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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 116 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 10
    ऋषिः - कक्षीवान् देवता - अश्विनौ छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    जु॒जु॒रुषो॑ नासत्यो॒त व॒व्रिं प्रामु॑ञ्चतं द्रा॒पिमि॑व॒ च्यवा॑नात्। प्राति॑रतं जहि॒तस्यायु॑र्द॒स्रादित्पति॑मकृणुतं क॒नीना॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    जु॒जु॒रुषः॑ । ना॒स॒त्या॒ । उ॒त । व॒व्रिम् । प्र । अ॒मु॒ञ्च॒त॒म् । द्रा॒पिम्ऽइ॑व । च्यवा॑नात् । प्र । अ॒ति॒र॒त॒म् । ज॒हि॒तस्य॑ । आयुः॑ । द॒स्रा॒ । आत् । इत् । पति॑म् । अ॒कृ॒णु॒त॒म् । क॒नीना॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    जुजुरुषो नासत्योत वव्रिं प्रामुञ्चतं द्रापिमिव च्यवानात्। प्रातिरतं जहितस्यायुर्दस्रादित्पतिमकृणुतं कनीनाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    जुजुरुषः। नासत्या। उत। वव्रिम्। प्र। अमुञ्चतम्। द्रापिम्ऽइव। च्यवानात्। प्र। अतिरतम्। जहितस्य। आयुः। दस्रा। आत्। इत्। पतिम्। अकृणुतम्। कनीनाम् ॥ १.११६.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 10
    अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 9; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ विधिः सामान्यत उपदिश्यते ।

    अन्वयः

    हे नासत्या राजधर्मसभापती युवां च्यवानाद्द्रापिमिव वव्रिं प्राऽमुञ्चतम्। दुःखात् पृथक् कुरुतम्। उतापि जुजुरुषो विद्यावयोवृद्धादाप्तादध्यापकात् कनीनां शिक्षामकृणुतमात् समये प्राप्त एकैकस्या इदेवैकैकं पतिं च। हे दस्रा वैद्याविव प्राणदातारौ जहितस्यायुः प्राऽतिरतम् ॥ १० ॥

    पदार्थः

    (जुजुरुषः) जीर्णाद्वृद्धात् (नासत्या) (उत) अपि (वव्रिम्) संविभक्तारम् (प्र, अमुञ्चतम्) प्रमुञ्चेतम् (द्रापिमिव) यथा कवचम् (च्यवानात्) पालयमानात् (प्र,अतिरतम्) प्रतरेतम् (जहितस्य) हातुः। अत्र हा धातोरौणादिक इतच् प्रत्ययो बाहुलकात् सन्वच्च। (आयुः) जीवनम् (दस्रा) दातारौ (आत्) अनन्तरम् (इत्) एव (पतिम्) पालकं स्वामिनम् (अकृणुतम्) कुरुतम् (कनीनाम्) यौवनत्वेन दीप्तिमतीनां ब्रह्मचारिणीनां कन्यानाम् ॥ १० ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। राजपुरुषैरुपदेशकैश्च दातॄणां दुःखं विनाशनीयम्। विद्यासु प्रवृत्तानां कुमारकुमारीणां रक्षणं विधाय विद्यासुशिक्षे प्रदापनीये, बाल्यावस्थायामर्थात् पञ्चविंशाद्वर्षात्प्राक् पुरुषस्य षोडशात् प्राक् स्त्रियाश्च विवाहं निवार्य्यात ऊर्ध्वं यावदष्टाचत्वारिंशद्वर्षं पुरुषस्याचतुर्विंशतिवर्षं स्त्रियाः स्वयंवरं विवाहं कारयित्वा सर्वेषामात्मशरीरबलमलं कर्त्तव्यम् ॥ १० ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब सामान्य से विधि का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

    पदार्थ

    हे (नासत्या) राजधर्म की सभा के पति ! तुम दोनों (च्यवानात्) भागे हुए से (द्रापिमिव) कवच के समान (वव्रिम्) अच्छे विभाग करानेवाले को (प्रामुञ्चतम्) भलीभाँति दुःख से पृथक् करो (उत) और (जुजुरुषः) बुड्ढे विद्यावान् शास्त्रज्ञ पढ़ानेवाले से (कनीनाम्) यौवनपन से तेजधारिणी ब्रह्मचारिणी कन्याओं को शिक्षा (अकृणुतम्) करो (आत्) इसके अनन्तर नियत समय की प्राप्ति में उनमें से एक-एक (इत्) ही का एक-एक (पतिम्) रक्षक पति करो। हे (दस्रा) वैद्यों के समान प्राण के देनेहारो ! (जहितस्य) त्यागी की (आयुः) आयुर्दा को (प्रातिरतम्) अच्छे प्रकार पार लों पहुँचाओ ॥ १० ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुष और उपदेश करनेवालों को देनेवालों का दुःख दूर करना चाहिये, विद्याओं में प्रवृत्ति करते हुए कुमार और कुमारियों की रक्षा कर विद्या और अच्छी शिक्षा उनको दिलवाना चाहिये। बालकपन में अर्थात् पच्चीस वर्ष के भीतर पुरुष और सोलह वर्ष के भीतर स्त्री के विवाह को रोक, इसके उपरान्त अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त पुरुष और चौबीस वर्ष पर्यन्त स्त्री का स्वयंवर विवाह कराकर सबके आत्मा और शरीर के बल को पूर्ण करना चाहिये ॥ १० ॥

