यजुर्वेद - अध्याय 23/ मन्त्र 16
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - सविता देवता
छन्दः - विराडजगती
स्वरः - निषादः
125
न वाऽउ॑ऽए॒तन्म्रि॑यसे॒ न रि॑ष्यसि दे॒वाँ२ऽइदे॑षि प॒थिभिः॑ सु॒गेभिः॑। यत्रास॑ते सु॒कृतो॒ यत्र॒ ते य॒युस्तत्र॑ त्वा दे॒वः स॑वि॒ता द॑धातु॥१६॥
स्वर सहित पद पाठन। वै। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। ए॒तत्। म्रि॒यसे॒। न। रि॒ष्य॒सि॒। दे॒वान्। इत्। ए॒षि॒। प॒थिभि॒रिति॒ प॒थिऽभिः॑। सु॒गेभि॒रिति॑ सु॒ऽगेभिः॑। यत्र॑। आस॑ते। सु॒कृत॒ इति॑ सु॒ऽकृतः॑। यत्र॑। ते। य॒युः। तत्र॑। त्वा॒। दे॒वः। स॒वि॒ता। द॒धा॒तु॒ ॥१६ ॥
स्वर रहित मन्त्र
न वाऽउऽएतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँऽइदेषि पथिभिः सुगेभिः । यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु ॥
स्वर रहित पद पाठ
न। वै। ऊँऽइत्यूँ। एतत्। म्रियसे। न। रिष्यसि। देवान्। इत्। एषि। पथिभिरिति पथिऽभिः। सुगेभिरिति सुऽगेभिः। यत्र। आसते। सुकृत इति सुऽकृतः। यत्र। ते। ययुः। तत्र। त्वा। देवः। सविता। दधातु॥१६॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ मनुष्याः कीदृशा भवेयुरित्याह॥
अन्वयः
हे विद्यार्थिन्! यत्र ते सृकृत आसते सुखं ययुर्यत्र सुगेभिः पथिभिस्त्वं देवानेषि यत्रैतदु वर्त्तते स्थितस्त्वं न म्रियसे न वै रिष्यसि तत्रेत् त्वा सविता देवो दधातु॥१६॥
पदार्थः
(न) निषेधे (वै) निश्चयेन (उ) वितर्के (एतत्) (म्रियसे) (न) (रिष्यसि) हिन्धि (देवान्) दिव्यान् गुणान् विदुषो वा (इत्) एव (एषि) प्राप्नोषि (पथिभिः) मार्गैः (सुगेभिः) सुखेन गन्तुं योग्यैः (यत्र) (आसते) उपविशन्ति (सुकृतः) धर्मात्मानः (यत्र) (ते) योगिनो विद्वांसः (ययुः) यान्ति (तत्र) (त्वा) त्वाम् (देवः) स्वप्रकाशः (सविता) सकलजगदुत्पादकः परमेश्वरः (दधातु) धरतु॥१६॥
भावार्थः
यदि मनुष्या स्वस्वरूपं जानीयुस्तर्हि तेऽविनाशित्वं विद्युः। यदि धर्म्येण मार्गेण गच्छेयुस्तर्हि सुकृतामानन्दं प्राप्नुयुः। यदि परमात्मानं सेवेरँस्तर्हि सत्ये मार्गे जीवान् दध्युः॥१६॥
हिन्दी (3)
विषय
अब मनुष्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे विद्यार्थी! (यत्र) जहां (ते) वे (सुकृतः) धर्मात्मा योगी विद्वान् (आसते) बैठते और सुख को (ययुः) प्राप्त होते हैं वा (यत्र) जहां (सुगेभिः) सुख से जाने योग्य (पथिभिः) मार्गों से तू (देवान्) दिव्य अच्छे-अच्छे गुण वा विद्वानों को (एषि) प्राप्त होता है और जहां (एतत्) यह पूर्वोक्त सब वृत्तान्त (उ) तो वर्त्तमान है और स्थिर हुआ तू (न) नहीं (म्रियसे) नष्ट हो (न, वै) नहीं (रिष्यसि) दूसरे का नाश करे (तत्र) वहां (इत्) ही (त्वा) तुझे (सविता) समस्त जगत् का उत्पन्न करने वाला परमेश्वर (देवः) जोकि आप प्रकाशमान है, वह (दधातु) स्थापन करे॥१६॥
भावार्थ
