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यजुर्वेद अध्याय - 23

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  • यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 6
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - सूर्यो देवता छन्दः - विराडगायत्री स्वरः - षड्जः
    136

    यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यु॒ञ्जन्ति॑। अ॒स्य॒। काम्या॑। हरी॒ऽइति॒ हरी॑। विप॑क्ष॒सेति॒ विऽप॑क्षसा। रथे॑। शोणा॑। धृ॒ष्णूऽइति॑ धृ॒ष्णू। नृ॒वाह॒सेति॑ नृ॒ऽवाह॑सा ॥६ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे । शोणा धृष्णू नृसाहसा ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    युञ्जन्ति। अस्य। काम्या। हरीऽइति हरी। विपक्षसेति विऽपक्षसा। रथे। शोणा। धृष्णूऽइति धृष्णू। नृवाहसेति नृऽवाहसा॥६॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 23; मन्त्र » 6
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ केनेश्वरः प्राप्तव्य इत्याह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यथा शिक्षकाः काम्या हरी विपक्षसा शोणा धृष्णू नृवाहसा रथे युञ्जन्ति, तथा योगिनोऽस्य परमेश्वरस्य मध्य इन्द्रियाणि मनः प्राणाँश्च युञ्जन्ति॥६॥

    पदार्थः

    (युञ्जन्ति) (अस्य) जीवस्य (काम्या) कमनीयौ (हरी) हरणशीलौ (विपक्षसा) विविधैः परिगृहीतौ (रथे) याने (शोणा) रक्तगुणविशिष्टौ (धृष्णू) दृढौ (नृवाहसा) नृणां वाहकौ॥६॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा मनुष्याः सुशिक्षितैर्हयैर्युक्तेन यानेन स्थानान्तरं सद्यः प्राप्नुवन्ति, तथैव विद्यासत्सङ्गयोगाभ्यासैः परमात्मानं क्षिप्रं प्राप्नुवन्ति॥६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब किससे ईश्वर की प्राप्ति होने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जैसे शिक्षा करने वाले सज्जन (काम्या) मनोहर (हरी) ले जाने हारे (विपक्षसा) जो कि विविध प्रकारों से भलीभांति ग्रहण किये हुए (शोणा) लाल-लाल रंग से युक्त (धृष्णू) अतिपुष्ट (नृवाहसा) मनुष्यों को एक देश से दूसरे देश को पहुंचाने हारे दो घोड़ों को (रथे) में (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, वैसे योगीजन (अस्य) इस परमेश्वर के बीच इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणों को युक्त करते हैं॥६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य अच्छे सिखाये हुए घोड़ों से युक्त रथ से एक स्थान से दूसरे स्थान को शीघ्र प्राप्त होते हैं, वैसे ही विद्या, सज्जनों का संग और योगाभ्यास से परमात्मा को शीघ्र प्राप्त होते हैं॥६॥

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    विषय

    रथ में जुते अश्वों के समान दो नायकों की नियुक्ति ।

    भावार्थ

    (काम्या ) कान्तिमान्, सुन्दर ( विपक्षसा) विविधि बन्धनों से बंधे (हरी) दो घोड़ों को (रथे) रथ में (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं उसी प्रकार (रथे) रमण योग्य इस शरीर में (काम्या) कान्तियुक्त, (विपक्षसा) विविध उपायों से वश में आये ( हरी ) वेगवान् प्राण और अपान को (युंजन्ति), योग द्वारा वश करते हैं। योगी जन ( अस्य रथे ) इस परमेश्वर के परम रथ में अपने (काम्या हरी) सुन्दर ज्ञान और कर्मेन्द्रियों को भी लगा देते हैं । (अस्य रथे) इस राष्ट्रपति के राष्ट्र में भी (काम्या) सबकी अभिलाषा के पात्र, (विपक्षसा) विविध पक्ष अर्थात् अनुयायियों वाले, (हरी) समर्थ पुरुषों को (युर्भ्रान्त) नियुक्त करते हैं । अश्व कैसे ? (शोणौ) लाल रंग के वेगवाले (धृष्णू) बलवान् दृढ़, (नृवाहसौ) मनुष्यों को ढो ले जाने वाले हैं । प्राणापान कैसे हैं ? (शोणौ ) गतिशील ( धृष्णू) अन्य समस्त प्राणों को दमन करने वाले, (नृवाहसौ) शरीर के नेता प्राणों को अपने में धारण करनेवाले । दो विद्वान् नेता कैसे हों ? (शोणौ) ज्ञानी, अथवा भव्य पोशाक वाले, तेजस्वी, (धृष्णू) धर्षणशील, विपक्ष के पराभव करने वाले, (नृवाहसा ) नेता पुरुषों को सन्मार्ग पर ले जाने वाले हों ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सूर्यो देवता । विराड् गायत्री । षड्जः ॥

