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यजुर्वेद अध्याय - 23

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  • यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 8
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - वाय्वादयो देवताः छन्दः - निचृदत्यष्टिः स्वरः - गान्धारः
    202

    व॑सवस्त्वाञ्जन्तु गाय॒त्रेण॒ छन्द॑सा रु॒द्रास्त्वा॑ञ्जन्तु॒ त्रैष्टु॑भेन॒ छन्द॑सादि॒त्यास्त्वा॑ञ्जन्तु॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑सा। भूर्भुवः॒ स्वर्लाजी३ञ्छाची३न्यव्ये॒ गव्य॑ऽए॒तदन्न॑मत्त देवाऽए॒तदन्न॑मद्धि प्रजापते॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वस॑वः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। रु॒द्राः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नति॒ त्रैऽस्तु॑भेन। छन्द॑सा। आ॒दि॒त्याः। त्वा॒। अ॒ञ्ज॒न्तु॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। भूः। भुवः॑। स्वः॑। लाजी३न्। शाची३न्। यव्ये॑। गव्ये॑। ए॒तत्। अन्न॑म्। अ॒त्त॒। दे॒वाः॒। ए॒तत्। अन्न॑म्। अ॒द्धि॒। प्र॒जा॒प॒त॒ इति॑ प्रजाऽपते ॥८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वसवस्त्वाञ्जन्तु गायत्रेण च्छन्दसा रुद्रास्त्वाञ्जन्तु त्रैष्टुभेन च्छन्दसाऽआदित्यास्त्वाञ्जन्तु जागतेन च्छन्दसा । भूर्भुवः स्वर्लाजी३ञ्छाची३न्यव्ये गव्यऽएतदन्नमत्त देवाऽएतदन्नमद्धि प्रजापते ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    वसवः। त्वा। अञ्जन्तु। गायत्रेण। छन्दसा। रुद्राः। त्वा। अञ्जन्तु। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनति त्रैऽस्तुभेन। छन्दसा। आदित्याः। त्वा। अञ्जन्तु। जागतेन। छन्दसा। भूः। भुवः। स्वः। लाजी३न्। शाची३न्। यव्ये। गव्ये। एतत्। अन्नम्। अत्त। देवाः। एतत्। अन्नम्। अद्धि। प्रजापत इति प्रजाऽपते॥८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 23; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्विद्वांसः किं कुर्वन्तीत्याह॥

    अन्वयः

    हे प्रजापते! वसवो गायत्रेण छन्दसा यं त्वाऽञ्जन्तु रुद्रास्त्रैष्टुभेन छन्दसा यं त्वाऽञ्जन्त्वादित्या जागतेन छन्दसा यं त्वाऽञ्जन्तु स त्वमेतदन्नमद्धि। हे देवाः! यूयं यव्ये गव्य एतदन्नमत्त लाजीन् शाचीन् भूर्भुवः स्वर्लोकान् प्राप्नुत च॥८॥

    पदार्थः

    (वसवः) प्रथमकल्पा विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (अञ्जन्तु) कामयन्ताम् (गायत्रेण) गायत्रीछन्दोवाच्येन (छन्दसा) अर्थेन (रुद्राः) मध्यमकल्पा विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (अञ्जन्तु) (त्रैष्टुभेन) त्रिष्टुप्प्रकाशितेनाऽर्थेन (छन्दसा) (आदित्याः) उत्तमा विद्वांसः (त्वा) (अञ्जन्तु) (जागतेन) जगतीछन्दःप्रकाशितेनाऽर्थेन (छन्दसा) स्वच्छन्देन (भूः) इमं लोकम् (भुवः) अन्तरिक्षस्थान् (स्वः) प्रकाशस्थांल्लोकान् (लाजीन्) स्वस्वकक्षायां चलितान् (शाचीन्) व्यक्तान् (यव्ये) यवानां भवने क्षेत्रे जातम् (गव्ये) गोर्विकारे (एतत्) (अन्नम्) (अत्त) भक्षयत (देवाः) विद्वांसः (एतत्) (अन्नम्) (अद्धि) भुङ्क्ष्व (प्रजापते) प्रजारक्षक॥८॥

