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यजुर्वेद अध्याय - 23

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  • यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 35
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - प्रजा देवता छन्दः - भुरिगुष्णिक् स्वरः - ऋषभः
    81

    म॒हाना॑म्न्यो रे॒वत्यो॒ विश्वा॒ आशाः॑ प्र॒भूव॑रीः।मैघी॑र्वि॒द्युतो॒ वाचः॑ सू॒चीभिः॑ शम्यन्तु त्वा॥३५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒हाना॑म्न्य॒ इति॑ म॒हाऽना॑म्न्यः। रे॒वत्यः॑। विश्वाः॑। आशाः॑। प्र॒भूव॒रीरिति॑ प्र॒ऽभूव॑रीः। मैघीः॑। वि॒द्युत॒ इति॑ वि॒द्युऽतः॑। वाचः॑। सू॒चीभिः॑। श॒म्य॒न्तु॒। त्वा॒ ॥३५ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    महानाम्न्यो रेवत्यो विश्वाऽआशाः प्रभूवरीः । मैघीर्विद्युतो वाचः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    महानाम्न्य इति महाऽनाम्न्यः। रेवत्यः। विश्वाः। आशाः। प्रभूवरीरिति प्रऽभूवरीः। मैघीः। विद्युत इति विद्युऽतः। वाचः। सूचीभिः। शम्यन्तु। त्वा॥३५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 23; मन्त्र » 35
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्विद्वांसः कीदृशा भवेयुरित्याह॥

    अन्वयः

    हे जिज्ञासो! सूचीभिर्या महानाम्न्यो रेवत्यः प्रभूवरीर्विश्वा आशा इव मैघीर्विद्युत इव च वाचस्त्वा शम्यन्तु तास्त्वं गृहाण॥३५॥

    पदार्थः

    (महानाम्न्यः) महन्नाम यासां ताः (रेवत्यः) बहुधनयुक्ताः (विश्वाः) अखिलाः (आशाः) दिशः (प्रभूवरीः) प्रभुत्वयुक्ताः (मैघीः) मेघानामिमाः (विद्युतः) (वाचः) (सूचीभिः) (शम्यन्तु) (त्वा) त्वाम्॥३५॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। येषां वाचो दिग्वत्सर्वासु विद्यासु व्यापिका मेघस्था विद्युदिव सर्वार्थप्रकाशिकाः सन्ति, ते शान्त्या जितेन्द्रियत्वं प्राप्य महाकीर्त्तयो जायन्ते॥३५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर विद्वान् कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे ज्ञान चाहने हारे (सूचीभिः) सन्धान करने वाली क्रियाओं से जो (महानाम्न्यः) बड़े नाम वाली (रेवत्यः) बहुत प्रकार के धन और (प्रभूवरीः) प्रभुता से युक्त (विश्वाः) समस्त (आशाः) दिशाओं के समान (मैघीः) वा मेघों की तड़क (विद्युतः) जो बिजुली उनके समान (वाचः) वाणी (त्वा) तुझ को (शम्यन्तु) शान्तियुक्त करें, उनका तू ग्रहण कर॥३५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिनकी वाणी दिशा के तुल्य सब विद्याओं में व्याप्त होने और मेघ में ठहरी हुई बिजुली के समान अर्थ का प्रकाश करने वाली है, वे विद्वान् शान्ति से जितेन्द्रियता को प्राप्त होकर बड़ी कीर्ति वाले होते हैं॥३५॥

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    विषय

    द्विपदा आदि और महानाम्नी आदि वेदवाणियों से स्वामी का शान्तिकरण । इसी प्रकार गायत्री, द्विपदा महानाम्नी आदि भिन्न-भिन्न प्रजाओं का वर्णन ।

