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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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मन्त्र चुनें
अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 11
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - साम्न्यनुष्टुप्
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
43
यदा॑ञ्जनाभ्यञ्ज॒नमा॒हर॒न्त्याज्य॑मे॒व तत् ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । आ॒ञ्ज॒न॒ऽअ॒भ्य॒ञ्ज॒नम् । आ॒ऽहर॑न्ति । आज्य॑म् । ए॒व । तत् ॥६.११॥
स्वर रहित मन्त्र
यदाञ्जनाभ्यञ्जनमाहरन्त्याज्यमेव तत् ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । आञ्जनऽअभ्यञ्जनम् । आऽहरन्ति । आज्यम् । एव । तत् ॥६.११॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) जब (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) चन्दन और तेल आदि के मर्दन को (आहरन्ति) वे [गृहस्थ लोग] प्राप्त होते हैं, (तत्) सब [संन्यासी के लिये] (आज्यम्) [संसार का] व्यक्त करनेवाला ब्रह्म (एव) ही है ॥११॥
भावार्थ
संन्यासी पुरुष परमात्मा के चिन्तन में अपनी शरीरशोभा समझता है ॥११॥
टिप्पणी
११−(यत्) यदा (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-ल्युट्। सम्यक् चन्दनादिलेपनं तैलादिमर्दनं च (आहरन्ति) (आज्यम्) अ० ५।८।१। आङ्+अञ्जू व्यक्तौ-क्यप्। संसारस्य व्यक्तिकरं ब्रह्म (एव) (तत्) तदा ॥
विषय
अतिथि के लिए 'बिछौना, स्नान, भोजन' आदि की व्यवस्था
पदार्थ
१. (यत्) = जो (कशिपु उपबर्हणम्) = [a bed] बिस्तरा वा तकिया (आहरन्ति) = प्राप्त कराते हैं, (ते परिधयः एव) = वे यज्ञ में परिधि नामक पलाश-दण्डों के समान हैं [A stick of a sacred tree like पलाश laid around the sacrificial fire]| २. (यत्) = जो (आञ्जन)-आँखों के लिए अञ्जन वा (अभ्यञ्जनम्) = शरीर-मालिश के लिए तेल, उबटन आदि (आहरन्ति) = लाते हैं, (तत् आज्यम् एव) = वह यज्ञ में लाया जानेवाला घृत ही है। (यत्) = जो (परिवेषात्) = घर के लोगों के लिए भोजन परोसने से (पुरा) = पूर्व ही अतिथि के लिए (खादम् आहरन्ति) = भोजन लाते हैं, तो (पुरोडाशौ एव) = वे यज्ञ की दो पुरोडाश आहुतियाँ ही हैं। ४. (यत्) = जो (अशनकृतं ह्वयन्ति) = भोजन बनानेवाले कुशल पुरुष को बुलाते हैं, (तत् हविष्कृतम् एवं ह्वयन्ति) = वह यज्ञ में चरु तैयार करनेवाले पुरुष को ही बुलाते हैं।
भावार्थ
अतिथि के लिए रात्रि में सोने के लिए बिछौना और प्रात: उठने पर स्नान-सामग्नी व तदनन्तर भोजनादि प्राप्त कराना-अतिथियज्ञ की ये सब क्रियाएँ देवयज्ञ की क्रियाओं के समान ही हैं।
भाषार्थ
(यत्) जो (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) सुरमा तथा मलने का तैल (आहरन्ति) लाते हैं (तत्) वह (आज्यम् एव) यज्ञिय घृत ही है।
विषय
अतिथि-यज्ञ और देवयज्ञ की तुलना।
भावार्थ
(यत्) जो (कशिपु-उपबर्हणम् आहरन्ति) अतिथि के लिए चादरें और सिरहाना लाकर बिछाते हैं (ते परिधयः एव) वे यज्ञ में ‘परिधि’ के समान हैं। और (यत्) जो (अञ्जनाभ्यञ्जनम्, आहरन्ति) आंखों के लिए अंजन और शरीर के लिये तेल उबटना आदि लाते हैं (तत्) वह यज्ञ में (आज्यम् एव) घृत के ही समान आवश्यक पदार्थ है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
‘सो विद्यात्’ इति षट् पर्यायाः। एकं सुक्तम्। ब्रह्मा ऋषिः। अतिथिरुत विद्या देवता। तत्र प्रथमे पर्याये १ नागी नाम त्रिपाद् गायत्री, २ त्रिपदा आर्षी गायत्री, ३,७ साम्न्यौ त्रिष्टुभौ, ४ आसुरीगायत्री, ६ त्रिपदा साम्नां जगती, ८ याजुषी त्रिष्टुप्, १० साम्नां भुरिग बृहती, ११, १४-१६ साम्न्योऽनुष्टुभः, १२ विराड् गायत्री, १३ साम्नी निचृत् पंक्तिः, १७ त्रिपदा विराड् भुरिक् गायत्री। सप्तदशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
When they bring creams and ointments, these are like ghrta for the yajna.
Translation
The unguents (anjanam) and ointments (abhyanjanam) they bring, that is, as if, the purified butter for the sacrifice.
Translation
Whatever ointment and the material of inunction they bring for the guest is like the ghee for yajna.
Translation
Just as householders use ointment for the eyes, and oil for the body, so does a Sanyasi realize God, the Creator of the universe.
Footnote
Sanyasi: A recluse, hermit or anchorite.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
११−(यत्) यदा (आञ्जनाभ्यञ्जनम्) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-ल्युट्। सम्यक् चन्दनादिलेपनं तैलादिमर्दनं च (आहरन्ति) (आज्यम्) अ० ५।८।१। आङ्+अञ्जू व्यक्तौ-क्यप्। संसारस्य व्यक्तिकरं ब्रह्म (एव) (तत्) तदा ॥
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