    भावार्थः

    ये विद्वांसः साङ्गोपाङ्गान् वेदान् मनुष्यानध्यापयन्ति, ते धन्यवादार्हा भवन्ति॥८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर विद्वान् लोग क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (प्रजापते) प्रजाजनों को पालने हारे राजन्! (वसवः) प्रथम कक्षा के विद्वान् (गायत्रेण) गायत्री छन्द से कहने योग्य (छन्दसा) स्वच्छन्द अर्थ से जिन (त्वा) आपको (अञ्जन्तु) चाहें (रुद्राः) मध्यम कक्षा के विद्वान् जन (त्रैष्टुभेन) त्रिष्टुप् छन्द से प्रकाश किये हुए (छन्दसा) स्वच्छन्द अर्थ से जिन (त्वा) आपको (अञ्जन्तु) चाहें वा (आदित्याः) उत्तम कक्षा के विद्वान् जन (जागतेन) जगती छन्द से प्रकाशित किये हुए (छन्दसा) स्वच्छन्द अर्थ से जिन (त्वा) आपको (अञ्जन्तु) चाहें सो आप (एतत्) इस (अन्नम्) अन्न को (अद्धि) खाइये। हे (देवाः) विद्वानो! तुम (यव्ये) यवों के खेत में उत्पन्न (गव्ये) गौ के दूध-दही आदि उत्तम पदार्थ में मिले हुए (एतम्) इस (अन्नम्) अन्न को (अत्त) खाओ तथा (लाजीन्) अपनी-अपनी कक्षा में चलते हुए (शाचीन्) प्रगट (भूः) इस प्रत्यक्ष लोक (भुवः) अन्तरिक्षस्थ लोक और (स्वः) प्रकाश में स्थिर सूर्य्यादि लोकों को प्राप्त होओ॥८॥

    भावार्थ

    जो विद्वान् जन अङ्गों और उपाङ्गों से युक्त चारों वेदों को मनुष्यों को पढ़ाते हैं, वे धन्यवाद के योग्य होते हैं॥८॥

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    विषय

    गायत्र, त्रैष्टुभ और जागत तीन शब्दों से वसु, रुद्र और आदित्यों द्वारा स्तवन । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन राजा की कीर्त्ति । तेजस्वी, शक्तिमान् राजा को राष्ट्रैश्वर्य भोग की आज्ञा ।

    भावार्थ

    हे राजन् ! ( वसवः ) वसुनामक विद्वान् जन (त्वा) तुझको (गायत्रेण छन्दसा ) गायत्री मन्त्र से, अथवा पृथिवी पालन के मार्ग अथवा ब्राह्मबल से (भञ्जन्तु) ज्ञानवान् एवं युक्त करें। (रुद्राः) रुद्र नैष्ठिक पुरुष (त्वा) तुझको (त्रैष्टुभेन छन्दसा ) त्रिष्टुभ मन्त्र से (त्वा भञ्जन्तु) तुझको ज्ञानवान् करें, अथवा (रुद्राः) क्षत्रियगण तुझको क्षात्रबल से युक्त करें । (आदित्याः) आदित्य ब्रह्मचारी लोग (स्वा) तुझको ( जागतेन छन्दसा ) जगती छन्द के मन्त्रों से शिक्षित करें और (आदित्याः) वैश्यगण व्यापारों द्वारा तुझे समृद्ध करें । इसी प्रकार परमेश्वर के स्वरूप को (वसवः) बसने वाले जीव जीवों के बसाने वाले पृथिवी आदि लोक ( गायत्रेण छन्दसा ) पृथ्वी लोक के ज्ञान से प्रकाशित करते हैं । ( रुद्राः) अन्तरिक्षस्थ वायु प्राण आदि पदार्थ (त्रैष्टुभेन छन्दसा ) अन्तरिक्षस्थ जल वायु विद्यत् पदार्थों से परमेश्वर के स्वरूप को प्रकट करते हैं । सूर्य आदि लोक जागत छन्द से अर्थात् नाना जगतों के स्वरूप से ईश्वर के महान् सामर्थ्य को प्रकट करते हैं । हे विद्वान् पुरुष ! (भूः भुवः स्वः) पूर्व कहे उक्त तीनों लोक हैं भूः भुवः, स्वः, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और प्रकाशस्थ लोक । इन तीनों को तू वश कर । हे (लाजिन्) प्रकाशों से प्रकाशवान् और हे (शाचिन् ) शक्ति से शक्तिमान् ! तू उक्त लोकों को अपने वश कर । हे ( देवा: विद्वान् पुरुषो ! (यव्ये) जौ आदि से बने और ( गव्ये ) गो दुग्ध घृत आदि के बने पदार्थ के स्वरूप में विद्यमान ( एतत् ) इस ( अन्नम् ) भोजन करने योग्य अन्न को (भत्त) खाओ | हे (प्रजापते) प्रजापालक राजन् ! तू भी ( एतत् अन्नम् ) इस अन्न को (अद्धि) भोजन कर । लाजिन् शाचिन् इत्येतत् संबोधनपद द्वयम् । दूरादाह्राने प्लुतिः लाजाः दीप्तयोऽस्य सन्तीति लाजी दीप्तिमान् । शाचाः शक्तयोऽस्य सन्तीति स शाची शक्तिमान् इत्यर्थः ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वाय्वादयो देवता: । निचृद् अत्यष्टिः । गांधारः ॥

