यजुर्वेद - अध्याय 25/ मन्त्र 12
ऋषिः - प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - ईश्वरो देवता
छन्दः - स्वराट् पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
194
यस्ये॒मे हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा यस्य॑ समु॒द्रꣳ र॒सया॑ स॒हाहुः।यस्ये॒माः प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥॥१२॥
स्वर सहित पद पाठयस्य॑। इ॒मे। हि॒मव॑न्त॒ इति॑ हि॒मऽव॑न्तः। म॒हि॒त्वेति॑ महि॒ऽत्वा। यस्य॑। स॒मु॒द्रम्। र॒सया॑। सह। आ॒हुः। यस्य॑। इ॒माः। प्र॒दिश॒ इति॑ प्र॒ऽदिशः॑। यस्य॑। बा॒हू इति॑ बा॒हू। कस्मै॑। दे॒वाय॑। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒ ॥१२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रँ रसया सहाहुः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
स्वर रहित पद पाठ
यस्य। इमे। हिमवन्त इति हिमऽवन्तः। महित्वेति महिऽत्वा। यस्य। समुद्रम्। रसया। सह। आहुः। यस्य। इमाः। प्रदिश इति, प्रऽदिशः। यस्य। बाहू इति बाहू। कस्मै। देवाय। हविषा। विधेम॥१२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
पुनः सूर्यवर्णनविषयमाह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यस्य सूर्यस्य महित्वा महत्त्वेनेमे हिमवन्त आकर्षिताः सन्ति, यस्य रसया सह समुद्रमाहुर्यस्येमा दिशो यस्य प्रदिशश्च बाहू इवाहुस्तस्मै कस्मै देवाय हविषा वयं विधेम, एवं यूयमपि विधत्त॥१२॥
पदार्थः
(यस्य) (इमे) (हिमवन्तः) हिमालयादयः पर्वताः (महित्वा) महत्त्वेन (यस्य) (समुद्रम्) अन्तरिक्षम् (रसया) स्नेहनेन (सह) (आहुः) कथयन्ति (यस्य) (इमाः) (प्रदिशः) दिशो विदिशश्च (यस्य) (बाहू) भुजवद्वर्त्तमानाः (कस्मै) सुखरूपाय (देवाय) कमनीयाय (हविषा) हवनयोग्येन पदार्थेन (विधेम) परिचरेम॥१२॥
भावार्थः
हे मनुष्याः! यः सर्वेभ्यो महान् सर्वप्रकाशकः सर्वेभ्यो रसस्य हर्त्ता यस्य प्रतापेन दिशामुपदिशां च विभागो भवति, स सवितृलोको युक्त्या सेवितव्यः॥१२॥
विषयः
पुनः सूर्यवर्णनविषयमाह ॥
सपदार्थान्वयः
हे मनुष्या यस्य सूर्यस्य महित्वा महत्त्वेनेमे हिमवन्त आकर्षिताः सन्ति यस्य रसया सह समुद्रमाहुर्यस्येमा दिशो यस्य प्रदिशश्च बाहू इवाहुस्तस्मै कस्मै देवाय हविषा वयं विधेम, एवं यूयमपि विधत्त ॥ १२ ॥ सपदार्थान्वयः--हे मनुष्याः! यस्य सूर्यस्य महित्वा=महत्त्वेनेमे हिमवन्तः हिमालयादयः पर्वता: आकर्षिताः सन्ति; यस्य रसया स्नेहनेन सहसमुद्रम् अन्तरिक्षम् आहुः कथयन्ति, यस्येमा दिशो, यस्य प्रदिशः दिशो विदिशश्च च बाहू भुजवद्वर्तमान: इवाहुः कथयन्ति; तस्मै कस्मै सुखरूपाय देवाय कमनीयाय हविषा हवनयोग्येन पदार्थेन वयं विधेम परिचरेम; एवं यूयमपि विधत्त ॥ २५ । १२ ॥
