यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 12
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - विद्युदादयो देवताः
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
166
द्यौरा॑सीत् पू॒र्वचि॑त्ति॒रश्व॑ऽआसीद् बृ॒हद्वयः॑। अवि॑रासीत् पिलिप्पि॒ला रात्रि॑रासीत् पिशङ्गि॒ला॥१२॥
स्वर सहित पद पाठद्यौः। आ॒सी॒त्। पू॒र्वचि॑त्ति॒रिति॑ पू॒र्वऽचि॑त्तिः। अश्वः॑। आ॒सी॒त्। बृ॒हत्। वयः॑। अविः॑। आ॒सी॒त्। पि॒लि॒प्पि॒ला। रात्रिः॑। आ॒सी॒त्। पि॒श॒ङ्गि॒ला ॥१२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
द्यौरासीत्पूर्वचित्तिः अश्वऽआसीद्बृहद्वयः । अविरासीत्पिलिप्पिला रात्रिरासीत्पिशङ्गिला ॥
स्वर रहित पद पाठ
द्यौः। आसीत्। पूर्वचित्तिरिति पूर्वऽचित्तिः। अश्वः। आसीत्। बृहत्। वयः। अविः। आसीत्। पिलिप्पिला। रात्रिः। आसीत्। पिशङ्गिला॥१२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ प्राक्प्रश्नोत्तराण्याह॥
अन्वयः
हे जिज्ञासवः! पूर्वचित्तिर्द्यौरासीद्, बृहद्वयोऽश्व आसीत्, पिलिप्पिलाऽविरासीत्, पिशङ्गिला रात्रिरासीदिति यूयं बुध्यध्वम्॥१२॥
पदार्थः
(द्यौः) दिव्यगुणप्रदा वृष्टिः। द्यौर्वै वृष्टिः। (शत॰१३।२।६।१६) (आसीत्) अस्ति (पूर्वचित्तिः) प्रथमस्मृतिविषया (अश्वः) योऽश्नुते मार्गान् सोऽग्निः (आसीत्) (बृहत्) महत् (वयः) यो वेति गच्छति सः (अविः) रक्षणादिकर्त्री पृथिवी (आसीत्) (पिलिप्पिला) (रात्रिः) (आसीत्) (पिशङ्गिला)॥१२॥
भावार्थः
हवनसूर्यरूपाद्यग्नितापेन सर्वगुणसंपन्नाऽन्नादिना संसारस्थितिनिमित्ता वृष्टिर्जायते, ततः सर्वरत्नाढ्या भूर्भवति। सूर्याग्निनिमित्तेनैव प्राणिनां शयनाय रात्रिर्जायते॥१२॥
हिन्दी (3)
विषय
अब पिछले प्रश्नों के उत्तरों को कहते हैं॥
पदार्थ
हे जानने की इच्छा करने वालो! (पूर्वचित्तिः) प्रथम स्मृति का विषय (द्यौः) दिव्यगुण देने हारी वर्षा (आसीत्) है, (बृहत्) बड़े (वयः) उड़ने हारे (अश्वः) मार्गों को व्याप्त होने वाले पक्षी के तुल्य अग्नि (आसीत्) है, (पिलिप्पिला) वर्षा से पिलिपिली चिकनी शोभायमान (अविः) अन्नादि से रक्षा आदि उत्तम गुण प्रगट करने वाली पृथिवी (आसीत्) है और (पिशङ्गिला) प्रकाशरूप को निगलने अर्थात् अन्धकार करने हारी (रात्रिः) रात (आसीत्) है, यह तुम जानो॥१२॥
भावार्थ
हवन और सूर्य रूपादि अग्नि के ताप से सब गुणों से युक्त अन्नादि से संसार की स्थिति करने वाली वर्षा होती है। उस वर्षा से सब ओषधि आदि उत्तम पदार्थ युक्त पृथिवी होती और सूर्य्य रूप अग्नि से ही प्राणियों के विश्राम के लिये रात्रि होती है॥१२॥
विषय
