यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 38
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - सभासदो देवताः
छन्दः - निचृत् त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
78
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यव॑ञ्चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑।इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नम॑ऽउक्तिं॒ यज॑न्ति॥३८॥
स्वर सहित पद पाठकु॒वित्। अ॒ङ्ग। यव॑मन्त इति॒ यव॑ऽमन्तः। यव॑म्। चि॒त्। यथा॑। दान्ति॑। अ॒नु॒पू॒र्वमित्य॑नुऽपू॒र्वम्। वि॒यूयेति॑ वि॒ऽयूय॑। इ॒हेहेती॒हऽइ॑ह। ए॒षा॒म्। कृ॒णु॒हि॒। भोज॑नानि। ये। ब॒र्हिषः॑। नम॑ऽउक्ति॒मिति॒ नमः॑ऽउक्तिम्। यज॑न्ति ॥३८ ॥
स्वर रहित मन्त्र
कुविदङ्ग यवमन्तो वयञ्चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वँवियूय । इहेहैषाङ्कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमऽउक्तिँयजन्ति ॥
स्वर रहित पद पाठ
कुवित्। अङ्ग। यवमन्त इति यवऽमन्तः। यवम्। चित्। यथा। दान्ति। अनुपूर्वमित्यनुऽपूर्वम्। वियूयेति विऽयूय। इहेहेतीहऽइह। एषाम्। कृणुहि। भोजनानि। ये। बर्हिषः। नमऽउक्तिमिति नमःऽउक्तिम्। यजन्ति॥३८॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथाऽध्यापकाऽध्येतारः कीदृशः स्युरित्याह॥
अन्वयः
हे अङ्ग। कुवित् त्वमिहेहैषां यथा यवमन्तो कृषीव यवं वियूय चिदप्यनुपूर्वं दान्ति ये च बर्हिषो नम उक्तिं यजन्ति, तेषां भोजनानि कृणुहि॥३८॥
पदार्थः
(कुवित्) बहुविज्ञानयुक्तः (अङ्ग) मित्र (यवमन्तः) बहुयवादिधान्ययुक्ताः (यवम्) धान्यसमूहम् (चित्) अपि (यथा) (दान्ति) छिन्दन्ति (अनुपूर्वम्) आनुकूल्यमनतिक्रम्य (वियूय) वियोज्य संमिश्र्य च (इहेह) अस्मिन्नस्मिन् व्यवहारे (एषाम्) जनानाम् (कृणुहि) कुरु (भोजनानि) पालनार्थान्यन्नानि (ये) (बर्हिषः) जलस्य (नमउक्तिम्) नमसोऽन्नस्य वचनम् (यजन्ति) सङ्गच्छन्ते॥३८॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। हे अध्यापकाध्येतारः! यूयं यथा कृषीवलाः परस्परस्य क्षेत्राणि पर्यायेण लुनन्ति, बुसादिभ्योऽन्नानि पृथक्कृत्याऽन्यान् भोजयित्वा स्वयं भुञ्जते, तथैवेह विद्याव्यवहारे निष्कपटतया विद्यार्थिभिरध्यापकानां सेवामध्यापकैर्विद्यार्थिनां विद्यावृद्धिं च कृत्वा परस्परान् भोजनादिना सत्कृत्य सर्व आनन्दन्तु॥३८॥
हिन्दी (3)
विषय
अब पढ़ने और पढ़ाने हारे कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (अङ्ग) मित्र! (कुवित्) बहुत विज्ञानयुक्त तू (इहेह) इस-इस व्यवहार में (एषाम्) इन मनुष्यों से (यथा) जैसे (यवमन्तः) बहुत जौ आदि अन्नयुक्त खेती करने वाले (यवम्) जौ आदि अनाज के समूह को बुस आदि से (वियूय) पृथक् कर (चित्) और (अनुपूर्वम्) क्रम से (दान्ति) छेदन करते हैं, उनके और (ये) जो (बर्हिषः) जल वा (नमउक्तिम्) अन्नसम्बन्धी वचन को (यजन्ति) कहकर सत्कार करते हैं, उनके (भोजनानि) भोजनों को (कृणुहि) करो॥३८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे पढ़ाने और पढ़ने वालो! तुम लोग जैसे खेती करनेहारे एक-दूसरे के खेत को पारी से काटते और भूसा से अन्न को अलग कर औरों को भोजन कराके फिर आप भोजन करते हैं, वैसे ही यहां विद्या के व्यवहार में निष्कपट भाव से विद्यार्थियों को पढ़ाने वालों की सेवा और पढ़ाने वालों को विद्यार्थियों की विद्यावृद्धि कर एक-दूसरे को खान-पान से सत्कार कर सब कोई आनन्द भोगें॥३८॥
