यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 14
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - ब्रह्मादेवता
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
179
सꣳशि॑तो र॒श्मिना॒ रथः॒ सꣳशि॑तो र॒श्मिना॒ हयः॑। सꣳशि॑तो अ॒प्स्वप्सु॒जा ब्र॒ह्मा सोम॑पुरोगवः॥१४॥
स्वर सहित पद पाठसशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। र॒श्मिना॑। रथः॑। सशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। र॒श्मिना॑। हयः॑। सशि॑त॒ इति॒ सम्ऽशि॑तः। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒प्सु॒जा इत्य॑प्सु॒ऽजा। ब्र॒ह्मा। सोम॑ऽपुरोगवः ॥१४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सँशितो रश्मिना रथः सँशितो रश्मिना हयः । सँशितो अप्स्वप्सुजा ब्रह्मा सोमपुरोगवः ॥
स्वर रहित पद पाठ
सशित इति सम्ऽशितः। रश्मिना। रथः। सशित इति सम्ऽशितः। रश्मिना। हयः। सशित इति सम्ऽशितः। अप्स्वित्यप्ऽसु। अप्सुजा इत्यप्सुऽजा। ब्रह्मा। सोमऽपुरोगवः॥१४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्विद्वांसः किं कुर्युरित्याह॥
अन्वयः
यदि मनुष्यै रश्मिना रथः संशितो रश्मिना हयः संशितोऽप्स्वप्सुजाः सोमपुरोगवो ब्रह्मा संशितः क्रियेत तर्हि किं किं सुखं न लभ्येत॥१४॥
पदार्थः
(संशितः) सम्यक् सूक्ष्मीकृतः (रश्मिना) किरणसमूहेन (रथः) रमणसाधनः (संशितः) (रश्मिना) (हयः) अश्वः (संशितः) स्तुतः (अप्सु) प्राणेषु (अप्सुजाः) प्राणेषु जायमानः (ब्रह्मा) महान् योगी विद्वान् (सोमपुरोगवः) सोम ओषधिगणबोध ऐश्वर्ययोगो वा पुरोगामी यस्य सः॥१४॥
भावार्थः
ये मनुष्याः पदार्थविज्ञानेन विद्वांसो भवन्ति, तेऽन्यान् कारयित्वा प्रशंसां प्राप्नुवन्तु॥१४॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर विद्वान् लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
जो मनुष्यों से (रश्मिना) किरणसमूह से (रथः) आनन्द को सिद्ध करने वाला यान (संशितः) अच्छे प्रकार सूक्ष्म कारीगरी से बनाया (रश्मिना) लगाम की रस्सी आदि से (हयः) घोड़ा (संशितः) भलीभांति चलने में तीक्ष्ण अर्थात् उत्तम क्रिया तथा (अप्सु) प्राणों में (अप्सुजाः) जो प्राणवायु रूप से संचार करने वाला पवन वा वाष्प (सोमपुरोगवः) ओषधियों का बोध और ऐश्वर्य्य का योग जिससे पहिले प्राप्त होने वाला है, वह (ब्रह्मा) बड़ा योगी विद्वान् (संशितः) अतिप्रशंसित किया जाये तो क्या-क्या सुख न मिले॥१४॥
भावार्थ
जो मनुष्य पदार्थों के विशेष ज्ञान से विद्वान् होते हैं, वे औरों को विद्वान् करके प्रशंसा को पावें॥१४॥
विषय
रथ अश्व के दृष्टान्त से ब्रह्मा नाम विद्वान् के कर्तव्य और स्थिति वर्णन । पक्षान्तर में अध्यात्मविवेचन ।
भावार्थ
