूर्यो वा ॥ छन्दः—१, ९, २७, ३५, ४०, ५० विराट् त्रिष्टुप् । ८, १८, २६, ३१, ३३, ३४, ३७, ४३, ४६, ४७, ४९ निचृत् त्रिष्टुप् । २, १०, १३, १६, १७, १९, २१, २४, २८, ३२, ५२ त्रिष्टुप् । १४, ३९, ४१, ४४, ४५ भुरिक त्रिष्टुप् । १२, १५, २३ जगती । २९, ३६ निचृज्जगती । २० भुरिक् पङ्क्तिः । २२, २५, ४८ स्वराट् पङ्क्तिः । ३०, ३८ पङ्क्तिः। ४२ भुरिग् बृहती । ५१ विराड्नुष्टुप् ॥ द्वापञ्चाशदृचं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
जे लोक प्रथमावस्थेत ब्रह्मचर्याचे पालन करून उत्तम शिक्षण घेण्याचे कार्य करतात, ते आप्त अर्थात विद्वान बनून विद्यानंद प्राप्त करतात. त्यांचा सर्वत्र सत्कार केला जातो. ॥ ५० ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
The divinities, first evolutes of nature with the immanent will Divine, conducted the yajna of creation by yajna, yajnic inputs of self-sacrifice. They were the first sustainers, supporters of the divine laws, keepers of the rules of Dharma and carriers of the yajna further. They alone attain to grandeur and rise to the regions where the divine souls of the ancients dwell, who carry on the yajna and serve the Lord of Heaven.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The benefits of learning with the observance Brahmacharya(continence).
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The enlightened truthful persons worship Adorable God with the Yajnas-noble deeds. Thus they accomplish Dharma (righteousness) , Artha ( wealth), Moksha, Kama (fulfilment of noble desires) and (the emancipation) with the group of fire and other divine objects. To attain God, the Brahmacharya (perfect continence and self-control) is the first and foremost duty. Thus persons become truly great and venerable and attain the state of genuine emancipation. Indeed there is not the least element of misery and it is attained by the perfectly enlightened noble souls, whom other seekers of truth also approach for acquiring the true wisdom.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those who in the first stage of life observe the rules of Brahmacharya and acquire good education and prompt others also to do the same, become reliable and enlightened persons. Such people enjoy the bliss of wisdom and are respected everywhere.
Foot Notes
( यज्ञेन) अग्न्यादिदिव्यपदार्थसमूहेन = By the means of the group of fire and other divine objects. ( यज्ञम् ) धर्मार्थकाममोक्षव्यवहारम् = The accomplishment of righteousness, wealth, fulfilment of noble desires and emancipation.
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal