ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 2
वी॒ळु॒पत्म॑भिराशु॒हेम॑भिर्वा दे॒वानां॑ वा जू॒तिभि॒: शाश॑दाना। तद्रास॑भो नासत्या स॒हस्र॑मा॒जा य॒मस्य॑ प्र॒धने॑ जिगाय ॥
स्वर सहित पद पाठवी॒ळु॒पत्म॑ऽभिः । आ॒शु॒हेम॑ऽभिः । वा॒ । दे॒वाना॑म् । वा॒ । जू॒तिऽभिः॑ । शाश॑दाना । तत् । रास॑भः । ना॒स॒त्या॒ । स॒हस्र॑म् । आ॒जा । य॒मस्य॑ । प्र॒ऽधने॑ । जि॒गा॒य॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां वा जूतिभि: शाशदाना। तद्रासभो नासत्या सहस्रमाजा यमस्य प्रधने जिगाय ॥
स्वर रहित पद पाठवीळुपत्मऽभिः। आशुहेमऽभिः। वा। देवानाम्। वा। जूतिऽभिः। शाशदाना। तत्। रासभः। नासत्या। सहस्रम्। आजा। यमस्य। प्रऽधने। जिगाय ॥ १.११६.२
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 2
अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 2
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अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ युद्धविषयमाह ।
अन्वयः
हे शाशदाना नासत्या सभासेनापती भवन्तौ यथा वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां जूतिभिर्वा स्वकार्य्याणि न्यूहतुस्तथा तदाचरन् रासभः प्रधन आजा संग्रामे यमस्य सहस्रं जिगाय शत्रोरसंख्यान् वीरान् जयेत् ॥ २ ॥
पदार्थः
(वीळुपत्मभिः) बलेन पतनशीलैः (आशुहेमभिः) शीघ्रं गमयद्भिः (वा) (देवानाम्) विदुषाम् (वा) (जूतिभिः) जूयते प्राप्यतेऽर्थो याभिस्ताभिर्युद्धक्रियाभिः (शाशदाना) छेदकौ (तत्) (रासभः) आदिष्टोपयोजनपृथिव्यादिगुणसमूहवत्पुरुषः। रासभावश्विनोरित्यादिष्टोपयोजनना०। निघं० १। १५। (नासत्या) सत्यस्वभावौ (सहस्रम्) असंख्यातम् (आजा) संग्रामे (यमस्य) उपरतस्य मृत्योरिव शत्रुसमूहस्य (प्रधने) प्रकृष्टानि धनानि यस्मात्तस्मिन् (जिगाय) जयेत् ॥ २ ॥
भावार्थः
यथाग्निर्जलं वा वनं पृथिवीं वा प्रविष्टं सद्दहति छिनत्ति वा तथाऽतिवेगकारिभिर्विद्युदादिभिः साधितैः शस्त्रास्त्रैः शत्रवो जेतव्याः ॥ २ ॥
हिन्दी (3)
विषय
अब युद्ध के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
पदार्थ
हे (शाशदाना) पदार्थों को यथायोग्य छिन्न-छिन्न करनेहारे (नासत्या) सत्यस्वभावी सभापति और सेनापति ! आप जैसे (वीडुपत्मभिः) बल से गिरते और (आशुहेमभिः) शीघ्र पहुँचाते हुए पदार्थों से (वा) अथवा (देवानाम्) विद्वानों की (जूतिभिः) जिनसे अपना चाहा हुआ काम मिले सिद्ध हो उन युद्ध की क्रियाओं से (वा) निश्चय कर अपने कामों को निरन्तर तर्क-वितर्क से सिद्ध करते हों वैसे (तत्) उस आचरण को करता हुआ (रासभः) कहे हुए उपयोग को जो प्राप्त उस पृथिवी आदि पदार्थसमूह के समान पुरुष (प्रधने) उत्तम-उत्तम गुण जिसमें प्राप्त होते उस (आजा) संग्राम में (यमस्य) समीप आये हुए मृत्यु के समान शत्रुओं के (सहस्रम्) असंख्यात वीरों को (जिगाय) जीते ॥ २ ॥
भावार्थ
जैसे अग्नि वा जल वन वा पृथिवी को प्रवेश कर उसको जलाता वा छिन्न-भिन्न करता है, वैसे अत्यन्त वेग करनेहारे बिजुली आदि पदार्थों से किये हुए शस्त्र और अस्त्रों से शत्रु जन जीतने चाहिये ॥ २ ॥
विषय
यम का प्रधान संग्राम
पदार्थ
१. हे प्राणापानो ! आप (वीळुपत्मभिः) = दृढ़ गतिवाले (वा) = तथा (आशुहेमभिः) = शीघ्र गतिवाले (वा देवानां जूतिभिः) = और देवों की प्रेरणाओंवाले अश्वों से (शाशदाना) = [शद् शातने] काम क्रोधादि शत्रुओं का शातन - संहार करनेवाले हो । प्राणापानों की साधना से कर्मेन्द्रियरूप अश्व दृढ़ व शीघ्र गतिवाले होते हैं तथा ज्ञानेन्द्रियरूप अश्व देवों की प्रेरणावाले होते हैं । कर्मेन्द्रियाँ क्रियाशील व ज्ञानेन्द्रियाँ दिव्य प्रेरणावाली होती हैं तो वासनाओं का संहार हो ही जाता है । २. हे (नासत्या) = प्राणापानो ! (तत्) = तब (रासभः) = [रेभः] स्तुतिवचनों का उच्चारण करनेवाला यह स्तोता (यमस्य प्रधने आजा) = संयम के प्रकृष्ट धन की प्राप्ति के कारणभूत इस संग्राम में (सहस्त्रं जिगाय) = अनेक वासनाओं को जीतनेवाला होता है । प्राणसाधना के साथ प्रभुस्तवन होने पर मनुष्य वासनाओं पर विजय पाता ही है । यह वासनाओं के साथ होनेवाला संग्राम यहाँ ‘यम’ - संयम का संग्राम कहा गया है । यह संयम - संग्राम ही प्रकृष्ट धन प्राप्त कराता है ।
