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यजुर्वेद अध्याय - 25

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  • यजुर्वेद - अध्याय 25/ मन्त्र 19
    ऋषिः - गोतम ऋषिः देवता - ईश्वरो देवता छन्दः - स्वराड् बृहती स्वरः - मध्यमः
    202

    स्व॒स्ति न॒ऽइन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः।स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ऽअरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु॥१९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्व॒स्ति। नः॒। इन्द्रः॑। वृ॒द्धश्र॑वा॒ इति॑ वृ॒द्धऽश्र॑वाः। स्व॒स्ति। नः॒। पू॒षा। वि॒श्ववेदा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः। स्व॒स्ति। नः॒। तार्क्ष्यः॑। अरि॑ष्टनेमि॒रित्यरि॑ष्टऽनेमिः। स्व॒स्ति। नः॒। बृह॒स्पतिः॑। द॒धा॒तु॒ ॥१९ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्वस्ति नऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्या अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    स्वस्ति। नः। इन्द्रः। वृद्धश्रवा इति वृद्धऽश्रवाः। स्वस्ति। नः। पूषा। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः। स्वस्ति। नः। तार्क्ष्यः। अरिष्टनेमिरित्यरिष्टऽनेमिः। स्वस्ति। नः। बृहस्पतिः। दधातु॥१९॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 25; मन्त्र » 19
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    पुनर्मनुष्यैः किमेष्टव्यमित्याह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यो वृद्धश्रवा इन्द्रो नः स्वस्ति, यो विश्ववेदाः पूषा नः स्वस्ति, यर्स्ताक्ष्य इवारिष्टनेमिः सन्नः स्वस्ति, यो बृहस्पतिर्नः स्वस्ति दधातु, स युष्मभ्यमपि सुखं दधातु॥१९॥

    पदार्थः

    (स्वस्ति) सुखम् (नः) अस्मभ्यम् (इन्द्रः) परमैश्वर्यवानीश्वरः (वृद्धश्रवाः) वृद्धं श्रवः श्रवणं यस्य सः (स्वस्ति) (नः) (पूषा) सर्वतः पोषकः (विश्ववेदाः) विश्वं सर्वं जगद्वेदो धनं यस्य सः (स्वस्ति) (नः) (तार्क्ष्यः) अश्व इव। तार्क्ष्य इत्यश्वनामसु पठितम्॥ (निघं॰१।१४) (अरिष्टनेमिः) योऽरिष्टानि सुखानि प्रापयति सः। अत्रारिष्टोपपदाण्णीञ् प्रापणे धातोरौणादिको मिः प्रत्ययः। (स्वस्ति) (नः) (बृहस्पतिः) बृहतां महत्तत्त्वादीनां स्वामी पालकः (दधातु)॥१९॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्यथा स्वार्थे सुखमेष्टव्यं तथाऽन्यार्थमप्येषितव्यं यथा कश्चिदपि स्वार्थे दुःखं नेच्छति तथा परार्थमपि नैषितव्यम्॥१९॥

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    विषयः

    पुनर्मनुष्यैःकिमेष्टव्यमित्याह ॥

    सपदार्थान्वयः

    हे मनुष्या यो वृद्धश्रवा इन्द्रो नः स्वस्ति यो विश्ववेदाः पूषा नः स्वस्ति यस्तार्क्ष्य इवारिष्टनेमिः सन्नः स्वस्ति यो बृहस्पतिर्नः स्वस्ति दधातु स युष्मभ्यमपि सुखं दधातु ॥ १९ ॥ सपदार्थान्वयः- हे मनुष्याः ! यो वृद्धश्रवाः वृद्धं श्रवः=श्रवणं यस्य सः इन्द्रः परमैश्वर्यवानीश्वरः नः अस्मभ्यं स्वस्ति सुखम्, योविश्ववेदाः विश्वं=सर्वं जगद्वेदो=धनं यस्य सः, पूषा सर्वतः पोषकः नः अस्मभ्यं स्वस्ति सुखम्, यस्तार्क्ष्य: अश्व (इव) इवारिष्टनेमिः योऽरिष्टानि=सुखानि प्रापयति सः सन्, नः अस्मभ्यं स्वस्ति सुखम्, यो बृहस्पतिः बृहतां=महत्तत्त्वादीनां स्वामी पालक: नः अस्मभ्यं स्वस्ति सुखं दधातु; स युष्मभ्यमपि सुखं दधातु॥ २५ । १९॥

