ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 86/ मन्त्र 7
ऋषिः - अकृष्टा माषाः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - विराड्जगती
स्वरः - निषादः
य॒ज्ञस्य॑ के॒तुः प॑वते स्वध्व॒रः सोमो॑ दे॒वाना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम् । स॒हस्र॑धार॒: परि॒ कोश॑मर्षति॒ वृषा॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रोरु॑वत् ॥
स्वर सहित पद पाठय॒ज्ञस्य॑ । के॒तुः । प॒व॒ते॒ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रः । सोमः॑ । दे॒वाना॑म् । उप॑ । या॒ति॒ । निः॒ऽकृ॒तम् । स॒हस्र॑ऽधारः॑ । परि॑ । कोश॑म् । अ॒र्ष॒ति॒ । वृषा॑ । प॒वित्र॑म् । अति॑ । ए॒ति॒ । रोरु॑वत् ॥
स्वर रहित मन्त्र
यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम् । सहस्रधार: परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत् ॥
स्वर रहित पद पाठयज्ञस्य । केतुः । पवते । सुऽअध्वरः । सोमः । देवानाम् । उप । याति । निःऽकृतम् । सहस्रऽधारः । परि । कोशम् । अर्षति । वृषा । पवित्रम् । अति । एति । रोरुवत् ॥ ९.८६.७
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 86; मन्त्र » 7
अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 13; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 3; वर्ग » 13; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(यज्ञस्य, केतुः) परमात्मा ज्ञानयज्ञादीनां प्रज्ञापकोऽस्ति। (पवते) सर्वं पुनाति अपि च (स्वध्वरः) शोभनयज्ञकर्ता अस्ति। (सोमः) सोमस्वभावपरमात्मा (देवानां) विदुषां (निष्कृतं) संस्कृतान्यन्तःकरणानि प्राप्नोति। किम्भूतः परमात्मा (सहस्रधारः) अनन्तशक्तिसम्पन्नः (कोशम्) ज्ञानिपुरुष-स्यान्तःकरणं (पर्य्यर्षति) प्राप्नोति। स परमात्मा (पवित्रं) प्रत्येकपवित्रताम् (अत्येति) अतिक्रामति अर्थात् सर्वोपरि पवित्रोऽस्ति। किम्भूतः परमात्मा (वृषा) बलरूपः पुनः किम्भूतः (रोरुवत्) सर्वत्र शब्दायमानोऽस्ति ॥७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यज्ञस्य केतुः) ज्ञानयज्ञ, कर्म्मयज्ञ, ध्यानयज्ञ, योगयज्ञ, इत्यादि यज्ञों का परमात्मा केतु है। (पवते) सबको पवित्र करनेवाला है और (स्वध्वरः) अहिंसाप्रधान यज्ञोंवाला है। (सोमः) वह सोमस्वभाव परमात्मा (देवानां) विद्वानों के (निष्कृतम्) संस्कृत अन्तःकरणों को प्राप्त होता है। (सहस्रधारः) अनन्तशक्तिसम्पन्न है और (कोशम्) ज्ञानीपुरुष के अन्तःकरण को (पर्य्यर्षति) प्राप्त होता है। वह परमात्मा (पवित्रं) प्रत्येक पवित्रता को (अत्येति) अतिक्रमण करता है अर्थात् सर्वोपरि पवित्र है। (वृषा) वह बलस्वरूप है और (रोरुवत्) सर्वत्र शब्दायमान है ॥७॥
भावार्थ
परमात्मा अपनी अनन्तशक्ति से सर्वत्र विराजमान है, यद्यपि वह सर्वत्र विद्यमान है, तथापि उसकी अभिव्यक्ति विद्वानों के अन्तःकरण में ही होती है, अन्यत्र नहीं ॥७॥
विषय
यज्ञमय जगच्चक्र का प्रवर्त्तक प्रभु। उसकी हृदय में प्रतीति।
भावार्थ
