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  • अथर्ववेद - काण्ड 12/ सूक्त 4/ मन्त्र 39
    सूक्त - कश्यपः देवता - वशा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वशा गौ सूक्त

    म॒हदे॒षाव॑ तपति॒ चर॑न्ती॒ गोषु॒ गौरपि॑। अथो॑ ह॒ गोप॑तये व॒शाद॑दुषे वि॒षं दु॑हे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    म॒हत् । ए॒षा । अव॑ । त॒प॒ति॒ । चर॑न्ती । गोषु॑ । गौ: । अपि॑ । अथो॒ इति॑ । ह॒ । गोऽप॑तये । व॒शा। अद॑दुषे । वि॒षम्। दु॒हे॒ ॥४.३९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि। अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    महत् । एषा । अव । तपति । चरन्ती । गोषु । गौ: । अपि । अथो इति । ह । गोऽपतये । वशा। अददुषे । विषम्। दुहे ॥४.३९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 4; मन्त्र » 39

    पदार्थ -
    (एषा) यह (गौः) प्राप्तियोग्य [वेदवाणी] (गोषु) सब भूमि प्रदेशों में (अपि) ही (चरन्ती) विचरती हुई (महत्) बहुत (अव) निश्चय करके (तपति) प्रताप [ऐश्वर्य]वाली होती है। (अथो ह) और कि (वशा) वशा [वह कामनायोग्य वेदवाणी] (अददुषे) [उसके] न देनेवाले (गोपतये) भूपति [राजा] के लिये (विषम्) विष [महाकष्ट] (दुहे) पूर्ण करती है ॥३९॥

    भावार्थ - वेदवाणी की प्रवृत्ति होने से संसार में ऐश्वर्य बढ़ता है, और जो दुष्ट राजा उसे रोकता है, वह नष्ट हो जाता है ॥३९॥

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