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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - अतिथिः, विद्या छन्दः - साम्न्युष्णिक् सूक्तम् - अतिथि सत्कार
    75

    तस्मा॑ उ॒षा हिङ्कृ॑णोति सवि॒ता प्र स्तौ॑ति।

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्मै॑ । उ॒षा: । हिङ् । कृ॒णो॒ति॒ । स॒वि॒ता । प्र । स्तौ॒ति॒ ॥१०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति।

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्मै । उषा: । हिङ् । कृणोति । सविता । प्र । स्तौति ॥१०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 6; पर्यायः » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    अतिथि के सत्कार का उपदेश।

    पदार्थ

    (तस्मै) उस [गृहस्थ] के लिये (उषाः) उषा [प्रभातवेला] (हिङ्) तृप्ति कर्म (कृणोति) करती है, (सविता) प्रेरणा करनेवाला सूर्य (प्र) अच्छी भाँति (स्तौति) स्तुति करता है। [उसके लिये] (बृहस्पतिः) बड़े सोम [अमृत रस] का रक्षक, वायु (ऊर्जया) प्राण शक्ति के साथ (उत् गायति) उद्गीथ [वेदगान] करता है, (त्वष्टा) [अन्न आदि] उत्पन्न करनेवाला, मेघ (पुष्ट्या) पुष्टि के साथ (निधनम्) निधि (प्रति) प्रत्यक्ष (हरति) प्राप्त कराता है और (विश्वे) सब (देवाः) उत्तम गुणवाले पदार्थ [निधि प्रत्यक्ष प्राप्त कराते हैं]। [उस गृहस्थ के लिये] (भूत्याः) वैभव का, (प्रजायाः) प्रजा [सन्तान भृत्य आदि] का और (पशूनाम्) पशुओं [गौ, घोड़े, हाथी आदि] का (निधनम्) निधि (भवति) होता है, (यः) जो गृहस्थ (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है ॥१, २, ३॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य पूर्वोक्त विधि से विद्वानों का सत्कार करता है, उसको सब कालों में सब पदार्थों से आनन्द मिलता है ॥१, २, ३॥

    टिप्पणी

    १, २, ३−(तस्मै) गृहस्थाय (उषाः) प्रभातवेला (हिङ्) ऋत्विक्दधृक्०। पा० ™३।२।५९। इति बाहुलकात्। हिवि प्रीणने−क्विन्, इति हिन्व्। स्वमोर्नपुंसकात्। पा० ७।१।२३। अमो लुक्। संयोगान्तस्य लोपः। पा० ८।२।२३। वलोपः। क्विन्प्रत्ययस्य कुः। पा० ८।२।६२। इति सानुनासिकं कुत्वम्। हिन्वति प्रीणातीति हिङ्। प्रीणनम्। तृप्तिकर्म (कृणोति) करोति (सविता) प्रेरकः सूर्यः (प्र) प्रकर्षेण (स्तौति) प्रशंसति (बृहस्पतिः) अ० १।८।२। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।११। बृहतः सोमरसस्य पाता रक्षिता वायुः (ऊर्जया) प्राणशक्त्या (उत् गायति) उद्गीथं वेदगानं करोति (त्वष्टा) अ० २।५।६। त्वक्षतेः करोति कर्मणः−तृन्। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।३४। अन्नादीनां कर्ता मेघः (पुष्ट्या) पोषणेन (प्रति) प्रत्यक्षम् (हरति) प्रापयति (विश्वे) सर्वे (देवाः) उत्तमगुणाः पदार्थाः (निधनम्) कॄपॄवृजिमन्दिनिधाञः क्युः। उ० २।८१। निदधातेः−क्यु। नितरां धारणम्। निधिम् (भूत्याः) वैभवस्य (प्रजायाः) सन्तानभृत्यादेः (पशूनाम्) गवाश्वगजादीनाम् (भवति) वर्तते (यः) (एवम्) पूर्वोक्तप्रकारेण (वेद) जानाति ॥

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    विषय

    भूति, प्रजा, पशु

    पदार्थ

    १. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार अतिथियज्ञ के महत्त्व को समझता है, (तस्मै) = उसके लिए (उषा) = उषा (हिङ्कृणोति) = आनन्द का सन्देश देती है, (सविता प्रस्तौति) = सूर्य विशेष प्रशंसा करता है, (बृहस्पति:) = प्राण (ऊर्जया उद्गायति) = बल के साथ उसके गुणों का गान करता है, (त्वष्टा पुष्टया प्रतिहरति) = त्वष्टा उसे पुष्टि प्रदान करता है, (विश्वे देवा निधनम्) = अन्य सब देव उसे आश्रय प्रदान करते हैं, अतः वह (भूत्या: प्रजायाः पशूनाम्) = सम्पत्ति, प्रजा व पशुओं का (निधनं भवति) = आश्रयस्थान बनता है।

