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यजुर्वेद अध्याय - 25

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  • यजुर्वेद - अध्याय 25/ मन्त्र 1
    ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः देवता - सरस्वत्यादयो देवताः छन्दः - भुरिक्छक्वरी, निचृतदतिशक्वरी स्वरः - धैवतः, पञ्चमः
    1067

    शादं॑ द॒द्भिरव॑कां दन्तमू॒लैर्मृदं॒ बर्स्वै॑स्ते॒ गां दष्ट्रा॑भ्या॒सर॑स्वत्याऽअग्रजि॒ह्वं जि॒ह्वाया॑ऽ उत्सा॒दम॑वक्र॒न्देन॒ तालु॒ वाज॒ꣳहनु॑भ्याम॒पऽआ॒स्येन॒ वृष॑णमा॒ण्डाभ्या॑मादि॒त्याँ श्मश्रु॑भिः॒ पन्था॑नं भ्रू॒भ्यां द्यावा॑पृथि॒वी वर्त्तो॑भ्यां वि॒द्युतं॑ क॒नीन॑काभ्या शु॒क्राय॒ स्वाहा॑ कृ॒ष्णाय॒ स्वाहा॒ पार्या॑णि॒ पक्ष्मा॑ण्यवा॒र्याऽइ॒क्षवो॑ऽवा॒र्याणि॒ पक्ष्मा॑णि॒ पार्या॑ इ॒क्षवः॑॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शाद॑म्। द॒द्भिरिति॑ द॒त्ऽभिः। अव॑काम्। द॒न्त॒मू॒लैरिति॑ दन्तऽमू॒लैः। मृद॑म्। बर्स्वैः॑। ते॒। गाम्। दष्ट्रा॑भ्याम्। सर॑स्वत्यै। अ॒ग्र॒जि॒ह्वमित्य॑ग्रऽजि॒ह्वम्। जि॒ह्वायाः॑। उ॒त्सा॒दमित्यु॑त्ऽसा॒दम्। अ॒व॒क्रन्देनेत्य॑वऽक्र॒न्देन॑। तालु॑। वाज॑म्। हनु॑भ्या॒मिति॒ हनु॑ऽभ्याम्। अ॒पः। आ॒स्ये᳖न। वृष॑णम्। आ॒ण्डाभ्या॑म्। आ॒दि॒त्यान्। श्मश्रु॑भि॒रिति॒ श्मश्रु॑ऽभिः। पन्था॑नम्। भ्रू॒भ्याम्। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। वर्त्तो॑भ्या॒मिति॒ वर्त्तः॑ऽभ्याम्। वि॒द्युत॑मिति॒ वि॒ऽद्युत॑म्। क॒नीन॑काभ्याम्। शु॒क्राय॑। स्वाहा॑। कृ॒ष्णाय॑। स्वाहा॑। पार्या॑णि। पक्ष्मा॑णि। अ॒वा॒र्याः᳖। इ॒क्षवः॑। अ॒वा॒र्या᳖णि। पक्ष्मा॑णि। पार्याः॑। इ॒क्षवः॑ ॥१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शादन्दद्भिरवकान्दन्तमूलैर्मृदम्बर्स्वैस्तेगान्दँष्ट्राभ्याढँ सरस्वत्याऽअग्रजिह्वञ्जिह्वायाऽउत्सादमवक्रन्देन तालु वाजँ हनुभ्यामपऽआस्येन वृषणमाण्डाभ्यामात्याँश्मश्रुभिः पन्थानम्भ्रूभ्यान्द्यावापृथिवी वर्ताभ्याँविद्युतङ्कनीनकाभ्याँ शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या इक्षवो वार्याणि पक्ष्माणि पार्या इक्षवः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    शादम्। दद्भिरिति दत्ऽभिः। अवकाम्। दन्तमूलैरिति दन्तऽमूलैः। मृदम्। बर्स्वैः। ते। गाम्। दष्ट्राभ्याम्। सरस्वत्यै। अग्रजिह्वमित्यग्रऽजिह्वम्। जिह्वायाः। उत्सादमित्युत्ऽसादम्। अवक्रन्देनेत्यवऽक्रन्देन। तालु। वाजम्। हनुभ्यामिति हनुऽभ्याम्। अपः। आस्येन। वृषणम्। आण्डाभ्याम्। आदित्यान्। श्मश्रुभिरिति श्मश्रुऽभिः। पन्थानम्। भ्रूभ्याम्। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। वर्त्तोभ्यामिति वर्त्तःऽभ्याम्। विद्युतमिति विऽद्युतम्। कनीनकाभ्याम्। शुक्राय। स्वाहा। कृष्णाय। स्वाहा। पार्याणि। पक्ष्माणि। अवार्याः। इक्षवः। अवार्याणि। पक्ष्माणि। पार्याः। इक्षवः॥१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 25; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ केन किं कर्त्तव्यमित्याह॥

