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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 116 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 14
    ऋषिः - कक्षीवान् देवता - अश्विनौ छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    आ॒स्नो वृक॑स्य॒ वर्ति॑काम॒भीके॑ यु॒वं न॑रा नासत्यामुमुक्तम्। उ॒तो क॒विं पु॑रुभुजा यु॒वं ह॒ कृप॑माणमकृणुतं वि॒चक्षे॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒स्नः । वृक॑स्य । वर्ति॑काम् । अ॒भीके॑ । यु॒वम् । न॒रा॒ । ना॒स॒त्या॒ । अ॒मु॒मु॒क्त॒म् । उ॒तो इति॑ । क॒विम् । पु॒रु॒ऽभु॒जा॒ । यु॒वम् । ह॒ । कृप॑माणम् । अ॒कृ॒णु॒त॒म् । वि॒ऽचक्षे॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आस्नो वृकस्य वर्तिकामभीके युवं नरा नासत्यामुमुक्तम्। उतो कविं पुरुभुजा युवं ह कृपमाणमकृणुतं विचक्षे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आस्नः। वृकस्य। वर्तिकाम्। अभीके। युवम्। नरा। नासत्या। अमुमुक्तम्। उतो इति। कविम्। पुरुऽभुजा। युवम्। ह। कृपमाणम्। अकृणुतम्। विऽचक्षे ॥ १.११६.१४

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 14
    अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 10; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्यैः कथं वर्त्तितव्यमित्याह ।

    अन्वयः

    हे पुरुभुजा नासत्या नरा अश्विनौ युवं युवामभीके वृकस्यास्न आस्याद्वर्त्तिकामिव सर्वान्मनुष्यानविद्याजन्यदुःखादमुमुक्तं मोचयतम्। उतो ह खल्वपि युवं सर्वा विद्या विचक्षे कृपमाणं कविमकृणुतम् ॥ १४ ॥

    पदार्थः

    (आस्नः) आस्यान्मुखात् (वृकस्य) (वर्तिकाम्) चटकापक्षिणीमिव (अभीके) कामिते व्यवहारे (युवम्) युवाम् (नरा) सुखप्रापकौ (नासत्या) असत्यविरहौ (अमुमुक्तम्) मोचयतम् (उतो) अपि (कविम्) विद्यापारदर्शिनं मेधाविनम् (पुरुभुजा) पुरून् बहून् जनान् सुखानि भोजयितारौ (युवम्) युवाम् (ह) खलु (कृपमाणम्) कृपां कर्त्तारम्। अत्र विकरणव्यत्ययेन शः। (अकृणुतम्) कुरुतम् (विचक्षे) विख्यापयितुम्। अत्र तुमर्थेसे० सेन् ॥ १४ ॥

    भावार्थः

    मनुष्यैः सुखरूपे सर्वस्याभीष्टे विद्याग्रहणव्यवहाराख्ये सर्वान् मनुष्यान् प्रवर्त्य दुःखफलादन्याय्यात् कर्मणो निवर्त्य सर्वेषां प्राणिनामुपरि कृपां विधाय सुखयितव्यम् ॥ १४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (पुरुभुजा) बहुत जनों को सुख का भोग कराने (नासत्या) झूठ से अलग रहने (नरा) और सुखों को पहुँचानेहारे सभा सेनापतियो ! (युवम्) तुम दोनों (अभीके) चाहे हुए व्यवहार में (वृकस्य) भेड़िया के (आस्नः) मुख से (वर्त्तिकाम्) चिरौटी के समान सब मनुष्यों को अविद्याजन्य दुःख से (अमुमुक्तम्) छुड़ाओ (उतो) और (ह) भी (युवम्) तुम दोनों सब विद्याओं को (विचक्षे) विख्यात करने को (कृपमाणम्) कृपा करनेवाले (कविम्) विद्या के पारंगत पुरुष को (अकृणुतम्) सिद्ध करो ॥ १४ ॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि सुखरूप सबके चाहे हुए विद्या ग्रहण करने के व्यवहार में सब मनुष्यों को प्रवृत्त करके जिसका दुःख फल है उस अन्यायरूप काम से निवृत्त करके उन सब प्राणियों पर कृपा कर सुख देवें ॥ १४ ॥