भावार्थ
भावार्थ - प्राणसाधना से [क] कर्मेन्द्रियाँ दूढ़ व शीघ्र गतिवाली होती हैं , [ख] ज्ञानेन्द्रियाँ दिव्य प्रेरणावाली बनती हैं , [ग] स्तवन की वृत्ति वासनारूप शत्रुओं का पराजय करती है ।
विषय
दो प्रमुख नायकों तथा विद्वान स्त्री पुरुषों के कर्तव्य ।
भावार्थ
हे ( नासत्या ) सेना के नासिका या प्रमुख स्थान पर स्थित, कभी असत्य न देखने वाले चक्षुओं के समान अध्यक्ष पुरुषो ! आप दोनों ( वीडुपत्मभिः ) बलवान् चक्रों या पैरों वाले ( आशुहेमभिः ) शीघ्र गतिशील रथों से (वा) और ( देवानां ) युद्ध-विजिगीषु पुरुषों की ( जूतिभिः ) वेगवती सेनाओं से ( शाशदाना ) शत्रु सेनाओं को छिन्न भिन्न करते हो । ( तत् ) तब ( रासभः ) घोर गर्जनकारी तोप आदि यन्त्र ( यमस्य ) सर्व नियामक राजा के ( प्रधने आजा ) प्रचुर धन देने वाले संग्राम में ( सहस्रम् जिगाय ) सहस्रों को विजय करे । अथवा ( यमस्य सहस्रम् ) उपराम को प्राप्त हुए शत्रु के सहस्रों सेना बलों का विजय करें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
जसे अग्नी किंवा जल वन किंवा पृथ्वीवर प्रवेश करून दहन करतात किंवा छिन्नभिन्न करतात तसे अत्यंत वेगाने विद्युत इत्यादी पदार्थांपासून तयार केलेल्या शस्त्र अस्त्रांनी शत्रूंना जिंकले पाहिजे. ॥ २ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Ashvins, ever sincere and true, flying by the wings of powerful birds, fast at the speed of clouds, by the tempests of wind and fire splitting the currents of winds, eminent scholars and aeronauts, the power applied, controlled and directed in your chariot would win victories in a thousand battles of wealth against the deadly enemy.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
Now something about the warfare is told in the second Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O absolutely truthful and destroyers of the foes, O President of the Assembly and commander of the Army, as you accomplish your works with mighty and quick-going articles or with the activities of the battle whenever necessary, done by learned persons, doing like that or following into your foot-steps, a man possessing the knowledge about the earth, water and fire etc. can conquer in battle thousands of enemies.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(वीळुपरमभिः) बलेन पतनशीलैः Mighty or flying with force. ( वीळु इतिबलनाम निघ० २.९) (शाशदानौ) छेदकौ = Destroyers of enemies. (रासभः) आदिष्टोपयोजनपृथिव्यादिगुण समूहवत्पुरुषः रासभावश्विनोरित्यादिष्टोपयोजननाम (निघ०) । = A Man utilizing the earth, water, fire etc. knowing their attributes. (यमस्य) उपरतस्प मृत्योरिव शत्रुसमूहस्य Of death-like band of enemies.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As the fire burns the forest and water shatters the earth, so enemies should be conquered by rapid and effective weapons.
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