    पदार्थः

    (स्वस्ति) सुखम् (नः) अस्मभ्यम् (इन्द्रः) परमैश्वर्यवानीश्वरः (वृद्धश्रवाः) वृद्धं श्रवः=श्रवणं यस्य सः (स्वस्ति) (नः) (पूषा) सर्वतः पोषक: (विश्ववेदाः) विश्वं=सर्वं जगद्वेदो=धनं यस्य सः (स्वस्ति) (नः) (तार्क्ष्यः) अश्व इव । तार्क्ष्य इत्यश्वना० । निघं० १ | १४ ॥(अरिष्टनेमिः) योऽरिष्टानि=सुखानि प्रापयति स: । अत्रारिष्टोपपदाण्णीञ् प्रापणे धातोरौणादिको मिः प्रत्ययः । (स्वस्ति) (नः) (बृहस्पतिः) बृहतां=महत्तत्त्वादीनां स्वामी पालक: (दधातु) ॥ १९॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्यथा स्वार्थं सुखमेष्टव्यं तथाऽन्यार्थमप्येषितव्यम् । यथा कश्चिदपि स्वार्थं दुःखं नेच्छति तथा परार्थमपि नैषितव्यम् ॥ २५ । १९॥

    विशेषः

    गोतम: । ईश्वरः=स्पष्टम् । स्वराड्बृहती। मध्यमः ।।

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर मनुष्यों को किसकी इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जो (वृद्धश्रवाः) बहुत सुनने वाला (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् ईश्वर (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) उत्तम सुख जो (विश्ववेदाः) समस्त जगत् में वेद ही जिस का धन है, वह (पूषा) सब का पुष्टि करने वाला (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख जो (तार्क्ष्यः) घोड़े के समान (अरिष्टनेमिः) सुखों की प्राप्ति कराता हुआ (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) उत्तम सुख तथा जो (बृहस्पतिः) महत्तत्त्व आदि का स्वामी वा पालना करने वाला परमेश्वर (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) उत्तम सुख को (दधातु) धारण करे, वह तुम्हारे लिये भी सुख को धारण करे॥१९॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि जैसे अपने सुख को चाहें, वैसे और के लिये भी चाहें, जैसे कोई भी अपने लिये दुःख नहीं चाहता, वैसे ओर के लिये भी न चाहें॥१९॥

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    विषय

    ईश्वरोपासना । वायुओं के समान मातृभूमि के भक्त वीरों का वर्णन । उनके लक्षण और कर्तव्य ।

    भावार्थ

    (वृद्धश्रवाः) बहुत अधिक ज्ञान, यश, धन से युक्त आचार्य, राजा और परमेश्वर (नः) हमें (स्वस्ति दधातु) सुख प्रदान करे । (विश्ववेदाः) समस्त ज्ञान रूप वेदों और समस्त ऐश्वर्यों का स्वामी, (पूषा) सबका पोषक परमेश्वर (नः) हमें (स्वस्ति दधातु) कल्याण, सुख प्रदान करे । (तार्यः) रथ या अश्व जिस प्रकार (अरिष्टनेमिः) चक्र धारा के बिना टूटे, सुखपूर्वक, मार्ग से इष्ट देश को पहुँचाता है उसी प्रकार (अरिष्टनेमिः) अखण्ड, अटूट या नित्य सामर्थ्यवान् (तार्यः) अश्व के समान बलवान् राजा और व्यापक शक्तिमान् परमेश्वर (नः स्वस्ति दधातु) हमें कल्याण, सुख प्रदान करे । (बृहस्पतिः) महान् राष्ट्र का पालक राजा और बृहती वेदवाणी का पालक विद्वान् और महती शक्ति का स्वामी परमेश्वर (नः स्वस्ति दधातु) हमारा कल्याण करे ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ईश्वर इन्द्रो देवता । स्वराड बृहती । मध्यमः ॥

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    विषय

    फिर मनुष्यों को किसकी इच्छा करनी चाहिए, इस विषय का उपदेश किया है॥

    भाषार्थ

    हे मनुष्यो ! जो--(वृद्धश्रवाः) बड़े श्रवण विज्ञान (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् ईश्वर (नः) हमारे (स्वस्ति) सुख को धारण करता है; जो (विश्ववेदाः) जगत् रूप धन वाला, (पूषा) सब ओर से पोषक ईश्वर (नः) हमारे लिए (स्वस्ति) सुख को धारण करता है; जो (तार्क्ष्य:) घोड़े के समान (अरिष्टनेमिः) सुखों को प्राप्त कराने वाला होकर (नः) हमारे लिए (स्वस्ति) सुख को धारण करता है; जो (बृहस्पतिः) महत् तत्त्व आदि का स्वामी एवं पालक (नः) हमारे लिए (स्वस्ति) सुख को धारण करता है; वह तुम्हारे लिए भी सुख को धारण करे ॥ २५ । १९॥