    अन्वयः

    हे जिज्ञासो विद्यार्थिन्! ते दद्भिः शादं दन्तमूलैर्बर्स्वैश्चावकां मृदं दंष्ट्राभ्यां सरस्वत्यै गां जिह्वाया अग्रजिह्वमवक्रन्देनोत्सादं तालु हनुभ्यां वाजमास्येनाऽप आण्डाभ्यां वृषणं श्मश्रुभिरादित्यान् भ्रूभ्यां पन्थानं वर्त्तोभ्यां द्यावापृथिवी कनीनकाभ्यां विद्युतमहं बोधयामि। त्वया शुक्राय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या इक्षवोऽवार्याणि पक्ष्माणि पार्या इक्षवश्च संग्राह्याः॥१॥

    पदार्थः

    (शादम्) शीयते छिनत्ति यस्मिँस्तं शादम् (दद्भिः) दन्तैः (अवकाम्) रक्षिकाम् (दन्तमूलैः) दन्तानां मूलैः (मृदम्) मृत्तिकाम् (बर्स्वैः) दन्तपृष्ठैः (ते) तव (गाम्) वाणीम् (दंष्ट्राभ्याम्) मुखहन्ताभ्याम् (सरस्वत्यै) प्रशस्तविज्ञानवत्यै वाचे (अग्रजिह्वम्) जिह्वाया अग्रम् (जिह्वायाः) (उत्सादम्) ऊर्ध्वं सीदन्ति यस्मिँस्तम् (अवक्रन्देन) विकलतारहितेन (तालु) आस्यावयवम् (वाजम्) अन्नम् (हनुभ्याम्) मुखैकदेशाभ्याम् (अपः) जलानि (आस्येन) आस्यन्दन्ति क्लेदीभवन्ति यस्मिंस्तेन (वृषणम्) वर्षयितारम् (आण्डाभ्याम्) वीर्याधाराभ्याम् (आदित्यान्) मुख्यान् विदुषः (श्मश्रुभिः) मुखाऽभितः केशैः (पन्थानम्) मार्गम् (भ्रूभ्याम्) नेत्रगोलकोर्ध्वाऽवयवाभ्याम् (द्यावापृथिवी) सूर्यभूमी (वर्त्तोभ्याम्) गमनागमनाभ्याम् (विद्युतम्) तडितम् (कनीनकाभ्याम्) तेजोमयाभ्यां कृष्णागोलकतारकाभ्याम् (शुक्राय) वीर्याय (स्वाहा) ब्रह्मचर्यक्रियया (कृष्णाय) विद्याकर्षणाय (स्वाहा) सुशीलतायुक्तया क्रियया (पार्याणि) परितुं पूरयितुं योग्यानि (पक्ष्माणि) परिग्रहीतुं योग्यानि कर्माणि नेत्रोर्ध्वलोमानि वा (अवार्याः) अवारे भवाः (इक्षवः) इक्षुदण्डाः (अवार्याणि) अवारेषु भवानि (पक्ष्माणि) परिग्रहणानि लोमानि वा (पार्याः) परितुं पालयितुं योग्याः (इक्षवः) गुडादिनिमित्ताः॥१॥

    भावार्थः

    अध्यापकाः शिष्याणामङ्गान्युपदेशेन पुष्टानि कृत्वाऽऽहारविहारादिकं संबोध्य सर्वा विद्याः प्रापय्याखण्डितं ब्रह्मचर्यं सेवयित्वैश्वर्यं प्रापय्य सुखिनः सम्पादयेयुः॥१॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब पच्चीसवें अध्याय का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में किसको क्या करना चाहिये, इस विषय को कहा है॥

