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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 116 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 19
    ऋषिः - कक्षीवान् देवता - अश्विनौ छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    र॒यिं सु॑क्ष॒त्रं स्व॑प॒त्यमायु॑: सु॒वीर्यं॑ नासत्या॒ वह॑न्ता। आ ज॒ह्नावीं॒ सम॑न॒सोप॒ वाजै॒स्त्रिरह्नो॑ भा॒गं दध॑तीमयातम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    र॒यिम् । सु॒ऽक्ष॒त्रम् । सु॒ऽअ॒प॒त्यम् । आयुः॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । ना॒स॒त्या॒ । वह॑न्ता । आ । ज॒ह्नावी॑म् । सऽम॑नसा । उप॑ । वाजैः॑ । त्रिः । अह्नः॑ । भा॒गम् । दध॑तीम् । अ॒या॒त॒म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायु: सुवीर्यं नासत्या वहन्ता। आ जह्नावीं समनसोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    रयिम्। सुऽक्षत्रम्। सुऽअपत्यम्। आयुः। सुऽवीर्यम्। नासत्या। वहन्ता। आ। जह्नावीम्। सऽमनसा। उप। वाजैः। त्रिः। अह्नः। भागम्। दधतीम्। अयातम् ॥ १.११६.१९

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 19
    अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 11; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे समनसा वहन्ता नासत्याश्विनौ सभासेनेशौ युवां सनातनन्यायसेवनाद्रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायुः सुवीर्यं वाजैः सह वर्त्तमानां जह्नावीमह्नो भागं त्रिर्दधतीं सेनामुपायातं सम्यक् प्राप्नुतम् ॥ १९ ॥

    पदार्थः

    (रयिम्) श्रीसमूहम् (सुक्षत्रम्) शोभनं राज्यम् (स्वपत्यम्) शोभनं सन्तानम् (आयुः) चिरञ्जीवनम् (सुवीर्यम्) उत्तमं पराक्रमम् (नासत्या) सत्यपालकौ सन्तौ (वहन्ता) प्राप्नुवन्तौ (आ) (जह्नावीम्) जहत्यास्त्याज्यायाः शत्रुसेनाया इमां विरोधिनीं सेनाम्। अत्र जहातेर्द्वेऽन्त्यलोपश्च। उ० ३। ३६। इति हाधातोर्नुस्ततस्तस्येदमित्यण्। पृषोदरादित्वाद्वर्णविपर्ययः। (समनसा) समानं मनो विज्ञानं ययोस्तौ (उप) (वाजैः) ज्ञानवेगयुक्तैर्भृत्यादिभिः सह वर्त्तमानम् (त्रिः) त्रिवारम् (अह्नः) दिवसस्य (भागम्) भजनीयं समयम् (दधतीम्) धरन्तीम् (अयातम्) प्राप्नुतम् ॥ १९ ॥

    भावार्थः

    नहि कश्चिद्विद्यासत्यन्यायसेवनमन्तरैतानि धनादीनि प्राप्य रक्षित्वा सुखं कर्त्तुं शक्नोति तस्माद्धर्मसेवनेनैव राज्यादिकं प्राप्तुं शक्यम् ॥ १९ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (समनसा) समान विज्ञानवाले (वहन्ता) उत्तम सुख को प्राप्त हुए (नासत्या) सत्यधर्मपालक सभा सेना के अधिपतियो ! तुम दोनों सनातन न्याय के सेवन से (रयिम्) धनसमूह (सुक्षत्रम्) अच्छे राज्य (स्वपत्यम्) अच्छे संतान (आयुः) चिरकाल जीवन (सुवीर्य्यम्) उत्तम पराक्रम को और (वाजैः) ज्ञान वा वेगयुक्त भृत्यादिकों के साथ वर्त्तमान (जह्नावीम्) छोड़ने योग्य शत्रुओं की सेना की विरोधिनी इस सेना को तथा (अह्नः) दिन के (भागम्) सेवने योग्य विभाग अर्थात् समय को और (त्रिः) तीन बार (दधतीम्) धारण करती हुई सेना के (उप, आ, अयातम्) समीप अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ॥ १९ ॥

    भावार्थ

    कोई विद्या और सत्यन्याय के सेवन के विना इन धन आदि पदार्थों को प्राप्त हो और इनकी रक्षा कर सुख नहीं कर सकता है, इससे धर्म के सेवन से ही राज्य आदि प्राप्त हो सकता है ॥ १९ ॥

