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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 86/ मन्त्र 24
    ऋषिः - पृश्नयोऽजाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - आर्चीजगती स्वरः - निषादः

    त्वां सो॑म॒ पव॑मानं स्वा॒ध्योऽनु॒ विप्रा॑सो अमदन्नव॒स्यव॑: । त्वां सु॑प॒र्ण आभ॑रद्दि॒वस्परीन्दो॒ विश्वा॑भिर्म॒तिभि॒: परि॑ष्कृतम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वाम् । सो॒म॒ । पव॑मानम् । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । अनु॑ । विप्रा॑सः । अ॒म॒द॒न् । अ॒व॒स्यवः॑ । त्वाम् । सु॒ऽप॒र्णः । आ । अ॒भ॒र॒त् । दि॒वः । परि॑ । इन्दो॒ इति॑ । विश्वा॑भिः । म॒तिऽभिः॑ । परि॑ऽकृतम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वां सोम पवमानं स्वाध्योऽनु विप्रासो अमदन्नवस्यव: । त्वां सुपर्ण आभरद्दिवस्परीन्दो विश्वाभिर्मतिभि: परिष्कृतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वाम् । सोम । पवमानम् । सुऽआध्यः । अनु । विप्रासः । अमदन् । अवस्यवः । त्वाम् । सुऽपर्णः । आ । अभरत् । दिवः । परि । इन्दो इति । विश्वाभिः । मतिऽभिः । परिऽकृतम् ॥ ९.८६.२४

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 86; मन्त्र » 24
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 16; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सोम) हे परमात्मन् ! (पवमानं, त्वां) सर्वपूज्यं त्वां (स्वाध्यः) सुकर्म्माणः किम्भूताः (विप्रासः) मेधाविनः पुनः किम्भूताः (अवस्यवः) त्वदुपासनपरायणाः (अनु, अमदन्) भवन्तं स्तुवन्ति। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! (त्वां) भवन्तं (सुपर्णः) सबोधोपासकः (आ, अभरत्) उपासनया गृह्णाति किम्भूतस्त्वं (दिवः, परि) द्युलोकस्य मर्य्यादामुल्लङ्घ्य स्थितः। अपरञ्च (विश्वाभिः, मतिभिः) निखिलज्ञानैः (परिष्कृतं) अलङ्कृतोऽसि ॥२४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सोम) हे परमात्मन् ! (पवमानं त्वां) सर्वपूज्य तुझको (स्वाध्यः) सुकर्म्मी लोग (विप्रासः) जो मेधावी हैं और (अवस्यवः) आपकी उपासना की इच्छा करनेवाले हैं, वे (अन्वमदन्) आपकी स्तुति करते हैं। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! (त्वां) तुझको (सुपर्णः) बोधयुक्त उपासक (आभरत्) उपासना द्वारा ग्रहण करता है। तुम कैसे हो, (दिवस्परि) कि द्युलोक की भी मर्य्यादा को उल्लङ्घन करके वर्तमान हो और (विश्वाभिर्मतिभिः) सम्पूर्ण ज्ञानों से (परिष्कृतम्) अलंकृत हो ॥२४॥

    भावार्थ

    जो लोग विद्या द्वारा अपनी बुद्धि का परिष्कार करते हैं, वे ही परमात्मा की विभूति को जान सकते हैं, अन्य नहीं ॥२४॥

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    विषय

    सर्वस्तुत्य और शरणयोग्य प्रभु।

    भावार्थ

    हे (सोम) उत्तम शासक ! सर्वप्रेरक प्रभो ! (स्वाध्यः) उत्तम ध्यान, धारणा और उत्तम कर्म वाले (विप्रासः) मेधावी विद्वान्, (अवस्यवः) रक्षा, ज्ञान, कृपा दया और अपनी वृद्धि चाहने वाले जन (पवमानं त्वां) बाह्य और भीतरी शत्रुओं का नाश कर देश, देह और हृदय को पवित्र करने वाले तेरी ही (अनु अमदन्) निरन्तर स्तुति किया करते हैं। हे (इन्दो) तेजस्विन् (विश्वाभिः मतिभिः) समस्त बुद्धियों और स्तुतियों वा ज्ञान-वाणियों से (परि-कृतम्) सुशोभित (त्वां) तुझको (सुपर्णः) उत्तम पालनशक्ति वाला वा उत्तम गति से जाने में समर्थ उत्तम साधनसम्पन्न पुरुष (दिवः परि) समस्त कामनाओं को प्राप्त करने के लिये वा (दिवः परिः) महान् आकाशवत्, अपरिमेय हृदयाकाश में भी (त्वां आभरद्) तुझको ही धारण करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—१० आकृष्टामाषाः। ११–२० सिकता निवावरी। २१–३० पृश्नयोऽजाः। ३१-४० त्रय ऋषिगणाः। ४१—४५ अत्रिः। ४६–४८ गृत्समदः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:– १, ६, २१, २६, ३३, ४० जगती। २, ७, ८, ११, १२,१७, २०, २३, ३०, ३१, ३४, ३५, ३६, ३८, ३९, ४२, ४४, ४७ विराड् जगती। ३–५, ९, १०, १३, १६, १८, १९, २२, २५, २७, ३२, ३७, ४१, ४६ निचृज्जगती। १४, १५, २८, २९, ४३, ४८ पादनिचृज्जगती। २४ आर्ची जगती। ४५ आर्ची स्वराड् जगती॥

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    विषय

    स्वाध्यः विप्रासः अवस्यवः

    पदार्थ

    हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (त्वां) = तुझे (पवमानम्) = पवित्र करनेवाले (अनु) = तेरे पीछे, अर्थात् तेरे अनुसार, जितना-जितना तेरा रक्षण करते हैं उतना उतना (अमदन्) = आनन्दित होते हैं। कौन ? (स्वाध्यः) = [सुष्ठुध्याताः] प्रभु का उत्तम उपासन करनेवाले, (विप्रासः) = ज्ञानी व अपना पूरण करनेवाले, तथा (अवस्यवः) = रक्षण की कामनावाले । हे (इन्दो त्वाम्) = सोम तुझे (सुपर्ण:) = अपना अच्छी प्रकार पालन व पूरण करनेवाला (दिवस्परि) = मस्तिष्करूप द्युलोक का लक्ष्य करके अर्थात् मस्तिष्क को परिष्कृत करने के हेतु से (आभरत्) = शरीर में चारों ओर धारण करता है। शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ बना रहता है । उस तुझे यह सुपर्ण धारण करता है या अपने में प्राप्त कराता है, जो तू (विश्वाभिः मतिभिः) = सब बुद्धियों से (परिष्कृतम्) = सुशोभित व अलङ्कृत है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें प्रभुप्रवण करता है, हमारी कमियों को दूर करता है तथा हमारा रक्षण करता है । यह सब बुद्धियों से अलंकृत हुआ हुआ हमारे ज्ञान को बढ़ाता है ।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, pure and purifying dynamic spirit of the world of existence, men of noble thought, will and action, veteran saints, seekers of divine favour and protection adore and exalt you. Indu, O spirit of life and light higher than highest regions of light, exalted and glorified in purity by all sages of the world of wisdom, the imaginative seeker of divinity attains to you by his flights of meditation.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे लोक विद्येद्वारे आपली बुद्धी परिष्कृत करतात. तेच परमात्म्याच्या विभूतींना जाणू शकतात, इतर नव्हे. ॥२४॥

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