ब्रह्मोद्य | ब्रह्म औरः प्रभु राजा की शक्तिविषयक प्रश्नोत्तर । सूर्य, अग्नि, भूमि, द्यौ, अश्व, अवि और रात्रि विषयक प्रश्नोत्तर ।
भावार्थ
( द्यौः) द्यौ, वृष्टि ही (पूर्वचित्तिः) 'पूर्वचित्ति' है अर्थात् सबसे प्रथम स्मरण योग्य पदार्थ है । (अश्व:) समस्त पदार्थों को भस्म कर खा जाने वाला, सर्वव्यापक अग्नि ही (बृहत् वयः) सबसे बड़ा बल है और (अवि:) सबकी रक्षिका भूमि (पिलिप्पिला ) 'पिलिप्पिला' सबसे अधिक शोभा वाली है । (पिशंगिला ) और 'पिशंगिला', समस्त पदार्थों के रूपों, को निगल जाने वाली ( रात्रिः आसीत् ) रात्रि है । राष्ट्र पक्ष में - सबसे पूर्व चयन का निर्माण करने योग्य, (द्यौः) ज्ञान प्रकाश वाली राजसभा है । (अश्व:) सर्व राष्ट्र का भोक्ता राजा या वेग से जानने वाले रथ, वाहन आदि तुरंग बल ही (बृहद् वयः) बड़ा भारी बल है। (अवि:) सबकी रक्षा करने वाली राजशक्ति (पिलिप्पिला ) पालन करने वाली 'राष्ट्र की श्री शोभा' है । ( रात्रिः ) समस्त ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाली, सबको रमानेवाली 'रात्रि' राजशक्ति ही (पिशंगिला) समस्त पदार्थों को अपने भीतर निगल जाती है अपने वश करती है । श्री पिलिप्पिला । अहोरात्रे वै पशंगिले । शत० १३ । २ । ६ । १६ ॥ या वृष्टिकारणभूता द्यौः सैव प्रथमतश्चेतयमाना । प्रथमतो वृष्टौं सत्यां पश्चादोषधिद्वारा सर्वे प्राणिनो जीवन्ति । युद्धद्वारा वीरजीवन हेतु स्वादश्वो बृहद्वयः ॥ अतिशयेन रूपवती पिशङ्गिला रात्रिश्च तादृशी चन्द्रिकया नक्षत्रैश्च रूपत्वप्रतिभासात् प्रजासमूहनिमित्तस्य ध्वनिविशेषस्य पिलिप्पिलेत्यनुकरणं श्रीश्च तथाविधध्वनियुक्ता यस्मिन् गृहे धनं समृद्धिस्तत्र जनबहुलतया निरन्तरं तथाविधः शब्दो भवति । इति सायणः ।
विषय
पिलिप्पिला- पिशंगिला
पदार्थ
१. गतमन्त्रों के अनुसार ही इन मन्त्रों में भी चार प्रश्न व उत्तर दिये गये हैं। प्रथम प्रश्न है (स्वित्) = भला (पूर्वचित्तिः) = सबसे प्रथम [प्रथमा स्मृतिविषया- द०] स्मरण व ध्यान की वस्तु का क्या है? अर्थात् सबसे अधिक ध्यान किसपर देना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि (द्यौः) = मस्तिष्क (पूर्वचित्तिः) = सबसे प्रथम ध्यान देने का विषय (आसीत्) = है । शरीर में मस्तिष्क उसी प्रकार सर्वोपरि स्थित है जैसे विराट् शरीर में द्युलोक। ('मूर्ध्ना द्यौः') = विराट् शरीर के मस्तिष्क से ही द्युलोक बनता है और यही द्युलोक मस्तिष्करूप से हमारे शरीर में निवास करता है। हमें इस मस्तिष्क का सर्वाधिक ध्यान करना है। । २. दूसरा प्रश्न है (स्वित्) = भला (बृहद् वयः) = वर्धनशील पक्षी (किम्) = कौन