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यजुर्वेद अध्याय - 23

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  • यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 53
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - प्रष्टा देवता छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    124

    का स्वि॑दासीत् पू॒र्वचि॑त्तिः॒ कि॑स्वि॑दासीद् बृ॒हद्वयः॑।का स्वि॑दासीत् पिलिप्पि॒ला का स्वि॑दासीत् पिशङ्गि॒ला॥५३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पू॒र्वचि॑त्ति॒रिति॑ पू॒र्वऽचि॑त्तिः। किम्। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। बृ॒हत्। वयः॑। का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पि॒लि॒प्पि॒ला। का। स्वि॒त्। आ॒सी॒त्। पि॒श॒ङ्गि॒ला ॥५३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः किँ स्विदासीद्बृहद्वयः । का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    का। स्वित्। आसीत्। पूर्वचित्तिरिति पूर्वऽचित्तिः। किम्। स्वित्। आसीत्। बृहत्। वयः। का। स्वित्। आसीत्। पिलिप्पिला। का। स्वित्। आसीत्। पिशङ्गिला॥५३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 23; मन्त्र » 53
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः प्रश्नानाह॥

    अन्वयः

    हे विद्वन्नत्र जगति का स्वित् पूर्वचित्तिरासीत्? किं स्विद् बृहद्वय आसीत्? का स्वित् पिलिप्पिला आसीत्? कास्वित् पिशाङ्गिला आसीद्? इति भवन्तं पृच्छामि॥५३॥

    पदार्थः

    (का) (स्वित्) (आसीत्) (पूर्वचित्तिः) पूर्वस्मिन्ननादौ सञ्चयनाख्या (किम्) (स्वित्) (आसीत्) (बृहत्) महत् (वयः) प्रजननात्मकम् (का) (स्वित्) (आसीत्) (पिलिप्पिला) आर्द्रीभूता (का) (स्वित्) (आसीत्) (पिशङ्गिला) अवयवान्तःकर्त्री॥५३॥

    भावार्थः

    अत्र चत्वारः प्रश्नास्तेषां समाधानानि परस्मिन् मन्त्रे द्रष्टव्यानि॥५३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर भी अगले मन्त्र में प्रश्नों को कहते हैं॥

    पदार्थ

    हे विद्वन्! इस जगत् में (का, स्वित्) कौन (पूर्वचित्तिः) पूर्व अनादि समय में संचित होने वाली (आसीत्) है (किं, स्वित्) क्या (बृहत्) बड़ा (वयः) उत्पन्न स्वरूप (आसीत्) है, (का, स्वित्) कौन (पिलिप्पिला) पिलपिली चिकनी (आसीत्) है और (का, स्वित्) कौन (पिशङ्गिला) अवयवों को भीतर करने वाली (आसीत्) है, यह आपको पूछता हूँ॥५३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में चार प्रश्न हैं, उनके समाधान अगले मन्त्र में देखने चाहियें॥५३॥

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    विषय

    अ० २३ । ११ । १२ । के समान प्रश्न । पिशंगिला, कुरु पिशंगिला, शश और अहि के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर और उनका रहस्यविवेचन ।

    भावार्थ

    ( ५३) इस मन्त्र की व्याख्या देखो अ० २३।११॥

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    विषय

    पूर्वचित्तिः बृहद्वयः

    पदार्थ

    १. इसी अध्याय के मन्त्र संख्या ११-१२ पर इनका विस्तृत अर्थ है। यहाँ ज्ञानचर्चा के प्रसंग में इनको पुनः उपस्थित करने का उद्देश्य यह है कि (का स्वित्) = भला (पूर्वचित्तिः) = सर्वप्रथम ध्यान देने योग्य वस्तु (आसीत्) = क्या है?' इस प्रश्न का यह उत्तर कि (“द्यौः") = मस्तिष्क ही (पूर्वचित्तिः) = सर्वप्रथम ध्यान देने की वस्तु आसीत् है'। हम यह कभी भूलें नहीं कि मस्तिष्क के विकास से ही तो हम गतमन्त्र में दिये गये उत्तर को देने की योग्यतावाले ब्रह्मा बन पाएँगे। २. (किं स्वित्) = भला (बृहद्) = वर्धनशील (वयः) = पक्षी [जीव] क्या है। इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अश्वः) = सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाला जीव ही (बृहद् वयः) = वर्धनशील पक्षी है। वेद में परमात्मा व आत्मा को 'द्वा सुपर्णा' = दो पक्षियों के रूप में स्मरण किया है। परमात्मा सदा बढ़े हुए हैं, जीव अल्प होने से सदा सन्मार्ग पर चलते हुए बढ़ा करता है। ३. तीसरा प्रश्न है (स्वित्) = भला (का) = कौन (पिलिप्पिला) = 'चिक्कण, आर्द्र व शोभना' भी है ? उत्तर देते हुए कहते हैं कि (अविः) = आत्मरक्षण करनेवाला ही शरीर में पिलिप्पिला = स्वास्थ्य की स्निग्धतावाली, मन में दया की आर्द्रतावाली तथा मस्तिष्क में ज्ञान की शोभावाली श्री से युक्त होता है । ४. चौथा प्रश्न है (किं स्वित्) = भला का कौन (पिशङ्गिला आसीत्) = सब रूपों को निगीर्ण कर जानेवाली है ? उत्तर देते हैं कि (रात्रिः) = रात (पिशङ्गिला आसीत्) = रूपों को निगल जानेवाली है। रात को सब रूप समाप्त होकर कृष्ण-ही-कृष्ण दिखता है। प्रलयकाल को भी [तम आसीत् तमसा गूळहमग्रे] अन्धकारमय होने से तम व रात्रि कहते हैं। उस प्रलयकाल में भी ये रूप समाप्त हो जाते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम मस्तिष्क को ध्येय वसुओं में सबसे ऊपर रक्खें। सबसे अधिक हमें इसी का ध्यान करना है। कर्मों में सदा व्याप्त रहकर हम वर्धनशील हों। आधि-व्याधियों से अपने को बचाते हुए हम स्निग्ध शरीर. आर्द्र हृदय व शोभन मस्तिष्कवाले हों। हम इस बात को न भूलें कि हमारे जीवन में भी महानिद्रा की रात्रि आनी है, जिसमें ये सब भौतिक तड़क-भड़क [रूप] समाप्त हो जाएगी, अतः इसको इतना महत्त्व क्यों देना ?

