अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 13
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - ब्रह्मौदनः
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त
51
परे॑हि नारि॒ पुन॒रेहि॑ क्षि॒प्रम॒पां त्वा॑ गो॒ष्ठोऽध्य॑रुक्ष॒द्भरा॑य। तासां॑ गृह्णीताद्यत॒मा य॒ज्ञिया॒ अस॑न्वि॒भाज्य॑ धी॒रीत॑रा जहीतात् ॥
स्वर सहित पद पाठपरा॑ । इ॒हि॒ । ना॒रि॒ । पुन॑: । आ । इ॒हि॒ । क्षि॒प्रम् । अ॒पाम् । त्वा॒ । गो॒ऽस्थ: । अधि॑ । अ॒रु॒क्ष॒त् । भरा॑य । तासा॑म् । गृ॒ह्णी॒ता॒त् । य॒त॒मा: । य॒ज्ञिया॑: । अस॑न् । वि॒ऽभाज्य॑ । धी॒री । इत॑रा: । ज॒ही॒ता॒त् ॥१.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
परेहि नारि पुनरेहि क्षिप्रमपां त्वा गोष्ठोऽध्यरुक्षद्भराय। तासां गृह्णीताद्यतमा यज्ञिया असन्विभाज्य धीरीतरा जहीतात् ॥
स्वर रहित पद पाठपरा । इहि । नारि । पुन: । आ । इहि । क्षिप्रम् । अपाम् । त्वा । गोऽस्थ: । अधि । अरुक्षत् । भराय । तासाम् । गृह्णीतात् । यतमा: । यज्ञिया: । असन् । विऽभाज्य । धीरी । इतरा: । जहीतात् ॥१.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थ
(नारि) हे नरों की शक्तिवाली स्त्री ! तू (परा) पराक्रम के साथ (इहि) चल, (पुनः) अवश्य (क्षिप्रम्) शीघ्र (आ इहि) आ (अपाम्) विद्या में व्याप्त स्त्रियों के (गोष्ठः) समाज ने (भराय) पोषण के लिये (त्वा) तुझे (अधि अरुक्षत्) ऊपर चढ़ाया है। (तासाम्) उन [स्त्रियों] में (यतमाः) जो-जो (यज्ञियाः) पूजायोग्य [स्त्रियाँ] (असन्) होवें, [उन्हें] (गृह्णीतात्) ग्रहण कर और (धीरी) बुद्धिमती तू (इतराः) दूसरी [स्त्रियों] को (विभाज्य) अलग करके (जहीतात्) छोड़ दे ॥१३॥
भावार्थ
सब स्त्रियाँ विदुषी समाज बनाकर अधिक गुणवती स्त्री को अपनी प्रधाना बनावें, और प्रधाना की सम्मति से विदुषी स्त्रियों को चुनकर कार्य्यकर्त्री सभा स्थापित करें ॥१३॥
टिप्पणी
१३−(परा) पराक्रमेण (इहि) गच्छ (नारि) अ० १।११।१। नर-अञ्, ङीन्। नराणामियं शक्तिमती स्त्री तत्सम्बुद्धौ-दयानन्दभाष्ये, यजु० ५।२६। (पुनः) अवधारणे (एहि) आगच्छ (क्षिप्रम्) शीघ्रम् (अपाम्) व्याप्तविद्यानां स्त्रीणाम्-दयानन्दभाष्ये, यजु० १०।७। (त्वा) त्वाम् (गोष्ठः) गावोऽनेका वाचस्तिष्ठन्त्यत्र। गोष्ठी। समाजः (अधि अरुक्षत्) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-लुङ्। आरूढवान् (भराय) पोषणाय (तासाम्) स्त्रीणाम् (गृह्णीतात्) गृहाण। स्वीकुरु (यतमाः) बह्वीषु याः (यज्ञियाः) पूजार्हाः (असन्) लेटि रूपम्। भवेयुः (विभाज्य) विविच्य (धीरी) धीमती (इतराः) अन्याः (जहीतात्) ओहाक् त्यागे। जहीहि। परित्यज ॥
विषय
नारी का कार्यों में लगे ही रहना
पदार्थ