विषय
राजा का प्रजा के भोजनादि सुख का प्रबन्ध करना ।
भावार्थ
व्याख्या देखो अ० १० । ३२ ॥
विषय
आत्मदेह-विवेक
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार घर के शान्त वातावरण में ही मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति कर सकता है। घर स्वर्ग बनेगा तो वहाँ देवों का निवास तो होगा ही। ये दिव्य वृत्तिवाले लोग (कुवित्) = खूब (अङ्ग) = शीघ्र ही, (यवमन्तः) = अच्छी कृषिवाले किसान (यव) = जौ को (चित्) = निश्चय से (यथा) = जैसे (अनुपूर्वम्) = क्रमशः एक ओर से (वियूय) = कुछ-कुछ अलग करके (दान्ति) = काटते चलते हैं, उसी प्रकार क्रमशः एक ओर से शुरू करके पहले अन्नमयकोश को, फिर प्राणमय, उसके बाद मनोमय, फिर विज्ञानमय व अन्त में आनन्दमय को अलग करके अन्तःस्थित आत्मतत्त्व का दर्शन करते हैं । २. इन साधकों में कोई अभी 'अन्नमयकोश' मैं नहीं हूँ, ऐसा ही निश्चय करने का प्रयत्न कर रहा होता है, कोई इससे ऊपर 'प्राणमयकोश मैं नहीं हूँ' ऐसा निश्चय कर चुका होता है। कोई मनोमय से ऊपर उठने का प्रयत्न कर रहा होता है तो कोई विज्ञानमय तक पहुँच रहा होता है। कोई एक आध सौभाग्यशाली साधक आनन्दमय तक पहुँच गया होता है और आत्मानन्द ले रहा होता है। हे प्रभो! आप (इह इह) = इस - इस स्थान में पहुँचे हुए इन सब अभियुक्त [साधना में लगे हुए] व्यक्तियों का (भोजनानि) = पालन (कृणुहि) = कीजिए। आप ही इनके योगक्षेम का ध्यान करते हैं। ३. आप उन सबके योगक्षेम को चलाते हैं (ये) = जो (बर्हिषः) = हृदय में से वासनाओं का उद्बर्हण करनेवाले लोग (नमउक्तिम्) = नमन के वचनों को, नम्रतापूर्ण स्तुति वचनों को (यजन्ति) = अपने साथ सङ्गत करते हैं। वस्तुतः प्रभु के प्रति नमन ही उन्हें वासनाओं को उन्मूलित करने में सहायक होता है। वासनाओं के विनष्ट होने पर पवित्र हृदय में प्रभु का दर्शन होता है।
भावार्थ
भावार्थ- एक-एक कोश को चिन्तनपूर्वक अलग करते हुए हम आत्मरूप को देख पाते हैं। इस आत्मरूप का दर्शन तभी होगा जब हम हृदय को वासनाशून्य बनाएँगे। हृदय की पवित्रता प्रभु के प्रति नमन से होगी ।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे अध्ययन व अध्यापन करणाऱ्यांनो! ज्याप्रमाणे शेतकरी एकमेकांचे शेत आळीपाळीने कापतात व धान्यापासून भूसा वेगळा करून अन्न तयार करून इतरांना भोजन देतात व नंतर स्वतः भोजन करतात तसे विद्यार्थ्यांनी विद्या प्रक्रियेत अध्यापकांची सेवा करावी व अध्यापकांनीही विद्यार्थ्यांची विद्या वृद्धिंगत करावी. खानपानासह सत्कार करावा व सर्वांनी आनंदात राहावे.