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    विषय

    अञ्जन [Decoration ]

    पदार्थ

    १. (वसवः) = वसुनामक आठ देव अथवा शरीर में उत्तम निवास के लिए आवश्यक तत्त्व (त्वा) = तुझे (गायत्रेण छन्दसा:) = [ गयाः प्राणाः तन् तत्रे] प्राणशक्ति के रक्षण की प्रबल इच्छा से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। साधक की सर्वप्रथम कामना यही होनी चाहिए कि उसकी प्राणशक्ति ठीक रहे । २. (रुद्राः) = रुद्र अथवा 'रोरूयमानो द्रवति' जो प्रभु के नाम का निरन्तर उच्चारण करता हुआ गतिशील होता है, वही तो रुद्र है। ये प्रभुस्मरणपूर्वक कर्त्तव्य को करने की भावनाएँ (त्वा) = तुझे (त्रैष्टुभेन छन्दसा) = [त्रि + स्तुप्] काम, क्रोध व लोभ तीनों को रोकने की प्रबल कामना से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। मनुष्य प्रभुस्मरण करता है, कार्य में लगा रहता है। बस, यह बात उसे कामादि से दूर रखती है। यह व्यक्ति काम, क्रोध व लोभ का शिकार नहीं होता। ३. (आदित्याः) = बारह आदित्य अथवा सब जगह से अच्छाई के ग्रहण करने की वृत्ति (त्वा) = तुझे (जागतेन छन्दसा) = लोकहित करने की प्रबल भावना से (अञ्जन्तु) = अलंकृत करें। लोकहित वही कर सकता है जो सब जगह से अच्छाई को ग्रहण की वृत्तिवाला बने । ४. 'गायत्र छन्द से' तू (भूः) = पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त करनेवाला होगा, 'त्रैष्टुभ् छन्द से' तू (भुवः) = आकलन, चिन्तन व ज्ञानवाला बनेगा। कामादि ही तो ज्ञान का आवरण बने रहते हैं। 'जागत छन्द से' तू (स्वः) = पूर्ण सुख को प्राप्त करनेवाला होगा । ५. (लाजीन्) = [योऽयं लाजानां समूहो लाजीनित्युक्तः - उ० ] लाजाओं को (शाचीन्) = [योऽयं सक्तूनां समूहः शाचीनित्युक्तः - उ० ] सत्तुओं को (यव्ये) = [ यवमय: समूह: - उ० ] यवसमूह में अथवा (गव्ये) = [गव्येर्विकारे दध्यादि - उ० ] दही आदि में (एतद् अन्नं अत्त) = इस अन्न को खाओ। (देवाः) = देव इसी अन्न को खाते हैं। वस्तुतः यही 'धान, सत्तु, जौ व दही' आदि पदार्थ ही मनुष्य को सात्त्विक वृत्तिवाला व देव बनाते हैं। हे (प्रजापते) = प्रजा के रक्षक! तू भी (एतत् अन्नं अद्धि) = इसी अन्न को खा । इस अन्न का सेवन तुझे सात्त्विक वृत्तिवाला बनाकर प्रजा का रक्षक बनाएगा, मांसाहारी राजा तो प्रजा का भक्षक ही बन जाएगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- हममें 'प्रजारक्षण, काम कोध-लोभ-निवारण व लोकहित' की प्रबल कामना हो। इससे हम स्वस्थ, सज्ञान व सुखी बनेंगे। हम 'धान, सत्तु, जौ व दही' आदि पदार्थों का प्रयोग करें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जे विद्वान लोक माणसांना वेदांग व उपांगासह चार वेद शिकवितात ते धन्यवादास पात्र असतात.

