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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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मन्त्र चुनें
अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 13
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - त्रिपदार्ची पङ्क्तिः
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
65
योऽति॑थीनां॒ स आ॑हव॒नीयो॒ यो वेश्म॑नि॒ स गार्ह॑पत्यो॒ यस्मि॒न्पच॑न्ति॒ स द॑क्षिणा॒ग्निः ॥
स्वर सहित पद पाठय: । अति॑थीनाम् । स: । आ॒ऽह॒व॒नीय॑: । य: । वेश्म॑नि । स: । गार्ह॑ऽपत्य: । यस्मि॑न् । पच॑न्ति । स: । द॒क्षि॒ण॒ऽअ॒ग्नि: ॥७.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो यस्मिन्पचन्ति स दक्षिणाग्निः ॥
स्वर रहित पद पाठय: । अतिथीनाम् । स: । आऽहवनीय: । य: । वेश्मनि । स: । गार्हऽपत्य: । यस्मिन् । पचन्ति । स: । दक्षिणऽअग्नि: ॥७.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थ
(यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथियों, [उत्तम संन्यासियों] का [सङ्ग है], (सः) वह [संन्यासियों के लिये] (आहवनीयः) आहवनीय [ग्राह्य अग्नि है, जिसमें ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचारी होम करते हैं], और (यः) जो (वेश्मनि) घर में [अर्थात् अपने आश्रम में निवास है], (सः) वह [उसके लिये] (गार्हपत्यः) गार्हपत्य [गृहसम्बन्धी अग्नि है] और (यस्मिन्) जिसमें [अर्थात् जिस जाठराग्नि में अन्न आदि] (पचन्ति) पचाते हैं, (सः) वह [संन्यासियों के लिये] (दक्षिणाग्निः) दक्षिणाग्नि [अनुकूल अग्नि वानप्रस्थ सम्बन्धी है] ॥१३॥
भावार्थ
संन्यासी अपने आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करके सब आश्रमों का हित करता है ॥१३॥
टिप्पणी
१३−(यः) सङ्गः (अतिथीनाम्) विदुषां संन्यासिनाम् (सः) सङ्गः (आहवनीयः) अ० ८।१०।(१)।४। ब्रह्मचारिभिर्ग्राह्यो होमाग्निः (यः) निवासः (वेश्मनि) गृहे (सः) (गार्हपत्यः) अ० ५।३१।५। गृहपतिभिः संयुक्तः (यस्मिन्) जाठराग्नौ (पचन्ति) (सः) (दक्षिणाग्निः) अ० ८।१०।(१)।६। दक्षिणोऽनुकूलोऽग्नि। वानप्रस्थानां होमाग्निः ॥
विषय
अतिथियज्ञ में अग्नित्रय का स्थान
पदार्थ
१. (यः) = जो (अतिथीनाम्) = अतिथियों का शरीर है (स:) = वह (आहवनीय:) = आहवनीय अग्नि के समान है, (यः वेश्मनि) = जो गृहस्थ के घर में निवास करना है (स: गार्हपत्यः) वह गाईपत्य अग्नि के समान है और (यस्मिन्) = जिस अग्नि में गृहमेधी लोग (पचन्ति) = अतिथि के लिए अन्नादि पकाते हैं, (सः दक्षिणाग्नि:) = वह दक्षिणाग्नि है।
भावार्थ
अतिथियज्ञ में 'आहवनीय, गाई पत्य व दक्षिणाग्नि' तीनों ही अग्नियौं उपस्थित हो जाती हैं। इसप्रकार यह यज्ञ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
भाषार्थ
(यः) जो (अतिथिनाम्) अतिथियों की [जाठर] अग्नि है (सः) वह (आहवनीयः) आहवनीय अग्नि है, (यः) जो (वेश्मनि) घर में गृह्याग्नि है (सः) वह है (गार्हपत्यः) गार्हपत्य अग्नि, (यस्मिन्) जिस अग्नि में (पचन्ति) पाकक्रिया करते हैं (सः) वह है (दक्षिणाग्निः) दक्षिणाग्नि।
टिप्पणी
[यज्ञ में प्रायः तीन अग्नियां होती हैं, (१) आहवनीय, जिस में कि आहुतियां दी जाती हैं, (२) दूसरी अग्नि होती है गार्हपत्य, जो कि सदा प्रतप्त रहती है, (३) तीसरी है दक्षिणाग्नि, जिस में कि यज्ञियपाक किया जाता है]।
