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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 86/ मन्त्र 27
    ऋषिः - पृश्नयोऽजाः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    अ॒स॒श्चत॑: श॒तधा॑रा अभि॒श्रियो॒ हरिं॑ नव॒न्तेऽव॒ ता उ॑द॒न्युव॑: । क्षिपो॑ मृजन्ति॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑तं तृ॒तीये॑ पृ॒ष्ठे अधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स॒श्चतः॑ । श॒तऽधा॑राः । अ॒भि॒ऽश्रियः॑ । हरि॑म् । न॒व॒न्ते । अव॑ । ताः । उ॒द॒न्युवः॑ । क्षिपः॑ । मृ॒ज॒न्ति॒ । परि॑ । गोभिः॑ । आऽवृ॑तम् । तृ॒तीये॑ । पृ॒ष्ठे । अधि॑ । रो॒च॒ने । दि॒वः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    असश्चत: शतधारा अभिश्रियो हरिं नवन्तेऽव ता उदन्युव: । क्षिपो मृजन्ति परि गोभिरावृतं तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    असश्चतः । शतऽधाराः । अभिऽश्रियः । हरिम् । नवन्ते । अव । ताः । उदन्युवः । क्षिपः । मृजन्ति । परि । गोभिः । आऽवृतम् । तृतीये । पृष्ठे । अधि । रोचने । दिवः ॥ ९.८६.२७

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 86; मन्त्र » 27
    अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 17; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (उदन्युवः) प्रीतेः (ताः) पूर्वोक्ताः (शतधाराः) शतधारा याः (असश्चतः) नानारूपेषु (अभिश्रियः) स्थितिं लभन्ते, ताः (हरिं) परमात्मानं (अव, नवन्ते) प्राप्नुवन्ति (गोभिः, आवृतं) प्रकाशपुञ्जं परमात्मानं (क्षिपः) बुद्धिवृत्तयः (मृजन्ति) विषयं कुर्वन्ति। यः परमात्मा (दिवः, तृतीये, पृष्ठे) द्युलोकस्य तृतीयके पृष्ठे विराजते। अन्यच्च (रोचने) प्रकाशस्वरूपोऽस्ति बुद्धिवृत्तयस्तं प्रकाशयन्ति ॥२७॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (उदन्युवः) प्रेम की (ताः) वे (शतधाराः) सैकड़ों धारायें (असश्चतः) जो नानारूपों में (अभिश्रियः) स्थिति को लाभ कर रही हैं, वे (हरिं) परमात्मा को (अवनवन्ते) प्राप्त होती हैं। (गोभिरावृतं) प्रकाशपुञ्ज परमात्मा को (क्षिपः) बुद्धिवृत्तियें (मृजन्ति) विषय करती हैं। जो परमात्मा (दिवस्तृतीये पृष्ठे) द्युलोक के तीसरे पृष्ट पर विराजमान है और (रोचने) प्रकाशस्वरूप है। उसको बुद्धिवृत्तियें प्रकाशित करती हैं |॥२७॥

    भावार्थ

    द्युलोकादिकों के प्रकाशक परमात्मा को मनुष्य ज्ञान की वृत्तियों से ही साक्षात्कार करता है, अन्यथा नहीं ॥२७॥

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    विषय

    प्रजाओं और सेनाओं द्वारा राजा का अभिषेक। पक्षान्तर में वेदवाणियों से प्रभु की स्तुति और शुद्धजनों से प्रभु की प्राप्ति।