१. हे (नारि) = गृहकार्यों का प्रणयन करनेवाली गृहपनि! तू (परेहि) = [परा इहि] कार्यवश बाहर अवश्य जा, परन्तु (क्षिप्रं पुनः एहि) = शीघ्र ही फिर लौटने की कर-सहेलियों में ही गप्पें न मारती रह। उन्हीं की गोष्ठी में न बैठी रह, चूँकि (अपां गोष्ठः) = कर्मों का समूह (भराय) = भरण करने के लिए (त्वा अध्यरुक्षत) = तेरे सिर पर आरूढ़ है। तेरे सिर पर गृहकार्यों का बोझ विद्यमान है उन सब कर्तव्यों को भी तो तुझे निभाना है। २. (तासाम्) = उन कर्मों में (यतमाः यज्ञियाः असन्) = जितने यज्ञिय [पवित्र] कर्म हैं, उनको तू (गृह्णीतात्) = ग्रहण कर, उन कर्त्तव्यों के पालन में यलशील हो। (धीरी) = बुद्धिमती तू (विभाज्य) = अच्छे व बुरे कर्मों को अलग-अलग करके (इतरा:) = जो शुभेतर अशुभ कर्म हैं उन्हें (जहीतात्) = छोड़ दे।
भावार्थ
गृहपनी कार्यवश घर से बाहर जाए भी तो शीघ्र ही लौट आये, क्योंकि उसके सिर पर तो कर्मों का बड़ा भार लदा है। यह यज्ञिय कर्मों को स्वीकार करे और बुद्धिमती होती हुई अशुभ कर्मों का परित्याग कर डाले।
भाषार्थ
(नारि) हे जलाहरण करने बाली नारि ! (परेहि) दूर जा और (पुनः क्षिप्रम्) फिर शीघ्र (एहि) लौट कर आ, (अपां गोष्ठः) जल का घड़ा, (भराय) जल भरने या लाने के लिये (त्वा अध्यरुक्षद्) तुझ पर आरूढ़ हुआ है। (तासाम्) उन जलों में (यतमाः) जो जल (यज्ञियाः) शुद्ध पवित्र (असन्) हों (गृह्णीतात) उन का ग्रहण कर, (धीरी) बुद्धिमती तू (इतराः विभाज्य) अन्य अर्थात् अपवित्र जलों को पृथक् कर के (जहीतात्) छोड़ दें।
टिप्पणी
[ताजा और शुद्धपवित्र जल लाने के लिये नारी को प्रेरित किया है, चाहे ऐसा जल दूर से भी लाना पड़े। गोष्ठः गो= जल (उणा० २।६८, महर्षि दयानन्द) + स्थः जलाधार घड़ा]।
विषय
ब्रह्मोदन रूप से प्रजापति के स्वरूपों का वर्णन।
भावार्थ
पनिहारी के दृष्टान्त से राज सभा के कार्यों को उपदेश करते हैं। हे (नारि) नर–नेताओं की बनी सभे ! (परा इहि) तू दूर तक जा, दूर तक देख। और फिर अपने केन्द्र स्थान में आजा। (त्वा) तेरे ऊपर (अपां) अपः, ज्ञान, कर्म या आप्त पुरुषों का (गोष्ठः*) समूह (भराय) तुझे पुष्ट करने के लिये (त्वा अधि अरुक्षत्) तेरे ऊपर विराजमान है। (तासां) उन आपः-कर्मों प्रजाओं में से (यतमाः) जो जो (यज्ञियाः) पूजनीय, श्रेष्ठ प्रजाएं (असन्) हों उनको हे सभे ! तू (गृह्णीतात्) ग्रहण कर और (धीरी) बुद्धिमती तू उनको (विभाज्य) अच्छों से पृथक् करके (इतराः) औरों को (जहीतात्) त्याग दे। पनिहारी के पक्ष में—हे नारि (परेहि) जा और फिर शीघ्र आ। (अपां गोष्ठः त्वा भराय अधि अरुक्षत्) जलों का भरा घट तेरे सिर पर रखा है। जो उत्तम जल हों उनको ले ले और नीचे जो मलिन जल हों उनको तू बुद्धिमती त्याग दे। (तृ०) ‘यज्ञियासन्’, (च०) ‘विभज्य, धीरीतरा ह्वमीत’ इति पैप्प० सं०।
टिप्पणी
‘कोष्ठः’ छान्दसं गत्वम्। ‘काष्ठा’, ग्राष्ठावत्।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। ब्रह्मोदनो देवता। १ अनुष्टुब्गर्भा भुरिक् पंक्तिः, २, ५ बृहतीगर्भा विराट्, ३ चतुष्पदा शाक्वरगर्भा जगती, ४, १५, १६ भुरिक्, ६ उष्णिक्, ८ विराङ्गायत्री, ६ शाक्करातिजागतगर्भा जगती, १० विराट पुरोऽतिजगती विराड् जगती, ११ अतिजगती, १७, २१, २४, २६, २८ विराड् जगत्यः, १८ अतिजागतगर्भापरातिजागताविराड्अतिजगती, २० अतिजागतगर्भापरा शाकराचतुष्पदाभुरिक् जगती, २९, ३१ भुरिक् २७ अतिजागतगर्भा जगती, ३५ चतुष्पात् ककुम्मत्युष्णिक्, ३६ पुरोविराड्, ३७ विराड् जगती, ७, १२, १४, १९, २२, २३, ३०-३४ त्रिष्टुभः। सप्तत्रिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brahmaudana
Meaning
O women, rise high, go far and come back home soon. Let the assembly for collective action and policy raise you high for full achievement and self-fulfilment. Of those actions take up those which, for you, are worthy of association and participation and, thinking patiently and intelligently, sift and leave the rest aside.
Translation
Go away, woman, come back quickly; the stall (gostha) of the waters hath ascended thee for bearing; seize then of them, whichever shall be worshipful; having shared. Out wisely (dhiritra), then leave the others.
Translation
O Woman; go on with your work, return back quickly to your normal routines, may the store of action and knowledge rise upon you for your affording and supporting. You differentiating thoroughly accept whatever of these Actions are good, leave the rest as rejected.
Translation
Just as a water-woman goes afar to bring water, and soon comes back with a pitcher of water on her head. She keeps the pure and throws away the impure waters, so should the members of the House of Lords go to distant countries and come back to the Parliament. O House of Representatives. knowledge, action, a host of public spirited persons, in order to strengthen thee, are ever vigilant. Select thou of the subjects such as are fit for service, skilfully separating leaves the others!
Footnote
Thou: The Parliament.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(परा) पराक्रमेण (इहि) गच्छ (नारि) अ० १।११।१। नर-अञ्, ङीन्। नराणामियं शक्तिमती स्त्री तत्सम्बुद्धौ-दयानन्दभाष्ये, यजु० ५।२६। (पुनः) अवधारणे (एहि) आगच्छ (क्षिप्रम्) शीघ्रम् (अपाम्) व्याप्तविद्यानां स्त्रीणाम्-दयानन्दभाष्ये, यजु० १०।७। (त्वा) त्वाम् (गोष्ठः) गावोऽनेका वाचस्तिष्ठन्त्यत्र। गोष्ठी। समाजः (अधि अरुक्षत्) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-लुङ्। आरूढवान् (भराय) पोषणाय (तासाम्) स्त्रीणाम् (गृह्णीतात्) गृहाण। स्वीकुरु (यतमाः) बह्वीषु याः (यज्ञियाः) पूजार्हाः (असन्) लेटि रूपम्। भवेयुः (विभाज्य) विविच्य (धीरी) धीमती (इतराः) अन्याः (जहीतात्) ओहाक् त्यागे। जहीहि। परित्यज ॥
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