पदार्थः
(यस्य) (इमे) (हिमवन्तः) हिमालयादयः पर्वताः (महित्वा) महत्त्वेन (यस्य) (समुद्रम्) अन्तरिक्षम् (रसया) स्नेहनेन (सह) (आहुः) कथयन्ति (यस्य) (इमाः) (प्रदिशः) दिशो विदिशश्च (यस्य) (बाहू) भुजवद्वर्त्तमाना: (कस्मै) सुखरूपाय (देवाय) कमनीयाय (हविषा) हवनयोग्येन पदार्थेन (विधेम) परिचरेम ॥ १२ ॥
भावार्थः
हे मनुष्याः ! य: सर्वेभ्यो महान् सर्वप्रकाशकः, सर्वेभ्यो रसस्य हर्त्ता; यस्य प्रतापेन दिशामुपदिशां च विभागो भवति, स सवितृलोको युक्त्या सेवनीयः ॥ २५ । १२ ॥
विशेषः
प्रजापतिः । ईश्वरः=सूर्यः । स्वराट्पङ्क्तिः । पञ्चमः ॥ -
हिन्दी (4)
विषय
फिर सूर्य के वर्णन विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! (यस्य) जिस सूर्य के (महित्वा) बड़ेपन से (इमे) ये (हिमवन्तः) हिमालय आदि पर्वत आकर्षित और प्रकाशित हैं, (यस्य) जिस के (रसया) स्नेह के (सह) साथ (समुद्रम्) अच्छे प्रकार जिस में जल ठहरते हैं, उस अन्तरिक्ष को (आहुः) कहते हैं तथा (यस्य) जिस की (इमाः) इन दिशा और (यस्य) जिसकी (प्रदिशः) विदिशाओं को (बाहू) भुजाओं के समान वर्त्तमान कहते हैं, उस (कस्मै) सुखरूप (देवाय) मनोहर सूर्यमण्डल के लिये (हविषा) होम करने योग्य पदार्थ से हम लोग (विधेम) सेवन का विधान करें, ऐसे ही तुम भी विधान करो॥१२॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! जो सब से बड़ा, सब का प्रकाश करने और सब पदार्थों से रस का लेने हारा, जिस के प्रताप से दिशा और विदिशाओं का विभाग होता है, वह सूर्य्यलोक युक्ति के साथ सेवन करने योग्य है॥१२॥
विषय
प्रजापति का वर्णन । परमेश्वर की उपासना।
भावार्थ
(यस्य) जिसके (महित्वा ) महान् सामर्थ्य से (इमे) ये (हिमवन्तः) हिम वाले पर्वत बने हैं और (यस्य महित्वा ) जिसके महान् सामर्थ्य से ( रसया सह ) स्नेहगुण या जलों से बद्ध, ठोस हुई पृथिवी के साथ (समुद्रम् ) महान् समुद्र को (आहुः) बतलाते हैं । और (यस्य ) जिसके महान् सामर्थ्य से बनी (इमाः) ये ( प्रदिशः) दिशा, उपदिशाएं (यस्य बाहू) जिसके बाहुओं के समान हैं, उस (कस्मै ) सुखस्वरूप, प्रजापालक (देवाय) तेजस्वी परमेश्वर की (हविषा ) स्तुति द्वारा हम ( विधेम ) उपासना करें । (२) राजा भी (यस्य महित्वा ) जिसके महान् सामर्थ्य के अधीन हिम वाले पर्वत और पृथ्वी सहित समुद्र कहे जायें, दिशा प्रतिदिशा के वासी जिसके अधीन रहकर (यस्य बाहू) बाहु के समान बल या सहायक हों उस महान् प्रजापालक राजा को हम (हविषा ) कर और अन्न द्वारा सेवा करें।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कः प्रजापतिरीश्वरौ देवता । स्वराट् पंक्तिः । पंचमः ॥
विषय
सूर्य का वर्णन फिर किया है॥