    भावार्थ

    (महानाम्न्यः) 'महानाम्नी' नामक वेदवाणियां, ( रेवत्यः ) रेवती नामक ऋचाएं और ( विश्वाः आशाः ) समस्त 'आशा' शब्दवाली ऋचाएं, ( प्रभुवरी: ) 'प्रभु' शब्दवाली, (मैघी: ) मेघ सम्बन्धी ऋचाएं, ये सब (वाचः) वाणियां (सूचीभि:) अपनी ज्ञानसूचक शैलियों से (त्वा शम्यन्तु ) तुझे शान्ति प्रदान करें। ऊपर की तीनों ऋचाएं वाणियों के साथ २ प्रजाओं का भी वर्णन करती हैं। जैसे- ( गायत्री ) ब्राह्मण वर्ग, (त्रिष्टुप्) क्षत्रिय वर्ग, (जगती) वैश्य वर्ग, (अनुष्टुप्) भृत्य वर्ग, (पंक्ति) पञ्चजन, (बृहती ) बड़े राष्ट्र की जनपदवासिनी या बड़ी शक्तिवाली, ( उष्णिहा ) सबके प्रेमी, ( ककुप् ) सर्वश्रेष्ठ पुरुष ये अपनी ज्ञानसूचक वाणियों से हृदय को शान्त करें । (२) (महानाम्न्यः ) बड़ी यशस्विनी, ( रेवत्याः ) धन धान्य सम्पन्न, (विश्वाः आशाः) समस्त दिशाओं में बसी, ( प्रभूवरी:) प्रभूत, बल और धन सामर्थ्य वाली, (मैघी:) मेघ के समान सब पर सुख वर्षण करनेवाले ज्ञानोपदेशक वर्ग, (विद्यतः) विद्युत के समान प्रकाश देने वाले शिल्पिवर्ग, (वाचः) वेद वाणियों के वक्ताजन ज्ञानसाधनों से तुझे (शम्यन्तु) शान्ति दें।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वाचः प्रजाः देवताः । भूरिगुष्णिक् । ऋषभः ॥

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    विषय

    विविध वाणियों के उपदेश

    पदार्थ

    १. (महानाम्न्यः) = महानाम्नी नामवाली (वाचः) = ऋग्वाणियाँ (सूचीभि:) = अपने सूत्रात्मक उपदेशों से (त्वा) = तुझे (शम्यन्तु) = शान्त करें। ये 'महानाम्नी' ऋचाएँ महान् प्रभु के नामों का स्मरण कराने के कारण 'महानाम्नी' कहलाती हैं। प्रभु नाम-स्मरण से मनुष्य में ये शक्ति उत्पन्न करती हैं, अतः 'शक्वर्यः' नामवाली भी हो जाती हैं। इनका उपदेश यही है कि 'उस महान् प्रभु के नाम का जप करो और उसके अर्थ की भावना करो'। जीवन की सच्ची पवित्रता व शान्ति इसी से प्राप्त होती है। २. (रेवत्यः) = रेवत नामवाली (वाचः) = रेवती वाणियाँ (सूचीभि:) = अपनी सूत्रात्मक सूचनाओं से (त्वा) = तुझे (शम्यन्तु) = शान्त करें। इन वाणियों से ही हम वास्तविक ऐश्वर्य को प्राप्त करने का बोध लेते हैं । ३. (विश्वाः आशाः) = सब दिशाओं को (प्रभूवरीः) = शक्तिशाली बनानेवाली (वाच:) = वाणियाँ (सूचीभि:) = अपनी सूत्रात्मक सूचनाओं से तुझे शान्त करें। इन वाणियों का उपदेश है कि तुम अपनी सब दिशाओं को शक्तिशाली बनाओ, अर्थात् सब दिशाओं में उन्नति करनेवाले बनो। तुम्हारा शरीर-मन-मस्तिष्क सभी प्रभावशाली हों। ४. (मैघी:) = मेघों के समान ज्ञानजल का वर्षण करनेवाली ये (वाच:) = वाणियाँ तुझे अपनी सूचनाओं से शान्त करें। इनकी सूचना है कि जैसे मेघ जल की वर्षा से औरों के सन्तापों को हरता है उसी प्रकार तू ज्ञानजल के वर्षण से औरों को सुखी करनेवाला हो । ५. (विद्युतः) = ये विशेष द्युतिवाली (वाच:) = वाणियाँ, विद्युत् के समान चमकती हुई सूचना दे रही हैं कि तू विशिष्ट ज्ञान से चमकनेवाला बन। यह सूचना तेरे जीवन का अङ्ग बने और तुझे शान्ति प्राप्त कराए।

    भावार्थ

    भावार्थ-वेद की विविध वाणियाँ यह उपदेश दे रही हैं कि [क] तुम उस महान् प्रभु के नाम का स्मरण करो। [ख] वास्तविक ऐश्वर्य का अर्जन करो। [ग] सब दिशाओं में उन्नति करो। [घ] मेघों की भाँति सन्ताप हरनेवाले बनो और [ङ] बिजली की भाँति चमकते हुए अन्धेरे में औरों को रास्ता दिखानेवाले बनो।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्यांची वाणी मेघातील विद्युतप्रमाणे व दशदिशाप्रमाणे सर्व विद्यांमध्ये व्याप्त असते. ते विद्वान शांती व जितेंद्रियता प्राप्त करतात व महान कीर्तीही प्राप्त करतात.

