ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 4
ति॒स्रः क्षप॒स्त्रिरहा॑ति॒व्रज॑द्भि॒र्नास॑त्या भु॒ज्युमू॑हथुः पत॒ङ्गैः। स॒मु॒द्रस्य॒ धन्व॑न्ना॒र्द्रस्य॑ पा॒रे त्रि॒भी रथै॑: श॒तप॑द्भि॒: षळ॑श्वैः ॥
स्वर सहित पद पाठति॒स्रः । क्षपः॑ । त्रिः । अहा॑ । अ॒ति॒व्रज॑त्ऽभिः । नास॑त्या । भु॒ज्युम् । ऊ॒ह॒थुः॒ । प॒त॒ङ्गैः । स॒मु॒द्रस्य॑ । धन्व॑न् । आ॒र्द्रस्य॑ । पा॒रे । त्रि॒ऽभिः । रथैः॑ । श॒तप॑त्ऽभिः । षट्ऽअ॑श्वैः ॥
स्वर रहित मन्त्र
तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतङ्गैः। समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथै: शतपद्भि: षळश्वैः ॥
स्वर रहित पद पाठतिस्रः। क्षपः। त्रिः। अहा। अतिव्रजत्ऽभिः। नासत्या। भुज्युम्। ऊहथुः। पतङ्गैः। समुद्रस्य। धन्वन्। आर्द्रस्य। पारे। त्रिऽभिः। रथैः। शतपत्ऽभिः। षट्ऽअश्वैः ॥ १.११६.४
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 4
अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे नासत्या सभासेनापती युवां तिस्रः क्षपस्त्र्यहा दिनान्यतिव्रजद्भिः पतङ्गैः सहयुक्तैः षडश्वैः शतपद्भिस्त्रिभी रथैर्भुज्युं समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिरूहथुर्गमयेतम् ॥ ४ ॥
पदार्थः
(तिस्रः) त्रिसंख्याकाः (क्षपः) रात्रीः (त्रिः) त्रिवारम् (अहा) त्रीणि दिनानि (अतिव्रजद्भिः) अतिशयेन गमयतृभिर्द्रव्यैः (नासत्या) सत्येन परिपूर्णौ (भुज्युम्) राज्यपालकम् (ऊहथुः) प्राप्नुतम् (पतङ्गैः) अश्ववद्वेगिभिः (समुद्रस्य) सम्यग्द्रवन्त्यापो यस्मिन्तस्यान्तरिक्षस्य (धन्वन्) धन्वनो बहुसिकतस्य स्थलस्य (आर्द्रस्य) सपङ्कस्य सागरस्य (पारे) परभागे (त्रिभिः) भूम्यन्तरिक्षजलेषु गमयितृभिः (रथैः) रमणीयैर्विमानादिभिर्यानैः (शतपद्भिः) शतैर्गमनशीलैः पादवेगैः (षडश्वैः) षट् अश्वा आशुगमकाः कलायन्त्रस्थितिप्रदेशा येषु तैः ॥ ४ ॥
भावार्थः
अहो मनुष्या यदा त्रिष्वहोरात्रेषु समुद्रादिपारावारं गमिष्यन्त्यागमिष्यन्ति तदा किमपि सुखं दुर्लभं स्थास्यति न किमपि ॥ ४ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (नासत्या) सत्य से परिपूर्ण सभापति और सेनापति ! तुम दोनों (तिस्रः) तीन (क्षपः) रात्रि (अहा) तीन दिन (अतिव्रजद्भिः) अतीव चलते हुए पदार्थ (पतङ्गैः) जो कि घोड़े के समान वेगवाले हैं उनके साथ वर्त्तमान (षडश्वैः) जिनमें जल्दी ले जानेहारे छः कलों के घर विद्यमान उन (शतपद्भिः) सैकड़ों पग के समान वेगयुक्त (त्रिभिः) भूमि, अन्तरिक्ष और जल में चलनेहारे (रथैः) रमणीय सुन्दर मनोहर विमान आदि रथों से (भुज्युम्) राज्य की पालना करनेवाले को (समुद्रस्य) जिसमें अच्छे प्रकार परमाणुरूप जल जाते हैं उस अन्तरिक्ष वा (धन्वन्) जिसमें बहुत बालू है उस भूमि वा (आर्द्रस्य) कींच के सहित जो समुद्र उसके (पारे) पार में (त्रिः) तीन बार (ऊहथुः) पहुँचाओ ॥ ४ ॥
भावार्थ
आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य जो तीन दिन-रात में समुद्र आदि स्थानों के अवार-पार जावें-आवेंगे तो कुछ भी सुख दुर्लभ रहेगा ! किन्तु कुछ भी नहीं ॥ ४ ॥
विषय
समुद्रस्य धन्वन् आर्द्रस्य पारे
पदार्थ
१. हे (नासत्या) = प्राणापानो ! आप (तिस्त्रः क्षपः) = तीन रात्रियों व (त्रिः अहा) = तीन दिन में , अर्थात् जीवन के प्रातः , मध्याह्न व सायं में - बाल्य , यौवन व वार्धक्य में (भुज्युम्) = भोगवृत्ति को भोगवृत्तिवाले पुरुष को (अतिव्रजद्भिः) = अतिशयेन चञ्चलता से इधर - उधर जानेवाले इन (पतङ्गैः) = इन्द्रियरूप अश्वों से (पारे ऊहथुः) = पार प्राप्त कराते हो । किसके पार ? बाल्यकाल में (समुद्रस्य पारे) = ज्ञानसमुद्र के पार , यौवन में (धन्वन् पारे) = सुख - दुःख से परिपूर्ण होने के कारण शुष्क रेतीली भूमि के तुल्य इस गृहस्थ के कर्मों के पार तथा वार्धक्य में (आर्द्रस्य पारे) = प्रेम से आर्द्र हृदय में होनेवाली उपासना के पार । प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति बाल्य में ज्ञान - प्राप्ति में तत्पर रहता है , इसका यौवन कर्मप्रधान