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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 86/ मन्त्र 35
    ऋषिः - त्रयऋषिगणाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - विराड्जगती स्वरः - निषादः

    इष॒मूर्जं॑ पवमाना॒भ्य॑र्षसि श्ये॒नो न वंसु॑ क॒लशे॑षु सीदसि । इन्द्रा॑य॒ मद्वा॒ मद्यो॒ मद॑: सु॒तो दि॒वो वि॑ष्ट॒म्भ उ॑प॒मो वि॑चक्ष॒णः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इष॑म् । ऊर्ज॑म् । प॒व॒मा॒न॒ । अ॒भि । अ॒र्ष॒सि॒ । श्ये॒नः । न । वंसु॑ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒सि॒ । इन्द्रा॑य । मद्वा॑ । मद्यः॑ । मदः॑ । सु॒तः । दि॒वः । वि॒ष्ट॒म्भः । उ॒प॒मः । वि॒ऽच॒क्ष॒णः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इषमूर्जं पवमानाभ्यर्षसि श्येनो न वंसु कलशेषु सीदसि । इन्द्राय मद्वा मद्यो मद: सुतो दिवो विष्टम्भ उपमो विचक्षणः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इषम् । ऊर्जम् । पवमान । अभि । अर्षसि । श्येनः । न । वंसु । कलशेषु । सीदसि । इन्द्राय । मद्वा । मद्यः । मदः । सुतः । दिवः । विष्टम्भः । उपमः । विऽचक्षणः ॥ ९.८६.३५

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 86; मन्त्र » 35
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 18; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    पदार्थः

    (पवमान) हे सर्वपावकपरमात्मन् ! त्वम् (इषं) ऐश्वर्य्यमपि च (ऊर्जं) बलं (अभि, अर्षसि) ददासि श्येनः, (न) यथा विद्युत् (वंसु, कलशेषु) निवासयोग्यस्थानेषु स्थिता भवति, तथैव (सीदसि) त्वं पवित्रेऽन्तःकरणे स्थिरो भवसि। (इन्द्राय) कर्म्मयोगिने (मद्वा) आनन्दकर्ता (मद्यः) आनन्दहेतुः (मदः) अपि चानन्दस्वरूपोऽसि (सुतः) स्वयंसिद्धः (दिवः, विष्टम्भः) द्युलोकस्याश्रयः अपरञ्च (उपमः) द्युलोकस्योपमायोग्यः किञ्च (विचक्षणः) सर्वोपरि प्रवक्ता असि ॥३५॥

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    पदार्थः

    (पवमान) हे सर्वपावकपरमात्मन् ! त्वम् (इषं) ऐश्वर्य्यमपि च (ऊर्जं) बलं (अभि, अर्षसि) ददासि (श्येनः, न) यथा विद्युत् (वंसु, कलशेषु) निवासयोग्यस्थानेषु स्थिता भवति, तथैव (सीदसि) त्वं पवित्रेऽन्तःकरणे स्थिरो भवसि। (इन्द्राय) कर्म्मयोगिने (मद्वा) आनन्दकर्ता (मद्यः) आनन्दहेतुः (मदः) अपि चानन्दस्वरूपोऽसि (सुतः) स्वयंसिद्धः (दिवः, विष्टम्भः) द्युलोकस्याश्रयः अपरञ्च (उपमः) द्युलोकस्योपमायोग्यः किञ्च (विचक्षणः) सर्वोपरि प्रवक्ता असि ॥३५॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (इषं) ऐश्वर्य्य और (ऊर्जं) बल को (अभ्यर्षसि) देते हैं। (श्येनो न ) जिस प्रकार बिजली (वंसु कलशेषु) निवासयोग्य स्थानों में स्थिर होती है, इसी प्रकार (सीदसि) आप पवित्र अन्तःकरणों में स्थिर होते हैं। (इन्द्राय) आप कर्म्मयोगी के लिये (मद्वा) आनन्द करनेवाले (मद्यः) और आनन्द के हेतु हैं। (मदः) स्वयं आनन्दस्वरूप हैं। (सुतः) स्वयंसिद्ध हैं। (दिवो विष्टम्भः) द्युलोक के आधार हैं (उपमः) और द्युलोक की उपमावाले हैं। (विचक्षणः) सर्वोपरि प्रवक्ता हैं ॥३५॥

