अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 34
ऋषिः - कौशिकः
देवता - विष्णुक्रमः
छन्दः - त्र्यवसाना षट्पदा यथाक्षरं शक्वरी, अतिशक्वरी
सूक्तम् - विजय प्राप्ति सूक्त
32
विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हा कृ॒षिसं॑शि॒तोऽन्न॑तेजाः। कृ॒षिमनु॒ वि क्र॑मे॒ऽहं कृ॒ष्यास्तं निर्भ॑जामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः। स मा जी॑वी॒त्तं प्रा॒णो ज॑हातु ॥
स्वर सहित पद पाठविष्णो॑: । क्रम॑: । अ॒सि॒ । स॒प॒त्न॒ऽहा । कृ॒षिऽसं॑शित: । अन्न॑ऽतेजा: । कृ॒षिम् । अनु॑ । वि । क्र॒मे॒ । अ॒हम् । कृ॒ष्या: । तम् । नि: । भ॒जा॒म॒: । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: । स: । मा । जी॒वी॒त् । तम् । प्रा॒ण: । ज॒हा॒तु॒ ॥५.३४॥
स्वर रहित मन्त्र
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा कृषिसंशितोऽन्नतेजाः। कृषिमनु वि क्रमेऽहं कृष्यास्तं निर्भजामो योस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः। स मा जीवीत्तं प्राणो जहातु ॥
स्वर रहित पद पाठविष्णो: । क्रम: । असि । सपत्नऽहा । कृषिऽसंशित: । अन्नऽतेजा: । कृषिम् । अनु । वि । क्रमे । अहम् । कृष्या: । तम् । नि: । भजाम: । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म: । स: । मा । जीवीत् । तम् । प्राण: । जहातु ॥५.३४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
तू (विष्णोः) विष्णु [सर्वव्यापक परमेश्वर] से (क्रमः) पराक्रमयुक्त, (सपत्नहा) वैरियों का नाश करने हारा, (कृषिसंशित), खेती से तीक्ष्ण किया गया और (अन्नतेजाः) अन्न से तेज पाया हुआ (असि) है। (कृषिम् अनु) खेती के पीछे (अहम्) मैं (वि क्रमे) पराक्रम करता हूँ, (कृष्याः) खेती से (तम्) उस (शत्रु) को.... म० २५ ॥३४॥
भावार्थ
मनुष्य खेती और अन्न के प्रयोग से ऐश्वर्यवान् होवें ॥३४॥
टिप्पणी
३४−(कृषिसंशितः) भूमिकर्षणात् तीक्ष्णीकृतः (अन्नतेजाः) अदनीयपदार्थात् प्राप्ततेजाः। अन्यत् सुगमं गतं च ॥
विषय
कृषिसंशितोऽन्नतेजा:
पदार्थ
१. (विष्णोः क्रमः असि) = तू पवित्र पुरुष के पराक्रमवाला है, (सपत्नहा) = कर्मों में व्याप्त रहने के द्वारा रोगरूप शत्रुओं को नष्ट करनेवाला है। (कृषिसंशित:) = कृषिकर्म द्वारा तीक्ष्ण शक्तिवाला बना है और (अनतेजा:) = कृषि से उत्पन्न अन्न के द्वारा तेजस्वी बना है। २. तू निश्चय कर कि (कृषि अनु) = कृषि का लक्ष्य करके (अहं विक्रमे) = मैं पुरुषार्थवाला होता हूँ और इस (कृष्या:) = कृषिकर्म में लगे रहने के द्वारा (तम्०) [शेष पूर्ववत्]।
भावार्थ
हम पवित्र कर्मों को करते हुए कृषि से उत्पन्न अन्न का सेवन करते हुए तेजस्वी बनें और रोग व वासनारूप शत्रुओं को नष्ट करें।
भाषार्थ
(विष्णोः) विष्णु के (क्रमः) पराक्रम वाला (असि) तू है, (सपत्नहा) सपत्न का हनन करने वाला है, (कृषिसंशितः) कृषिकर्म कराने में तेज अर्थात् उग्र है, (अन्नतेजाः) और अन्न के कारण तू तेजस्वी है। (अहम्) मैं (कृषिम् अनु) कृषिकर्म में (विक्रमे) विक्रम अर्थात् पराक्रम करता हूं, (कृष्याः) कृषिक्रर्म से (तम्) उसे (निर्भजामः) हम भागरहित करते हैं। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, और (यम्) जिसके साथ (वयम्) हम (द्विष्मः) द्वेष करते हैं, (सः) वह (मा) न (जीवीत्) जीवित रहे (तम्) उसे (प्राणः) प्राण (जहातु) छोड़ जाय।
टिप्पणी
[सार्वभौमशासक पृथिवी में कृषिकर्म कराने में उग्र भावना वाला है। फलतः पृथिवी में अन्न का बाहुल्य हो जाता है। अन्न के बाहुल्य होने के कारण उस का तेज बढ़ता है, वह तेजस्वी हो जाता है। जिस राष्ट्र के पास अन्न नहीं और उसे अन्य राष्ट्रों से अन्न मांगना पड़ता है वह भिखमंगा राष्ट्र निस्तेज होता है। इस लिये सार्वभौमशासक कृषिकर्म में अपने पराक्रम को दर्शाता है। वह सपत्न को कृषिकर्म करने से वञ्चित कर देता है, और उस के पास अन्नाभाव हो जाने पर क्षुधा से तड़पता हुआ वह मृत्यु का ग्रास बन जाता है। शेष अभिप्राय मन्त्र (२१) के सदृश]। [विशेष - ३२-३४ मन्त्रों में ओषधि, जल, और अन्न का अभाव वर्णित हुआ है। इन में से प्रत्येक तथा सब से वञ्चित हो जाने के कारण सपत्न की मृत्यु हो जाती है। यह उस के लिये मृत्यु दण्ड है, अतः वह सार्वभौम शासन का सपत्न है, शत्रु है।]
विषय
