यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 24
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - भूमिसूर्यौ देवते
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
406
मा॒ता च॑ ते पि॒ता च॒ तेऽग्रं॑ वृ॒क्षस्य॑ रोहतः। प्रति॑ला॒मीति॑ ते पि॒ता ग॒भे मु॒ष्टिम॑तꣳसयत्॥२४॥
स्वर सहित पद पाठमा॒ता। च॒। ते॒। पि॒ता। च॒। ते॒। अग्र॑म्। वृ॒क्षस्य॑। रो॒ह॒तः॒। प्रति॑लामि। इति॑। ते॑। पि॒ता। ग॒भे। मु॒ष्टिम्। अ॒त॒ꣳस॒य॒त्॥२४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
माता च ते पिता च तेग्रँ वृक्षस्य रोहतः । प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमतँसयत् ॥
स्वर रहित पद पाठ
माता। च। ते। पिता। च। ते। अग्रम्। वृक्षस्य। रोहतः। प्रतिलामि। इति। ते। पिता। गभे। मुष्टिम्। अतꣳसयत्॥२४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे राजन्! यदि ते पृथिवीव माता च सूर्य्य इव ते पिता च वृक्षस्याग्रं रोहतः। यदि ते पिता गभे मुष्टिमतंसयत् तर्हि प्रजाजनोऽहम्प्रतिलामीति॥२४॥
पदार्थः
(माता) पृथिवीव वर्त्तमाना माता (च) (ते) तव (पिता) सूर्य्य इव वर्त्तमानः पिता (च) (ते) तव (अग्रम्) मुख्यश्रियम् (वृक्षस्य) व्रश्चितुं छेत्तुं योग्यस्य संसाराख्यस्य राज्यस्य (रोहतः) (प्रतिलामि) स्निह्यामि (इति) (ते) तव (पिता) (गभे) प्रजायाम् (मुष्टिम्) मुष्ट्या धनग्राहकं राज्यम् (अतंसयत्) तंसयत्यलङ्कारोति॥२४॥ इयं वै माताऽसौ पिताभ्यामेवैनं स्वर्गं लोकं गमयत्यग्रं वृक्षस्य रोहत इति। श्रीर्वैराष्ट्रस्याग्रं श्रियमेवैनं राष्ट्रस्याग्रं गमयति प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमतंसयदिति। विड्वै गभो राष्ट्रं मुष्टी राष्ट्रमेवाविश्याहन्ति, तस्माद् राष्ट्री विशं घातुकः॥ (शत॰१२।२।३।७)
भावार्थः
यौ मातापितरौ पृथिवीसूर्य्यवर्द्धैर्यविद्याप्रकाशितौ न्यायेन राज्यं पालयित्वाग्र्यां श्रियं प्राप्य प्रजा भूषयित्वा स्वस्य पुत्रं राजनीत्या युक्तं कुर्यातां तौ राज्यं कर्तुमर्हेताम्॥२४॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे राजन्! यदि (ते) आपकी (माता) पृथिवी के तुल्य सहनशील मान करने वाली माता (च) और (ते) आपका (पिता) सूर्य्य के समान तेजस्वी पालन करने वाला पिता (च) भी (वृक्षस्य) छेदन करने योग्य संसार रूप वृक्ष के राज्य की (अग्रम्) मुख्य श्री शोभा वा लक्ष्मी पर (रोहतः) आरुढ़ होते हैं, (ते) आपका (पिता) पिता (गभे) प्रजा में (मुष्टिम्) मुट्ठी से धन लेने वाले राज्य को, धन लेकर (अतंसयत्) प्रकाशित करता है तो मैं (इति) इस प्रकार प्रजाजन (प्रतिलामि) भलीभांति उस राजा से प्रीति करता हूँ॥२४॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता-पिता पृथिवी और सूर्य्य के तुल्य धैर्य और विद्या से प्रकाश को प्राप्त न्याय से राज्य को पाल कर, उत्तम लक्ष्मी वा शोभा को पाकर, प्रजा को सुशोभित कर, अपने पुत्र को राजनीति से युक्त करें, वे राज्य करने को योग्य हों॥२४॥
विषय
माता पिता का प्रधान पद और स्नेह से रक्षार्थ ही राष्ट्र की समृद्धि के आधार पर राजा का सैन्यबल होता है । मन्त्रोक्त मुष्टि, गर्भ, वृक्ष आदि शब्दों का रहस्य विवेक । गृहस्थः पक्ष में माता पिता का उच्च पद और ऐश्वर्य या स्त्री के आधार पर परिवारिक स्नेह की व्यवस्था ।
भावार्थ