    भावार्थ

    मनुष्य जैसे अपने लिए सुख चाहें वैसे दूसरों के लिए भी सुख की कामना करें। जैसे कोई भी व्यक्ति अपने लिए दुःख नहीं चाहता वैसे दूसरों के लिए भी दुःख की कामना न करें ॥ २५ । १९॥

    प्रमाणार्थ

    (तार्क्ष्य:) अश्व इव । 'तार्क्ष्य' यह पद निघं० (१ । १४) में अश्व-नामों में पठित है। (अरिष्टनेमिः) यहाँ 'अरिष्ट' उपपद 'णीञ् प्रापणे' धातु से औणादिक 'मि' प्रत्यय है ।

    भाष्यसार

    मनुष्य किसकी इच्छा करें--सब मनुष्य ऐसी कामना करें कि जो ईश्वर बड़े विज्ञान वाला, परम ऐश्वर्यवान्, सकल जगत् रूप धन वाला, सब ओर से पोषक, घोड़े के समान सुखों का प्रापक, महत्तत्त्व आदि का स्वामी अर्थात् पालक है वह हमारे लिए तथा तुम्हारे लिए भी सुख को धारण करे। मनुष्य जैसे अपने लिए सुख की कामना करें वैसे अन्यों के लिए भी सुख की कामना किया करें। जैसे कोई मनुष्य अपने लिए दुःख की कामना नहीं करता वैसे अन्यों के लिए भी दुःख की कामना न करें ॥ २५ । १९॥

    विशेष

    'स्वस्ति नः इन्द्रो०'महर्षि ने इस मन्त्र का विनियोग स्वस्तिवाचन में संस्कारविधि में किया है॥

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    विषय

    स्वस्ति का साधन

    पदार्थ

    १. (नः) = हमारे लिए (वृद्धश्रवाः) = सदा से बढ़े हुए ज्ञानवाला (इन्द्रः) = बलवान् व सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु (स्वस्ति) = कल्याण करनेवाला हो, अर्थात् प्रभु की कृपा से हमारा ज्ञान बढ़े और उस प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में सब वासनाओं का दहन होकर हमें वास्तविक शान्ति का लाभ हो और हमारी जीवन स्थिति उत्तम हो । २. (नः) = हमारे लिए (विश्ववेदाः) = सम्पूर्ण धनों का स्वामी (पूषा) = सबका पोषण करनेवाला प्रभु पोषण के लिए आवश्यक धनों को प्राप्त कराता हुआ (स्वस्ति) = कल्याणकर हो, अर्थात् प्रभुकृपा से हम पुरुषार्थ करते हुए आवश्यक धनों की प्राप्ति के द्वारा जीवन की स्थिति को उत्तम कर सकें । ३. (नः) = हमारे लिये (तार्क्ष्य:) = [तृक्ष गतौ ] गति में उत्तम = स्वाभाविक क्रियावाला पूर्णरूप से निःस्वार्थ क्रियावाला, (अरिष्टनेमिः) = अहिंसित मर्यादावाला प्रभु (स्वस्ति) = कल्याणकर हो। हम भी उस प्रभु की तरह सतत व निःस्वार्थ गतिवाले बनकर सदा मर्यादा में चलते हुए कभी हिंसित न हों और इस मर्यादित जीवन में कल्याण प्राप्त करें। ४. (नः) = हमारे लिए (बृहस्पतिः) = बृहत् [बड़े] आकाशादि का पति वह प्रभु (स्वस्ति) = कल्याण को (दधातु) = धारण करे। हम भी 'बृहस्पति' प्रभु की उपासना करते हुए 'बृहस्पति' बनें, उदार हृदयाकाशवाले बनें। यह उदारता हमें कृपण [ miser] की कृपणता [misery] से ऊपर उठाकर कल्याणमय स्थिति में प्राप्त कराए।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रभु की उपासना करते हुए [क] वृद्ध ज्ञानवाले व काम-क्रोधादि शत्रुओं का संहार करनेवाले बनें, [ख] पोषण के लिए आवश्यक धन प्राप्त करें, [ग] निरन्तर क्रियाशील जीवन बिताते हुए कभी मर्यादा का उल्लंघन न करें। [घ] उदारहृदय बनकर कल्याण को सिद्ध करें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसे जशी स्वतः सुखाची इच्छा करतात तशीच दुसऱ्यासाठीही करावी. जसे स्वतःला दुःख नकोसे वाटते तसे इतरांनाही नकोसे वाटते हे लक्षात घ्यावे.