    भावार्थ

    (हरिं) दुःखहारी रक्षक को (अभि श्रियः) उसका आश्रय लेने वाली (असश्चतः) परस्पर असम्बद्ध, स्वतः पृथक् २ (शत- धाराः) सैकड़ों धाराओं के तुल्य, प्रजाएं नाना स्तुतियां करती हुई (उदन्युवः) जल लिये हुए, आदरार्थ (नवन्ते) विनयपूर्वक प्राप्त हों। (दिवः) भूमि या राजसभा के (रोचने) सर्वप्रिय, (तृतीये पृष्ठे) तृतीय, सर्वोत्तम पद पर (गोभिः आवृतम्) वेद-वाणियों से परिष्कृत जल-धाराओं से अभिषिक्त उसको (क्षिपः) शत्रु को उखाड़ फेंकने वाली नाना सेनाएं भी (परि मृजन्ति) सुशोभित और अभिषिक्त करती हैं। इसी प्रकार निःसंग सहस्रों वाणियां और भक्तजन उस प्रभु की स्तुति करते हैं। परम मोक्ष पद में विराजमान उस प्रभु को पापवासनाओं को फेंक देने वाले शुद्ध जन ही प्राप्त करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—१० आकृष्टामाषाः। ११–२० सिकता निवावरी। २१–३० पृश्नयोऽजाः। ३१-४० त्रय ऋषिगणाः। ४१—४५ अत्रिः। ४६–४८ गृत्समदः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:– १, ६, २१, २६, ३३, ४० जगती। २, ७, ८, ११, १२,१७, २०, २३, ३०, ३१, ३४, ३५, ३६, ३८, ३९, ४२, ४४, ४७ विराड् जगती। ३–५, ९, १०, १३, १६, १८, १९, २२, २५, २७, ३२, ३७, ४१, ४६ निचृज्जगती। १४, १५, २८, २९, ४३, ४८ पादनिचृज्जगती। २४ आर्ची जगती। ४५ आर्ची स्वराड् जगती॥

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    विषय

    साधन पञ्चक

    पदार्थ

    (असश्चतः) = [Not defeated or overcome] अपराजित हुई-हुई वासनाओं से अनाक्रान्त (शतधारा:) = शतवर्ष पर्यन्त अपना धारण करनेवाली, (अभिश्रियः) = प्रातः - सायं प्रभु का उपासना करनेवाली [श्रि सेवायाम्] (उदन्युवः) = रेतः कण रूप उदक की कामनावाली (ताः) = वे प्रजायें (हरि:) = इस दुःखहर्ता सोम को अवनवन्ते अन्दर ही अन्दर प्राप्त करती हैं। ये प्रजाएँ सोम को शरीर के अन्दर स्थापित करती हैं । (क्षिपः) = वासनाओं को अपने से परे फेंकनेवाले लोग, (दिवः) = प्रकाश के (अधिरोचने) = खूब दीप्त होनेवाले तृतीये पृष्ठे-तीर्णतम अथवा 'शरीर व हृदय' से ऊपर तीसरे मस्तिष्क के स्थान में [ आधार में] (गोभिः आवृतम्) = ज्ञानरश्मियों से आवृत हुए हुए इस सोम को (परिमृजन्ति) = शुद्ध करते हैं । वस्तुतः सोम परिशुद्धि के लिये आवश्यक है कि हम अपने खाली समय का उपयोग स्वाध्याय में करे। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और इस प्रकार सोम का सदुपयोग हो जाता है। इस सोम के द्वारा हम जीवन में सदा तृतीय भूमिका में निवास करनेवाले बन पाते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- वासनाओं से अनाकान्त होकर, सौ वर्ष तक चलने का संकल्प करके, प्रातः- सायं प्रभु का उपासन करते हुए, सोमरक्षण की प्रबल इच्छावाले बनकर, खाली समय को स्वाध्याय में बिताते हुए हम सोम का रक्षण कर पाते हैं ।

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Those ceaseless, overflowing, bright and extensive showers of adoration in love and homage flowing in a hundred streams reach beatific Soma, light of life. Holy vibrations of mind in faith exalt the lord wrapped in sun-rays abiding in the third and highest region over the bright heaven and enshrine it in the soul. HoWI: -iMpH I

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    द्युलोक इत्यादीचा प्रकाशक असलेल्या परमेश्वराचा ज्ञानवृत्तीने मनुष्य साक्षात्कार करतो, अन्यथा नाही. ॥२७॥

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