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  • अथर्ववेद - काण्ड 9/ सूक्त 6/ पर्यायः 5/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - अतिथिः, विद्या छन्दः - साम्न्युष्णिक् सूक्तम् - अतिथि सत्कार
    पदार्थ -

    (तस्मै) उस [गृहस्थ] के लिये (उषाः) उषा [प्रभातवेला] (हिङ्) तृप्ति कर्म (कृणोति) करती है, (सविता) प्रेरणा करनेवाला सूर्य (प्र) अच्छी भाँति (स्तौति) स्तुति करता है। [उसके लिये] (बृहस्पतिः) बड़े सोम [अमृत रस] का रक्षक, वायु (ऊर्जया) प्राण शक्ति के साथ (उत् गायति) उद्गीथ [वेदगान] करता है, (त्वष्टा) [अन्न आदि] उत्पन्न करनेवाला, मेघ (पुष्ट्या) पुष्टि के साथ (निधनम्) निधि (प्रति) प्रत्यक्ष (हरति) प्राप्त कराता है और (विश्वे) सब (देवाः) उत्तम गुणवाले पदार्थ [निधि प्रत्यक्ष प्राप्त कराते हैं]। [उस गृहस्थ के लिये] (भूत्याः) वैभव का, (प्रजायाः) प्रजा [सन्तान भृत्य आदि] का और (पशूनाम्) पशुओं [गौ, घोड़े, हाथी आदि] का (निधनम्) निधि (भवति) होता है, (यः) जो गृहस्थ (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है ॥१, २, ३॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य पूर्वोक्त विधि से विद्वानों का सत्कार करता है, उसको सब कालों में सब पदार्थों से आनन्द मिलता है ॥१, २, ३॥

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