भाषार्थ
हे मनुष्यो! (यस्य) जिस सूर्य की (महित्त्वा) महिमा से (इमे) ये (हिमवन्तः) हिमालय आदि पर्वत आकर्षित हैं; (यस्य) जिसके(रसया) स्नेहन=रस के साथ (समुद्रम्) आकाश को (आहु:) कहते हैं; (यस्य) जिसकी (इमाः) ये दिशाएँ और (यस्य) जिसकी (प्रदिशः) उपदिशाएँ (बाहू) भुजाओं के समान (आहुः) कहते हैं; (तस्मै) उस (कस्मै) सुख रूप (देवाय) कामना करने योग्य सूर्य का (हविषा) हवन करने योग्य पदार्थ से हम लोग (विधेम) सेवन करते हैं; इस प्रकार तुम भी करो ॥ २५ । १२ ॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! जो सब से महान्, सब का प्रकाशक, सब से रस को हरण करने वाला और जिसके प्रताप से दिशाओं तथा उपदिशाओं का विभाग होता है, उस सूर्यलोक का युक्ति से सेवन करें ॥ २५ । १२॥
भाष्यसार
सूर्य का वर्णन--सूर्य की महिमा से ही ये हिमालय आदि पर्वत आकर्षित हैं। इसकी महिमा से ही रस (जल) के साथ प्रकाश विद्यमान है। दिशाएँ और उपदिशाएँ इसकी बाहु के समान हैं। इसके प्रताप से ही दिशाओं और उपदिशाओं का विभाग होता है। यह सबसे महान और सबका प्रकाशक है। सब पदार्थों से रस को हरण करता है । इस सुख रूप, कामना करने के योग्य सूर्य का हवन योग्य पदार्थों का होम करके युक्ति से सेवन करें ॥ २५ । १२॥
विषय
महिमा
पदार्थ
१. (इमे) = ये (हिमवन्तः) = हिमाच्छादित पर्वत (यस्य) = जिसकी (महित्वा) = महिमा को (आहुः) = कहते हैं (रसया सह) = इस सम्पूर्ण रसमय फलों व अन्नों को जन्म देनेवाली पृथिवी के साथ (समुद्रम्) = समुद्र (यस्य) = [महित्वा] (आहुः) = जिसकी महिमा का प्रतिपादन करते हैं। (इमाः) = ये प्रदिशः प्रकृष्ट दिशाएँ भी यस्य जिसकी महिमा का वर्णन करती हैं तथा (यस्य) = जिसके (बाहू)= [बाह प्रयत्ने] चराचर द्विविध जगत् के निर्माणात्मक प्रयत्न उसकी महिमा का प्रतिपादन कर रहे हैं । ३. उस (कस्मै) = सुखस्वरूप (देवाय) = सर्वानन्दप्रद प्रभु के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन से (विधेम) = हम पूजा करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ - हिमाच्छादित पर्वतों को देखकर, विविध रसों से परिपूर्ण फल-फूलोंवाली इस पृथिवी को देखकर, अनन्तप्राय जलराशिवाले समुद्र को देखकर, इन विस्तृत दिशाओं को देखकर तथा चर व अचर विविध जगत् के निर्माण प्रयत्नों को देखकर किस द्रष्टा को की महिमा का स्मरण नहीं होता? कोई अचर ही होगा जिसे इन वस्तुओं को देखकर भी प्रभु का स्मरण न हो। प्रभु
मराठी (2)
भावार्थ
हे माणसांनो ! जो सर्वांना प्रकाश देणारा व सर्व पदार्थांचा रस शोषून घेणारा, तसेच ज्याच्या शक्तीमुळे दिशा व उपदिशांचे विभाग निर्माण होतात. त्या सूर्याचा युक्तीने उपयोग करून घ्यावा.