( रश्मिना ) रस्सी से ( संशित: ) अच्छी प्रकार बंधा (रथः) रथ अच्छा सुखकारी होता है और (हयः) घोड़ा भी (रश्मिना ) रासों से बंधा हुआ वश में रहता है उसी प्रकार (अप्सुजाः) प्रजा में उत्पन्न विद्वान् (अप्सु संशितः) प्रजाओं द्वारा ही भली प्रकार नियम व्यवस्थाओं और कर्म, कर्त्तव्यों से बद्ध हो और (ब्रह्मा) ब्रह्म, वेद का जानने हारा विद्वान् ही (सोमपुरोगवः) राजा के आगे २ चलने हारा, उसका मार्गदर्शक हो । अथवा - ( अप्सुजाः) प्रजाओं में तेज से स्वामी बनने वाला राजा (अप्सु संशितः) प्रजाओं द्वारा ही खूब तीक्ष्ण, एवं कर्त्तव्यपरायण, व्यवस्थाबद्ध किया जाकर (ब्रह्मा) महान् शक्तिमान् प्रभु और विद्वान् के समान (सोम-'पुरोगवः ) ऐश्वर्य या राष्ट्र का नेता हो । अध्यात्म में - (रथः) देह, (रश्मिना ) सूर्यकिरणवत् तप से (संशितः ) तीक्ष्ण हो । (हयः) इन्द्रियां भी तप से तीक्ष्ण हों । (अप्सुजाः) प्राण भी तप से तप्त हों और तब (ब्रह्मा) विद्वान् योगी (सोम- पुरोगवः ) सोमनाम ब्रह्म रस प्राप्ति में अग्रसर होता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा । निचृदनुष्टुप् । गान्धारः ॥
विषय
सोमपुरोगव
पदार्थ
१. गत मन्त्र के 'राथ्यो वृषा' ने क्या किया है? उसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि इसके द्वारा रश्मिना ज्ञानरूपी किरणों से युक्त मनरूप लगाम से रथः = यह शरीररूप रथ (संशितः) = शोभित किया गया है [संपूर्व: श्यति : शोभने- उ० ] अथवा चलने में तीक्ष्ण व उत्तम क्रियावाला किया गया है। २. (रश्मिना) = उसी ज्ञान-किरणयुक्त मनरूपी लगाम से (हयः) = इन्द्रियरूप घोड़े (संशितः) = शोभित व तीक्ष्ण क्रियायुक्त किये गये हैं । ३. (अप्सुजा:) = सदा कर्मों में लगा होनेवाला यह (अश्व) [ = कर्मों में व्याप्त पुरुष] (अप्सु) = प्राणों में (संशित:) = शोभित हुआ है। कर्मों से इसकी प्राणशक्ति बढ़ी है। ४. इस प्रकार कर्मों से बढ़ी हुई प्राणशक्तिवाला यह पुरुष (ब्रह्मा) = बड़ा व निर्माता हुआ है, (सोमपुरोगवः) = यह सोम की रक्षा के द्वारा आगे और आगे चलता है [सोमेन पुरः गच्छति ] । सोम की रक्षा के द्वारा यह उसकी ऊर्ध्वगति करनेवाला 'शूद्र [शु+उत्+र] होता है, शरीर में उसका प्रवेश करानेवाला 'वैश्य' बनता है, शरीर को सब क्षतों से बचाने के कारण 'क्षत्रिय' होता है और इस सोम के ज्ञानाग्नि का ईंधन बनने पर 'ब्रह्म'- ज्ञान से दीप्त 'ब्राह्मण' होता है। इस प्रकार यह सोम के द्वारा अधिक- और अधिक उन्नति करता चलता है।
भावार्थ
भावार्थ - रथ और घोड़ों [शरीर व इन्द्रियों] को वश में करके क्रियाशीलता से अपनी शोभा को बढ़ाकर हम ब्रह्मा बनते हैं और सोम की रक्षा से आगे और आगे चलनेवाले बनते हैं।
मराठी (2)
भावार्थ
जी माणसे पदार्थांच्या विशेष ज्ञानाने विद्वान होतात ती इतरांना विद्वान करतात व त्यांची प्रशंसा होते.
