यजुर्वेद - अध्याय 25/ मन्त्र 15
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - विद्वांसो देवता
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
141
दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वाना॑ रा॒तिर॒भि नो॒ निव॑र्त्तताम्।दे॒वाना॑ स॒ख्यमुप॑सेदिमा व॒यं दे॒वा न॒ऽआयुः॒ प्रति॑रन्तु जी॒वसे॑॥१५॥
स्वर सहित पद पाठदे॒वाना॑म्। भ॒द्रा। सु॒म॒तिरिति॑ सुऽम॒तिः। ऋ॒जूय॒ताम्। ऋ॒जु॒य॒तामित्यृ॑जुऽय॒ताम्। दे॒वाना॑म्। रा॒तिः। अ॒भि। नः॒। नि। व॒र्त्त॒ता॒म्। दे॒वाना॑म्। स॒ख्यम्। उप॑। से॒दि॒म॒। आ। व॒यम्। दे॒वाः। नः॒। आयुः॑। प्र। ति॒र॒न्तु॒। जी॒वसे॑ ॥१५ ॥
स्वर रहित मन्त्र
देवानाम्भद्रा सुमतिरृजूयतान्देवानाँ रातिरभि नो नि वर्तताम् । देवानाँ सख्यमुपसेदिमा वयन्देवा नऽआयुः प्रतिरन्तु जीवसे ॥
स्वर रहित पद पाठ
देवानाम्। भद्रा। सुमतिरिति सुऽमतिः। ऋजूयताम्। ऋजुयतामित्यृजुऽयताम्। देवानाम्। रातिः। अभि। नः। नि। वर्त्तताम्। देवानाम्। सख्यम्। उप। सेदिम। आ। वयम्। देवाः। नः। आयुः। प्र। तिरन्तु। जीवसे॥१५॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यथा देवानां भद्रा सुमतिरस्मानृजूयतां देवानां रातिर्नोऽस्मानभिनिवर्त्ततां वयं देवानां सख्यमुपासेदिम देवा नो जीवस आयुः प्रतिरन्तु तथा युष्मान् प्रतिवर्त्तन्ताम्॥१५॥
पदार्थः
(देवानाम्) विदुषाम् (भद्रा) कल्याणकारी (सुमतिः) शोभना प्रज्ञा (ऋजूयताम्) सरलीकुर्वताम् (देवानाम्) दातॄणाम् (रातिः) विद्यादिदानम् (अभि) सर्वतः (नः) अस्मान् (नि) (वर्त्तताम्) (देवानाम्) विदुषाम् (सख्यम्) मित्रत्वम् (उप) (सेदिम) प्राप्नुयाम (आ) (वयम्) (देवाः) विद्वांसः (नः) अस्माकम् (आयुः) प्राणधारणम् (प्र) (तिरन्तु) पूर्णं भोजयन्तु (जीवसे) जीवितुम्॥१५॥
भावार्थः
सर्वैर्मनुष्यैराप्तानां विदुषां सकाशात् प्रज्ञाः प्राप्य ब्रह्मचर्येणायुः संवर्ध्य सदैव धार्मिकैः सह मित्रता रक्षणीया॥१५॥
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ॥
सपदार्थान्वयः
हे मनुष्या यथा देवानां भद्रा सुमतिरस्मानृजूयतां देवानां रातिर्नोऽस्मानभिनिवर्त्ततां वयं देवानां सख्यमुपसेदिम देवा नो जीवस आयुः प्रतिरन्तु तथा युष्मान्प्रतिवर्त्तन्ताम् ॥ १५ ॥ सपदार्थान्वयः-हे मनुष्याः ! यथादेवानां विदुषां भद्रा कल्याणकरी सुमतिः शोभना प्रज्ञा अस्मानृजूयतां सरलीकुर्वताम्, देवानां दातॄणां रातिः विद्यादिदानं नः अस्मान् अभि+निवर्त्ततां सर्वतः [निवर्त्तताम्], वयं देवानां विदुषां सख्यं मित्रत्वम् उप+आ+सेदिम प्राप्नुयाम, देवाःविद्वांसः नः अस्माकं जीवसे जीवितुम् आयु:=प्राणधारणं प्रतिरन्तु पूर्णं भोजयन्तु; तथा युष्मान्प्रतिवर्त्तन्ताम्॥ २५ । १५ ॥
पदार्थः
(देवानाम्) विदुषाम् (भद्रा) कल्याणकरी (सुमतिः) शोभना प्रज्ञा (ऋजूयताम्) सरलीकुर्वताम् (देवानाम्) दातॄणाम् (राति:) विद्यादिदानम् (अभि) सर्वत: (न:) अस्मान् (नि) (वर्त्तताम्) (देवानाम्) विदुषाम् (सख्यम्) मित्रत्वम् (उप) (सेदिम) प्राप्नुयाम (आ) (वयम्) (देवाः) विद्वांसः (न:) अस्माकम् (आयु:) प्राणधारणम् (प्र) (तिरन्तु) पूर्णं भोजयन्तु (जीवसे) जीवितुम् ॥ १५॥
भावार्थः
सर्वैर्मनुष्यैराप्तानांसकाशात् प्रज्ञाः प्राप्य, ब्रह्मचर्येणायुः संवर्ध्य सदैव धार्मिकै: सह मित्रता रक्षणीया ॥ २५ । १५ ॥
विशेषः
प्रजापतिः । विद्वांसः=स्पष्टम् । जगती । निषादः ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जैसे (देवानाम्) विद्वानों की (भद्रा) कल्याण करने वाली (सुमतिः) उत्तम बुद्धि हम लोगों को और (ऋजूयताम्) कठिन विषयों को सरल करते हुए (देवानाम्) देने वाले विद्वानों का (रातिः) विद्या आदि पदार्थों का देना (नः) हम लोगों को (अभि, नि, वर्त्तताम्) सब ओर से सिद्ध करे, सब गुणों से पूर्ण करे (वयम्) हम लोग (देवानाम्) विद्वानों की (सख्यम्) मित्रता को (उपा, सेदिम) अच्छे प्रकार पावें (देवाः) विद्वान् (नः) हम को (जीवसे) जीने के लिये (आयुः) जिस से प्राण का धारण होता, उस आयुर्दा को (प्र, तिरन्तु) पूरी भुगावें, वैसे तुम्हारे प्रति वर्त्ताव रक्खें॥१५॥
भावार्थ
सब मनुष्यों को चाहिये कि पूर्ण शास्त्रवेत्ता विद्वानों के समीप से उत्तम बुद्धियों को पाकर ब्रह्मचर्य आश्रम से आयु को बढ़ा के सदैव धार्मिक जनों के साथ मित्रता रक्खें॥१५॥
विषय
विद्वानों से प्रार्थना ।
भावार्थ
( देवानाम् ) विद्वान्, विद्या के दाता, ज्ञानप्रकाशक पुरुषों की (भद्रा ) कल्याणकारिणी, सुखप्रद, (सुमतिः) उत्तम ज्ञानमयी, शुभ मति, (नः) हमें ( नि वर्त्तताम् ) सब प्रकार से प्राप्त हो । और (ऋजूयताम् ) सरल, धर्म के भागों से जाने वाले सबकी वृद्धि की कामना करने वाले, ( देवानाम् ) और दानशील विद्वान् पुरुषों के (रातिः) ज्ञान और धन के दान (नः) हमें ( अभि नि वर्त्तताम् ) सब ओर से प्राप्त हों । ( वयम् ) हम ( देवानां सख्यम् ) विद्वानों के मित्रभाव को ( उप सेदिम) प्राप्त हों। (देवाः) विद्वान् पुरुष (जीवसे) दीर्घ जीवन के लिये (आयुः प्रतिरन्तु) आयु की वृद्धि करें ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विद्वांसः । जगती । निषादः ॥
विषय
मनुष्य किस की इच्छा करें, यह फिर उपदेश किया है॥
भाषार्थ
