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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 16
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - साम्न्यनुष्टुप्
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
44
शूर्पं॑ प॒वित्रं॒ तुषा॑ ऋजी॒षाभि॒षव॑णी॒रापः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठशूर्प॑म् । प॒वित्र॑म् । तुषा॑: । ऋ॒जी॒षा: । अ॒भि॒ऽसव॑नी: । आप॑: ॥६.१६॥
स्वर रहित मन्त्र
शूर्पं पवित्रं तुषा ऋजीषाभिषवणीरापः ॥
स्वर रहित पद पाठशूर्पम् । पवित्रम् । तुषा: । ऋजीषा: । अभिऽसवनी: । आप: ॥६.१६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(शूर्पम्) सूप [छाज], (पवित्रम्) चालनी, (तुषाः) बुसी (ऋजीषा) सोम का फोक [नीरस वस्तु], (अभिसवनीः) मार्जन वा स्नान के पात्र, (आपः) [यज्ञ का] जल। (स्रुक्) स्रुचा [घी चढ़ाने का पात्र], (दर्विः) चमचा, (नेक्षणम्) शूल, शलाका आदि, (आयवनम्) कढ़ाही, (द्रोणकलशाः) द्रोणकलश [यज्ञ के कलश], (कुम्भ्यः) कुम्भी [गर्गरी], (वायव्यानि) पवन करने के (पात्राणि) पात्र [गृहस्थों के हैं], (इयम्) यह [पृथिवी] (एव) ही [संन्यासियों को] (कृष्णाजिनम्) कृष्णसार हरिन की मृगछाला [के समान है] ॥१६, १७॥
भावार्थ
गृहस्थ लोग अनेक प्रकार की सामग्री से यज्ञ आदि काम करते हैं, सन्यासी पुरुष जितेन्द्रिय होकर समस्त पृथिवी को अपना सर्वस्व और विस्तर आदि समझ प्रसन्न रहते हैं ॥१६, १७॥ मनुस्मृति-अ० ६। श्लो० ४३ में इस प्रकार वर्णन है ॥ अनग्निरनिकेतः स्याद् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्। उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥१॥ (उपेक्षकः) [बुरे कर्मों की] उपेक्षा करनेवाला, (अशङ्कुसुकः) स्थिरबुद्धि, (भावसमाहितः) परमेश्वर की भावना में ध्यान लगाये हुए (मुनिः) मुनि अर्थात् संन्यासी (अनग्निः) आहवनीय आदि अग्नियों से रहित और (अनिकेतः) विना घरवाला (स्यात्) रहे और (अन्नार्थम्) अन्न के लिये (ग्रामम् आश्रयेत्) ग्राम का आश्रम ले ॥
टिप्पणी
१६, १७−(शूर्पम्) सुशॄभ्यां निच्च। उ० ३।२६। शॄ हिंसायाम्-प प्रत्ययः, नित् किच् च, यद्वा शूर्प माने-घञ्। शूर्पमशनपवनं शृणातेर्वा-निरु० ६।९। धान्यस्फोटनयन्त्रम् (पवित्रम्) पुवः संज्ञायाम्। पा० ३।२।१८५। पूञ्, शोधने−इत्र। चालनी (तुषाः) तुष प्रीतौ-क, टाप्। धान्यत्वचः (ऋजीषा) अर्जेर्ऋज च। उ० २८। अर्ज अर्जने−ईषन्, कित्, ऋजादेशः, टाप्। यत्सोमस्य पूयमानस्यातिरिच्यते तदृजीषमपार्जितं भवति-निरु० ५।१२। नीरसं सोमचूर्णम् (अभिसवनीः) अभि+षुञ् स्नपने स्नाने च-ल्युट्, ङीप्। मार्जन्यः। प्रोक्षण्यः (आपः) यज्ञजलानि (स्रुक्) चिक् च। उ० २।६२। स्रु गतौ चिक्। वटपत्राकृतिर्यज्ञपात्रभेदः (दर्विः) अ० ४।१४।१। काष्ठादिचमसः (नेक्षणम्) णिक्ष चुम्बने-ल्युट्। शूलशलाकादिद्रव्यम् (आयवनम्) यु मिश्रणामिश्रणयोः-ल्युट्। पाकसाधनपात्रम्। कटाहः (द्रोणकलशाः) यज्ञघटाः (कुम्भ्यः) उखाः (वायव्यानि) वाय्वृतुपित्रुषसो यत्। पा० ४।२।३१। वायु-यत्। वायुदेवताकानि। वायुसाधकानि (पात्राणि) पा रक्षणे ष्ट्रन्। भाजनानि। यन्त्राणि (इयम्) प्रसिद्धा भूमिः (एव) (कृष्णाजिनम्) कृष्णसारमृगचर्मवत् ॥