विषय
विद्वानांनी काय केले पाहिजे, यावषियी . -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - ज्या मनुष्यांनी (कारीगरांनी वा यांत्रिक जनांनी) (रश्मिना) सूर्यकिरणांच्या साहाय्याने चालणारे आणि (रथः) आनंद व सोय देणारे यात (सँशितः) उच्च तंत्रज्ञानाच्या साहाय्याने यान केले आहे, (ते प्रशंसित अवश्य होतात) तसेच (रश्मिना) लगामाद्वारे प्रशिक्षित वा नियंत्रित (हयः) घोडा, आणि (सँशितः) चालण्यात वा गतीत जे तीव्र म्हणजे उत्तम आहे, (त्याला प्रशिक्षण देणारे प्रशंसनीय होतात) तसेच (अप्सु) प्राणांत (अप्सुजाः) प्राणवायू रूपाने संचार करणारे पवन अथवा पाण्यातून निर्माण केलेली वाफ तसेच (सोमपुरोगवः) औषधीचे ज्ञान करून देणारा आणि ऐश्वर्य समृद्धी मिळवूद देणारा जो सर्वप्रथम असा ब्रह्मा महाविद्वान आहे, तो (सँशितः) सर्वांतर्फे अतिप्रशंसित का होऊ नये? (अर्थात यांत्रिकजन, अश्वप्रशिक्षक, विद्वान हे सर्व समाजात अवश्य सत्कार-आदरास प्राप्त होतात) त्यामुळे सर्व लोकांना सुख-आनंद मिळतो, हे साहजिकच आहे. ॥14॥
भावार्थ
भावार्थ- जे लोक पदार्थांचे विशेष ज्ञान प्राप्त करून विद्वान होतात, त्यांनी इतरांनाही विद्यावान करावे म्हणजे ते समाजात प्रशंसनीय होतात. ॥14॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Body is strengthened through penance, warm like the suns rays. Organs are also strengthened through penance. Vital breaths are invigorated through penance. A learned yogi advances spiritually through the attainment of love for God.
Meaning
The chariot is refined by the light of sunbeams. The horse is refined by sensitive reins of steering. The expert man of knowledge born of the energy of prana, working on energy, is refined by advancement in the knowledge of health, peace and value of honour.
Translation
The chariot looks beautiful when secured with ropes; the horse looks graceful when fitted with reins; the lotus looks charming when lying in waters; the learned sage looks grand when merged in bliss. (1)
Notes
Samsitaḥ, शोभित:, beautified. Also, sharpened. Brahmā, a learned sage. Somapurogavah, सोमः पुरोगामी यस्य, on that is preceded by soma, i. e. bliss, or wealth or a certain medic nal plant.
बंगाली (1)
विषय
পুনর্বিদ্বাংসঃ কিং কুর্য়ুরিত্যাহ ॥
পুনঃ বিদ্বান্গণ কী করিবে, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- যাহা মনুষ্যগণের দ্বারা (রশ্মিনা) কিরণ সমূহের দ্বারা (রথঃ) আনন্দকে সিদ্ধকারী যান (সংশিতঃ) উত্তম প্রকার সূক্ষ্ম কারীগর দ্বারা নির্মিত (রশ্মিনা) লাগামের দড়ি ইত্যাদি দ্বারা (হয়ঃ) অশ্ব (সংশিতঃ) ভালমত চলিতে তীক্ষ্ম অর্থাৎ উত্তম ক্রিয়া তথা (অপ্সু) প্রাণসকলে (অপ্সুজাঃ) যাহা প্রাণবায়ু রূপে সঞ্চারকারী পবন বা বাষ্প (সোমপুরোগবঃ) ওষধি সকলের বোধ এবং ঐশ্বর্য্যের যোগ যাহা হইতে প্রথমে প্রাপ্ত হওয়ার যোগ্য সে (ব্রহ্মা) বড় যোগী বিদ্বান্ (সংশিতঃ) অতিপ্রশংসিত করা হউক তাহা হইলে কী কী সুখ প্রাপ্ত হইবে না? ॥ ১৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- যে সব মনুষ্য পদার্থ সমূহের বিশেষ জ্ঞান দ্বারা বিদ্বান্ হয় তাহারা অন্যদেরকে বিদ্বান্ করিয়া প্রশংসা প্রাপ্ত করুক ॥ ১৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
সꣳশি॑তো র॒শ্মিনা॒ রথঃ॒ সꣳশি॑তো র॒শ্মিনা॒ হয়ঃ॑ ।
সꣳশি॑তো অ॒প্স্ব᳖সু॒জা ব্র॒হ্মা সোম॑পুরোগবঃ ॥ ১৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সꣳশিতো রশ্মিনেত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । ব্রহ্মা দেবতা । নিচৃদনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
গান্ধারঃ স্বরঃ ॥
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