    पदार्थ

    हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए विद्यार्थी जन! (ते) तेरे (दद्भिः) दांतों से (शादम्) जिस में छेदन करता है, उस व्यवहार को (दन्तमूलैः) दांतों की जड़ों और (बर्स्वैः) दांतों की पछाडि़यों से (अवकाम्) रक्षा करने वाली (मृदम्) मट्टी को (दंष्ट्राभ्याम्) डाढ़ों से (सरस्वत्यै) विशेष ज्ञान वाली वाणी के लिये (गाम्) वाणी को (जिह्वायाः) जीभ से (अग्रजिह्वम्) जीभ के अगले भाग को (अवक्रन्देन) विकलतारहित व्यवहार से (उत्सादम्) जिसमें ऊपर को स्थिर होती है, उस (तालु) को (हनुभ्याम्) ठोढ़ी के पास के भागों से (वाजम्) अन्न को (आस्येन) जिससे भोजन आदि पदार्थ को गीला करते उस मुख से (अपः) जलों को (आण्डाभ्याम्) वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे आण्डों से (वृषणम्) वीर्य वर्षाने वाले अङ्ग को (श्मश्रुभिः) मुख के चारों ओर जो केश अर्थात् दाढ़ी उससे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को (भ्रूभ्याम्) नेत्र-गोलकों के ऊपर जो भौंहे हैं, उन से (पन्थानम्) मार्ग को (वर्त्तोभ्याम्) जाने-आने से (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि तथा (कनीनकाभ्याम्) तेज से भरे हुए काले नेत्रों के तारों के सदृश गोलों से (विद्युतम्) बिजुली को मैं समझाता हूँ। तुझ को (शुक्राय) वीर्य के लिये (स्वाहा) ब्रह्मचर्य क्रिया से और (कृष्णाय) विद्या खींचने के लिये (स्वाहा) सुन्दरशीलयुक्त क्रिया से (पार्याणि) पूरे करने योग्य (पक्ष्माणि) जो सब ओर से लेने चाहिये, उन कामों वा पलकों के ऊपर के विन्ने वा (अवार्याः) नदी आदि के प्रथम ओर होने वाले (इक्षवः) गन्नों के पौंडे वा (अवार्याणि) नदी आदि के पहिले किनारे पर होने वाले पदार्थ (पक्ष्माणि) सब ओर से जिनका ग्रहण करें वा लोम और (पार्याः) पालना करने योग्य (इक्षवः) ऊख, जो गुड़ आदि के निमित्त हैं, वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहियें॥१॥

    भावार्थ

    अध्यापक लोग अपने शिष्यों के अङ्गों को उपदेश से अच्छे प्रकार पुष्ट कर तथा आहार वा विहार का अच्छा बोध, समस्त विद्याओं की प्राप्ति, अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन और ऐश्वर्य की प्राप्ति करा के सुखयुक्त करें॥१॥

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    विषय

    नाना प्रकार के शिल्पों तथा गुणों और रहस्यमय पदार्थों के ज्ञान के लिये शरीरगत अंगों का दृष्टान्तरूप से उल्लेख ।