विषय
अतिथियज्ञ की वस्तुएँ देवयज्ञ की वस्तुएँ
पदार्थ
१. (ये) = जो (व्रहयः यवा:) = अतिथियज्ञ के अवसर पर चावल व जौ (निरुप्यन्ते) = बिखेरे जाते हैं. (अंशवः एव ते) = वे यज्ञ में सोमलता के खण्डों के समान हैं। २. (यानि) = जो भोजन की तैयारी के लिए (उलूखलमुसलानि) = ऊखल व मूसल है, (ग्रावाणः एव ते) = वे यज्ञ में सोम कूटने के लिए उपयोगी पत्थरों के समान हैं। ३. (शूर्पम्) = अतिथि के अनशोधन के लिए काम में लाया जानेवाला छाज (पवित्रम्) = सोम के छानने के लिए 'दशापवित्र' नामक वस्त्रखण्ड के समान जानना चाहिए, (तुषा:) = छाज से फटकने पर अलग हो जानेवाले अन्न के तुष (ऋजीषा) = सोम को छानने के बाद प्राप्त फोक के समान हैं। (अभिषवणी:) = अतिथि का भोजन बनाने के लिए प्रयुक्त होनेवाले (आप:) = जल यज्ञ में सोमरस में मिलाने योग्य 'वसनीवरी' नामक जलधाराओं के समान हैं। ४. स्(त्रुक दर्वि:) = अतिथि का भोजन बनाने के लिए जो कड़छी है, वह यज्ञ के घृत-चमस के समान है, (आयवनम्) = भोजन तैयार करते समय जो दाल आदि के चलाने का कार्य किया जाता है, वह (नेक्षणम्) = यज्ञ में बार-बार सोमरस को मिलाने के समान है। (कुम्भ्यः) = खाना पकाने के लिए जो देगची आदि पात्र हैं, वे (द्रोणकलशा:) = सोमरस रखने के लिए द्रोणकलशों के समान हैं। (पात्राणि) = अतिथि को खिलाने के लिए जो कटोरी, थाली आदि पात्र हैं, वे यज्ञ में सोमपान करने के निमित्त (वायव्यानि) = वायव्य पात्रों के समान हैं और अतिथि के लिए (इयम् एव) = जो उठने-बैठने के लिए भूमि है, वही (कृष्णाजिनम्) = यज्ञ की कृष्ण मृगछाला के समान है।
भावार्थ
अतिथियज्ञ में प्रयुक्त होनेवाली वस्तुएँ देवयज्ञ में प्रयुक्त होनेवाली उस-उस वस्तु के समान हैं।
भाषार्थ
(शूर्पम्) छाज है (पवित्रम्) सोमरस के छानने का साधन, (तुषाः) व्रीहि के कूटने पर प्राप्त छिलके हैं (ऋजीषा) सोम ओषधि के पीसने पर बचे छिलके, (आपः) जल हैं (अभिषवणीः) सोम औषधि पीसने के लिये जल।
विषय
अतिथि-यज्ञ और देवयज्ञ की तुलना।
भावार्थ
(शूर्पं पवित्रम्) अतिथि के निमित्त अन्न साफ करने के लिये जो छाज काम में लाया जाता है वह यज्ञ में ‘पवित्र’ अर्थात् सोम छानने के लिये ‘दशापवित्र’ नामक वस्त्र खण्ड के समान जानना चाहिये। (तुषाः ऋजीषाः) छाज से फटकते हुए जो अन्न के तुष अलग हो जाते हैं वह यज्ञ में सोम को छानने के बाद प्राप्त फोक के समान हैं। (अभिषवणीः आपः) अतिथि के भोजन बनाने के लिये जो जल प्रयुक्त होते हैं वह यज्ञ में सोम रस में मिलाने योग्य ‘वसतीवरी’ नामक जलधाराओं के समान हैं। (स्रुक् दर्विः) अतिथि का भोजन बनाने के लिये जो कड़छी प्रयुक्त होती है वह यज्ञ में ‘स्रुक्’ या घृतचमस् के समान हैं। (आयवनम् नेक्षणम्) भोजन तैयार करते समय जो दाल आदि चलाने का कार्य किया जाता है वह यज्ञ में सोम-रस को बार बार मिलाने के समान है। (कुम्भ्यः द्रोणकलशाः) खाना पकाने के लिये जो डेगची आदि पात्र हैं वे यज्ञ में सोम रस रखने के लिये द्रोणकलशों के समान हैं। (पात्राणि वायव्यानि) अतिथि को खिलाने के जिये जो थाली, कटोरी आदि पात्र हैं वे यज्ञ में सोमपान करने के निमित्त ‘वायव्य’ पात्रों के समान हैं। और अतिथि के लिये (इयम् एव कृष्णाजिनम्) जो बैठने उठने के लिये वह भूमि है वह यज्ञ में कृष्ण मृगछाला के समान है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