हे मनुष्यो! जैसे--(देवानाम्) विद्वानों की (भद्रा) कल्याणकारी (सुमतिः) उत्तम प्रज्ञा, हमें प्राप्त हो; और (ऋजूयताम्) सरल व्यवहार करने वाले (देवानाम्) दाता विद्वानों का (रातिः) विद्या आदि दान (नः) हमें (अभि+निवर्त्तताम्) सब ओर से प्राप्त हो; हम (देवानाम्) विद्वानों की (सख्यम्) मित्रता को (उप+आ+सेदिम) प्राप्त करें; (देवाः) विद्वान् लोग (नः) हमारे (जीवसे) जीवन के लिए (आयु:) आयु को (प्रतिरन्तु) पूर्ण भोगें, वैसा तुम्हारे प्रति वर्त्ताव करें ॥ २५ । १५ ॥
भावार्थ
सब मनुष्य आप्त विद्वानों से प्रज्ञा को प्राप्त करके, ब्रह्मचर्य से आयु को बढ़ाकर सदैव धार्मिकों के साथ मित्रता रखें ॥ २५ । १५ ॥
भाष्यसार
मनुष्य किस की इच्छा करें--सब मनुष्य ऐसी इच्छा करें--आप्त विद्वानों के संग से हमें उत्तम प्रज्ञा= बुद्धि प्राप्त हो । सरल व्यवहार करने वाले, विद्या के दाता विद्वानों से हमें विद्या का दान प्राप्त हो। हम विद्वानों की मित्रता को प्राप्त करें। विद्वान् लोग ब्रह्मचर्य की शिक्षा से हमें पूर्ण आयु भोग के लिए समर्थ बनावें ॥ २५ । १५ ॥
विशेष
विनियोग- 'देवानां भद्रा०'महर्षि ने इस मन्त्र का विनियोग स्वस्तिवाचन में संस्कारविधि में किया है॥
विषय
'सुमति व राति'-देवसख्य
पदार्थ
१. (ऋजूयताम्) = क. (ऋजुगामिनाम्) = सदा सरल मार्ग से चलनेवाले ख. (ऋजुकामिनाम्) = सदा सरलता को चाहनेवाले (देवानाम्) = देवों की भद्रा (सुमति:) = कल्याण व सुख को करनेवाली शोभनमति (नः) = हमें (अभिनिवर्त्तताम्) = अभिमुख्येन प्राप्त हो, अर्थात् हम भी देवों की भाँति सरल मार्ग से चलनेवाले व सरलता की कामना करनेवाले बनें। २. (देवानाम्) = देवों की (राति:) = दानवृत्ति भी (नः) = हममें (अभिनिवर्तताम्) = अभिमुख प्रवृत्त हो, अर्थात् देवों की भाँति हम भी सदा देनेवाले बनें । ३. इस प्रकार देवों की सुमति तथा राति को प्राप्त करके (वयम्) = हम (देवानाम्) = देवों के (सख्यम्) = मित्रभाव को (उपसेदिम) = प्राप्त करें। उन जैसा बनकर ही तो हम उनके सच्चे मित्र हो सकेंगे। ४. ऐसा होने पर (देवा:) = देव (नः आयुः) = हमारे जीवन को (जीवसे) = चिर जीवन के लिए (प्रतिरन्तु) = बढ़ाएँ । वस्तुत: 'सुमति व राति' दोनों ही दीर्घजीवन के लिए आवश्यक हैं। मस्तिष्क की कुमति अल्पायुष्य का प्रबल कारण बनती है। मन की अनुदारता भी उसी प्रकार आयुष्य को छोटा करती है, अतः हम सुमति व राति को प्राप्त करके दीर्घजीवन को सिद्ध करें। इस दीर्घजीवन के लिए 'देवों की मित्रता' अत्यधिक महत्त्व रखती है।
भावार्थ
भावार्थ- हमें देवों की 'सुमति' प्राप्त हो। देवों की भाँति हम 'दानवृत्ति' वाले हों तथा देवों की ही हमें 'मित्रता' प्राप्त हो। ये तीनों बातें हमारे दीर्घजीवन का कारण बनें।
मराठी (2)
भावार्थ
सर्व माणसांनी पूर्ण शस्रवेत्ते व विद्वान यांच्याकडून उत्तम बुद्धी प्राप्त करून ब्रह्मचर्य पालन करावे व आयुष्य वाढवावे व सदैव धार्मिक लोकांबरोबर मैत्री करावी.
