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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 3
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - प्राजापत्यानुष्टुप्
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
57
स य ए॒वं वि॒द्वान्त्स॒र्पिरु॑प॒सिच्यो॑प॒हर॑ति।
स्वर सहित पद पाठस: । य: । ए॒वम् । वि॒द्वान् । स॒र्पि: । उ॒प॒ऽसिच्य॑ । उ॒प॒ऽहर॑ति ॥९.३॥
स्वर रहित मन्त्र
स य एवं विद्वान्त्सर्पिरुपसिच्योपहरति।
स्वर रहित पद पाठस: । य: । एवम् । विद्वान् । सर्पि: । उपऽसिच्य । उपऽहरति ॥९.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थ
(यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसा (विद्वान्) विद्वान् है, (सः) वह (सर्पिः) घृत (उपसिच्य) सिद्ध करके (उपहरति) भेंट करता है। (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (अतिरात्रेण) अतिरात्र से (इष्ट्वा) यज्ञ करके.... म० १, २ ॥३, ४॥
भावार्थ
“अतिरात्र” जो रात्रि बिताकर सोमयाग वा अन्नेष्टि किया जाता है, जैसे होलिका, दीपावली। आगे ऊपर के समान है-म० १, २ ॥३, ४॥
टिप्पणी
३, ४−(सर्पिः) अ० १।१५।४। घृतम् (अतिरात्रेण) अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः। पा० ५।४।८७। अच् प्रत्ययः। रात्रिमतीत्य वर्तते स अतिरात्रः। तेन सोमयागविशेषेण। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
क्षीर, सर्पि, मधु, मांस
पदार्थ
१. (यः एवं विद्वान्) = जो इसप्रकार अतिथियज्ञ के महत्त्व को जानता है, (स:) = वह (क्षीरम् उपसिच्य) = दूध को पात्र में डालकर (उपहरति) = अतिथि की तृप्ति के लिए प्राप्त कराता है, तो २. (यावत्) = जितना (सुसमृद्धेन) = उत्तम रीति से सम्पादित (अग्निष्टोमेन इष्ट्वा) = अग्निष्टोम यज्ञ से यज्ञ करके (अवरुन्द्ध) = फल प्रास करता है, (तावत्) = उतना (एनेन अवरुन्द्धे) = अतिथियज्ञ से प्राप्त कर लेता है। ३. (यः एवं विद्वान्) = जो इसप्रकार अतिथियज्ञ के महत्त्व को जानता है (स:) = वह सर्पिः उपसिच्य-घृत आदि पौष्टिक पदार्थों को पात्र में डालकर (उपहरति) = अतिथि की तृप्ति के लिए प्राप्त कराता है, तो ४. (यावत्) = जितना (सुसमृद्धेन) = सम्यक् सम्पादित (अतिरात्रेण) = 'अतिरात्र' नामक यज्ञ से (अवरुन्द्धे) = फल प्राप्त करता है (तावत्) = उतना (एनेन अवरुन्द्धे) = इस अतिथि-सत्कार से प्राप्त कर लेता है। ५. (यः एवं विद्वान्) = जो इसप्रकार अतिथियज्ञ के महत्त्व को जानता है (स:) = वह (मधु उपसिच्य) = मधु आदि मधुर पदार्थों को पात्र में डालकर (उपहरति) = अतिथि के लिए प्राप्त कराता है, ६. तो (यावत्) = जितना (सुसमृद्धेन सत्नसोन इष्ट्वा) = सम्यक् सम्पादित 'सत्रसद्य' से यज्ञ करके (अवरुन्द्धे) = फल प्रास करता है, (तावत्) = उतना (एनेन अवरुन्द्धे) = इस अतिथियज्ञ के करने से प्राप्त करता है। ७. (यः एवं विद्वान्) = जो इसप्रकार अतिथियज्ञ के महत्त्व को समझता है, (स:) = यह (मांसम् उपसिच्य) = मन को रुचिपूर्ण लगनेवाले घी, मलाई, फल [The fleshy part of a fruit] आदि पदार्थों को पात्र में डालकर (उपहरति) = अतिथि के लिए प्राप्त कराता है, तो ८. (यावत्) = जितना (सुसमद्धेन द्वादशाहेन इष्ट्वा) = सम्यक् सम्पादित 'द्वादशाह' यज्ञ से यज्ञ करके (अवरुन्द्धे) = फल प्राप्त करता है (तावत्) = उतना एनेन अवरुद्ध इस अतिथियज्ञ से प्राप्त कर लेता है।
भावार्थ
अतिथि के लिए 'दूध, घृत, मधु, मांस [मन को अच्छा लगनेवाले पदार्थ] प्राप्त कराने से क्रमश: अग्निष्टोम, अतिरात्र, सत्रसय, द्वादशाह यज्ञों के करने का फल मिलता है।
भाषार्थ
(यः) जो अतिथिपति (एवम्) इस प्रकार (विद्वान्) अतिथियज्ञ के महत्त्व को जानता है, और (सर्पिः) पिघला घृत (उपसिच्य) डाल कर (उपहरति) उपहाररूप में अन्न देता है, (सः) वह (सुसमृद्धेन) उत्तम प्रकार सिद्ध हुए (अतिरात्रेण) अतिरात्र द्वारा (इष्ट्वा) यजन कर के (यावत्) जितना फल (अवरुन्द्धे) प्राप्त करता है, या स्वाधिकार में कर लेता है, (तावत्) उतना फल (अनेन) इस अतिथियज्ञ द्वारा प्राप्त कर लेता है, या स्वाधिकार में कर लेता है।
विषय
अतिथियज्ञ का महान् फल।
भावार्थ
(यः एवं विद्वान्) जो इस प्रकार के अतिथि सत्कार के व्रत को जानता हुआ गृहस्थ (सर्पिः उपसिच्य) घृत आदि पुष्टिकारक पदार्थों को पात्र में रख अतिथि के लिये लाता है (यावत् अतिरात्रेण इष्ट्वा०) तो उत्तम रीति से सम्पादित ‘अतिरात्र’ नामक यज्ञ को करके जितना फल प्राप्त करते हैं उतना फल वह गृहस्थ इस अतिथि यज्ञ से प्राप्त कर लेता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्देवता च पूर्वोक्ते। १,३,५,७ प्राजापत्या अनुष्टुभः, ९ भुरिक्, २, ४, ६, त्रिपदा गायत्र्यः, १० चतुष्पाद प्रस्तारपंक्तिः। दशर्चं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
The host, knowing thus the law and tradition, who takes up ghrta preparations, sprinkles these with delicacies, and offers to the learned guest...
Translation
He, who knowing thus, pours out purified butter and presents it (to the guest), with it he wins so much as one wins by performing a very successful atiratra sacrifice.
Translation
3+4. The house-holding man who possesses this knowledge and offers food to guest pouring ghee, attains for him as much thereby as he can gain by the performance of successful Atiratra Yajna.
Translation
The man, who having this knowledge of honoring a guest, pouring clarified butter in a basin offers it to the hermit, wins for himself as much fruit as he gains by the performance of a very successful Atiratra sacrifice.
Footnote
Atiratra: A sacrifice that is performed throughout the night, like that of Holi and Dipawali. An optional part of the Jyotishtoma sacrifice.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३, ४−(सर्पिः) अ० १।१५।४। घृतम् (अतिरात्रेण) अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः। पा० ५।४।८७। अच् प्रत्ययः। रात्रिमतीत्य वर्तते स अतिरात्रः। तेन सोमयागविशेषेण। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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