    भावार्थ

    (शादं दद्भिः) काटने की क्रिया को दांतों से सीखो । (दन्त- मूलैः) दांतों के मूल भागों से ( अवकाम् ) रक्षा करने की विधि का प्रयोग सीखें । (बर्स्वैः मृदम्) दांतों के पृष्ठ- भागों से मर्दन करने की क्रिया सीखें कि वे चबाये पदार्थ को कैसे मसलते हैं । ( दंष्ट्राभ्यां गाम् ) दाढ़ों से तीक्ष्णता का ज्ञान करें । ( सरस्वत्यै अग्रजिह्वम् ) सरस्वती, शुद्ध वाणी के उच्चारण के लिये जिह्वा के अग्रभाग का उपयोग करें। (जिह्वायाः) जीभ से ( उत्सादम् ) उखाड़ने के व्यापार की शिक्षा लो । वह चतुरता से दांतों में फंसे अन्नादि के अंशों को कैसे उखाड़ती है । (अवक्रन्देन तालुं) नीचे शब्द के प्रयोग से (तालु) तालु का प्रयोग सीखो । ( हनुभ्यामवाजम् ) दोनों जवाड़ों से बल की शिक्षा लो, वे वस्तु को कैसी दृढ़ता से पकड़ते हैं । (आस्येन अपः) मुख से जलों के प्रकट होने का विज्ञान देखो, किस प्रकार मुख में लगी ग्रन्थियों से जल छूटता है और नित्य सदा मुख जल से गीला रहता है । ( आण्डाभ्याम् वृषणम् ) अण्डकोषों से वीर्य सेचन का ज्ञान प्राप्त करो । ( श्मश्रुभिः) दाढ़ी मोंछ के बालों से (आदित्यान् ) आदित्य ब्रह्मचारियों को पहिचानो, अथवा दाढ़ी मोंछे के बालों से सूर्य की किरणों को जानो । अर्थात् मुख पर दाढ़ी मोंछे सूर्यविम्ब के चारों ओर उससे निकलने वाली किरणों के समान हैं, ( भ्रूभ्याम् पन्थानम् ) भौंहों से मार्ग को जानो, जैसे नाक पर दो भौहें एक दूसरे के विपरीत दिशा में लगी हैं जैसे भिन्न-भिन्न दिशा में गये मार्गों को सूचित करें । अथवा (भ्रूभ्याम् ) भौंहों के इशारे से ही ( पन्थानम् ) जाने योग्य मार्ग को समझो | बुद्धिमान् को इशारों से ही अपनी कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य जानना चाहिये । ( वत्तभ्यां द्यावापृथिवी ) ऊपर नीचे की पलकों से आकाश और पृथिवी को जाने। जैसे दो पलके ऊपर नीचे हैं वे चक्षु को अपने भीतर लिये हैं उसी प्रकार आकाश ऊपर और पृथिवी नीचे वे दोनों दो पलकों के समान सूर्य रूप तेज को अपने भीतर धारण करती हैं । ( कनीनकाभ्याम् ) आंख की पुतलियों से ( विद्युतम् ) या विशेष द्युतिमय सूर्य को समझो । पलकों के बीच की पुतली आकाश और भूमि के बीच विशेष तेजस्वी सूर्यवत् है । (शुक्लाय स्वाहा ) आंख के शुक्ल भाग का भी ज्ञान करो और (कृष्णाय स्वाहा) कृष्ण भाग का भी ज्ञान करो । वे दोनों दिन और रात्रि के प्रकाश और अन्धकार के समान चक्षु के तेज के रक्षक हैं । (पक्ष्माणि) पलकों पर के लोम (पार्याणि) नदी के परले तट पर लगे कासों के समान हैं । (इक्षवः) नीचे की पलकों के लोम (अवार्याणि) मानो इस तीर के कासों