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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 61/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अमहीयुः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    पव॑मानस्य ते व॒यं प॒वित्र॑मभ्युन्द॒तः । स॒खि॒त्वमा वृ॑णीमहे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पव॑मानस्य । ते॒ । व॒यम् । प॒वित्र॑म् । अ॒भि॒ऽउ॒न्द॒तः । स॒खि॒ऽत्वम् । आ । वृ॒णी॒म॒ह्चे ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः । सखित्वमा वृणीमहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पवमानस्य । ते । वयम् । पवित्रम् । अभिऽउन्दतः । सखिऽत्वम् । आ । वृणीमह्चे ॥ ९.६१.४

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 61; मन्त्र » 4
    अष्टक » 7; अध्याय » 1; वर्ग » 18; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (पवमानस्य) स्वाश्रितजनान् पवित्रयन् (पवित्रम्) पूतमनुष्यस्य (अभ्युन्दतः) उत्साहकर्तुः (ते) तव (सखित्वम्) मैत्रीकरणाय (वयम्) वयं (आवृणीमहे) प्रार्थयामः ॥४॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (पवमानस्य) अपने आश्रित जनों को पवित्र करते हुए (पवित्रम् अभ्युदयन्तः) और पवित्र किये हुए मनुष्य को उत्साहित करनेवाले (ते) तुम्हारे (सखित्वम्) मैत्रीभाव के लिये (वयम्) हम लोग (आवृणीमहे) प्रार्थना करते हैं ॥४॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में परमात्मा के सद्गुणों को धारण करके परमात्मा के साथ मैत्री भाव का वर्णन किया गया है ॥४॥

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    विषय

    सोम सखित्व- वरण

    पदार्थ

    [१] हे सोम! (पवित्रम्) = पवित्र हृदयवाले पुरुष को (अभ्युन्दतः) = शक्ति से सिक्त करते हुए, (पवमानस्य) = जीवन को पवित्र बनानेवाले (ते) = तेरे (सखित्वम्) = मित्रभाव को (वयम्) = हम (आवृणीमहे) = वरते हैं । [२] हम सोम के सखा बनते हैं। यह सोम का सखित्व हमें शक्ति से सिक्त करेगा और पवित्र जीवनवाला बनायेगा ।

    भावार्थ

    भावार्थ- सोम हमें शक्ति सिक्त करता है तथा पवित्र बनाता है।

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    विषय

    राजा अभिषिक्त होकर प्रजा का मित्र होकर रहे।

    भावार्थ

    (पवमानस्य) अभिषेक को प्राप्त होते हुए और (पवित्रम् अभि) परम पवित्र पद को लक्ष्य करके (उन्दतः) जल क्लिन्न होते हुए वा (पवित्रम् अभि) राष्ट्र के कण्टक शोधन के प्रति (अभि उन्दतः) प्रजा के प्रति दया भाव से आर्द्र हुए (ते सखित्वम् आ वृणीमहे) तेरे सख्य भाव को हम चाहते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अमहीयुर्ऋषिः। पवमानः सोमो देवता॥ छन्द:- १, ४, ५, ८, १०, १२, १५, १८, २२–२४, २९, ३० निचृद् गायत्री। २, ३, ६, ७, ९, १३, १४, १६, १७, २०, २१, २६–२८ गायत्री। ११, १९ विराड् गायत्री। २५ ककुम्मती गायत्री॥ त्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O Soma, pure and purifying lord and ruler of life, the streams of your peace, plenty and piety overflow. We pray for abiding love and friendship with you.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात परमेश्वराच्या सद्गुणांना धारण करून परमेश्वराबरोबर मैत्रीचे वर्णन केलेले आहे. ॥४॥

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