है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अश्वः) = [अश्नुते कर्मसु ] सदा कर्मों में व्याप्त होनेवाला जीव ही (बृहद् वयः) = वर्धनशील पक्षी (आसीत्) = है । वैदिक साहित्य में आत्मा तथा परमात्मा दोनों को ('द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया') = इन शब्दों में सदा साथ रहनेवाले दो मित्र पक्षियों के रूप में चित्रित किया है। इनमें परमात्मा सदावृद्ध व निरतिशय वृद्धिवाले हैं, जीवात्मा अल्प है और यह साधना के मार्ग पर चलकर वृद्धि को प्राप्त करनेवाला है। यह बढ़ता हुआ पक्षी है। जितना जितना बढ़ता जाता है उतना उतना प्रभु के समीप पहुँचता जाता है अथवा जितना - जितना प्रभु के समीप पहुँचता जाता है उतना उतना बढ़ता जाता है । ३. तीसरा प्रश्न है (स्वित्) = भला (पिलिप्पिला) = [आर्द्रीभूता-चिक्कणा - शोभन - द० ] [ श्रीर्वै पिलिप्पिला - श० १३/२/६/१६] आर्द्रीभूत, चिक्कणा व शोभना श्री क्या (आसीत्) = है ? उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अवि:) = [अव रक्षणे] रोगों व वासनाओं से अपना रक्षण करनेवाला जीव ही (पिलिप्पिला) = शरीर में स्वास्थ्य की स्निग्धता से चिक्कण, मन में करुणा से आर्द्रीभूत, मस्तिष्क में उत्तम विचारों से शोभन श्रीवाला आसीत् है । जब हम आधि-व्याधियों से अपने को बचाते हैं तभी हमारे शरीर, मन व मस्तिष्क श्रीसम्पन्न होते हैं। ४. चौथा प्रश्न है (स्वित्) = भला (पिशंगिला) = [पिशं रूपं गिलति] रूप को निगल जानेवाला का (आसीत्) = कौन है ? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (रात्रिः) = रात (पिशंगिला आसीत्) = रूप को निगल जानेवाली है। रात्रि में सब वर्ण समाप्त होकर एक कृष्ण ही कृष्ण वर्ण की प्रतीति होती है। इसी प्रकार उस परमेश्वर में रमण करनेवाले [रात्रि: रमयित्री] योगनिद्रागत योगी के इन शरीररूप रूपों का, वल्बों का विलय मोक्ष हो जाता है। इस योगी को फिर दीर्घकाल तक शरीर नहीं लेना पड़ता ।
भावार्थ
भावार्थ- सर्वाधिक ध्यान हमें मस्तिष्क का करना है। साधना के द्वारा निरन्तर वृद्धि का यत्न करना है। अपने को आधि-व्याधियों से बचाकर श्रीसम्पन्न होना है तथा प्रभुस्मरण के द्वारा इन शरीरों के परिग्रह से ऊपर उठना है।
मराठी (2)
भावार्थ
हवन व सूर्यरूपी अग्नीच्या योगे उत्तम अन्न उत्पन्न करणारी व लक्षात ठेवण्याजोगी वस्तू म्हणजे वृष्टी होय. उडणाऱ्या पक्षाप्रमाणे अग्नी हा सर्वत्र उपस्थित असतो. पर्जन्यामुळेच पृथ्वीवर उत्तम पदार्थ निर्माण होतात, ती पृथ्वी नरम किंवा मऊ असते व सूर्यरूपी अग्नीला गिळण्यासाठी किंवा प्राण्यांना विश्रांतीसाठी रात्र निर्माण होते.