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    विषय

    मनुष्यांनी कोणाची इच्छा करावी, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, तो परमेश्‍वर (वृद्धश्रवाः) अत्यंत ऐकणारा (उपासकांची प्रार्थना व याचना ऐकूण त्याची त्याची पूर्ती करणारा असून (इन्द्रः) परम ऐश्‍वर्यवान आहे. तो (नः) आमच्यासाठी (स्वस्ति) श्रेष्ठ सुख देतो, (विश्‍ववेदाः) समस्त विश्‍वात वेद हे त्याने दिलेले सर्वोत्तम धन आहे, तो (पूषा) सर्वांचे पोषण करणारा आणि (नः) आम्हा (विद्वान) उपासकांसाठी (स्वस्ति) सुखाची प्राप्ती करविणारा आणि (नः) आम्हाला स्वामी व पालक परमेश्‍वर (नः) ज्याप्रमाणे आम्हा विद्वानांसाठी (स्वस्ति) श्रेष्ठ सुख देतो तो (दधातु) तुम्हा सर्व लोकांसाठीही श्रेष्ठ सुख देणारा राहो. ॥19॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांचे कर्तव्य आहे की त्यांनी जसे स्वतःकरिता सुखाची कामना व अपेक्षा करावी, तशी इतर सर्वांसाठी ही अवश्य करावी. जसे कोणीही स्वतःकरिता दुःखाची इच्छा करीत नाही, तसे इतरांकरिताही दुःखाची कामना करू नये. ॥19॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    May the Master of vast knowledge, may Mighty God prosper us. May the Nourisher of all, the Author of all the Vedas prosper us. May He the Giver of all comforts like the horse prosper us. May God the Lord of all the elements of Nature vouchsafe us prosperity.

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    Meaning

    May Indra, great is His glory, be kind and grant us honour and greatness. May Pusha, lord sustainer and wielder of universal wealth, be generous and bring us health and wealth. May the inviolable lord of speed and security be watchful and grant us progress and freedom. And may Brihaspati, lord of the great world of existence, be gracious and bless us with all the good and well¬ being in life.

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    Translation

    May the widely respected, resplendent God, guard our welfare. May the all-knowing nourisher guard our welfare. May the creator of the cyclic universe ceaselessly guard our welfare. May the sovereign protector, with unblemished weapons, guard us for our prosperity. (1)

    Notes

    Tārkṣyah aristanemiḥ, the creator of the cyclic uni verse. Tärkṣya is the personification of the sun, whose fellies are uninjured. (Griffith).

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্মনুষ্যৈঃ কিমেষ্টব্যমিত্যাহ ॥
    পুনঃ মনুষ্যদিগকে কাহার ইচ্ছা করা উচিত এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যিনি (বৃদ্ধশ্রবাঃ) বহু শ্রবণকারী (ইন্দ্রঃ) পরম ঐশ্বর্য্যবান্ ঈশ্বর (নঃ) আমাদের জন্য (স্বস্তি) উত্তম সুখ যাহা (বিশ্ববেদাঃ) সমস্ত জগতে বেদই যাহার ধন তিনি (পূষা) সকলের পুষ্টিদাতা (নঃ) আমাদিগের জন্য (স্বস্তি) সুখ যাহা (তাক্ষ্যৈঃ) অশ্বের সমান (অরিষ্টনেমিঃ) সুখকে প্রাপ্ত করাইয়া (নঃ) আমাদিগের জন্য (স্বস্তি) উত্তম সুখ তথা যিনি (বৃহস্পতিঃ) মহতত্ত্বাদির স্বামী অথবা পালনকারী পরমেশ্বর (নঃ) আমাদের জন্য (স্বস্তি) উত্তম সুখকে (দধাতু) ধারণ করিবেন ॥ ১ঌ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–মনুষ্যদিগের উচিত যে, যেমন নিজের সুখ চাহিবে তদ্রূপ অন্যদের জন্যও চাহিবে । যেমন কেহই নিজের জন্য দুঃখ চায় না তদ্রূপ অন্যদের জন্যও চাহিবে না ॥ ১ঌ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    স্ব॒স্তি ন॒ऽইন্দ্রো॑ বৃ॒দ্ধশ্র॑বাঃ স্ব॒স্তি নঃ॑ পূ॒ষা বি॒শ্ববে॑দাঃ ।
    স্ব॒স্তি ন॒স্তার্ক্ষ্যো॒ऽঅরি॑ষ্টনেমিঃ স্ব॒স্তি নো॒ বৃহ॒স্পতি॑র্দধাতু ॥ ১ঌ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    স্বস্তি ন ইত্যস্য গোতম ঋষিঃ । ঈশ্বরো দেবতা । স্বরাড্বৃহতী ছন্দঃ ।
    মধ্যমঃ স্বরঃ ॥

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