विषय
अध्ययन करणारे व अध्यापन करणारे कसे असावेत, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (अङ्ग) मित्रा, तू (कुवित्) अत्यंत ज्ञानि-विज्ञान आहेस. तू (इहेह) या जगातील विविध कार्य व्यवहारांमधे (एषाम) या इतर लोकाशी (कशा प्रकारे सुविचारपूर्वक कार्यें करतोस?) अशाप्रकारे की (तथा) जसे कृषकगण (यवमन्तः) जव आदी धान्याची शेती करणारे कृषक (यवम्) यव आदी धान्याच्या कणांना भुश्यापासून (वियूय) हालवून वा ओग्नावून वेगळे करतात (चित्) आणि (अनुपूर्वम्) क्रमाक्रमाने (यान्ति) त्या भुसा व धान्य यांना तोडणे निवडणे आदी कामें करतात. (हे विद्यार्थी, वा अध्यापक, तूम्ही अज्ञानापासून ज्ञान वेगळे करतोस आणि सत्य तेच सांभाळून ठेवतोस) (ये) जे लोक (बर्हिषः) जल अथवा (नमउक्तिम्) अन्न-धान्यादीद्वारे (यजन्ति) नम्रवचनाने तुमचा सत्कार-सम्मान करतात, तुम्ही दोघे त्यांच्या (भोजनानि) भोजनाचा निमंत्रणाचा, (कृणुहि) स्वीकार करा. ॥38॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात उपमा अलंकार आहे. हे अध्यापक आणि हे अध्ययन कर्ता जनहो, ज्याप्रमाणे शेतकरी एकमेकाच्या शेतातील कापणी, नांगरणी आदी कामें मिळून व आळीपाळीने करतात तसेच भुश्यापासून धान्यकण वेगळे करतात आणि आधी इतरांना जेवण घालून नंतर स्वतः जेवतात, तद्वत तुम्ही या अध्ययन-अध्यापन कार्यात निष्कपट होऊन (एकमेकाला सहकार्य द्यावे) ते असे की विद्यार्थ्यांनी अध्यापकांची सेवा करावी आणि अध्यापकांनी विद्यार्थ्यांचे ज्ञान वाढवावे याशिवाय दोघांनी खान-पान आदी विषयी एकमेकाला सत्कृत वा आनंदित करीत रहावे. ॥38॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O King, just as farmers reap the barley-corn, winnow and protect it ; so shouldst thou arrange for food for those engaged in the contemplation of God.
Meaning
Dear Sabhasad, eminent member of the council, just as farmers blest with rich barley harvest the grain with discrimination, some plants separately and some together, so do the teachers sit on seats of grass, receive food and water, and carry on the yajna of education accomplishing their work with the disciples with judgement. Here in this school, provide for their food and maintenance.
Translation
O friends, as the farmers reap the plentiful barley crop in proper order, so get the meals prepared here itself for the people, who in this sacrifice are chanting hymns of homage. (1)
Notes
Repeated from X. 32.
बंगाली (1)
विषय
অথাऽধ্যাপকাऽধ্যেতারঃ কীদৃশঃ স্যুরিত্যাহ ॥
এখন অধ্যেতা ও অধ্যাপক কেমন হইবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।
पदार्थ
পদার্থঃ- হে (অঙ্গ) মিত্র ! (কুবিৎ) বহু বিজ্ঞানযুক্ত তুমি (ইহেহ) এই ব্যবহারে (এষাম্) এই সব মনুষ্যদিগের দ্বারা (য়থা) যেমন (য়বমন্তঃ) বহু যবাদি অন্ন যুক্ত কৃষিকারী (য়বম্) যবাদি শস্যের সমূহকে ভূষি ইত্যাদি হইতে (বিয়ূয়) পৃথক করিয়া (চিৎ) এবং (অনুপূর্বম্) ক্রমপূর্বক (দান্তি) ছেদন করে তাহাদের এবং (য়ে) যাহারা (বর্হিষঃ) জল বা (নমউক্তিম্) অন্ন সম্পর্কীয় বচনকে (য়জন্তি) বলিয়া সৎকার করে তাহাদের (ভোজনানি) ভোজন কে (কৃণুহি) কর ॥ ৩৮ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমালঙ্কার আছে । হে অধ্যেতাও অধ্যাপকগণ ! তোমরা যেমন কৃষিজীবী একে অন্যের জমিকে পালাক্রমে কর্ত্তন কর এবং ভূষি হইতে অন্নকে পৃথক করিয়া অন্যদেরকে ভোজন করাইয়া তারপর স্বয়ং ভোজন কর তদ্রূপ এখানে বিদ্যার ব্যবহারে নিষ্কপট ভাবপূর্বক বিদ্যার্থীদের বিদ্যাবুদ্ধি করিয়া একে অন্যের পানাহার দ্বারা সৎকার করিয়া সকলে আনন্দভোগ করুক ॥ ৩৮ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
কু॒বিদ॒ঙ্গ য়ব॑মন্তো॒ য়ব॑ঞ্চি॒দ্যথা॒ দান্ত্য॑নুপূ॒র্বং বি॒য়ূয়॑ ।
ই॒হেহৈ॑ষাং কৃণুহি॒ ভোজ॑নানি॒ য়ে ব॒র্হিষো॒ নম॑ऽউক্তিং॒ য়জ॑ন্তি ॥ ৩৮ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
কুবিদঙ্গেত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সভাসদো দেবতাঃ । নিচৃৎ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal