Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 10 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 18
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - त्रिषन्धिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    45

    क्र॒व्यादा॑नुव॒र्तय॑न्मृ॒त्युना॑ च पु॒रोहि॑तम्। त्रिष॑न्धे॒ प्रेहि॒ सेन॑या जयामित्रा॒न्प्र प॑द्यस्व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क्र॒व्य॒ऽअदा॑ । अ॒नु॒ऽव॒र्तय॑न् । मृ॒त्युना॑ । च॒ । पु॒र:ऽहि॑तम् । त्रिऽसं॑धे । प्र । इ॒हि॒ । सेन॑या । जय॑ । अ॒मित्रा॑न् । प्र । प॒द्य॒स्व॒ ॥१२.१८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    क्रव्यादानुवर्तयन्मृत्युना च पुरोहितम्। त्रिषन्धे प्रेहि सेनया जयामित्रान्प्र पद्यस्व ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    क्रव्यऽअदा । अनुऽवर्तयन् । मृत्युना । च । पुर:ऽहितम् । त्रिऽसंधे । प्र । इहि । सेनया । जय । अमित्रान् । प्र । पद्यस्व ॥१२.१८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 10; मन्त्र » 18
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (त्रिषन्धे) हे त्रिसन्धि ! [म० २। त्रयीकुशल राजन्] [शत्रुओं के लिये] (क्रव्यादा) मांसभक्षक [कष्ट] (च) और (मृत्युना) मृत्यु के साथ (पुरोहितम्) पुरोहित [अग्रगामी पुरुष] का (अनुवर्तयन्) अनुवर्ती होकर तू (सेनया) अपनी सेना के साथ (प्र इहि) चढ़ाई कर, (अमित्रान्) वैरियों को (जय) जीत और (प्र पद्यस्व) आगे बढ़ ॥१८॥

    भावार्थ

    राजा को योग्य है कि आप्त सत्य प्रतिज्ञावाले पुरुषों के समान शत्रुओं के कष्ट देने और मारने के अस्त्र-शस्त्र आदि साधन संग्रह करके चढ़ाई करे ॥१८॥

    टिप्पणी

    १८−(क्रव्यादा) अ० ३।२१।८। मांसभक्षकेन कष्टेन (अनुवर्तयन्) अनुगच्छन् (मृत्युना) मृत्युसाधनेन सह (च) (पुरोहितम्) अ० ३।१९।१। अग्रगामिनं पुरुषम् (त्रिषन्धे) म० २। हे त्रयीकुशल राजन् (प्रेहि) प्रकर्षेण गच्छ (सेनया) (जय) (अमित्रान्) शत्रून् (प्र पद्यस्व) पद गतौ। अग्रे गच्छ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मृत्युना च पुरोहितम्

    पदार्थ

    १. हे (त्रिषन्धे) = 'जल, स्थल व वायु सेना के अध्यक्ष! तू (क्रव्यादा) = मांसभक्षक पशुओं से इन शत्रुओं को (अनुवर्तयन्) = अनुव्रत करता हुआ, (च) = और (मृत्युना पुरोहितम्) = मृत्यु ही जिसके सामने खड़ी है, अर्थात् जो अब शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा, उस शत्रु को (सेनया प्रेहि) = सेना के साथ आक्रान्त कर, (जय) = इन शत्रुओं को जीत ले तथा (अमित्रान् प्रपद्यस्व) = इन शत्रुओं के मध्य में विजेता के रूप में प्रवेश करनेवाला हो।

    भावार्थ

    हमारा त्रिषन्धि सेनापति शत्रुओं को परास्त करके विजेता के रूप में उनके मध्य में, सन्धि आदि के लिए, प्रवेश करे।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (त्रिषन्धे) हे त्रिषन्धि ! (क्रव्यादा) शत्रु के कच्चे मांस अर्थात् शरीर को खा जाने वाले आग्नेयास्त्र के साथ, (च) और (मृत्युना) मारक शस्त्रों के साथ, (पुरोहितम्) संमुखस्थ शत्रु का (अनुवर्तयन्) पीछा करता हुआ तू, (सेनया) सेना सहित (प्रेहि) आगे बढ़, (अमित्रान्) अमित्रों को (जय) जीत, (प्र पद्यस्व) आगे कदम बढ़ा।