हे राष्ट्र ! (ते माता च ) तेरा माता, निर्माता, ज्ञानवान् पुरुष, ( ते पिता च) और तेरा पिता, पालक, राजा, दोनों (वृक्षस्य) भूमि को आच्छादन करने वाले शासन के ( अग्रम् ) मुख्य पद पर (रोहत :) आरूढ़ होते हैं । और (ते पिता) तेरा पालक राजा भी (प्रतिलामि इति) स्नेह करता हूँ इस भाव से ही (गभे = भगे) प्रजा के ऐश्वर्य के आधार पर ( मुष्टिम् ) दुःखों से छुड़ाने वाले सुसंगठित राष्ट्र, अथवा शत्रुनाशक शस्त्र बल को ( अतंसंयत् ) सुशोभित करता है । 'अ' - श्रीर्वै राष्ट्रस्य अग्रम् । श्रियमेवेनं गमयति । बिड्वै गभो राष्ट्रं मुष्टि: । राष्ट्रम् एव विशि आहन्ति । तस्माद् राष्ट्री विशं घातुकः । श्री राष्ट्र का अग्र भाव है । 'गभ' प्रजा है । राष्ट्र राज्य प्रबन्ध या शासन 'मुष्टि' है । जैसे ढीले हाथ में कुछ शक्ति नहीं, उसकी मुट्ठी बांध लेने पर वह बलवान् हो जाता है वैसे प्रजा को शासन में बांध लेने पर वह दृढ़ मुट्ठी के समान हो जाती है । वह राष्ट्र ही प्रजा के आधार पर चलता है राष्ट्रपति इस प्रकार प्रजा को ही प्राप्त होता है । राजा का यह स्नेह है कि वह बिखरी प्रजा को मुट्ठी का रूप देता है, यही प्रजा की शोभा है कि स्नेह से पांचों अंगुलियों के समान पांचों जन मिलकर एक हो जाते हैं, 'वृक्षस्य ' - वृत्वा क्षां तिष्ठतीति । निरुक्तम् । 'मुष्टिम् ' — मोचनाद् मोपणाद्, मोहनाद्वा । निरु० ६।१।१ । ( २ ) गृहस्थ पक्ष में- हे पुरुष ! (ते माता च पिता च वृक्षस्य भयं रोहतः) तेरे माता पिता ही गृहस्थाश्रमरूप आश्रय वृक्ष के मुख्य पद पर स्थित हैं । (ते पिता) तेरा पिता स्नेह करता हूँ इस भाव से ही (गभे = भगे) ऐश्वर्य के बल पर अथवा स्त्री के आधार पर ही अपने ( मुष्टिम् ) मुट्ठी के समान एक कर देने वाली परिवारिक स्नेह की व्यवस्था को सुशोभित करता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भूमिसूर्यौ देवते । निचृदनुष्टुप् । गान्धारः ॥
विषय
स्तेय-दण्ड [ चोरी का नाश ]
पदार्थ
१. राष्ट्र में प्रजा माता है जो राष्ट्र का निर्माण करती है और राजा पिता है जिसका काम राष्ट्र की रक्षा करना है। ये दोनों मिलकर ही राष्ट्र की उन्नति का साधन कर पाते हैं, अतः मन्त्र में कहते हैं कि हे राष्ट्र ! (ते माता च) = तेरा निर्माण करनेवाली यह प्रजा, (पिता च ते) = और तेरी रक्षा करनेवाला यह राजा (वृक्षस्य अग्रम्) = राष्ट्रवृक्ष के अग्रभाग पर, अर्थात् राष्ट्रोन्नति के शिखर पर (रोहतः) = आरोहण करते हैं। [श्रीर्वै राष्ट्रस्य अग्रम् - श० १३ । २।९।७] 'श्री' ही राष्ट्रवृक्ष का शिखर है, अतः ये राष्ट्र को अत्यन्त श्रीसम्पन्न करते हैं । २. और हे राष्ट्र ! (प्रतिलाम इति) = [तिल स्नेहने] प्रकर्षेण स्नेह करता हूँ, इस भावना से ही (ते पिता) = तेरा रक्षक यह राजा (गभे) = [ विड् वै गभः] ऐश्वर्यसम्पन्न प्रजाओं के अन्दर (मुष्टिम्) = [मोषणात् नि० ६।१।१] चोरी की वृत्ति को (अतंसयत्) = कम्पित कर दूर करवा [Shakes away] देता है। मनु के अनुसार राजा चोर को हस्तच्छेदादि दण्ड देता है [(तत्तदेव हरेदस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः) - मनु] ऐसे दण्ड से प्रजा चोरी आदि पापों की ओर झुकाववाली नहीं रहती । वस्तुतः जब राजा को राष्ट्र के प्रति स्नेह होता है तब वह राष्ट्र में से चोरी आदि को दूर करने का प्रयत्न करता है। की
भावार्थ
भावार्थ - राष्ट्र की माता 'प्रजा' है तो पिता 'राजा' है। ये दोनों मिलकर राष्ट्रवृक्ष श्री का वर्धन करते हैं। राजा राष्ट्र में से चोरी को कम्पित कर दूर भगा देता है।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे माता-पिता, पृथ्वी व सूर्य यांच्याप्रमाणे धैर्य व विद्या, तसेच न्यायमार्गाने राज्याचे पालन करून उत्तम लक्ष्मी प्राप्त करून प्रजेला सुशोभित करतात व आपल्या पुत्रांना राजनीतिनिपुण करतात ते राज्य करण्यायोग्य असतात.