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    विषय

    वृक के आस्य से वर्तिका की मुक्ति

    पदार्थ

    १. वर्तिका शब्द का अभिप्राय है - ‘अपने कर्तव्य कर्मों में वर्तना’ । मनुष्य जब लोभ के वशीभूत हो जाता है तब वह अपने कर्तव्य - कर्मों को विस्मृत करके धन कमाने में ही लगा रहता है । यह लोभ ‘वृक’ है । वे सारे कर्त्तव्य मानो इस वृक के मुख में चले जाते हैं , वृक उन्हें निगल जाता है । ‘वर्तिका’ हमें कर्तव्य का ध्यान कराती है , वृक हमें कर्त्तव्य - पथ से दूर करता है । एवं यह वृक व वर्तिका का संग्राम चलता है । इस (अभीके) = संग्राम में हे (नरा) = स्वस्थवृत्ति को प्राप्त करानेवाले (नासत्या) = प्राणापानो ! (युवम्) = आप (वृकस्य आस्नः) = इस लोभरूप वृक के मुख से (वर्तिकाम्) = कर्त्तव्यपरायणतारूप वर्तिका को (अमुमुक्तम्) = छुड़ाते हो । प्राणसाधक लोभ के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों में प्रमाद नहीं करता । २. (उत) = और हे (पुरुभुजा) = खूब ही पालन करनेवाले प्राणापानो ! (युवं ह) = आप निश्चय से इस कर्तव्यपरायण व्यक्ति को (कविम्) = क्रान्तप्रज्ञ - अत्यधिक सूक्ष्मदर्शी बुद्धिवाला व (कृपमाणम्) = [कृप् सामर्थ्ये] सामर्थ्यवाला (अकृणुतम्) = करते हो । यह बुद्धिमान् सशक्त पुरुष (विचक्षे) = अपने कर्तव्यों को विशेषरूप से देखने के लिए होता है । सब वस्तुओं को ठीक रूप में देखने के कारण यह ठीक मार्ग पर ही चलता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - लोभ के कारण हम अपने कर्तव्य - कर्मों में किसी प्रकार का प्रमाद न करें । बुद्धिमान् व समझदार बनकर अपने कर्त्तव्य को देखें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे ( नरा ) नायक पुरुषो ! ( नासत्या ) कभी असत्य मार्ग पर न जाने वाले प्रमुख पुरुषो ! जिस प्रकार ( वर्त्तिकाम् ) वार वार आने वाली उषा को ( वृकस्य ) घेर लेने वाले अन्धकार के मुख से छुड़ाकर ( विचक्षे ) पदार्थों के प्रकाश करने वाले सूर्य को प्रकट करते हो और जिस प्रकार कोई नर नारी भेड़ियों के मुख से बटेरी को छुड़ा कर किसी दयाशील की रेख देख में उसे घर दे उसी प्रकार ( युवम् ) तुम दोनों ( वृकस्य ) भेड़िये के समान पीठ पीछे से आक्रमण करने वाले डाकू लोगों के ( आस्नः ) प्रजा के खा जाने वाले मुख अर्थात् अत्याचार से (अभीके) परस्पर प्रतिद्वन्द्विता के अवसर पर, व ( वर्त्तिकाम् ) नाना वृत्तियों, व्यवसायों और उद्योगों से गुजर करने वाली, बटेरी के समान निर्बल दुःखी प्रजा को ( अमुमुक्तम् ) सदा छुड़ाते रहो । ( उतो ) और हे ( पुरुभुजा ) बहुतों को पालने और भोगने में समर्थ ( युवं ) आप दोनों ( विचक्षे ) विविध न्याय व्यवहारों को देखने के लिये अध्यक्ष पद पर ( कृपमाणम् ) प्रजा पर कृपा और अनुग्रह करने वाले और समर्थ ( कविम्) दूरदर्शी विद्वान्, प्रज्ञावान् पुरुष को ( अकृतम् ) नियुक्त करो ।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी सुखरूपी, सर्वांना अभीष्ट असणाऱ्या विद्याग्रहण व्यवहारात सर्व माणसांना प्रवृत्त करून, ज्याचे दुःख हे फळ आहे अशा अन्यायरूपी कामातून निवृत्त करून सर्व प्राण्यांवर कृपा करून सुख द्यावे. ॥ १४ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Ashvins, defenders of truth, light and justice, leaders of humanity and creators of peace and prosperity for all, in the human search for progress and enlightenment, you save the poor bird from the devourer’s mouth, and give the poet a compassionate heart for a comprehensive vision of life.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should men deal with others is told in the fourteenth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O absolutely truthful leaders of men, teachers and preachers, you liberate all men from the misery caused by ignorance as a quail is liberated from the mouth of wolf. You are benefactors of many, you make a man wise and kind-hearted to impart true wisdom to all.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (अभीके) कामिते व्यवहारे = Desired act. (विचक्षे) विस्थापयितुम् = To impart knowledge. (पुरुभुजा) पुरून बहून् जनान् सुखानि भोजयितारौ = Benefactors of many men.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    It is the duty of all learned persons to lead men to the desirable act of the acquisition of knowledge and to keep them away from all unjust acts, having kindness to all beings. It is by doing this, that they enjoy happiness.

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