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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 8
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - याजुषी त्रिष्टुप्
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
54
यदु॑पस्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत् ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । उ॒प॒ऽस्तृ॒णन्ति॑ । ब॒र्हि: । ए॒व । तत् ॥६.८॥
स्वर रहित मन्त्र
यदुपस्तृणन्ति बर्हिरेव तत् ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । उपऽस्तृणन्ति । बर्हि: । एव । तत् ॥६.८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) जो कुछ वे [गृहस्थ] (उपस्तृणन्ति) बिछोना करते हैं, (तत्) वह [संन्यासी के लिये] (बर्हिः) कुशासन (एव) ही होता है ॥८॥
भावार्थ
संन्यासी लोग अल्पमूल्य वस्तुओं में निर्वाह करके यज्ञसामग्री का ध्यान रखते हैं ॥८॥
टिप्पणी
८−(यत्) यत्किंचित् (उपस्तृणन्ति) आच्छादनानि कुर्वन्ति (बर्हिः) अ० ५।२२।१। कुशासनम्। यज्ञसामग्री ॥
विषय
आतिथ्य व स्वर्ग
पदार्थ
१. (यत्) = जो (तर्पणम्) = अतिथि के लिए तृप्तिकारक मधुपर्क आदि पदार्थ प्राप्त कराये जाते हैं और (यः एव) = जो (अग्रीषोमीय:) = अग्नि व सोम देवतावाला (पशः बध्यते) = पशु बाँधा जाता है, (सः एव सः) = वह तर्पण वह पशु ही हो जाता है। सिंह आदि अग्नितत्त्व प्रधान पशु हैं, तो गौ आदि सोमतत्त्व प्रधान। यज्ञों में दोनों प्रकार के ही पशु बाँधे जाते हैं। इसप्रकार यज्ञ में उपस्थित बालकों व युवकों को प्राणी-शास्त्र का ज्ञान खेल-खेल में ही हो जाता था। २. यत्-जो अतिथि के निवास के लिए (आवसथान् कल्पयन्ति) = उचित गृह बनाते हैं, (तत्) = वह एक प्रकार से (सदोहविर्धानानि) = [सदस] प्राचीन वंशगृह [सभास्थान] और हविर्धान नामक पात्रों को ही (कल्पयन्ति) = बनाते हैं। ३. (यत्) = जो अतिथि के लिए (उपस्तृणन्ति) = चारपाई या टाट बिछाते हैं, (तत् बहिः एव) = वह यज्ञ में कुशाओं का बिछौना ही है। ४. (यत् उपरिशयनम् आहरन्ति) = जो गद्दा लाकर चारपाई पर बिछाते हैं अथवा अपने से ऊँचे स्थान में अतिथि को सुलाते हैं तो (तेन) = उस अतिथि-सत्कार की क्रिया से स्(वर्ग लोकम् एव अवरुन्द्ध) = अपने लिए स्वर्गलोक को ही सुरक्षित कर लेते हैं [रोक लेते हैं]।
भावार्थ
अतिथि-सत्कार हमारे घरों को स्वर्ग-तुल्य बनाता है।
भाषार्थ
(यद् उपस्तृणन्ति) जो बिछौना बिछाते हैं, (तत बर्हिः एव) वह यज्ञ स्थल में कुशास्तरण ही है।
विषय
अतिथि-यज्ञ और देवयज्ञ की तुलना।
भावार्थ
(यत् उपस्तृणन्ति) जो अतिथि के लिए चारपाई या टाट बिछाया जाता है (तत्) वह मानो यज्ञ में (बर्हिः एवः) बर्हि या कुशाओं के बिछाने के समान ही है। और (यत्) जो (उपरिशयनं आहरन्ति) अतिथि के लिए चारपाई या टाट के ऊपर गद्दा (आहरन्ति) लाकर बिछाते हैं (तेन) उस कार्य से मानो (स्वर्गम् लोकम् एव अव रुन्धे) वे यज्ञ में स्वर्ग=सुखप्रद इष्ट लोक को ही प्राप्त करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
‘सो विद्यात्’ इति षट् पर्यायाः। एकं सुक्तम्। ब्रह्मा ऋषिः। अतिथिरुत विद्या देवता। तत्र प्रथमे पर्याये १ नागी नाम त्रिपाद् गायत्री, २ त्रिपदा आर्षी गायत्री, ३,७ साम्न्यौ त्रिष्टुभौ, ४ आसुरीगायत्री, ६ त्रिपदा साम्नां जगती, ८ याजुषी त्रिष्टुप्, १० साम्नां भुरिग बृहती, ११, १४-१६ साम्न्योऽनुष्टुभः, १२ विराड् गायत्री, १३ साम्नी निचृत् पंक्तिः, १७ त्रिपदा विराड् भुरिक् गायत्री। सप्तदशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
When they provide for the bed, that is like spreading the holy grass on the vedi.
Translation
The mattresses (upastarana) they spread (on the floor), that is, in fact; spreading of sacred grass (barhis) (at the sacrifice).
Translation
What they spread out on the floor to seat him is just like the grass which is used in yajna the kusha.
Translation
The couch spread by a householder for a hermit, is for him a seat of grass.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८−(यत्) यत्किंचित् (उपस्तृणन्ति) आच्छादनानि कुर्वन्ति (बर्हिः) अ० ५।२२।१। कुशासनम्। यज्ञसामग्री ॥
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