जो मनुष्य अपने-अपने रूप को जानें तो अविनाशीभाव को जान सकें, जो धर्मयुक्त मार्ग से चलें तो अच्छे कर्म करनेहारों के आनन्द को पावें, जो परमात्मा की सेवा करें तो जीवों को सत्यमार्ग में स्थापन करें॥१६॥
विषय
ऐश्वर्यवान् स्वामी और अध्यात्म में आत्मा का वर्णन ।
भावार्थ
( न वा) और न ही ( एतत् ) इस प्रकार शक्तिशाली हो जाने पर तू (त्रियसे) मार सकता है । ( न देवान् ) और न देवों, अन्य विद्वान् एवं शासक और विजयशील, या तुझे चाहने, या तुझसे धन चाहने वाले लोगों को (इत् ) ही (रिष्यसि ) विनष्ट करे । तू (सुगेभिः) सुख से गमन करने योग्य, सुगम (पथिभिः) प्रजापालन के मार्गों से (एषि) गमन कर । ( यन्त्र) जिस मार्ग में (सुकृतः) उत्तम सदाचारी पुरुष (आसते ) स्थित रहते हैं और (यत्र ) जिस पर उच्च यशस्वी पद को (ते ययुः) वे प्राप्त होते हैं । (देवः सविता) सबका द्रष्टा और दाता, सर्वोत्पादक परमेश्वर या मार्गदर्शक प्रेरक विद्वान् (तत्र) वहां ही तुझे (दधातु) स्थापित करे । अध्यात्म में — इसी प्रकार देह में आत्मा अमर है वह सुख से इन्द्रियों का शासक है, ईश्वर उसे पुण्य मार्गों लोकों में स्थापित करे ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
सविता देवता । विराड्जगती । निषादः ॥
विषय
अमरण-अहिंसन
पदार्थ
१. पिछले मन्त्र के अनुसार औरों की ओर न देखते हुए जब हम स्वयं अपने को शक्तिशाली बनाते हैं, यज्ञशील होते हैं, प्रीतिपूर्वक उपासन करनेवाले बनते हैं तब प्रभु कहते हैं कि (एतत्) = यह तू (वै उ) = निश्चय से (न म्रियसे) = मरता नहीं है (न रिष्यसि) = तू हिंसित नहीं होता। इस मार्ग पर चलने से तेरा शरीर व्याधियों से आक्रान्त होकर असमय में चले जानेवाला नहीं होता और तेरा मन भी आधियों से अभिभूत होकर हिंसित नहीं होता । तेरा शरीर नीरोग होता है तो मन निर्मल। २. (सुगेभिः पथिभिः) = साधुगमन मार्गों से, अर्थात् उत्तम मार्गों से चलता हुआ तू (इत्) = निश्चय से (देवान् एषि) = देवों को, दिव्य गुणों को प्राप्त होता है। ३. (सविता देवः) = सबका प्रेरक, दिव्य गुणों का पुञ्ज वह प्रभु (त्वा) = तुझे (तत्र) = उस मार्ग में (दधातु) = स्थापित करे (यत्र) = जहाँ (सुकृतः) = पुण्यशाली लोग (आसते) = उपविष्ट होते हैं और (यत्र) = जहाँ (ते) = वे (ययुः) = जाते हैं व चलते हैं। तेरा मार्ग सदा पुण्यशालियों का ही मार्ग हो, उन्हीं देवों के मार्ग से तू चलनेवाला हो, अर्थात् तेरा मार्ग 'देवयान मार्ग' हो ।
भावार्थ
भावार्थ- देवयान-मार्ग से चलते हुए हम व्याधियों से मृत्यु को प्राप्त न हों और काम-क्रोध-लोभादि आधियों से हिंसित न हों।
मराठी (2)
भावार्थ
जी माणसे आपले स्वरूप जाणतात ती अविनाशी तत्त्व जाणू शकतात. जी धर्मयुक्त मार्गाने चालतात, ती सत्कर्म करण्याचा आनंद मिळवू शकतात. जी माणसे परमेश्वराची सेवा करतात. जी जीवांना सत्य मार्गाने नेऊ शकतात.