    भावार्थ

    अतिथि सत्कार करनेवाला सम्पत्ति, प्रजा व पशुओं का आश्रयस्थान बनता है।

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    भाषार्थ

    (तस्मै) उस अतिथिपति के लिये (उषाः) उषा-काल (हिङ्करोति) हिङ् शब्द का उच्चारण करता है, (सविता प्रस्तौति) सविता का काल प्रस्ताव करता है ॥१॥ '

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Atithi Yajna: Hospitality

    Meaning

    Paryaya 5 For the host and the household that knows the law, tradition, rules and manners of Atithi yajna in honour of the learned guests, nature sings songs of celebration. This part of the sukta uses musical terms of Sama songs: Hinkara, Prastava, Udgitha, Pratihara and Nidhana. (Refer to Chhandogya Upanishad, 2, 1-7) For the host that knows and follows the laws and etiquette of Atithi yajna, the Dawn sings the Hinkara, melody of refreshment and awakening into light. Savita, the sun, sings the Prastava, rising song of progress.

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    Subject

    Atithih-Vidya

    Translation

    For him the dawn chants hin (a particular sound in chanting of Samans; (hiñkrnoti)); the impeller Lord sings the prelude (the part of Samans, which is chanted by the prastotr); the Lord supreme chants loudly with vigour (the part of the Samans, that is sung by the udgatr); the universal moulder (mechanic) joins in with nourishment (the part of the samans, that is chanted by pratihartr); and all the bounties of Nature sing the finale (the concluding part of Samans); he, who knows this, becomes the abode of prosperity, of progeny and of cattle. (Dawn-usa; hiñkara - Savity; prastotr - Brhaspati; udgata tvastr;pratihastr visvedevah - nidhana)

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    Translation

    1+2+3. For him who knows the essentials of this Atithi Yajna the dawn murmurs Hinkara, the sun sings Prastave the Wind sings Udgatri Samon with vigor, cloud presents the notes fo Pratihara with increase all the other physical and spiritual forces sing Nidhana and to him comes the treasure of prosperty. progeny and cattal.

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    Translation

    For the householder, who knows how to honor a guest. Dawn brings the message of joy, the Sun sings praise, Air with full vigor chants is virtues, God grants nourishment, all the forces of nature grant shelter. He becomes the abiding place of welfare, of progeny, and of cattle.

    Footnote

    Hinkara, Prastava, Udgitha, Pratihara and Nidhana are the five parts of Sama recitation. This verse describes the fruit of honoring a learned sage as a guest.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १, २, ३−(तस्मै) गृहस्थाय (उषाः) प्रभातवेला (हिङ्) ऋत्विक्दधृक्०। पा० ™३।२।५९। इति बाहुलकात्। हिवि प्रीणने−क्विन्, इति हिन्व्। स्वमोर्नपुंसकात्। पा० ७।१।२३। अमो लुक्। संयोगान्तस्य लोपः। पा० ८।२।२३। वलोपः। क्विन्प्रत्ययस्य कुः। पा० ८।२।६२। इति सानुनासिकं कुत्वम्। हिन्वति प्रीणातीति हिङ्। प्रीणनम्। तृप्तिकर्म (कृणोति) करोति (सविता) प्रेरकः सूर्यः (प्र) प्रकर्षेण (स्तौति) प्रशंसति (बृहस्पतिः) अ० १।८।२। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।११। बृहतः सोमरसस्य पाता रक्षिता वायुः (ऊर्जया) प्राणशक्त्या (उत् गायति) उद्गीथं वेदगानं करोति (त्वष्टा) अ० २।५।६। त्वक्षतेः करोति कर्मणः−तृन्। मध्यस्थानदेवतात्वात्-निरु० १०।३४। अन्नादीनां कर्ता मेघः (पुष्ट्या) पोषणेन (प्रति) प्रत्यक्षम् (हरति) प्रापयति (विश्वे) सर्वे (देवाः) उत्तमगुणाः पदार्थाः (निधनम्) कॄपॄवृजिमन्दिनिधाञः क्युः। उ० २।८१। निदधातेः−क्यु। नितरां धारणम्। निधिम् (भूत्याः) वैभवस्य (प्रजायाः) सन्तानभृत्यादेः (पशूनाम्) गवाश्वगजादीनाम् (भवति) वर्तते (यः) (एवम्) पूर्वोक्तप्रकारेण (वेद) जानाति ॥

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