विषय
पुनश्च, तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यानो, (देवानाम्) विद्वानांची (भद्रा) कल्याणकारिणी (सुमतिः) सद्बुद्धी आम्हांला (सर्वसामान्यजनांना) प्राप्त व्हावी (विद्वानांनी आम्हाला सन्मार्ग दाखवावा) आणि (ऋजूयताम्) कठीण विषयांना सोपे करून सांगणारी (देवानाम्) विद्वानांची ती (रातिः) तसद्या आणि विद्यावान (नः) आमच्याकरिता (अभि, नि, वर्त्तताम्) सर्वदिशांनी म्हणजे सर्वथा प्राप्त होणारे असावे, आम्हांलाही त्यानी स्ववत् मानून गुणग्रहण करवावे. (वयम्) आम्हाला (देवानाम्) विद्वानांची (सख्यम्) मैत्री (उपासेदिम) प्राप्त व्हावी. (देवाः) विद्वज्जनांनी (नः) आम्हाला (जीवसे) दीर्घ व स्वस्थ जीवन जगण्यासाठी (आयुः) प्राण दायक आयुष्याचे (प्र, तिरन्तु) पूर्णत्व द्यावे (आम्ही दीर्घजीवी कसे व्हावे, ते सांगावे) हे लोकहो, आम्हां (उपासकाप्रत) जशी विद्वानांची प्रेरणा असावी, तशीच तुम्हा सर्वांनाही ती प्रेरणा मिळावी, (अशी आमची कामना आहे) ॥15॥
भावार्थ
भावार्थ - सर्व लोकांचे हे कर्तव्य आहे की त्यांनी पूर्ण शास्त्रज्ञ विद्वानांच्या जवळ राहून उत्तममती प्राप्त करावी आणि ब्रह्मचर्य पालन करून आयुष्य दीर्घ करून सदैव धार्मिक जनांसह मैत्री ठेवावी. ॥15॥
इंग्लिश (3)
Meaning
May the auspicious favour of the learned be ours. May the bounty of the righteous fill us with virtues. May we devoutly seek the friendship of the learned. May they extend our life that we may live.
Meaning
May the auspicious wisdom of brilliant visionaries come to us. May the wealth and knowledge of simple, sincere and generous people come to us from all sides. May we enjoy the favour and friendship of noble and dedicated people of faith and excellence. And may all these nobilities thrive and promote our life for good and joyous living.
Translation
May the benevolent wisdom of the straightforward sages be ours. May generosity of godly men and their friendship descend on us. May they grant us long life that we may enjoy fully. (1)
Notes
Abhi no nivartatām, may retum towards us. Pra tirantu, प्रवर्धयंतु, may they grant or enhance.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেইবিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যেমন (দেবানাম্) বিদ্বান্দিগের (ভদ্রা) কল্যাণকারিণী (সুমতিঃ) উত্তম বুদ্ধি আমাদিগকে এবং (ঋজুয়তাম্) কঠিন বিষয়কে সরল করিয়া (দেবানাম্) দানকারী বিদ্বান্দিগের (রাতিঃ) বিদ্যাদি পদার্থকে দান করা (নঃ) আমাদিগকে (অভি, নি, বর্ত্ততাম্) সব দিক দিয়া সিদ্ধ করুক, সমস্ত গুণে পূর্ণ করুক (বয়ম্) আমরা (দেবানাম্) বিদ্বান্দিগের (সখ্যম্) মিত্রতাকে (উপসেদিম) উত্তম প্রকার প্রাপ্ত হইব (দেবাঃ) বিদ্বান্গণ (নঃ) আমাদেরকে (জীবসে) বাঁচিবার জন্য (আয়ুঃ) যদ্দ্বারা প্রাণের ধারণ হয় সেই আয়ুর্দাকে (প্র, তিরন্তু) পূর্ণ ভোগ করিবে তদ্রূপ তোমাদের প্রতি ব্যবহার রাখুক ॥ ১৫ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–সকল মনুষ্যদিগের উচিত যে, পূর্ণ শাস্ত্রবেত্তা বিদ্বান্দিগের সমীপ হইতে উত্তম বুদ্ধি লাভ করিয়া ব্রহ্মচর্য্য আশ্রম দ্বারা আয়ু বৃদ্ধি করাইয়া সর্বদা ধার্মিক লোকদের সহিত মিত্রতা রাখিবে ॥ ১৫ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
দে॒বানাং॑ ভ॒দ্রা সু॑ম॒তির্ঋ॑জূয়॒তাং দে॒বানা॑ᳬं রা॒তির॒ভি নো॒ নি ব॑র্ত্ততাম্ ।
দে॒বানা॑ᳬं স॒খ্যমুপ॑ সেদিমা ব॒য়ং দে॒বা ন॒ऽআয়ুঃ॒ প্র তি॑রন্তু জী॒বসে॑ ॥ ১৫ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
দেবানামিত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । বিদ্বাংসো দেবতাঃ । জগতী ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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