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    विषय

    विद्वज्जन काय करतात याविषयी.-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (प्रजापते) प्रजेचे पालन करणार्‍या हे राजा, (वसवः) प्रथम स्तराचे (आरंभिक श्रेणीतील) विद्वान (गायत्रेण)गायत्री छेदाद्वारे (छन्दसा) स्वच्छंदपणे (मुक्त हृदयानें) (त्वाम्) आपली (अञ्जन्तु) कामना करोत (आपले हित चिंतावे) (रूद्रः) मध्यम स्तराचे विद्वान (त्रैष्टुभेन) (छन्दसा) छन्दातील वेदमंत्राद्वारे (त्वाम्) आपल्या (अञ्जन्तु) हिताची कामना कामना करीत (आदित्या) उत्तम कोटीची विद्वान (जागतेन) (छन्दसा) जगती छंदातील मंत्राद्वारे वक्त होणार्‍या अर्थाने (त्वाम्) आपली (अञ्जन्तु) कामना करोत हे प्रजापती राजन्, आपण आम्ही देत असलेल्या (एतम्) या (अन्नम्) उत्तम अन्नाचे (अद्धि) सेवन करा हे विद्वज्जन, आपणही (यव्ये) जनाच्या शेतात उत्पन्न झालेल्या जव आदी धान्याचे आणि (गव्ये) गायीचे दूध, दही आधी उत्तम पदार्थ मिसळलेल्या (एतम्) या (अन्नम्) भोजनाचे (अत्त) सेवन करा आणि (लाजीन्) आपापल्या कक्षेत संचार करणार्‍या (शाचीन्) प्रत्यक्ष असलेल्या (भूः) या भूलोकात तसेच (भुवः) अंतरिक्षस्थित लोक आणि (स्वः) प्रकाशमयर्य्यादि लोकांना प्राप्त करा. (इह लोकातील, तसेच आकाशातील लोकांतील लाभ प्राप्त करा) ॥8॥

    भावार्थ

    भावार्थ - जे विद्वान सर्व मनुष्यांना अंग-उपगांसह चारही वेद शिकवितात, ते धन्यवादास पात्र आहेत वा असतात ॥8॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O king, the protector of his subjects, the Vasus approach thee with Vedic verses in Gayatri Metre, Rudras approach thee with verses in Trishtup metre, Adityas approach thee with verses in Jagati metre, eat thou this food, O learned people eat ye this food prepared from barley and cows milk and its products, and move on Earth, Ether, Heaven, and distinct planets moving in their orbits.

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    Meaning

    Prajapati, guardian and protector of the people, may the scholars of the Vasu order of twenty-four years celebrate you with the joy of the gayatri verses. May the scholars of the Rudra order of thirty-six years enlighten you with the knowledge of the trishtubh verses. May the scholars of the Aditya order of forty- eight years beatify you with the vision of the jagati verses. Receive the homage and be pleased by this celebration. Brilliant men of knowledge and vision, take the food from the fields of barley and milk of the cow and reach across the regions of the earth to the sky and the heavens orbiting in their own courses in space.