विषय
पुन्हा तोच विषय . -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे राजन्, जर (ते) तुमची (माता) भूमीप्रमाणे सहनशीलवृत्ती असलेली माता (च) आणि (ते) तुमचा (पिता) सूर्याप्रमाणे तेजस्वी असलेला निता (च) (तुमच्यासह हे दोघेही) (वृक्षस्य) छेदन करण्यास योग्य अशा या संसाररूप वृक्षाच्या वा राजाच्या (अग्रम्) मुख्य श्री व लक्ष्मीवर धनसंपदेवर) (रोहतः) आरूढ होतील, (तर राज्यावर केवढे उपकार होतील) तसेच जर तुमचा (पिता) पिता (गभे) प्रजेकडून (मुष्टिम्) मुठी-मुठीभर धन (वा कर वसूल करून) (अतंसयत्) अधिक उत्तम करील, तर मी (तुमचा) एक प्रजाजन (इति) अशाप्रकारे (प्र,तिलामि) त्या राजाला (तुमच्या पुत्राला) चांगले प्रशंसित करतो, त्यावर प्रीती करतो आणि माझ्या प्रमाणे सर्व प्रजाजनदेखील राजाला प्रिय मानतील)
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जे (राजाचे) आईवडील पृथ्वी आणि सूर्याप्रमाणे राज्याला धैर्य आणि विद्या देऊन न्यायाने प्रजापालन करतील (आपल्या राजा असलेल्या पुत्राला सहाय्य मार्गदर्शन करतील) ते उत्तम लक्ष्मी प्राप्त करून प्रजेलाही प्रशंसित करतील आणि आपल्या पुत्राला राजकारणाचे धडे शिकवून त्यास राज्यशकट चालविण्यास समर्थ बनवतील ॥24॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O king, thy forbearing and loving mother, and thy father brilliant and nourishing like the sun, rule over the prosperity and riches of the sovereignty of this mundane universe. Thy father has beautified his rule for his subjects. I, as his subject, do love him dearly.
Meaning
Ruler, the earth your mother and the sun your father rise to the top of the world. The sun strikes at the treasure of space-waters with his light and power, the earth receives the showers and shines. Celebrate them with the people in yajna: It is beautiful, it is joyous. I am happy.
Translation
Your mother and your father climb up to the top of the tree. Being affectionate the father establishes the kingdom among the subjects. (1)
Notes
The chief priest says to the queen: When your mother and father ascend to the bed (made of wood), then your father thrusts his lubricated male organ into vagina. (Implying that your birth has taken place after these abcene proceedings).
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে রাজন্ ! যদি (তে) আপনার (মাতা) পৃথিবী তুল্য সহনশীল মানকারিণী মাতা (চ) এবং (তে) আপনার (পিতা) সূর্য্যের সমান তেজস্বী পালনকারী পিতা (চ) ও (বৃক্ষস্য) ছেদন করিবার যোগ্য সংসার রূপ বৃক্ষের রাজ্যের (অগ্রম্) মুখ্য শ্রী শোভা বা লক্ষ্মীর উপর (রোহতঃ) আরূঢ় হয় (তে) আপনার (পিতা) পিতা (গভে) প্রজায় (মুষ্টিম্) মুষ্টি দ্বারা ধন গ্রহণকারী রাজ্যকে, ধন লইয়া (অর্তসয়ৎ) প্রকাশিত করে, তাহা হইলে আমি (ইতি) এই প্রকার প্রজা (প্রতিলামি) ভালমত সেই রাজার সঙ্গে প্রীতি করি ॥ ২৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে মাতা-পিতা, পৃথিবী ও সূর্য্য তুল্য ধৈর্য্য ও বিদ্যা দ্বারা প্রকাশকে প্রাপ্ত ন্যায়পূর্বক রাজ্যের পালন করিয়া উত্তম লক্ষ্মী বা শোভা প্রাপ্ত হইয়া রাজাকে সুশোভিত করিয়া স্বীয় পুত্রকে রাজনীতি সহ যুক্ত করিবে, তাহারা রাজ্য করিবার যোগ্য হয় ॥ ২৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
মা॒তা চ॑ তে পি॒তা চ॒ তেऽগ্রং॑ বৃ॒ক্ষস্য॑ রোহতঃ ।
প্রতি॑লা॒মীতি॑ তে পি॒তা গ॒ভে মু॒ষ্টিম॑তꣳসয়ৎ ॥ ২৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
মাতা চেত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । ভূমিসূর্য়ৌ দেবতে । নিচৃদনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
গান্ধারঃ স্বরঃ ॥
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