ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 116/ मन्त्र 25
प्र वां॒ दंसां॑स्यश्विनाववोचम॒स्य पति॑: स्यां सु॒गव॑: सु॒वीर॑:। उ॒त पश्य॑न्नश्नु॒वन्दी॒र्घमायु॒रस्त॑मि॒वेज्ज॑रि॒माणं॑ जगम्याम् ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । वा॒म् । दंसां॑सि । अ॒स्वि॒नौ॒ । अ॒वो॒च॒म् । अ॒स्य । पतिः॑ । स्या॒म् । सु॒ऽगवः॑ । सु॒ऽवीरः॑ । उ॒त । पश्य॑न् । अ॒श्नु॒वन् । दी॒र्घम् । आयुः॑ । अस्त॑म्ऽइव । इत् । ज॒रि॒माण॑म् । ज॒ग॒म्या॒म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र वां दंसांस्यश्विनाववोचमस्य पति: स्यां सुगव: सुवीर:। उत पश्यन्नश्नुवन्दीर्घमायुरस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम् ॥
स्वर रहित पद पाठप्र। वाम्। दंसांसि। अश्विनौ। अवोचम्। अस्य। पतिः। स्याम्। सुऽगवः। सुऽवीरः। उत। पश्यन्। अश्नुवन्। दीर्घम्। आयुः। अस्तम्ऽइव। इत्। जरिमाणम्। जगम्याम् ॥ १.११६.२५
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 116; मन्त्र » 25
अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 12; मन्त्र » 5
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अष्टक » 1; अध्याय » 8; वर्ग » 12; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे अश्विनावहं वां युवयोर्दंसांसि प्रावोचं तेन सुगवः सुवीरः पश्यन्नुतापि दीर्घमायुरश्नुवन्सन्नस्य पतिः स्याम्। परिव्राजकोऽस्तमिव जरिमाणं देहं त्यक्त्वा सुखेनेज्जगम्याम् ॥ २५ ॥
पदार्थः
(प्र) (वाम्) युवयोरुपदेशकाध्यापकयोः (दंसांसि) उपदेशाध्यापनादीनि कर्माणि (अश्विनौ) सर्वशुभकर्मविद्याव्यापिनौ (अवोचम्) वदेयम् (अस्य) व्यवहारस्य राज्यस्य वा (पतिः) पालकः (स्याम्) भवेयम् (सुगवः) शोभना गावो यस्य (सुवीरः) शोभनपुत्रादिभृत्यः (उत) अपि (पश्यन्) सत्यासत्यं प्रेक्षमाणः (अश्नुवन्) विद्यासुखेन व्याप्नुवन् (दीर्घम्) वर्षशतादप्यधिकम् (आयुः) जीवनम् (अस्तमिव) गृहं प्राप्येव (जरिमाणम्) प्राप्तजरसं देहम् (इत्, एव) (जगम्याम्) भृशं गच्छेयम् ॥ २५ ॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्याः सदा धार्मिकाणामाप्तानां कर्माणि संसेव्य धर्मजितेन्द्रियत्वाभ्यां विद्याः प्राप्यायुर्वर्धयित्वा सुसहायाः सन्तो जगत्पालयेयुः। योगाभ्यासेन जीर्णानि शरीराणि त्यक्त्वा विज्ञानान्मुक्तिं च गच्छेयुरिति ॥ २५ ॥अत्र पृथिव्यादिपदार्थगुणदृष्टान्तेनानुकूलतया सभासेनापत्यादिगुणकर्मवर्णनादेतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तोक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम् ॥इति १२ द्वादशो वर्गः ११६ सूक्तं च समाप्तम् ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे (अश्विनौ) समस्त शुभ कर्म और विद्या में रमे हुए सज्जनो ! मैं (वाम्) तुम दोनों उपदेश करने और पढ़ानेवालों के (दंसांसि) उपदेश और विद्या पढ़ाने आदि कामों को (प्र, अवोचम्) कहूँ, उससे (सुगवः) अच्छी-अच्छी गौ और उत्तम-उत्तम वाणी आदि पदार्थोंवाला (सुवीरः) पुत्र-पौत्र आदि भृत्ययुक्त (पश्यन्) सत्य-असत्य को देखता (उत) और (दीर्घम्) बड़ी (आयुः) आयुर्दा को (अश्नुवन्) सुख से व्याप्त हुआ (अस्य) इस राज्य व्यवहार का (पतिः) पालनेवाला (स्याम्) होऊँ तथा संन्यासी महात्मा जैसे (अस्तमिव) घर को पाकर निर्लोभ से छोड़ दे, वैसे (जरिमाणम्) बुड्ढे हुए शरीर को छोड़ सुख से (इत्) ही (जगम्यात्) शीघ्र चला जाऊँ ॥ २५ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य सदा धार्मिक शास्त्रवक्ताओं के कर्मों को सेवन कर धर्म और जितेन्द्रियपन से विद्याओं को पाकर आयुर्दा बढ़ाके अच्छे सहाययुक्त हुए संसार की पालना करें और योगाभ्यास से जीर्ण अर्थात् बुड्ढे शरीरों को छोड़ विज्ञान से मुक्ति को प्राप्त होवें ॥ २५ ॥इस सूक्त में पृथिवी आदि पदार्थों के गुणों के दृष्टान्त तथा अनुकूलता से सभासेनापति आदि के गुण कर्मों के वर्णन से इस सूक्त में कहे अर्थ की पिछले सूक्त में कहे अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह १२ वर्ग और ११६ सूक्त समाप्त हुआ ॥
विषय
सुगवः , सुवीरः
पदार्थ
१. हे (अश्विनौ) = प्राणापानो ! मैं (वाम्) = आपके (दंसांसि) = पूर्वमन्त्रों में वर्णित अद्भुत कर्मों का (प्र अवोचम्) = प्रकर्षेण कथन करूँ । आपकी कृपा से मैं (अस्य) = इस शरीररूप गृह का (पतिः स्याम्) = अधिपति हो । शरीर पर मेरा पूर्ण प्रभुत्व हो , शरीर को बनानेवाले सब भूतों का मैं ईश्वर होऊँ , परिणामतः (सुगवः) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाला बनूं और (सुवीरः) = उत्तम वीर होऊँ , मेरी इन्द्रियों की शक्ति का विकास हो और मेरी वीरता में कमी न आये । शरीर पर आधिपत्य न होने से ही हम तुच्छ विषयों की ओर झुक जाते हैं और अपनी शक्तियों को क्षीण कर बैठते हैं । २. शरीर का अधिपति बनकर (उत) = और (पश्यन्) = आँखों से ठीक देखता हुआ , अर्थात् सब इन्द्रियों से उस - उस इन्द्रिय के कार्य को ठीक से करता हुआ (दीर्घम् आयुः अश्नुवन्) = दीर्घजीवन को प्राप्त करता हुआ मैं अन्त में (जरिमाणम्) = वृद्धावस्था में (इत्) = ही (जगम्याम्) = इस प्रकार जाऊँ (इव) = जैसेकि कोई व्यक्ति (अस्तम्) = घर को जाता है । जिस प्रकार हम घर में प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश करते हैं , उसी प्रकार हम वार्धक्य में प्रवेश करते हुए भी प्रसन्नता का अनुभव करें । यह तभी हो सकता है जब हम क्षीणशक्ति न हो गये हों । प्राणसाधना हमारी शक्तियों को स्थिर रखती है और परिणामतः जीवन में उल्लास बना रहता है ।
भावार्थ
भावार्थ - प्राणसाधना हमें उत्तम इन्द्रियोंवाला , वीर , दीर्घजीवी व सशक्त वार्धक्यवाला बनाती है ।
विशेष / सूचना
विशेष - सूक्त का आरम्भ प्राणसाधना द्वारा वासनाओं के उच्छेद से हुआ है [१] । समाप्ति पर भी यही कहा है कि हमारी इन्द्रियाँ स्वस्थ व सशक्त बनी रहती है , हमारा वार्धक्य भी जीर्ण शक्तिवाला नहीं हो जाता [२५] । अग्रिम सूक्त में भी कक्षीवान् प्राणसाधना द्वारा सोम - [वीर्य] पान का प्रयत्न करता है -
विषय
missing
भावार्थ
हे ( अश्विन ) उक्त मुख्य पुरुषो ! नायको ! एवं स्त्री पुरुषो ! मैं ( अस्य पतिः ) इस राष्ट्र, गृह और देह का पालक राजा ( वां दंसासि ) आप दोनों के कर्त्तव्यों का ( अवोचम् ) वर्णन करता हूं। मैं ( सुगवः ) सुखप्रद, उत्तम भूमि और गौ आदि सम्पत्ति का स्वामी ( सुवीरः ) उत्तम पुत्रों और वीर भृत्यों का स्वामी ( स्याम् ) होऊं । (उत) और ( पश्यन् ) चक्षुओं से देखता हुआ और ( दीर्घम् आयु: अश्नुवन् ) दीर्घायु का भोग करता हुआ मैं ( अस्तम् इव ) गृह के समान ( जरिमाणं ) बुढ़ापे की दशा को ( जगम्याम् ) प्राप्त होऊ । ( २ ) अध्यापक और उपदेशक के पक्ष में—मैं शिष्य ( सुगवः ) उत्तम ज्ञान वाणियों और उत्तम इन्द्रियों का और ( सुवीरः ) उत्तम प्राणों का साधक होकर दीर्घ आयु होकर ( पश्यन् ) ज्ञान का दर्शन करता हुआ ( जरिमाणम् ) उपदेश देने वाले गुरु को और ( जरिमाणम् ) सब दुःखों के नाश करने वाले परमेश्वर को प्राप्त होऊ ॥ इति द्वादशो वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कक्षीवानृषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्दः– १, १०, २२, २३ विराट् त्रिष्टुप्। २, ८, ९, १२, १३, १४, १५, १८, २०, २४, २५ निचृत् त्रिष्टुप्। ३, ४, ५, ७, २१ त्रिष्टुप् । ६, १६, १९ भुरिक् पंक्तिः। ११ पंक्तिः। १७ स्वराट् पंक्तिः॥ पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. माणसांनी सदैव धार्मिक शास्त्रवक्त्याच्या कर्माप्रमाणे वागून धर्म व जितेन्द्रियतेने विद्या प्राप्त करून आयुष्य वाढवून चांगल्या प्रकारे वागून जगाचे पालन करावे व योगाभ्यासाने जीर्ण अर्थात वृद्ध शरीर सोडून विज्ञानाने मुक्ती प्राप्त करावी. ॥ २५ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Ashvins, noble divinities of truth and right action, generous givers of good health and purpose of life for a full age, I pray I may sing in praise of your great actions with gratitude and, blest with cows, noble speech and abundant land, in the company of brave children, seeing the world and the light of divinity, enjoying long and full age, and giving up this ageing body I should retire, set like the sun and go home.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The same subject is continued.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O highly learned and active teachers and preachers, I have thus told your noble acts like the teaching and preaching etc. May I be the master of this place having good cattle and noble progeny retaining my sight and seeing the real nature of truth and untruth and enjoying a long life. As a Sanyasi gives up his home, in the same manner, having given up worn out body caused by old age, let me enjoy the bliss of emancipation.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(दंसांसि) उपदेशाध्यापनादीनि कर्माणि = Good actions like the preaching and teaching etc. (अस्तम् ) गृहम् = Home.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Men should preserve the world by doing the deeds done by absolutely truthful righteous people and having augmented their age and acquired knowledge with the observance of Dharma and self-control and having got good helpers. They should cast off their old and shattered bodies by the practice of Yoga and should enjoy the bliss of emancipation.
Translator's Notes
दंसइति कर्मनाम (निघ० २.१) अस्तमिति गृहनाम (निघ० ३.४ ) This hymn is connected with the previous hymn, as there is mention of the attributes of the earth and attributes of the President of the Assemblies and commander of the Army. Here ends the commentary on the 116th Hymn and 12th Verga of the first Mandala of the Rigveda.
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