    भावार्थ

    परमात्मा द्युभ्वादि लोकों का आधार है और उसी के आधार में चराचर सृष्टि की स्थिति है और वेदादि विद्याओं का प्रवक्ता होने से वह सर्वोपरि विचक्षण है ॥३५॥

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    विषय

    ज्ञाननिष्ठ के अभिषेक के तुल्य आत्मा का स्वच्छ होने का वर्णन।

    भावार्थ

    हे (पवमान) पवित्र एवं ज्ञान में निष्णात होने हारे ! तू (श्येनः न) उत्तम आचार चरित्र वाला, सत्पथगामी होकर (इषम् ऊर्जम् अभि अर्षसि) अन्न, बल और उत्तम इच्छा और पराक्रम को प्राप्त करता है। और (वंसु कलशेषु सीदसि) सेवन योग्य अभिषेक घटों के बीच विराजता है, इधर आत्मा कोशों या नाना देहों में विराजता है (इन्द्रिय) ऐश्वर्यवान् पद के लिये (मद्वा) हर्षकारक, (मदः) स्वयं भी आनन्द प्रसन्न, (सुतः) निष्णात, (दिवः विष्टंभः) प्रकाश के स्तम्भ के सदृश ज्ञानों को धारण करने वाला, (उपमः) सर्वोपमानयोग्य, (विचक्षणः) विविध ज्ञानों का द्रष्टा और उपदेष्टा है। इत्यष्टादशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—१० आकृष्टामाषाः। ११–२० सिकता निवावरी। २१–३० पृश्नयोऽजाः। ३१-४० त्रय ऋषिगणाः। ४१—४५ अत्रिः। ४६–४८ गृत्समदः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:– १, ६, २१, २६, ३३, ४० जगती। २, ७, ८, ११, १२,१७, २०, २३, ३०, ३१, ३४, ३५, ३६, ३८, ३९, ४२, ४४, ४७ विराड् जगती। ३–५, ९, १०, १३, १६, १८, १९, २२, २५, २७, ३२, ३७, ४१, ४६ निचृज्जगती। १४, १५, २८, २९, ४३, ४८ पादनिचृज्जगती। २४ आर्ची जगती। ४५ आर्ची स्वराड् जगती॥

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    विषय

    'दिवो विष्टम्भः, उपमो विचक्षणः'

    पदार्थ

    हे (पवमान) = हमें पवित्र करनेवाले सोम ! तू (इषम्) = प्रभुप्रेरणा व (ऊर्जम्) = बल व प्राणशक्ति की (अभि) = ओर (अर्षसि) = गतिवाला होता है । सोमरक्षण से हम प्रभुप्रेरणा को सुनने योग्य बनते हैं । उस प्रेरणा को क्रियान्वित करने के लिये बल व प्राणशक्ति को प्राप्त करते हैं। (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाले के समान (वंसु) = वासनाओं को पराजित करनेवाले अथवा प्रभु की उपासनावाले [वन्- संभजने] (कलशेषु) = इन शरीर कलशों में (सीदसि) = तू स्थित होता है । (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मद्वा) = अतिशय आनन्द को करनेवाला (मदः) = उल्लास का जनक व (मद्य) = मस्ती को लानेवाला होता है । (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ तू (दिवः विष्टम्भ) = ज्ञान का धारक है, (उपमा) = उपासना द्वारा प्रभु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला है [उपमाति] तथा (विचक्षणः) = विशेषण द्रष्टा है, हमारा ध्यान करनेवाला है । यह सोम ही तो हमारे शरीरों को नीरोग, हृदयों को पवित्र तथा मस्तिष्क को दीप्त बनाता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें प्रभु प्रेरणा को सुननेवाला बल व प्राणशक्तिवाला शंसनीय गतिवाला उल्लासमय ज्ञानधारक बनाता है यह सब प्रकार से हमारा ध्यान करता है ।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, spirit of the cosmos in evolutionary flux, you move food and energy in the process of creative evolution, and like the speediest harbinger of joy you settle in the heart core of devoted celebrants. You are the self-existent joyous and inspiring source of ecstasy for the soul, pillar of the light of heaven, most excellent beyond comparison and all watching omniscient spirit.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्मा द्यु भव इत्यादी लोकांचा आधार आहे व त्याच्याच आधारे चराचर सृष्टीची स्थिती असते व वेद इत्यादी विद्यांचा प्रवक्ता असल्यामुळे तो सर्वांपेक्षा बुद्धिमान आहे. ॥३५॥

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