के समान हैं । अथवा (पक्ष्माणि) स्वीकार करने योग्य वस्तु (पार्याणि) पालन करने योग्य हैं । (इक्षवः) इच्छानुकूल पदार्थ (अवार्याणि) वारण नहीं करने चाहिये । और इसी प्रकार ( पक्ष्माणि अवार्याणि) अपने पक्ष के, ग्रहण योग्यों को तिरस्कार न किया जाय । (इक्षवः पार्या) इष्ट सम्बन्धियों को पालन करना चाहिये । (२) इस मन्त्र में राष्ट्र की मनुष्य के मुंह से तुलना भी है । जैसे (शादं दद्भिः) 'शाद' अर्थात् छेदन करने वाले शस्त्र बल की दांतों से तुलना करो । ( अवकां) शैवाल को दन्तमूलों से तुलना करो। अथवा काटने वाले हथियारों की दांतों से । राष्ट्र की रक्षा करने वाली सेना को दांतों के मूलों के तुल्य मानो । (तेगां दंष्ट्राभ्याम् ) तीक्ष्ण शस्त्र की दाढ़ों से, ( सरस्वत्या अग्रजिह्नम् ) सरस्वती या विद्वसमिति से मुखस्थ जीभ की और ( जिह्वायाः उत्सादम् ) मुख में लगी जीभ की राष्ट्र में शत्रु को उखाड़ देने की शक्ति से तुलना करो । (अवक्रन्देन) शत्रु को ललकारने वाले या दबाने वाले बल से (तालु) तालु की जैसे भोज्य पदार्थ को तालु दबा लेता है उसी प्रकार राजा भोग्य राष्ट्र को दबाकर भोग करे । ( वाजं हनुभ्याम् ) राष्ट्र के बल वीर्य की मुख के जबाड़ों से । (अप: आस्येन) राष्ट्र में स्थिर जलों की (आस्येन) गीले मुख से, अथवा (अप: आस्येन) प्रजाओं की समस्त खाने वाले मुख से तुलना करो । ( वृषणम् आण्डाभ्याम् ) शरीर में स्थित अण्डकोशों से वर्षा करने वाले मेघ की, (आदित्यान् श्मश्रुभिः) सूर्य की किरणों की मुख के मूंछ दाढी से, ( पन्थानं भ्रूभ्याम् ) राष्ट्र में बने मार्ग की मुख पर लगी भौंहों से, (वत्तभ्यां द्यावापृथिवी) दो पलकों से आकाश और पृथिवी की और (विद्युतं कनीनकाभ्याम् ) आकाश पृथिवी के बीच स्थित विशेष कान्तिवाले सूर्य या विद्युत् की आंखों की पुतलियों से, तुलना करो। (शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा, शुक्रेन शुकुं सुष्ठु आह । कृष्णेन कृष्णं सुष्ठु उच्यते । अथवा, शुक्कुः शुक्लं स्वम् उपमानमाह कृष्णः कृष्णं स्वम् उपमानम् आह) आंख के श्वेत भाग और कृष्ण भाग के लिये भी दिन और रात्रि के शुक्ल और कृष्ण, प्रकाश और अन्धकार दोनों की उत्तम रीति से तुलना करों । ( पक्ष्माणि पार्याणि) ऊपर के पलक के लोम राष्ट्र के पालन करने वाले अथवा दूर देश वासी जन के समान हैं । और (इक्षवः) निचली पलक के रोम (अवार्याणि) समीप के प्रान्तों के वासी जनों के समान हैं । अथवा इससे विपरीत ( पक्ष्माणि भवार्याणि पार्या इक्षवः) ऊपर की पलकों के लोम पास के प्रान्तों की प्रजा और नीचे के पलक के रोम दूर के प्रान्तों की प्रजा के समान हैं ।