होता है और वार्धक्य उपासनामय । २. प्राणापान - ज्ञान , कर्म व उपासना में साधक को पारंगत करते हैं । किनके द्वारा ? (त्रिभिः रथैः) = तीन रथों के द्वारा - स्थूल , सूक्ष्म व कारणशरीररूप तीन रथों के द्वारा । प्राणसाधक का स्थूलशरीर कर्मप्रधान है तो सूक्ष्मशरीर ज्ञानप्रधान और कारणशरीर उपासनाप्रधान । ये तीनों ही शरीर (शतपद्भिः) = सौ वर्षों तक चलनेवाले हैं; (षट् अश्वैः) = पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ मनरूप छठे अश्ववाले हैं । इनके द्वारा प्राणापान हमें ज्ञान , कर्म व उपासना में पारंगत करनेवाले होते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ - प्राणापान [की साधना] के द्वारा हम भोगवृत्ति से ऊपर उठकर ज्ञान , कर्म व उपासना को सिद्ध करनेवाले होते हैं ।
विषय
अद्भुत विमान का वर्णन ।
भावार्थ
( तिस्रः क्षपः ) तीन रात और ( त्रिः अहा ) तीन दिन लगातार ( अति व्रजद्भिः ) अति वेग से चलने वाले ( पतः ) अश्वों के समान वेग से जाने वाले ( शतपद्भिः) सैकड़ों चरणों वाले और ( षड् अश्वैः ) छः अश्व अर्थात् वेगवान् यन्त्र कलाओं से युक्त ( त्रिभिःरथैः ) समुद्र, रेता और कीचड़ तीनों प्रकार की भूमियों में अथवा जल, स्थल और अन्तरिक्ष तीनों स्थानों पर चलने वाले ( त्रिभिः ) तीनों प्रकार के ( रथैः ) रथों से ( नासत्या ) सदा सत्य विज्ञान वाले दो विद्वान् ( भुज्युम् ) समस्त राष्ट्र के पालक और भोक्ता स्वामी तथा भोग्य ऐश्वर्य को ( समुद्रस्य ) समुद्र के, ( धन्वन् ) रेगिस्तान और अन्तरिक्ष के तथा ( आर्द्रस्य ) जल से युक्त कीचड़ वाले स्थल के ( पारे ) पार ( ऊहथुः ) पहुंचाया करें । अध्यात्म में—‘भुज्यु’ आत्मा है । ‘अश्व’ शरीर में लगे मन सहित पांच इन्द्रियें हैं। शत सौ वर्ष हैं। ‘नासत्य’ नासिकास्थ प्राण अपान हैं। तीन रात, तीन दिन बाल्य, यौवन और जरावस्था तथा उनके प्रारम्भ के तीन काल शैशव, नव यौवन, नई-बुढौती हैं समुद्र धन्व और आर्द्र तीनों ज्ञान, कर्म और उपासना हैं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
माणसे जर तीन दिवसात समुद्रापार करतील तर त्यांनी सर्व सुख मिळू शकेल. ॥ ४ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Ashvins, undeviating from truth and reality, you carry the ruler beneficiary across the unfathomable ocean and over the desert three-nights and three days non-stop by three flying chariots fitted with hundred wheels and six engines.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The three kinds of cars, the ships etc. should be provided with means of comfort and they should be able to move at such a great speed that they may cross the watery ocean, the land, the upper region in three days and three nights, rushing on their course as if they were provided with innumerable feet. They should have six mechanisms, fire chambers for securing swift motion. Let men travel comfortably in three regions. Men can enjoy the best comforts by acting in this way, but not otherwise.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(क्षपाः) रात्रीः = night (समुद्रस्य) सम्यगद्रवन्ति आपो यस्मिन् तस्य अन्तरिक्षस्य = of the firmament. (धन्वन्) धन्वन: बहुसिकतस्य स्थलस्य = Of a sandy place or desert. (त्रिभिः) भूम्यन्तरिक्षजलेषु गमयितृभिः = Enabling to travel on earth, the water and the firmament. (षडशैव:) षट् अश्वाः आशुगमका: कलायन्त्रस्थितिप्रदेशा येषु ते = With six mechanisms.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Oh when men shall be able to cross the ocean etc. within three days and three nights, what happiness is there that they may not attain ?
Translator's Notes
क्षपेतिरात्रिनाम (निघ० १.७ ) समुद्र इत्यन्तरिक्षनाम ( निघ० १.३ )
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