विषय
मनुष्यांनी कसे असावे, याविषयी.-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे विद्यार्थी, (यत्र) जेथे (ते) तुझे (सुकृतः) धर्मात्मा योगी विद्वान (आसते) बसतात वा राहतात आणि मोठ्या आनंद (ययुः) प्राप्त करतात (त्या आश्रमात व प्रदेशात तू जाऊन राहा) तसेच (यत्र) जेथे (सुगेभिः) सुखाने जाता येते वा प्रवास करता येते अशा (पथिभिः) मार्गावर जात-जात तू (देवान्) दिव्य गूण अथवा दिव्य विद्वानांना (एषि) प्राप्त करू शकशील (त्या मार्गावर तू जा) जेथे (सतत्) वरील वर्णित सर्व म्हणजे योगी विद्वान (उ) निश्चयाने आहेत तेथे तू स्थिरपणे राहा. तिथे (न) (म्रियसे) तू नष्ट होणार नाहींत (न, वै)(रिष्यसि) तसेच तू दुसर्याचाही नाश वा हानी करणार नाहीस. (तत्र) तिथे दिव्य स्थानी (इत्) निश्चयाने (त्वा) तुला (सविता) समस्त जगाचा उत्पादक परमेश्वरा (देवः) जो स्वतः प्रकाशमान दिव्यत्ववान आहे. तो ही तुला (दधातु) धारण करील (परमेश्वराची कृपा तिथे तुला लाभेल.) ॥16॥
भावार्थ
भावार्थ - जर मनुष्याने स्वरूपाला ओळखले तर त्याला आपल्या (जीवात्मारूपाने) अविनाशित्व कळेल. जे लोक धर्मयुक्त मार्गाने जातात, ते सत्कर्म करण्यार्या लोकांप्रमाणे आनंद प्राप्त करतात आणि जर मनुष्यांची परमेश्वराची सेवा केली, तर परमेश्वर जीवांना सत्यमार्गावर चालण्याची प्रेरणा देतो ॥16॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O Soul thou art immortal and indestructible. By fair paths thou cultivates noble qualities. May the resplendent God place thee in that place t where the godly yogis dwell, and derive pleasure.
Meaning
Man of knowledge and yajna, you go to meet with the seers and sages by the straight and right paths of truth. Die you shall not, nor your value diminish. Where dwell the men of right action and where they realize lasting peace and joy, there may Savita, lord of light and life, establish you.
Translation
You are not dying here; nor you are being injured. You are going to the bounties of Nature by easy paths. May the impeller Lord place you there, where dwell the virtuous ones, who have already gone there. (1)
Notes
Risyasi, विनश्यसि, are destroyed. Also, are injured. Sukṛtaḥ, साधुकारिण:, performers of virtuous deeds. The commentators have interpreted this and the following verses as if addressed to the horse, which is going to be slaughtered.
बंगाली (1)
विषय
অথ মনুষ্যাঃ কীদৃশা ভবেয়ুরিত্যাহ ॥
এখন মনুষ্য কেমন হইবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে বিদ্যার্থী ! (য়ত্র) যেখানে (তে) সেই সব (সুকৃতঃ) ধর্মাত্মা যোগী বিদ্বান্ (আসতে) বসেন এবং সুখ (য়য়ুঃ) লাভ করেন অথবা (য়ত্র) যেখানে (সুগেভিঃ) সুখ দ্বারা যাওয়ার যোগ্য (পথিভিঃ) মার্গ দ্বারা তুমি (দেবান্) দিব্য উত্তম উত্তম গুণ বা বিদ্বান্দিগকে (এষি) প্রাপ্ত হয় এবং যেখানে (এতৎ) এই পূর্বোক্ত সকল বৃত্তান্ত (উ) তো বর্ত্তমান এবং স্থির থাকা তুমি (ন) না (ম্রিয়সে) নষ্ট হও (ন, বৈ) না (রিষ্যসি) অপরের নাশ করিবে (তত্র) সেখানে (ইৎ) ই (ত্বা) তোমাকে (সবিতা) সমস্ত জগৎ উৎপাদক পরমেশ্বর (দেবঃ) যেহেতু প্রকাশমান, সেই (দধাতু) স্থাপন করিবে ॥ ১৬ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- যে সকল মনুষ্য নিজ নিজ রূপকে জানিবে তাহারা অবিনাশীভাবকে জানিতে পারিবে, যাহারা ধর্মযুক্ত মার্গ দিয়া চলিবে, তাহারা উত্তম কর্মকর্ত্তাদিগের আনন্দ পাইবে, যাহারা পরমাত্মার সেবা করিবে তাহারা জীবদিগকে সত্যমার্গে স্থাপন করিবে ॥ ১৬ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
ন বাऽউ॑ऽএ॒তন্ম্রি॑য়সে॒ ন রি॑ষ্যসি দে॒বাঁ২ऽইদে॑ষি প॒থিভিঃ॑ সু॒গেভিঃ॑ ।
য়ত্রাস॑তে সু॒কৃতো॒ য়ত্র॒ তে য়॒য়ুস্তত্র॑ ত্বা দে॒বঃ স॑বি॒তা দ॑ধাতু ॥ ১৬ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ন বা ইত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । বিরাড্জগতী ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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