    टिप्पणी

    १ - शांद दद्भिरित्यारभ्य पृथिवीं त्वचा [ २५ । ] इत्यन्तः संहिता भागो ब्राह्मणं न मन्त्राः इति महीधरः ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सरस्वत्यादयः । ( १ ) भुरिक शक्वरी ( २ ) निचृदतिशक्वरी । धैवतः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    अध्यापकांनी आपल्या शिष्यांना शरीरासंबंधी उपदेश करून चांगले बलवान बनवावे व आहारविहाराबाबत माहिती द्यावी. संपूर्ण विद्यार्थी प्राप्ती, अखंड ब्रह्मचर्यपालन व ऐश्वर्यप्राप्ती करून द्यावी व सुखी करावे.

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    विषय

    आता 25 व्या अध्यायाचा आरंभ होत आहे. या अध्यायाच्या पहिल्या मंत्रात कोणी काय करावे, या - विषयी वर्णन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे सत्य आणि उत्तम ज्ञानाची कामना करणार्‍या शिष्या (मी, तुझा अध्यापक तुला शारीरिक स्वच्छते विषयी तसेच शरीराच्या त्या त्या अवयवापासून ते ते लाभ कसे घ्यावेत, विषयी सांगत आहे) हे विद्यार्थी, तू (ते) तुझ्या (दद्भिः) दातांनी (शादम्) चर्वण, छेदन आदी कामे घेत जा. (दन्तमूलैः) दातांच्या मुळाचे (हिरड्यांना आणि (बर्स्वैः) दातांच्या मागील वा आतील भागांचे (अवकाम्) रक्षण करणार्‍या (मृदम्) माटीचा (मंजनाचा) (वापर करीत जा) (दष्ट्राभ्याम्) दाढापासून (सरस्वत्यै) विशेष ज्ञानपूर्ण वाणी (बोलण्यासाठी) (गाय्) वाणीचा (अभ्यास करीत जा-दंत्यवर्णाचे शुद्धपणे उच्चारण करणे शिक) (जिह्वायाः) जिभेच्या मुळा पासून (अग्रजिह्वम्) जिभेच्या अग्र भागापर्यंत (अवक्रन्देन) शुद्ध व अविकल कोम (उच्चारण, स्वादसेवन आदी) (कामे घेत जा.) (उत्सादम्) ज्या मुखातील वरच्या भागात जिव्हा स्थिर होते, त्या (तालु) टाळू द्वारे (हनुभ्याम्) आणि हनुवटी जवळील भागाद्वारे (वाजम्) अन्न चर्वण आदी क्रिया शिक. (आस्येन) ज्या भागात भोगनाला चावून मऊ आणि ओले केले जाते, त्या मुखाद्वारे (अपः) जल पीत जा (अण्डाभ्याम्) वीर्यधारणश करणार्‍या अंडकोषाद्वारे (वृषणाम्) वीर्यसेवन करणार्‍या अवयवाला (पुरूषेन्द्रियाला) (सशक्त कर) तसेच (श्मश्रुभिः) मुखाच्या भोवती जे केस म्हणजे दाढी-मिशा आहेत, त्यांच्याद्वारे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानांना (दाढी-मिशा धारण करणार्‍या ज्ञानवृद्ध, वयोवृद्ध विद्वानांना) योग्य मान-आदर देत जा) (भ्रूभ्याम्) नेत्रांच्या वरील भागात ज्या भुवया आहेत, त्याद्वारे ज्यावर तू चालतोस तो मार्ग नीट पाहत जा) (वर्तोभ्याम्) येणार्‍या जाणार्‍या वा फिरणार्‍या वा नेत्रांद्वारे (पन्थानम्) (द्यावापृथिवी) सूर्य आणि भूमी तसेच (कनीनकाभ्याम्) वार्‍याप्रमाणे तेजस्वी असलेल्या दोन नेत्रगोलकांद्वारे (विद्युतम्) विद्युतशक्तीला ओळखत जा. हे सर्व ज्ञान मी तुला शिकवीत आहे. मी तुला सांगत आहे की (शुक्राय) वीर्य वृद्धीसाठी (स्वाहा) ब्रह्मचर्यपालन कर (कृष्णाय) विद्या आकर्षित म्हणजे अवगत करण्यासाठी (स्वाहा) सुंदर सुशील आचरण करीत जा. तसेच तू (पार्याणि) पूर्ण करण्यास योग्य वा ठरविलेल्या कार्यासाठी (पक्ष्माणि) सर्व दिशांकडून घेण्यास योग्य कामांसाठी वा पापणीवरच्या संवर्धनासाठी केसांसाठी (यत्नकर) (अवार्याः) सर्वप्रथम नदीतटावर उगवणार्‍या (इक्षवः) ऊसासाठी (यत्नकर) (अवार्याणि) नदीतटावर सर्वप्रथम उगवणारे (पक्ष्माणि) सर्वोपयोगी पदार्थ अथवा अंगावरील लोभ-संवर्धन क्रिया, तसेच (पार्या) रक्षण व संग्रह करण्यास योग्य (इक्षवः) ऊस, गूळ आदी पदार्थ आहेत, त्या पदार्थांचा, हे शिष्या, तू संग्रह करत जा. ॥1॥

    भावार्थ

    भावार्थ - अध्यापकांनी आपल्या शिष्यांना शरीर अवयवांच्या स्वच्छते विषयी, पुष्टीवर्धनाविषयी नेहमी उपदेश करावा. त्यांना आहार-विहार संबंधी मार्गदर्शन करावे, त्यांना समस्त विद्या सुखी करावे. ॥1॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Learn from teeth the act of biting; from gums the method of protection ; from tooth-sockets the way of pounding; sharpness from fangs. Use the tongue-tip for a learned utterance ; learn the act of uprooting from the tongue , the use of palate by crying slowly ; chew food with both the jaws ; drink waters with the mouth. Acquire the knowledge of oozing semen from testicles. Recognise the Aditya Brahmcharis from their beard ; know the path from eyebrows ; know the Sun and Earth from their motion ; lightning from the pupils of eyes. Observe celibacy for the protection of semen, acquire knowledge through high character. Objects worth acceptance are worthy of preservation. Objects after ones desire should not be resisted. Dont show disrespect to your own men. Friends and relatives should be fostered.