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    विषय

    विद्वान कसे असावेत, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे ज्ञानार्थी जन, जे विद्वान तुला (संतुष्ट करू शकतात, तु त्यांच्याजवळ जा) ते विद्वान (सूचीभिः) संधीचे नियम या जोडण्याच्या पद्धती जाणतात. ते (महानाम्न्यः) मोठ्या प्रसिद्ध (रेवत्यः) आणि अनेकविध धन असलेल्या (प्रभूवरीः) तसेच स्वामित्व असलेल्या (विश्‍वा) समस्त (आशाः) दिशांप्रमाणे आहेत. (विद्ववानांकडे ज्ञानरूप धन आहे, ते छंदशास्त्राचे स्वामी आहेत) तसेच (मैघीः) ढगांमधे चमकणार्‍या (विद्युतः) विद्युतेप्रमाणे त्या विद्वानांची (वाचः) वाणी आहे (त्यांची वारी बुद्धित प्रकाश पाडणारी आहे) ते विद्वान (त्वा) तुला (शम्यन्तु) शांत, संतुष्ट करतील. (तुझ्या सर्व शंकांचे ते निवारण करतील, तु त्यांच्याजवळ जा) ॥35॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा आहे ज्या विद्वानांची वाणी दिशांप्रमाणे सर्व विद्यांमधे प्रसृत आहे (ते बहुविद्या वान् आहेत) आणि मेघामधे विद्यमान विद्युतेप्रमाणे मंत्राच्या अर्थाचा अकस्मात प्रकाश करणारी आहे, ते विद्वान जितेंद्रिय होऊन महान कीर्तिमंत होतात. ॥35॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    May the Mahanamni and Revati vedic verses, all far spread Supreme Regions, the lightning in the clouds, and the voices uttered by the subjects, satisfy the king.

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    Meaning

    Seekers of knowledge, citizens of the nation, may the universal words of wisdom, golden rich, great and sublime, ringing in all directions, raining like the clouds, roaring like thunder, and blazing as lightning — may all these great voices perfect you with their integrative and elevating message of peace and stability.

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    Translation

    May all these regions of great name and of great fortune, with their influence, and the rumble of thunder-clouds bring peace to you, with their pleasing sound. (1)

    Notes

    Mahānāmnyaḥ, having a great name. Also, nine verses of the Sämaveda in Sakvarī metre. Revatyaḥ, बहुधनयुक्ता:, having a big fortune. Also, verses from which Raivata Säman is formed. Maighirvidyuto vācaḥ, rumble of the clouds laden with the lightning.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্বিদ্বাংসঃ কীদৃশা ভবেয়ুরিত্যাহ ॥
    পুনঃ বিদ্বান্ কেমন হইবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে জ্ঞান কামনা কারী (সূচীভিঃ) সন্ধানকারিণী ক্রিয়াদের দ্বারা যাহা (মহানাম্ন্যঃ) বড় নামযুক্ত (রেবত্য) বহু প্রকারের ধন এবং (প্রভূবরীঃ) প্রভূতার সহিত যুক্ত (বিশ্বাঃ) সমস্ত (আশাঃ) দিক্গুলির সমান (মৈঘীঃ) বা মেঘের গর্জন (বিদ্যুতঃ) যে বিদ্যুৎ তাহাদের সমান (বাচঃ) বাণী (ত্বা) তোমাকে (শম্যন্তু) শান্তিযুক্ত করিবে তাহাদের তুমি গ্রহণ কর ॥ ৩৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যাহাদের বাণী দিক্ তুল্য সকল বিদ্যায় ব্যাপ্ত হয় এবং মেঘে স্থিত বিদ্যুতের সমান অর্থ প্রকাশকারী সেই সব বিদ্বান্গণ শান্তিপূর্বক জিতেন্দ্রিয়তা প্রাপ্ত হইয়া মহাকীর্ত্তিযুক্ত হয় ॥ ৩৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ম॒হানা॑ম্ন্যো রে॒বত্যো॒ বিশ্বা॒ আশাঃ॑ প্র॒ভূব॑রীঃ ।
    মৈঘী॑র্বি॒দ্যুতো॒ বাচঃ॑ সূ॒চীভিঃ॑ শম্যন্তু ত্বা ॥ ৩৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    মহানাম্ন্য ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । প্রজা দেবতা । ভুরিগুষ্ণিক্ ছন্দঃ ।
    ঋষভঃ স্বরঃ ॥

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