विषय
पुढील मंत्रात सूर्याचे वर्णन केले आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यानो, (यस्य) ज्या सूर्याच्या (महित्वा) महिमा आणि प्रभावामुळे (इमे) हे (हिमवन्तः) हिमालय आदी पर्वत आकर्षित व स्थिर आहेत आणि (यस्य) ज्या सूर्याच्या (सरया) स्नेह म्हणजे आकर्षणशक्ती (सह) मह (समुद्रम्) ज्यात जल स्थित वा (मेघरूपाने एकत्रित राहतात, त्या अंतरिक्षाला (सूर्याशी संबंधित) (आहुः) म्हणतात (त्या सूर्याला आमच्याप्रमाणे तुम्हीही हवनीय पदार्थांद्वारे सेवन करा-यज्ञाने सूर्याच्या शक्तीचा उपयोग करा) तसेच (यस्य) ज्या सूर्याच्या (इमाः) या चार दिशा आणि (यस्य) ज्या सूर्याच्या (प्रदिशा) चार उपदिशा (बाहू) बाहूप्रमाणे आहेत, असे म्हणतात, त्या (कस्मै) सुखकर (देवाय) मनोहर सूर्य;मंडळासाठी आम्ही (उपासक) (हविषा) अनेक हवनीय वा यज्ञीय पदार्थांच्या यज्ञात आहूती देऊन (विधेम) यथोचितपणे सेवन करतो, तद्वत हे मनुष्यानो, तुम्हीही करीत जा. ॥12॥
भावार्थ
भावार्थ - हे मनुष्यानो, जो सर्व पदार्थाहून तेजस्वी सर्वाहून महान, सर्वप्रकाशक व सर्व पदार्थांचा रसग्रहण वा शोषण करणारा सूर्य आहे, तसेच ज्याच्या प्रवाहामुळे वा अस्तित्वामुळे चार दिशा आणि उपदिशा असे विभाग केले जातात, तो सूर्य वा सूर्य लोक तुम्हा-आम्हांसाठी सेवनीय आहे (त्यापासून लाभ घेणे हितकर आहे, सूर्यामुळे दिशा बनतात, कारण सूर्य उगवतो, ती पूर्व दिशा, त्यावरून इतर दिशा ठरतात.) ॥12॥
इंग्लिश (3)
Meaning
By Whose might, are these snow-clad mountains standing, and men call the atmosphere filled water. His possession. Whose arms are these heavenly regions. May we worship with devotion, Him the Illuminator and Giver of happiness.
Meaning
By whose might, they say, these snow-covered mountains have come into existence and the oceans roll with floods of water, and who by His arms of omnipotence wields these quarters of space, to Him we offer our homage and worship with oblations of praise and havi.
Translation
The praise of whose greatness these snowy mountains, this ocean alongwith the mighty rivers, and all these quarters sing, and whose arms (are strong enough to protect us); to Him, the Lord, we offer our oblations. (1)
Notes
Rasaya, with the river. The ancient name of a river in the north of India, sometimes regarded as a stream that flows round the earth and the firmament. (Griffith).
बंगाली (1)
विषय
পুনঃ সূর্য়বর্ণনবিষয়মাহ ॥
পুনঃ সূর্য্যের বর্ণন বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! (য়স্য) যে সূর্য্যের (মহিত্বা) মহত্ত্ব দ্বারা (ইমে) এই সব (হিমবন্তঃ) হিমালয়াদি পর্বত আকর্ষিত ও প্রকাশিত (য়স্য) যাহার (সরয়া) স্নেহের (সহ) সহ (সমুদ্রম্) উত্তম প্রকার যাহাতে জল স্থির থাকে সেই অন্তরিক্ষকে (আহুঃ) বলে তথা (য়স্য) যাহার (ইমাঃ) এই দিশা এবং (য়স্য) যাহার (প্রদিশঃ) দিশা-বিদিশাকে (বাহূ) বাহুর সমান বর্ত্তমান বলে সেই (কস্মৈ) সুখরূপ (দেবায়) মনোহর সূর্য্যমণ্ডলের জন্য (হবিষা) হোম করিবার যোগ্য পদার্থ দ্বারা আমরা (বিধেম) হবনের বিধান করি এইরূপ তোমরাও বিধান কর ॥ ১২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যিনি সর্ববৃহৎ সকলের প্রকাশক এবং সকল পদার্থ দ্বারা রস গ্রহণকারী যাহার প্রতাপ দ্বারা দিশা ও বিদিশার বিভাগ হয়, সেই সূর্য্যলোক যুক্তি সহ সেবন করিবার যোগ্য ॥ ১২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
য়স্যে॒মে হি॒মব॑ন্তো মহি॒ত্বা য়স্য॑ সমু॒দ্রলস॒রয়া॑ স॒হাহুঃ ।
য়স্যে॒মাঃ প্র॒দিশো॒ য়স্য॑ বা॒হূ কস্মৈ॑ দে॒বায়॑ হ॒বিষা॑ বিধেম ॥ ॥ ১২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
য়স্যেত্যস্য প্রজাপতির্ঋষিঃ । ঈশ্বরো দেবতা । স্বরাট্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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