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    Meaning

    By the teeth, test the efficiency of chewing and the texture of food, the strength of the teeth by the roots and gums, the protective enamel by the cavities, biting force by the fangs, the ease and elegance of speech by the fluent sweetness and suppleness of the tongue at the tip, the palate by the roll of the voice, the sweetness and energy by the action of the jaws, the deliciousness of drinks by the mouth, the maturity of manhood by the scrotum, the roll of years of maturity by the beard and moustache, the paths and manners of living by the eyebrows, the sense of heaven and earth by the orbits of movement, the inner light and energy by the pupils of the eyes. For the perfection of brahmacharya observe sexual and mental discipline. For the completion of the acquisition of knowledge observe the discipline of study. The actions for going across the river of life are indispensable like the lovely sugar-cane at hand this side of the river. And the actions this side of the river of life too must be like the lovely sugar-cane across the river.

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    Translation

    Fresh hard fruits are for teeth, the soft ripe fruit for the jaws, very soft foods for gums, the hard nuts for the molars; the forepart of the tongue is for speech, the root of the tongue for tasting, the palates for shouting, the food is related to the two jaws, the water to the mouth, the fertility to the testicles, the beards to the old sages. The path is associated with eye-brows, the heaven and earth with eye-lashes and the lightning with the pupils of eyes. Let it be dedicated to the white; let it be dedicated to the black. Effectual are the upper eye-lashes and irresistible are the lower eye-lashes; irresistible are the upper eye-lashes and effectual are the lower eye-lashes. (1)

    Notes

    Agrajihvam, forepart of the tongue. Utsādam, the root (of the tongue). Avakranda, shouting; crying. Apa, water. Vṛṣaṇam, fertility. Vartobhyām, with the two eye-lashes. Pāryāņi, effectual. Avāryāṇi, irresistible. Pakṣmāṇi, नेत्रोपरिलोमानि, upper eye-lashes. Ikşhavaḥ, नेत्रोधोभागरोमाणि, lower eye-lashes.

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    बंगाली (1)