विषय
अतिथि यज्ञ की देव यज्ञ से तुलना।
भावार्थ
(यः अतिथीनाम्) जो अतिथियों की शरीराग्नि हैं (सः) वह (आहवनीयः) आहवनीय अग्नि के समान है। (यः) और जो गृहस्थ स्वयं (वेश्मनि) घर में विद्यमान है (सः गार्हपत्यः) वह गार्हपत्य अग्नि के समान है। और (यस्मिन्) जिस अग्नि में गृहमेधी लोग (पचन्ति) अतिथि के लिये अन्न आदि पकाते हैं (सः) वह (दक्षिणाग्निः) दक्षिणाग्नि के तुल्य है। चतुर्थ मन्त्र में ‘अतिथिरात्मन् जुहोति’ इस मन्त्रलिंग से अतिथि का शरीर स्वयं आहवनीयाग्नि के तुल्य है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अतिथिर्विद्या वा देवता। विराड् पुरस्ताद् बृहती। २, १२ साम्नी त्रिष्टुभौ। ३ आसुरी अनुष्टुप्। ४ साम्नी उष्णिक्। ५ साम्नी बृहती। ११ साम्नी बृहती भुरिक्। ६ आर्ची अनुष्टुप्। ७ त्रिपात् स्वराड् अनुष्टुप्। ९ साम्नी अनुष्टुप्। १० आर्ची त्रिष्टुप्। १३ आर्ची पंक्तिः। त्रयोदशर्चं द्वितीयं पर्यायसूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
For the host who performs Atithi yajna with the offer of food and hospitality to the guest: The ‘fire’ of the guest’s hunger is Ahavaniya Agni into which the oblation of food is made; the warmth of hospitality in the home with which the offer of rest and comfort is made to the guest is Garhapatya Agni which is always kept alive; and the fire of the hearth on which the hosts cook food for the guest is Dakshinagni, the fire of holy generosity.
Translation
The fire, which is of guests, is called ahavaniya (the fire of offerings); one, that is within the house, is called garhapatya (the householder’s fire); one, on which they cook, is called daksinagni (the southern fire).
Translation
The man serving the guests should realize, that the fire of the body of guest is the Ahavaniya, the fire kept in the house of a house-holder is Garhpatya and the fire on which food for guest the hosts cook is Dakshinagni.
Translation
The company of learned hermits is like Ahvniya fire for them. Their stay in the Ashrama is like Garhpatya fire. The fire whereon they cook food is like Dakshina fire.
Footnote
Them, their, they refer to learned hermits. Ahvniya fire: The eastern sacrificial fire, in which the Bramcharis perform homa. Garhpatya fire: The western sacred fire in which householders perform Yajna. Dakshina: The southern sacrificial fire in which Vanprasthis perform havan.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(यः) सङ्गः (अतिथीनाम्) विदुषां संन्यासिनाम् (सः) सङ्गः (आहवनीयः) अ० ८।१०।(१)।४। ब्रह्मचारिभिर्ग्राह्यो होमाग्निः (यः) निवासः (वेश्मनि) गृहे (सः) (गार्हपत्यः) अ० ५।३१।५। गृहपतिभिः संयुक्तः (यस्मिन्) जाठराग्नौ (पचन्ति) (सः) (दक्षिणाग्निः) अ० ८।१०।(१)।६। दक्षिणोऽनुकूलोऽग्नि। वानप्रस्थानां होमाग्निः ॥
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