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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 61/ मन्त्र 29
    ऋषिः - अमहीयुः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    अस्य॑ ते स॒ख्ये व॒यं तवे॑न्दो द्यु॒म्न उ॑त्त॒मे । सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अस्य॑ । ते॒ । स॒ख्ये । व॒यम् । तव॑ । इ॒न्दो॒ इति॑ । द्यु॒म्ने । उ॒त्ऽत॒मे । स॒स॒ह्याम॑ । पृ॒त॒न्य॒तः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्य ते सख्ये वयं तवेन्दो द्युम्न उत्तमे । सासह्याम पृतन्यतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्य । ते । सख्ये । वयम् । तव । इन्दो इति । द्युम्ने । उत्ऽतमे । ससह्याम । पृतन्यतः ॥ ९.६१.२९

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 61; मन्त्र » 29
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 23; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (अस्य ते सख्ये) तव मित्रतां प्राप्य (इन्दो) हे सुयशः प्रकाशित ! (तव उत्तमे द्युम्ने) तवोत्तमयशो निमित्तं वयं (पृतन्यत ससह्याम) रणे युद्धनिमित्तमागतान् शत्रून् अभिभवेम ॥२९॥

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    हिन्दी (2)

    पदार्थ

    (अस्य ते सख्ये) तुम्हारे मित्रभाव को प्राप्त होकर (इन्दो) हे सुन्दर यश से प्रकाशित ! (तव उत्तमे द्युम्ने) तुम्हारे उत्तम यश के निमित्त हम (पृतन्यतः ससह्याम) संग्राम में युद्ध के निमित्त आये हुए प्रतिपक्षियों को अभिभूत करें ॥२९॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा ने राजधर्म में साहाय्य का उपदेश किया है ॥२९॥

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    विषय

    उसके कर्त्तव्य, शत्रुनाश, प्रजा की मान-रक्षा।

    भावार्थ

    हे (इन्दो) ऐश्वर्यवन् ! दया से आर्द्र ! (अस्य तव) इस तेरे (सख्ये) मित्र भाव में रहकर (ते वयम्) वे हम लोग (उत्तमे द्युम्ने) उत्तम यश, बल और धन, अन्नादि प्राप्त करने के निमित्त (पृतन्यतः सास-ह्याम) संग्रामकारियों को वश करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अमहीयुर्ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:- १, ४, ५, ८, १०, १२, १५, १८, २२–२४, २९, ३० निचृद् गायत्री। २, ३, ६, ७, ९, १३, १४, १६, १७, २०, २१, २६–२८ गायत्री। ११, १९ विराड् गायत्री। २५ ककुम्मती गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O lord of truth, beauty and generosity, within the fold of your friendship and in the state of your highest honour and excellence, let us face and win over all the adversaries.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात परमेश्वराने राजधर्मास साहायक असा उपदेश केला आहे. ॥२९॥

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