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    विषय

    जरा का दूरीकरण व दीप्तिमयता

    पदार्थ

    १. हे (नासत्या) = अश्विनीदेवो ! प्राणापानो ! आप (जुजुरुषः) = जीर्ण होते हुए पुरुष से (उत) = और (वव्रिम्) = सम्पूर्ण शरीर को आवृत करके वर्तमान जरा को (प्रामुञ्चतम्) = इस प्रकार पृथक् करते हो (इव) = जैसेकि (च्यवानात्) = युद्ध से भागते हुए पुरुष से (द्रापिम्) = कवच को । जरा कवच - सा बना हुआ था , इस जरा को आप पृथक् कर देते हो , अर्थात् जीर्णाङ्ग पुरुष को आप फिर से युवा बना देते हो । २. उस वृद्ध की (आयुः) = आयु को जो (जहितस्य) = सब बन्धु - बान्धवों से परित्यक्त - सा हुआ - हुआ है (प्रातिरतम्) = आप बढ़ाते हो और हे (दत्रा) = सब दुःखों का उपक्षय करनेवाले प्राणापानो ! आप इस जहित को फिर से (आत् इत्) = शीघ्र ही (कनीनाम्) = दीप्तियों का (पतिम् अकृणुतम्) = पति बना देते हो । इसका वार्धक्य दूर होता है , जीवन दीर्घ बनता है और यह दीप्तिमय हो जाता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्राणसाधना से जीर्णता के चिह्न दूर हो जाते हैं , झुर्रियाँ, हट जाती हैं , जीवन दीर्घ होता है और त्वचा फिर से दीप्तिमय हो जाती है ।

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    विषय

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    भावार्थ

    ( च्यवानात् ) युद्ध में भाग जाने वाले भीरु से (द्रापिम् इव) जिस प्रकार सेनापति कवच छुड़ा लेता है। उसी प्रकार हे ( नासत्या ) सत्य नियमों के व्यवस्थापक राष्ट्र और दो नायक विद्वान् स्त्री पुरुषो ! आप दोनों ( जुजुरुषः ) आयु समाप्त करने वाले वृद्ध ( च्यवानात् ) संसार भोगते हुए मरणोन्मुख पुरुष से ( वव्रिम् ) विभाग करने योग्य धन सम्पत्ति को ( प्र मुञ्चतम् ) मरने से पूर्व ही छुड़ा कर अगले आने वाले सन्तान को प्रदान करो । ( जहितस्य आयुः ) त्यागी पुरुष की ( आयुः ) जीवन को ( प्र तिरतम् ) उत्तम रीति से बढ़ाओ । हे ( दस्रा ) दुःखों के नाश करने वाले ! तुम दोनों ( कनीनाम् ) उस पुरुष की कन्याओं के लिये योग्य ( पतिम् ) पति का ( अकृणुतम् ) प्रबन्ध करो । इति नवमो वर्गः ॥

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. राजपुरुष व उपदेशक यांनी दात्याचे दुःख दूर करावे. विद्या शिकण्याची प्रवृत्ती असणाऱ्या कुमार-कुमारींचे रक्षण करून विद्या व चांगले शिक्षण त्यांना द्यावे. बाल्यावस्थेत अर्थात पंचवीस वर्षांपूर्वी पुरुष व सोळा वर्षांपूर्वी स्त्री यांचे विवाह करू नयेत. त्यानंतर अठ्ठेचाळीस वर्षांपर्यंत पुरुष व चोवीस वर्षांपर्यंत स्त्रीचा स्वयंवर विवाह करवून सर्वांचे आत्मे व शरीर यांचे बल वाढवावे. ॥ १० ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ashvins, recuperative powers of nature, masters of medicine and psychiatrists, you free the ageing man from wrinkled skin, remove fear complex from the escapist running away from life, give a new lease of life to the depressed heading to suicide, and mature adolescent girls to grow and match with the right husband in marriage.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O truthful Presidents of the Raja Sabha (Council of ministers) and Dharma Sabha (Religious Assembly) as they remove an armor from a renegade. keep a distributor of wealth or charitable person from all misery. Make arrangements for the education of the Brahmacharinis who are full of splendor from absolutely truthful aged and experienced for their marriage with suitable husbands (one for one). O givers of new life like the Vaidyas or physicians who are destroyers of all diseases, augment the life span of a man of renunciation (by providing him with all necessities)

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (वव्रिम्) संविभक्तारम् = A man of charitable disposition distributing wealth and articles among the needy. (द्रापिम्) कवचम् = Armour. (च्यवानात् ) पलायमानात् = From a run-away or renegade. (जहितस्य) हातु: = Of a man of renunciation.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is the duty of the officers of the State and preachers to eliminate the troubles of charitable persons. They should protect all students whether boys and girls and arrange to impart them wisdom and good education. They should prevent by law the marriage of boys before 25th year and of the girls before 16th and should allow their marriage by self selection (Svayamvara system) up to the minimum age of 48 in the case of men and 24 in the case of women. In this way, they should help the growth of their physical and spiritual power.

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