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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 6 के मन्त्र
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मन्त्र चुनें
अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 7
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अतिथिः, विद्या
छन्दः - साम्नी बृहती
सूक्तम् - अतिथि सत्कार
71
ए॒ष वा अति॑थि॒र्यच्छ्रोत्रि॑य॒स्तस्मा॒त्पूर्वो॒ नाश्नी॑यात् ॥
स्वर सहित पद पाठए॒ष: । वै । अति॑थि: । यत् । श्रोत्रि॑य: । तस्मा॑त् । पूर्व॑: । न । अ॒श्नी॒या॒त् ॥८.७॥
स्वर रहित मन्त्र
एष वा अतिथिर्यच्छ्रोत्रियस्तस्मात्पूर्वो नाश्नीयात् ॥
स्वर रहित पद पाठएष: । वै । अतिथि: । यत् । श्रोत्रिय: । तस्मात् । पूर्व: । न । अश्नीयात् ॥८.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) क्योंकि (एषः वै) यही (अतिथिः) अतिथि (श्रोत्रियः) श्रोत्रिय [वेद जाननेवाला पुरुष है], (तस्मात्) उस [अतिथि] से (पूर्वः) पहिले [गृहस्थ] (न) न (अश्नीयात्) जीमें ॥७॥
भावार्थ
गृहस्थ का धर्म है कि अतिथि को भोजन कराके आप भोजन करे ॥७॥
टिप्पणी
७−(यत्) यस्मात् कारणात् (श्रोत्रियः) श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते। पा० ५।२।८४। छन्दस्-घन्। वेदाध्येतृपुरुषः (तस्मात्) अतिथेः सकाशात् (न) निषेधे (अश्नीयात्) जेमेत्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
अतिथि का लक्षण
पदार्थ
१. (एष:) = यह (वै) = निश्चय से (अतिथि:) = अतिथि है, (यत् श्रोत्रियः) = जो वेद का विद्वान् है, (तस्मात् पूर्व:) = उससे पहले (न अश्नीयात्) = भोजन न करे। २. (अतिथौ अशितावति अश्नीयात) = अतिथि के भोजन कर लेने पर ही भोजन खाये ताकि (यज्ञस्य सात्मत्वाय) = यज्ञ की संगतता बनी रहे, अर्थात् यज्ञ सम्पूर्णता से सफल हो, (यज्ञस्य अविच्छेदाय) = यज्ञ का विच्छेद [विनाश] न हो, (तत् व्रतम्) = यह व्रत ही लेना चाहिए कि 'अतिथि से पूर्व नहीं खाऊँगा'।३. (एतत् वै उ) = यह ही निश्चय से (स्वादीय:) = सब पदार्थ बहुत स्वादिष्ट हैं, (यत् अधिगवम्) = जो गौ से प्राप्त होता है, (क्षीरं वा) = दूध या (मांसं वा) = या अन्य मन को अच्छा लगनेवाला [मानसं अस्मिन् सीदति इति-निरु०] दूध से उत्पन्न घी, मलाई, रबड़ी, खोया, खीर आदि पदार्थ है, (तत् एव) = उन पदार्थों को गृहस्थ अतिथि से पूर्व (न अश्नीयात्) = न खाये। अतिथि को खिलाकर ही इन पदार्थों का यज्ञशेष के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
भावार्थ
श्रोत्रिय अतिथि को दूध, रबड़ी आदि स्वादिष्ट पदार्थों को खिलाकर उसके बाद ही गृहस्थ को यज्ञशेष के रूप में उन पदार्थों का ग्रहण करना चाहिए। यह गृहस्थ का व्रत है। इस व्रत के पालन से ही यज्ञ की पूर्णता व जीवन का कल्याण हुआ करता है।
भाषार्थ
(वै) निश्चय से (एषः अतिथिः) यह अतिथि है (यत् श्रोत्रियः) जो कि वेदाध्ययन करता तथा वैदिक विद्वान् है, (तस्मात् पूर्वः) उस के पहिले अतिथिपति (न अश्नीयात्) न खाए।
विषय
अतिथि यज्ञ न करने से हानियें।
भावार्थ
(एषः वै अतिथिः) यह अतिथि निश्चय से (यत् श्रोत्रियः) श्रोत्रिय अर्थात् वेद के विद्वान् ब्राह्मण के समान पूजनीय है (तस्मात्) इसलिए (पूर्वः) अतिथि से पहले (न अश्नीयात्) कभी भोजन न करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अतिथिविद्यावा देवता, १-६, ९ त्रिपदाः पिपीलकमध्या गायत्र्यः, ७ साम्नी बृहती, ८ पिपीकामध्या उष्णिक्। नवर्चं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Atithi Yajna: Hospitality
Meaning
The guest being a man of knowledge, culture and enlightenment, the host must not eat before him.
Translation
A guest is indeed a learned sage, therefore, one should never eat before he has eaten.
Translation
It is the guest who is a Shrotriya, learned spiritual man well-versed in the Vedas and therefore a house-holder should not take His meal before giving to him.
Translation
The householder should not eat before the guest who is a Brahmin versed in Vedic lore.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(यत्) यस्मात् कारणात् (श्रोत्रियः) श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते। पा० ५।२।८४। छन्दस्-घन्। वेदाध्येतृपुरुषः (तस्मात्) अतिथेः सकाशात् (न) निषेधे (अश्नीयात्) जेमेत्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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