ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 63/ मन्त्र 25
ऋषिः - निध्रुविः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
पव॑माना असृक्षत॒ सोमा॑: शु॒क्रास॒ इन्द॑वः । अ॒भि विश्वा॑नि॒ काव्या॑ ॥
स्वर सहित पद पाठपव॑मानाः । अ॒सृ॒क्ष॒त॒ । सोमाः॑ । शु॒क्रासः॑ । इन्द॑वः । अ॒भि । विश्वा॑नि । काव्या॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
पवमाना असृक्षत सोमा: शुक्रास इन्दवः । अभि विश्वानि काव्या ॥
स्वर रहित पद पाठपवमानाः । असृक्षत । सोमाः । शुक्रासः । इन्दवः । अभि । विश्वानि । काव्या ॥ ९.६३.२५
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 63; मन्त्र » 25
अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 34; मन्त्र » 5
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अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 34; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(शुक्रासः) यः बलवान् तथा (इन्दवः) दीप्तिमानस्ति एतादृशः (पवमानाः) रक्षकः (सोमाः) परमात्मा (विश्वानि) सम्पूर्णं (काव्या) वेदं (अभ्यसृक्षत) प्रकाशयति ॥२५॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(शुक्रासः) जो बलवान् तथा (इन्दवः) दीप्तिमान् है, ऐसा (पवमानाः) रक्षा करनेवाला (सोमाः) परमात्मा (विश्वानि) सम्पूर्ण (काव्या) वेद को (अभ्यसृक्षत) प्रकाशित करता है ॥२५॥
भावार्थ
इस मन्त्र में इस बात का कथन है कि परमात्मा सब ज्ञानों का स्त्रोत तथा वेद का प्रकाशक है। जैसा कि “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे” इत्यादि मन्त्रों में अन्यत्र भी वर्णन किया है कि परमात्मा से ऋगादि वेद उत्पन्न हुए ॥२५॥
विषय
पवमानाः शुक्रास इन्दवः
पदार्थ
[१] (सोमाः) = सोमकण (असृक्षत) = हमारे शरीरों में पैदा किये जाते हैं। ये सोमकण (पवमाना:) = हमारे हृदयों को पवित्र करनेवाले हैं। (शुक्रासः) = ये हमें ज्ञान की दीप्ति को प्राप्त कराते हैं और (इन्दवः) = हमें शक्तिशाली बनाते हैं। हृदय में 'पवमान', मस्तिष्क में 'शुक्र' तथा हाथों में 'इन्दु' । [२] ये सोमकण हमें (विश्वानि काव्या) = सब ज्ञानों की (अभि) = ओर ले चलते हैं। ज्ञानाग्नि को दीप्त करके ये हमें कवि बनाते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ- सुरक्षित सोम 'पवित्रता, ज्ञानदीप्ति व शक्ति' की ओर हमें ले चलते हैं ।
विषय
विद्वानों का कर्त्तव्य दया से सत्रको सत्य ज्ञानों का वितरण करें। (
भावार्थ
(पवमानाः) अपने अन्तःकरण को पवित्र करते हुए, (शुक्रासः) शुद्ध कान्तियुक्त, जलवत् स्वच्छ (इन्दवः) दयार्द्र हृदय, (सोमाः) विद्वान् पुरुष (विश्वानि) समस्त (काव्या) विद्वानों के उचित ज्ञानों और कार्यों को (अभि असृक्षत) सब प्रकार से प्रकट करें और उनका अनुष्ठान करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
निध्रुविः काश्यप ऋषिः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:- १, २, ४, १२, १७, २०, २२, २३, २५, २७, २८, ३० निचृद् गायत्री। ३, ७-११, १६, १८, १९, २१, २४, २६ गायत्री। ५, १३, १५ विराड् गायत्री। ६, १४, २९ ककुम्मती गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Streams of bright energising soma flow, pure and purifying, among the songs of universal poetry of divinity.
मराठी (1)
भावार्थ
परमात्मा सर्व ज्ञानाचा स्रोत व वेदाचा प्रकाशक आहे. जसा ‘तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत, ऋच: सामानि जज्ञिरे’ इत्यादी मंत्रात इतरत्र ही वर्णन केलेले आहे की परमात्म्यापासून ऋग्वेद इत्यादी वेद उत्पन्न झालेले आहेत. ॥२५॥
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