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    विषय

    रथ-योजन

    पदार्थ

    १. ये उपासक लोग रथे शरीररूप रथ में हरी ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों को (युञ्जन्ति) = जोतते हैं। रथ में जुतकर ही ये घोड़े इसकी यात्रा को पूर्ण करवाने में सहायक होंगे। जो घोड़े सदा चरते ही रहते हैं उनकी क्या उपयोगिता ? इसी प्रकार जो इन्द्रियाश्व भोगों को ही भोगने में लगे हैं वे स्पष्ट ही व्यर्थ हैं। वे दस के दस जब रथ में जुते होते हैं तो हम 'दशरथ' बनते हैं। जब ये भोगने में लगते हैं और मुख बन जाते हैं तब हम 'दश-मुख' [रावण] हो जाते हैं। २. ये घोड़े कैसे हैं? [क] (अस्य काम्या) = इस रथस्वामी के काम [इच्छा] का सम्पादन करनेवाले हैं। इसे लक्ष्यस्थान पर पहुँचानेवाले हैं। [ख] (विपक्षसा) = [ पक्ष परिग्रहे] ये घोड़े विशिष्ट परिग्रहवाले हैं। एक ने उत्कृष्ट ज्ञान का ग्रहण किया है तो दूसरे ने विशिष्ट कर्म का परिग्रह किया है। [ग] (शोणा) = तेजस्विता के कारण रक्तवर्णवाले हैं। [घ] (धृष्णू) = तेजस्विता के कारण ही शत्रु का धर्षण करनेवाले हैं। [ङ] (नृवाहसा) = मनुष्यों को लक्ष्य स्थान पर पहुँचानेवाले हैं। वस्तुतः इन्द्रियाश्वों को मलिन न होने देना, इनको ठीक-ठाक रखना ही जीवन यात्रा को पूर्ण करने का प्रमुख साधन है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम इन्द्रियाश्वों को रथ में जोतें और जीवन-यात्रा को पूर्णकर प्रभु के पास पहुँचें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसे प्रशिक्षित घोडे असलेल्या रथाने एका स्थानाहून दुसऱ्या स्थानी जशी शीघ्र पोचतात, तसेच विद्या, सज्जनांची संगती व योगाभ्यासाने परमेश्वराला त्वरेने प्राप्त करता येते.

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    विषय

    आता ईश्‍वराची प्राप्ती कोणत्या उपायांनी होईल, याविषयी.-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, ज्याप्रमाणे (घोडे, बैल आदी पशूंना) प्रशिक्षण देणारे घोडेस्वार वा प्रशिक्षक (काम्या) अत्यंत सुंदर आणि (हरी) वाहून वा ओढून नेणार्‍या (विपक्षसा) विविधप्रकारे (लगाम वा टाच) द्वारे नियंत्रित केलेल्या (शोणा) लाल रंगाच्या (धृष्णू) अती पृष्ट आणि (नृवाहसा) मनुष्यांना एका स्थानापासून दुसर्‍या स्थानापर्यंत नेणार्‍या दोन घोड्यांना (रथे) रथात (युञ्जन्ती) जुंपतात, त्याप्रमाणे योगीजन (अस्य) या परमेश्‍वराशी आपली इंद्रियें, अंतःकरण आणि प्राण, यांना संयुक्त करतात (इंद्रियें, अंतःकरण आणि प्राण यांना ईश्‍वरापाशी जोडण्यामुळेच ईशप्राप्ती संभव आहे, असा आशय आहे) ॥6॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जसे चांगल्याप्रकारे प्रशिक्षित घोड्यांनी युक्त रथाद्वारे एका स्थानापासून दुसर्‍या स्थानापर्यंत लवकर जातात, तसे लोक वा उपासक गण विद्याध्ययन, सत्संग आणि योगाभ्यासाद्वारे परमेश्‍वराला शीघ्र प्राप्त करतात ॥6॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Just as experts yoke to the chariot two beautiful horses, controlled with difficulty and through diverse devices; tawny, stout, our bearers from one place to the other, so do the yogis yoke their organs of sense, mind, and vital breaths to God.

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    Meaning

    Just as they yoke to the chariot two strong, handsome, reddish horses worthy of ride by men and loved by all, so do the yogis join their senses, mind and soul to Ishvara, lord and light of the world. (So do the scientists use the carrier currents of solar and electric energy, i. e. , the energy of Surya/sun and Indra/electricity, in the service of humanity for the divine purpose. )

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    Translation

    May they harness to the car of their human body lovely, highly-spirited, enduring and speedy compound faculties (mental and vital) to reach their destination. (1)

    Notes

    Kāmya, covetable. Also, those who fulfil our wishes. Harī, two horses. Soņā, tawny. Vipakṣasā, having differnt sorts of sides. Or, fa is bird; having wings like birds; swift as flying birds. Dhrsņu, overwhelming; conquering. Nṛvāhas, नृऋन् वहत: तौ , those who carry men.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ কেনেশ্বরঃ প্রাপ্তব্য ইত্যাহ ॥
    এখন কাহার দ্বারা ঈশ্বরের প্রাপ্তি হওয়া উচিত, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যেমন শিক্ষার্থী সজ্জন (কাম্যা) মনোহর (হরী) হরণশীল (বিপক্ষসা) বিবিধ প্রকারে ভালমত গৃহীত (শোণা) রক্তগুণবিশিষ্ট (ধৃষ্ণু) অতিপুষ্ট (নৃবাহসা) মনুষ্যদিগকে এক দেশ হইতে অন্য দেশে পোঁছাইবার জন্য সেই অশ্বগুলিকে (রথে) রথে (য়ুঞ্জন্তি) যুক্ত করে, সেইরূপ যোগী (অস্য) এই পরমেশ্বরের মধ্যে ইন্দ্রিয়, অন্তঃকরণ ও প্রাণগুলিকে যুক্ত করে ॥ ৬ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন মনুষ্য সুশিক্ষিত অশ্বযুক্ত রথ দ্বারা এক স্থান হইতে অন্য স্থান শীঘ্র প্রাপ্ত হয় সেইরূপই বিদ্যা সজ্জনদিগের সঙ্গ ও যোগাভ্যাস দ্বারা পরমাত্মাকে শীঘ্র প্রাপ্ত হয় ॥ ৬ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    য়ু॒ঞ্জন্ত্য॑স্য॒ কাম্যা॒ হরী॒ বিপ॑ক্ষসা॒ রথে॑ ।
    শোণা॑ ধৃ॒ষ্ণূ নৃ॒বাহ॑সা ॥ ৬ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    য়ুঞ্জন্ত্যস্যেত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সূর্য়ো দেবতা । বিরাডগায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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