(सु-अध्वरः) शोभन मार्ग का उपदेश करने वाला, उत्तम हिंसारहित प्रजापालनरूप यज्ञ का सम्पादक, अन्य किसी से भी पीड़ित न होनेवाला, (यज्ञस्य केतुः) महान् जगन्मय यज्ञचक्र को सूर्यवत् प्रकाशित करने वाला, (सोमः) जगत् का शासक, उत्पादक प्रभु (देवानां निष्कृतम्) समस्त मनुष्यों और प्राणों, पृथिव्यादि लोकों के भी परम स्थान को (उप याति) प्राप्त है। वह (सहस्र-धारः) सहस्रों धारक शक्तियों ज्ञानवाणियों का स्वामी (वृषा) सब सुखों का वर्षक (कोशम् परि अर्शति) आनन्दमय कोश में प्रकट होता है। वही (रोरुवत्) नाद करता हुआ (पवित्रम् एति जाते) परम पवित्र हृदय को प्राप्त होता है।
टिप्पणी
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१—१० आकृष्टामाषाः। ११–२० सिकता निवावरी। २१–३० पृश्नयोऽजाः। ३१-४० त्रय ऋषिगणाः। ४१—४५ अत्रिः। ४६–४८ गृत्समदः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:– १, ६, २१, २६, ३३, ४० जगती। २, ७, ८, ११, १२,१७, २०, २३, ३०, ३१, ३४, ३५, ३६, ३८, ३९, ४२, ४४, ४७ विराड् जगती। ३–५, ९, १०, १३, १६, १८, १९, २२, २५, २७, ३२, ३७, ४१, ४६ निचृज्जगती। १४, १५, २८, २९, ४३, ४८ पादनिचृज्जगती। २४ आर्ची जगती। ४५ आर्ची स्वराड् जगती॥
विषय
'स्वध्वरः - यज्ञस्य केतुः ' सोमः
पदार्थ
(स्वध्वरः) = उत्तम हिंसारहित कार्यों में हमें प्रवृत्त करनेवाला (सोमः) = यह सोम [वीर्यशक्ति] (यज्ञस्य केतुः) = यज्ञों का प्रकाशक होता है, हमारे जीवनों को यज्ञमय बनाता है। यह सोम (देवानाम्) = देववृत्तिवाले पुरुषों के (निष्कृतम्) = संस्कृत हृदयरूप स्थान को (उपयाति) = समीपता से प्राप्त होता है। अर्थात् यह सोम देववृत्तिवाले पुरुषों के जीवन में ही सुरक्षित रहता है। (सहस्त्रधारः) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाला यह सोम (कोशं परिअर्षति) = शरीर के कोशों में चारों ओर प्राप्त होता है। शरीर के सब कोशों को वस्तुतः यह उस उस धन से परिपूर्ण करता है । अन्नमय कोश को यह तेज प्राप्त कराता है, प्राणमय को वीर्य, मनोमय को बल व ओज- विज्ञानमय को ज्ञान प्राप्त कराता हुआ यह आनन्दमय कोश में हमें अद्भुत सहनशक्ति से परिपूर्ण करता है (वृषा) = शक्ति का सेचन करनेवाला यह सोम (रोरुवत्) = प्रभु के स्त्रोतों का उच्चारण करता हुआ, अपने रक्षक को प्रभुभक्त बनाता हुआ, (पवित्रम्) = पवित्र हृदय को (अत्येति) = अतिशयेन प्राप्त होता है। हृदय की पवित्रता ही सोम को शरीर में सुरक्षित रखती है ।
भावार्थ
भावार्थ- सोम हमारे जीवनों को यज्ञमय बनाता हुआ हमारे प्रत्येक कोश को उस-उस धन से परिपूर्ण करता है ।
इंग्लिश (1)
Meaning
Soma is the mark and summit of yajna, ultimate master and prime yajamana of cosmic yajna free from hate and violence and, in love, it radiates to the pure and sanctified heart of the holy celebrants. It moves and manifests in the heart core of the soul in a thousand streams of shower and, generous and potent, it transcends all existential purity and power as absolute bliss.
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वर आपल्या अनंत शक्तीने सर्वत्र विराजमान आहे. जरी तो सर्वत्र विराजमान आहे तरी त्याची अभिव्यक्ती विद्वानांच्या अंत:करणातच होते, अन्यत्र नव्हे. ॥७॥
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