‘सो विद्यात्’ इति षट् पर्यायाः। एकं सुक्तम्। ब्रह्मा ऋषिः। अतिथिरुत विद्या देवता। तत्र प्रथमे पर्याये १ नागी नाम त्रिपाद् गायत्री, २ त्रिपदा आर्षी गायत्री, ३,७ साम्न्यौ त्रिष्टुभौ, ४ आसुरीगायत्री, ६ त्रिपदा साम्नां जगती, ८ याजुषी त्रिष्टुप्, १० साम्नां भुरिग बृहती, ११, १४-१६ साम्न्योऽनुष्टुभः, १२ विराड् गायत्री, १३ साम्नी निचृत् पंक्तिः, १७ त्रिपदा विराड् भुरिक् गायत्री। सप्तदशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
The sieve is soma strainer, the chaff is soma pomace, and liquids are pressing gear.
Translation
The winnowing fan (Surpa) is, as if, the strainer (pavitram) the chaff (tusa) is, as if, the residue (rjisa) of the curejuice; the water at meal-time is, as if, the water used for pressing out the cure-juice.
Translation
The benowing-basket is the filter, the huska are chafts the Soma dregs, the water the pressing gear.
Translation
Just as the winnowing-basket, the filter, the chaff, the Soma dregs, the bathing basins the sacrificial water, the spoon, the ladle, the fork, the stirring prong, the Soma tubs, the cooking pots and the vessels are useful for the householders, so does this earth serve for the hermits, the purpose of the black-antelope’s skin to lie on.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१६, १७−(शूर्पम्) सुशॄभ्यां निच्च। उ० ३।२६। शॄ हिंसायाम्-प प्रत्ययः, नित् किच् च, यद्वा शूर्प माने-घञ्। शूर्पमशनपवनं शृणातेर्वा-निरु० ६।९। धान्यस्फोटनयन्त्रम् (पवित्रम्) पुवः संज्ञायाम्। पा० ३।२।१८५। पूञ्, शोधने−इत्र। चालनी (तुषाः) तुष प्रीतौ-क, टाप्। धान्यत्वचः (ऋजीषा) अर्जेर्ऋज च। उ० २८। अर्ज अर्जने−ईषन्, कित्, ऋजादेशः, टाप्। यत्सोमस्य पूयमानस्यातिरिच्यते तदृजीषमपार्जितं भवति-निरु० ५।१२। नीरसं सोमचूर्णम् (अभिसवनीः) अभि+षुञ् स्नपने स्नाने च-ल्युट्, ङीप्। मार्जन्यः। प्रोक्षण्यः (आपः) यज्ञजलानि (स्रुक्) चिक् च। उ० २।६२। स्रु गतौ चिक्। वटपत्राकृतिर्यज्ञपात्रभेदः (दर्विः) अ० ४।१४।१। काष्ठादिचमसः (नेक्षणम्) णिक्ष चुम्बने-ल्युट्। शूलशलाकादिद्रव्यम् (आयवनम्) यु मिश्रणामिश्रणयोः-ल्युट्। पाकसाधनपात्रम्। कटाहः (द्रोणकलशाः) यज्ञघटाः (कुम्भ्यः) उखाः (वायव्यानि) वाय्वृतुपित्रुषसो यत्। पा० ४।२।३१। वायु-यत्। वायुदेवताकानि। वायुसाधकानि (पात्राणि) पा रक्षणे ष्ट्रन्। भाजनानि। यन्त्राणि (इयम्) प्रसिद्धा भूमिः (एव) (कृष्णाजिनम्) कृष्णसारमृगचर्मवत् ॥
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