    टिप्पणी

    [सम्राट्, त्रिषन्धि को आज्ञा देता है। पुरोहितम्= पुरस्तात् स्थितं शत्रुम् (सायण)। क्रव्याद् श्मशानाग्नि है। आग्नेयास्त्र अग्निरूप है।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    शत्रुसेना का विजय।

    भावार्थ

    हे (त्रिषन्धे) त्रिसन्धे ! (मृत्युना च पुरोहितम्) मृत्यु से आगे से घेर कर शत्रु को (क्रव्यादा) मांस-खोर पशुओं से (अनुवर्तयन्) पीछे से घेर कर (सेनया प्रेहि) सेना से शत्रु पर चढ़ाई कर (अमित्रान्) शत्रुओं तक (प्र पद्यस्व) पहुंच और (जय) उनको जीत।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। मन्त्रोक्तस्त्रिषन्धिर्देवता। १ विराट् पथ्याबृहती, २ त्र्यवसाना षट्पा त्रिष्टुब्गर्भाति जगती, ३ विराड् आस्तार पंक्तिः, ४ विराट् त्रिष्टुप् पुरो विराट पुरस्ताज्ज्योतिस्त्रिष्टुप्, १२ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, १३ षट्पदा जगती, १६ त्र्यवसाना षट्पदा ककुम्मती अनुष्टुप् त्रिष्टुब् गर्भा शक्वरी, १७ पथ्यापंक्तिः, २१ त्रिपदा गायत्री, २२ विराट् पुरस्ताद बृहती, २५ ककुप्, २६ प्रस्तारपंक्तिः, ६-११, १४, १५, १८-२०, २३, २४, २७ अनुष्टुभः। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    मन्त्रार्थ

    (त्रिषन्धे) त्रिषन्धि वज्रास्त्र के प्रयोक्ता ! तू (पुरोहितम् अनुवर्तयन्) शत्रु के अग्र नेता सेनाध्यक्ष का अनुवर्तन करता हुआ-पीछा करता हुआ (क्रव्यादा मृत्युना) मांस खाने वाले के समान मारक शस्त्रास्त्र समूह के साथ (सेनया) तथा सेना के साथ (प्रेहि) प्रगति कर (जय) जीत (अमित्रान् प्रपद्यख)- और शत्रुओं को प्राप्त हो उनके विनाशार्थ ॥१८॥

    विशेष

    ऋषिः-भृग्वङ्गिराः (भर्जनशील अग्निप्रयोगवेत्ता) देवता – त्रिषन्धिः ( गन्धक, मनः शिल, स्फोट पदार्थों का अस्त्र )

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    War, Victory and Peace

    Meaning

    O Trishandhi, supreme commander of triple power of defence, offence and peace, pursuing the enemy with deadly force, facing their forces in front with death itself, march on forward with your army, conquer the unfriendly powers, and go on advancing.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Causing to follow the purohita with the flesh-eating (fire) and with death, O Trisandhi, go forth with the army; conquer the enemies; go forward.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O Chief of Army! keeping the devouring weapons and forces in your application in the way that brings death at the first moment, attack enemies with army, reach them and conquer

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O brave general, surround the raw flesh-eating foes, face them with death, attack them with thy army, conquer and subjugate them!

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १८−(क्रव्यादा) अ० ३।२१।८। मांसभक्षकेन कष्टेन (अनुवर्तयन्) अनुगच्छन् (मृत्युना) मृत्युसाधनेन सह (च) (पुरोहितम्) अ० ३।१९।१। अग्रगामिनं पुरुषम् (त्रिषन्धे) म० २। हे त्रयीकुशल राजन् (प्रेहि) प्रकर्षेण गच्छ (सेनया) (जय) (अमित्रान्) शत्रून् (प्र पद्यस्व) पद गतौ। अग्रे गच्छ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top