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    विषय

    सुक्षत्र , स्वपत्य , सुवीर्य में

    पदार्थ

    १. हे (नासत्या) = अश्विनीदेवो ! प्राणापानो ! आप (रयिम्) = धन को (सुक्षत्रम्) = उत्तमता से क्षतों [घावों , प्रहारों] से त्राण की शक्ति को , (स्वपत्यम्) = उत्तम सन्तान को , (आयुः) = दीर्घजीवन को तथा (सुवीर्यम्) = उत्तम वीर्य को (वहन्ता) = प्राप्त कराते हो । प्राणसाधना से उल्लिखित सब वस्तुओं की प्राप्ति होती है । २. हे प्राणापानो ! आप (समनसा) = समान मनवाले होकर , अर्थात् मिलकर कार्य करते हुए (जह्नावीम्) = [जहाति] प्राकृतिक भोगों का त्याग करनेवाली चित्तवृत्ति को [चित्तवृत्तिवाले पुरुष को] (वाजैः) = शक्तियों के साथ (उप अयातम्) = समीपता से प्राप्त होते हो । ऐसे पुरुष को आप सब कोशों के ऐश्वर्यों को देनेवाले हो । अन्नमयकोश का तेज , प्राणमय - कोश का वीर्य , मनोमयकोश का ओज व बल , विज्ञानमयकोश का मन्यु तथा आनन्दमयकोश का सहस् - इस त्याग - वृत्तिवाले पुरुष को प्राणसाधना से प्राप्त होता है । ३. इस जह्नावी को आप वे वाज प्राप्त कराते हो जो (आह्नः त्रिः) = दिन में तीन बार (भागं दधीतम्) = सोमयाग के प्रातः सवन , माध्यन्दिनसवन व सायन्तनसवन को धारण कर रही है । सोमयाग अध्यात्म में सोमशक्ति का रक्षण ही है । जीवन के चौबीस वर्ष तक इस वीर्य का रक्षण ही इसका प्रातः सवन है , अगले चवालीस वर्ष तक रक्षण इसका माध्यन्दिनसवन है और अगले अड़तालीस वर्ष तक इसका रक्षण ही सायन्तनसवन है । इन सवनों को करनेवाली जह्नावी को प्राणापान वाज - [शक्ति] - सम्पन्न करनेवाले होते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्राणसाधना से ‘धन , बल , सुसन्तान , आयु व सुवीर्य’ , प्राप्त होते हैं । त्याग वृत्तिवाला पुरुष वाज - [बल] - युक्त बन जाता है ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे ( नासत्या ) सदा सत्य पालन करने वाले प्रमुख राजपुरुषो ! हे स्त्री पुरुषो ! आप दोनों ( रयिम् ) ऐश्वर्य, ( सुक्षत्रम् ) उत्तम क्षात्रबल, उत्तम राज्यव्यवस्था, ( सु-अपत्यम् ) उत्तम सन्तान, ( आयुः ) दीर्घ जीवन और अन्न, ( सुवीर्यम् ) उत्तम वीर्य बल ( वहन्ता ) धारण करते हुए ( समनसा ) और एक दूसरे से समान चित्त वाले होकर ( भागं ) अपने सेवन करने योग्य ऐश्वर्य को धारण करने वाली ( जह्नावीम् ) शत्रुओं पर हथियार छोड़ने वाले सेनापति की, या वेतन भृति आदि देने वाले राजा की सेना को देखने भालने के लिये ( वाजैः ) वेगवान् अश्वों और भृत्यों सहित ( अह्नः त्रिः उप अयातम् ) दिन में तीन तीन वार आवें । ( २ ) गृहस्थ स्त्री पुरुष ( भागं दधतीं ) सुखादि देने वाली ( जह्नावीं ) वीर्य दान देने वाले पति की सन्तति को दिन में तीन वार प्राप्त हों। उनकी देख भाल तीन वार कर लिया करें, उनको भोजनादि से सन्तुष्ट किया करें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    कुणीही विद्या व सत्यन्यायाच्या सेवनाशिवाय धन इत्यादी पदार्थांना प्राप्त करून त्यांचे रक्षण करून सुख मिळवू शकत नाही, त्यामुळे धर्माच्या सेवनानेच राज्य इत्यादी प्राप्त होऊ शकते. ॥ १९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ashvins, protectors of truth and leaders of equal and agreeable mind, come with food, energy and powerful forces, bearing wealth, good social order, noble progeny, good health and age, courage and valour, and free flowing streams of water for the people performing their daily duties full three times of the day.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O President of the Assembly and Commander of the Army who are endowed with good knowledge, absolutely truthful and conferrers of happiness bearing the observance of eternal justice, strength and wealth, good progeny, long life, and vitality, approach your army which withstands the foes' army heroically, which follows a well-regulated timetable dividing it into three parts (morning, after noon and evening or night) and discharging its duties properly at apportioned time.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (जह्वावीम् ) जहत्या: त्याज्याया: शत्रुसेनायाः इमां विरोधिनों सेनाम् । अत्र जहातेर्द्वऽन्त्यलोपश्च [उणा० ३. ३६ ] इतिहाधतोनुस्ततस्तस्येदमित्यमण् पृषोदरादित्वाद्वर्णव्यत्ययः । = Withstanding the foe's army heroically.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    No one can earn and preserve wealth and health without knowledge. truth and justice and none can enjoy happiness without them. Therefore it is possible to preserve the State, with the observance of Dharma (righteousness and duty) only.

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