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    Translation

    May the young sages bless you with the gayatri metre. (1) May the adult sages bless you with the tristubh metre. (2) May the mature sages bless you with the jagati metre. (3) Being, becoming and bliss. (4) О learned ones, here is the food of parched rice and parched grain flour, preparations made with products of various grains and with cow-products; enjoy the food. Here is the food; enjoy it, O sacrificer. (5)

    Notes

    Bhūrbhuvaḥ svaḥ, O being, becoming, and bliss. Three mahävyähṛtis. Lājin, लाजानां समूह: a pile of parched grain flour, सक्तुः । Yavya, made of grains, barley etc. Gavya, made with dairy products, milk, curds, etc.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্বিদ্বাংসঃ কিং কুর্বন্তীত্যাহ ॥
    এখন বিদ্বান্গণ কী করেন, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (প্রজাপতে) প্রজাগণের পালক রাজন্ ! (বসবঃ) প্রথম শ্রেণির বিদ্বান্ (গায়ত্রেণ) গায়ত্রী ছন্দ দ্বারা বলিবার যোগ্য (ছন্দসা) স্বচ্ছন্দ অর্থ দ্বারা যে (ত্বা) আপনাকে (অঞ্জন্তু) কামনা করে (রুদ্রাঃ) মধ্যম শ্রেণির বিদ্বান্ (ত্রৈষ্টুভেন) ত্রিষ্টুপ্ছন্দ দ্বারা প্রকাশিত (ছন্দসা) স্বচ্ছন্দ অর্থ দ্বারা যে (ত্বা) আপনাকে (অঞ্জন্তু) কামনা করে অথবা (আদিত্যাঃ) উত্তম শ্রেণীর বিদ্বান্ (জাগতেন) জগতী ছন্দ দ্বারা প্রকাশিত (ছন্দসা) স্বচ্ছন্দ অর্থ দ্বারা যে (ত্বা) আপনাকে (অজন্তু) কামনা করে, সুতরাং আপনি (এতৎ) এই (অন্নম্) অন্নকে (অদ্ধি) ভক্ষণ করুন । হে (দেবাঃ) বিদ্বান্গণ ! তোমরা (য়ব্যে) যবের ক্ষেত্রে উৎপন্ন (গব্যে) গাভির দুগ্ধ, দধি ইত্যাদি উত্তম পদার্থে মিশ্রিত (এতম্) এই (অন্নম্) অন্নকে (অত্ত) ভক্ষণ কর তথা (লাজীন্) স্ব স্ব শ্রেণীতে গমনরত (শাচীন্) প্রকট (ভূঃ) এই প্রত্যক্ষ লোক (ভুবঃ) অন্তরিক্ষস্থ লোক এবং (স্বঃ) প্রকাশে স্থির সূর্য্যাদি লোককে প্রাপ্ত হও ॥ ৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যে সব বিদ্বান্ অঙ্গ ও উপাঙ্গ দ্বারা যুক্ত চারি বেদকে মনুষ্যদিগকে অধ্যাপন করেন, তাঁহারা ধন্যবাদের পাত্র হইয়া থাকেন ॥ ৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    বস॑বস্ত্বাঞ্জন্তু গায়॒ত্রেণ॒ ছন্দ॑সা রু॒দ্রাস্ত্বা॑ঞ্জন্তু॒ ত্রৈষ্টু॑ভেন॒ ছন্দ॑সাদি॒ত্যাস্ত্বা॑ঞ্জন্তু॒ জাগ॑তেন॒ ছন্দ॑সা । ভূর্ভুবঃ॒ স্ব᳕র্লাজী৩ঞ্ছাচী৩ন্যব্যে॒ গব্য॑ऽএ॒তদন্ন॑মত্ত দেবাऽএ॒তদন্ন॑মদ্ধি প্রজাপতে ॥ ৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    বসব ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । বায়্বাদয়ো দেবতাঃ । নিচৃদত্যষ্টিশ্ছন্দঃ ।
    গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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