विषय
आता मागील मंत्रातील उत्तरें सांगताहेत.-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे जिज्ञासूजनहो, (पूर्वचित्तिः) स्मृतीचा प्रथम विषय (घौः) दिव्यगुण देणारा पाऊस (आसीत्) आहे. (तीव्र दाहक उन्हाळ्यानंतर देणारी पावसाळ्यातील पहिली वृष्टी केवढी आनंददायी व उपकारक असते. ती कायम लक्षात राहते) (बृहत्) विशाल (वयः) उडरार्या (अश्वः) आकाश मार्गावर धावणार्या पक्ष्यांप्रमाणे (अग्निः) अग्नि (आसीत्) आहे. (तो सर्वत्र व्याप्त आहे) (पिलिप्पिला) पावसामुळे लिबलिबीत व चिक्कण झालेली वस्तू (अविः) अन्न आदी देऊन प्राण्यांचे जीवरक्षण करणारी पृथ्वी (आसीत्) आहे. आणि (पिशंगिली) प्रकाशाला गिळणारी वस्तू म्हणजे सर्वत्र अंधार फैलावणारी वस्तू (रात्रिः) रात्र (आसीत्) आहे. अशाप्रकारे मागील मंत्राच्या प्रश्नांची ही उत्तरे आहेत, हे समजून घ्या ॥12॥
भावार्थ
भावार्थ - हवनातील अग्नी आणि सूर्यरूपातील अग्नी आपल्या उष्णतोची गुणांमुळे समृद्ध होणारा आणि अन्न आदीद्वारे जगाच्या स्थिरता वा जीवनाचे कारण आहे- पाऊस. पावसामुळे ही पृथ्वी औषधी आदी उत्तम पदार्थांने समृद्ध होते आणि सूर्यरूप अग्नीमुळेच सर्व सर्व प्राण्यांना विश्रांती देणारी रात्र येत असते. ॥12॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Rain is the primary thought. Fire is like the mighty bird, Earth is the majestic, beautiful object that protects us with corn. Night absorbs light.
Meaning
Heaven is the first object of perception and thought. Energy, electricity and light, is the greatest bird of motion. Protective mother earth is soft, smooth and beautiful. The night of darkness devours light and forms.
Translation
The sky is the thing to be thought of first. The sun is the huge bird. Rain-soaked earth is soft and slippery. It is the night, that swallows the forms of the things. (1)
Notes
Dyauḥ, the sky. facrafe, the rain. It is the rain, of which people think first of all. Avih, रक्षणादिकर्त्री पृथ्वी, the earth. 'श्रीर्वैपिलिप्पिला', (Satapatha, XIII 2. 6. 16) श्री शब्देन भूरेव गृह्यते ।
बंगाली (1)
विषय
অথ প্রাক্প্রশ্নোত্তরাণ্যাহ ॥
এখন গত প্রশ্নগুলির উত্তর দেওয়া হইতেছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে জানিতে ইচ্ছুক ব্যক্তিগণ ! (পূর্বচিত্তিঃ) প্রথম স্মৃতির বিষয় (দ্যৌঃ) দিব্যগুণদাতা বর্ষা (আসীৎ) আছে । (বৃহৎ) বৃহৎ (বয়ঃ) উড়নশীল (অশ্বঃ) মার্গগুলি ব্যাপ্ত হইবার পক্ষীতুল্য অগ্নি (আসীৎ) আছে, (পিলিপ্পিলা) বর্ষা দ্বারা আর্দ্র, চিক্কণ শোভায়মান (অবিঃ) অন্নাদি হইতে রক্ষাদি উত্তমগুণ প্রকটকারী পৃথিবী (আসীৎ) আছে এবং (পিশঙ্গিলা) প্রকাশরূপকে নিগরণ অর্থাৎ অন্ধকারকারী (রাত্রিঃ) রাত্রি (আসীৎ) আছে, ইহা তোমরা জান ॥ ১২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- হবন ও সূর্য্য রূপাদি অগ্নির তাপ দ্বারা সকল গুণযুক্ত অন্নাদি দ্বারা সংসারের স্থিতি নিমিত্ত বৃষ্টি উৎপন্ন হয় । সেই বৃষ্টি দ্বারা সকল ওষধি আদি উত্তম পদার্থ যুক্ত পৃথিবী হয় এবং সূর্য্যরূপ অগ্নি দ্বারাই প্রাণীদিগের বিশ্রাম হেতু রাত্রি হয় ॥ ১২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
দ্যৌরা॑সীৎ পূ॒র্বচি॑ত্তি॒রশ্ব॑ऽআসীদ্ বৃ॒হদ্বয়ঃ॑ ।
অবি॑রাসীৎ পিলিপ্পি॒লা রাত্রি॑রাসীৎ পিশঙ্গি॒লা ॥ ১২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
দ্যৌরাসীদিত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । বিদ্যুদাদয়ো দেবতাঃ । নিচৃদনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
গান্ধারঃ স্বরঃ ॥
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