    विषय

    ॥ ও৩ম্ ॥
    অথ পঞ্চবিংশোऽধ্যায় আরভ্যতে
    ও৩ম্ বিশ্বা॑নি দেব সবিতর্দুরি॒তানি॒ পরা॑ সুব । য়দ্ভ॒দ্রং তন্ন॒ऽআ সু॑ব ॥ য়জুঃ৩০.৩ ॥
    অথ কেন কিং কর্ত্তব্যমিত্যাহ ॥
    এখন পঁচিশতম অধ্যায়ের আরম্ভ । ইহার প্রথম মন্ত্রে কাহাকে কী করা উচিত এই বিষয়কে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে উত্তম জ্ঞানাকাঙ্ক্ষী বিদ্যার্থীগণ! (তে) (দদ্ভিঃ) দাঁত দ্বারা (শাদম্) যাহাতে ছেদন করে সেই ব্যবহারকে (দন্তমূলৈঃ) দন্তমূল এবং (বসৈ্র্্বঃ) দন্তপৃষ্ঠ দ্বারা (অবকাম্) রক্ষাকারিণী (মৃদম্) মৃত্তিকাকে (দংষ্ট্রাভ্যাম্) মাড়ি দ্বারা (সরস্বত্যৈ) বিশেষ জ্ঞান যুক্তা বাণীর জন্য (গাম্) বাণীকে (জিহ্বায়াঃ) জিহ্বা দ্বারা (অগ্রজিহ্বম্) জিহ্বার অগ্রভাগকে (অবক্রন্দেন) বিকলতারহিত ব্যবহার দ্বারা (উৎসাদম্) যাহাতে উপরে স্থিত হয় সেই (তালু) তালুকে (হনুভ্যাম্) চিবুকের পার্শ্বের ভাগ দ্বারা (বাজম্) অন্নকে (আস্যেন) যদ্দ্বারা ভোজনাদি পদার্থকে আর্দ্র করিতে সেই মুখ দ্বারা (অপঃ) জলকে (আন্ডাভ্যাম্) বীর্য্যকে উত্তম প্রকার ধারণকারী অন্ড দ্বারা (বৃষণম্) বীর্য বর্ষণকারী অঙ্গকে (শ্মশ্রুভিঃ) মুখের চারিদিকে যে কেশ অর্থাৎ শ্বশ্রু তদ্দ্বারা (আদিত্যান্) মুখ্য বিদ্বান্দিগকে (ভ্রূভ্যাম্) নেত্র-গোলকের উপর যে ভ্রূ তদ্দ্বারা (পন্থানাম্) মার্গকে (বর্ত্তোভ্যাম্) যাতায়াতের দ্বারা (দ্যাবাপৃথিবী) সূর্য্য ও ভূমি তথা (কণীনকাভ্যাম্) তেজপূর্ণ কৃষ্ণ নেত্র গোলক তারকাগুলির দ্বারা (বিদ্যুতম্) বিদ্যুৎকে আমি বুঝি । তোমাকে (শুক্রায়) বীর্য্যের জন্য (স্বাহা) ব্রহ্মচর্য্য ক্রিয়া দ্বারা এবং (কৃষ্ণায়) বিদ্যা আকর্ষণ করিবার জন্য (স্বাহা) সুন্দর শীলযুক্ত ক্রিয়া দ্বারা (পার্য়াণি) পূর্ণ করিবার যোগ্য (পক্ষ্মাণি) যাহা সব দিক দিয়া গ্রহণ করা উচিত সেই সব কর্ম্ম অথবা নেত্রোর্ধ্বলোম সমূহ অথবা (অবার্য়াঃ) নদী আদির প্রথম দিকে হওয়ার (ইক্ষবঃ) ইক্ষুদন্ডগুলি অথবা (অবার্য়াণি) নদী আদির প্রথম তীরে জায়মান পদার্থ (পক্ষ্মাণি) সকল দিক্ দিয়া যাহার পরিগ্রহণ করিবে অথবা লোমাদি এবং (পার্য়াঃ) পালন করিবার যোগ্য (ইক্ষবঃ) ইক্ষু যাহা গুড়াদির নিমিত্ত সেই সব পদার্থ উত্তম প্রকার গ্রহণ করা উচিত ॥ ১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–অধ্যাপকগণ নিজের শিষ্যদিগের অঙ্গ সকলকে উপদেশ দ্বারা উত্তম প্রকার পুষ্ট করিয়া তথা আহার-বিহারের উত্তম বোধ, সমস্ত বিদ্যাসকলের প্রাপ্তি, অখণ্ডিত ব্রহ্মচর্য্যের সেবন এবং ঐশ্বর্য্যের প্রাপ্তি করাইয়া সুখযুক্ত করিবে ॥ ১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    শাদং॑ দ॒দ্ভিরব॑কাং দন্তমূ॒লৈমৃর্দং॒ বর্স্বৈ॑স্তে॒ গাং দᳬंষ্ট্রা॑ভ্যা॒ᳬं সর॑স্বত্যাऽঅগ্রজি॒হ্বং জি॒হ্বায়া॑ऽ উৎসা॒দম॑বক্র॒ন্দেন॒ তালু॒ বাজ॒ꣳ হনু॑ভ্যাম॒পऽআ॒স্যে᳖ন॒ বৃষ॑ণমা॒ণ্ডাভ্যা॑মাদি॒ত্যাঁ শ্মশ্রু॑ভিঃ॒ পন্থা॑নং ভ্রূ॒ভ্যাং দ্যাবা॑পৃথি॒বী বর্ত্তো॑ভ্যাং বি॒দ্যুতং॑ ক॒নীন॑কাভ্যাᳬं শু॒ক্রায়॒ স্বাহা॑ কৃ॒ষ্ণায়॒ স্বাহা॒ পার্য়া॑ণি॒ পক্ষ্মা॑ণ্যবা॒র্য়া᳖ऽই॒ক্ষবো॑ऽবা॒র্য়া᳖ণি॒ পক্ষ্মা॑ণি॒ পার্য়া॑ ই॒ক্ষবঃ॑ ॥ ১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    শাদমিত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । সরস্বত্যাদয়ো দেবতাঃ । পূর্বস্য ভুরিক্ছক্বরী ছন্দঃ । ধৈবতঃ স্বরঃ । আদিত্যানিত্যুত্তরস্য নিচৃদতিশক্বরী ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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