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे विद्वानांनो ! अनादी काळी कोणती वस्तू संचित होती? मोठ्या स्वरूपात काय उत्पन्न होते? कोण मऊ नरम असते? सर्व अवयवांना नष्ट करणारा कोण असतो? या चार प्रश्नांची उत्तरे पुढील मंत्रात आहेत.

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    विषय

    पुढील मंत्रात आणखी काही प्रश्‍न विचारले आहेत -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे विद्वान, या जगात (1) (का, स्वित्) कोण (पूर्वचित्तिः) पूर्वी - म्हणजे अनादिकाळी संचित होणारी (आसीत्) आहे (वा होती?) (किं, स्वित्) (2) कोण वा काय (आसीत्) आहे, जो (बृहत्) विशाल (वयः) उत्पन्न स्वरूप आहे? (का, स्वित्) (3) कोण (पिलिप्पिला) लिबलिबीत, लवचिक वा चिकणी वस्तू (आसीत्) आहे? आणि (का, स्वित्) (4) कोण वस्तू अशी आहे की जी (पिशङ्गिला) अवयव आत ओढून घेणारी (आसीत्) आहे. मी (एक जिज्ञासू) आपणास विचारी आहे. ॥53॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात चार प्रश्‍न विचारले आहेत. त्यांची उत्तरें पुढील मंत्रात दिली आहेत. ॥53॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, I ask of thee. What is accumulated in time without beginning ? What is the great source of creation ? What is the majestic thing What absorbs the bodies.

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    Meaning

    What is the first original structure in time? What is the great womb of the forms of life? What is the finest pliant material? What is the universal devourer?

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    Translation

    What is the thing thought of first? What is the huge bird? What is soft and slippery? What is that, which swallows the forms of the things? (1)

    Notes

    53-54. Same as XXIII. 11-12.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনঃ প্রশ্নানাহ ॥
    পুনঃ পরবর্ত্তী মন্ত্রে প্রশ্নগুলি বলা হইতেছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে বিদ্বন্! এই জগতে (কা, স্বিৎ) কে (পূর্বচিত্তিঃ) পূর্ব অনাদি সময়ে সঞ্চিত হওয়ার (আসীৎ) আছে? (কিং, স্বিৎ) কী (বৃহৎ) বৃহৎ (বয়ঃ) উৎপন্ন স্বরূপ (আসীৎ) আছে? (কা, স্বিৎ) কে (পিলিপ্পিলা) আদ্রীভূত চিক্কন (আসীৎ) আছে এবং (কা, স্বিৎ) কে (পিশঙ্গিলা) অবয়বগুলি কে ভিতরে করিয়া (আসীৎ) আছে, ইহা আপনার নিকট জিজ্ঞাসা করি ॥ ৫৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে চারটি প্রশ্ন, তাহার সমাধান পরবর্ত্তী মন্ত্রে দেখা উচিত ॥ ৫৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    কা স্বি॑দাসীৎ পূ॒র্বচি॑ত্তিঃ॒ কিᳬंস্বি॑দাসীদ্ বৃ॒হদ্বয়ঃ॑ ।
    কা স্বি॑দাসীৎ পিলিপ্পি॒লা কা স্বি॑দাসীৎ পিশঙ্গি॒লা ॥ ৫৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    কা স্বিদিত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । প্রষ্টা দেবতা । অনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    গান্ধারঃ স্বরঃ ।

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