विजिगीषु राजा के प्रति प्रजा के कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे राजन् ! (विष्णोः क्रमः असि) तू प्रजापालक के पद पर है। तू (सपत्नहा) शत्रुनाशक है। तू (कृषिसंशितः) कृषि के कार्यों में सुतीक्ष्ण, बलशाली है (अन्नतेजाः) अन्न ही तेरा तेज है। इस प्रकार प्रतिष्ठित होकर राजा संकल्प करे (अहं कृषिम् अनु वि क्रमे) मैं कृषि कर्म के लिये उद्योग, पराक्रम करूं। प्रजाएं संकल्प करें कि (कृष्याः तं०) हम कृषि से इत्यादि पूर्ववत्।
टिप्पणी
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-२४ सिन्धुद्वीप ऋषिः। २६-३६ कौशिक ऋषिः। ३७-४० ब्रह्मा ऋषिः। ४२-५० विहव्यः प्रजापतिर्देवता। १-१४, २२-२४ आपश्चन्द्रमाश्च देवताः। १५-२१ मन्त्रोक्ताः देवताः। २६-३६ विष्णुक्रमे प्रतिमन्त्रोक्ता वा देवताः। ३७-५० प्रतिमन्त्रोक्ताः देवताः। १-५ त्रिपदाः पुरोऽभिकृतयः ककुम्मतीगर्भा: पंक्तयः, ६ चतुष्पदा जगतीगर्भा जगती, ७-१०, १२, १३ त्र्यवसानाः पञ्चपदा विपरीतपादलक्ष्मा बृहत्यः, ११, १४ पथ्या बृहती, १५-१८, २१ चतुरवसाना दशपदा त्रैष्टुव् गर्भा अतिधृतयः, १९, २० कृती, २४ त्रिपदा विराड् गायत्री, २२, २३ अनुष्टुभौ, २६-३५ त्र्यवसानाः षट्पदा यथाक्ष शकर्योऽतिशक्वर्यश्च, ३६ पञ्चपदा अतिशाक्कर-अतिजागतगर्भा अष्टिः, ३७ विराट् पुरस्ताद् बृहती, ३८ पुरोष्णिक्, ३९, ४१ आर्षी गायत्र्यौ, ४० विराड् विषमा गायत्री, ४२, ४३, ४५-४८ अनुष्टुभः, ४४ त्रिपाद् गायत्री गर्भा अनुष्टुप्, ५० अनुष्टुप्। पञ्चशदर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Song of Victory
Meaning
You are the stride of Vishnu into productivity, destroyer of adversaries, strengthened, raised and sharpened by the abundance of farming, and blest with the vigour and vitality of food. I strive and advance into life in pursuance of the plenty and generosity of food and farming. From the way of food and farming we remove all those factors and negativities which oppose and obstruct us and those which we oppose and reject. Let no negativity and obstruction survive and last. Let even life energy forsake the negativity and obstruction of hate and enmity.
Translation
You are the stride (krama) of the all-prevading Lord (Visnu) slayer of rivals; sharpened by the farming (krsi), full of food’s might. I stride forth in the farming. From the farms (krsyah), we drive out him, who hates us and whom we do hate. May he not live. May the vital breath quit him.
Translation
O King! You are the representative of the All-pervading God amongst the subject, you are the slayer of the enemies, you are praised in agriculture and you possess the vigor of corn. You should think “I will play my glorious part in affairs of agriculture”. So that we may bar from agriculture that man, who hates me and whom we abhor. Let him not be alive and let the vital air abandon him.
Translation
O King, thou followest the behest of God, and art the protector of the people like Him. Thou art foe-slayer. Thou art expert in the science of agriculture. Thou art full of vigor through proper diet! I, as king, consider it my duty to improve Agriculture. We, the subjects, prevent from abusing agricultural products, him who hates us and whom we dislike. Let him not live, let vital breath desert him.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३४−(कृषिसंशितः) भूमिकर्षणात् तीक्ष्णीकृतः (अन्नतेजाः) अदनीयपदार्थात् प्राप्ततेजाः। अन्यत् सुगमं गतं च ॥
हिंगलिश (1)
Subject
कृषिसंशितोऽन्नतेजाः । कृषिं – उत्तम कृषि व्यवस्था से उत्पादित अन्न से प्राप्त ओजस्विता
Word Meaning
विष्णु के संसार के पालन कर्त्ता कार्यक्षेत्र में पराक्रमी बन कर “.उत्तम कृषि व्यवस्था से उत्पादित अन्न से प्राप्त ओजस्विता का ” एक क्रम से (योजनाबद्ध ढंग से ) कर्म करने से सब शत्रुरूपि विघ्न बाधाओं रुकावटों पर विजय पानी होती है | और जो हमारे (इस वेदाधारित ) सृष्टि पालन धर्म की अवहेलना करते है हम से द्वेष करते है वे हमारी सब उपलब्धियों समृद्धियों से वंचित रहेगे और स्वयं ही नष्ट हो जाएंगे |
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