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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 32
    ऋषिः - यमः देवता - स्वर्गः, ओदनः, अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - स्वर्गौदन सूक्त
    50

    नवं॑ ब॒र्हिरो॑द॒नाय॑ स्तृणीत प्रि॒यं हृ॒दश्चक्षु॑षो व॒ल्ग्वस्तु। तस्मि॑न्दे॒वाः स॒ह दै॒वीर्वि॑शन्त्वि॒मं प्राश्न॑न्त्वृ॒तुभि॑र्नि॒षद्य॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नव॑म् । ब॒र्हि: । ओ॒द॒नाय॑ । स्तृ॒णी॒त॒ । प्रि॒यम् । हृ॒द: । चक्षु॑ष: । व॒ल्गु । अ॒स्तु॒ । तस्मि॑न् । दे॒वा:। स॒ह । दै॒वी: । वि॒श॒न्तु॒ । इ॒मम् । प्र । अ॒श्न॒न्तु॒ । ऋ॒तुऽभि॑: । नि॒ऽसद्य॑ ॥३.३२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नवं बर्हिरोदनाय स्तृणीत प्रियं हृदश्चक्षुषो वल्ग्वस्तु। तस्मिन्देवाः सह दैवीर्विशन्त्विमं प्राश्नन्त्वृतुभिर्निषद्य ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नवम् । बर्हि: । ओदनाय । स्तृणीत । प्रियम् । हृद: । चक्षुष: । वल्गु । अस्तु । तस्मिन् । देवा:। सह । दैवी: । विशन्तु । इमम् । प्र । अश्नन्तु । ऋतुऽभि: । निऽसद्य ॥३.३२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 3; मन्त्र » 32
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परस्पर उन्नति करने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्यो !] (नवम्) नवीन (बर्हिः) आसन (ओदनाय) भात [रँधे चावल जीमने] के लिये (स्तृणीत) बिछाओ, वह [आसन] (हृदः) हृदय का (प्रियम्) प्रिय और (चक्षुषः) नेत्र का (वल्गु) रमणीय (अस्तु) होवे। (तस्मिन्) उस [आसन] पर (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] और (देवीः) देवियाँ [विदुषी स्त्रियाँ] (सह) साथ-साथ (विशन्तु) बैठें और (ऋतुभिः) सब ऋतुओं के साथ (निषद्य) बैठकर (इमम्) इस [भात] को (प्र अश्नन्तु) स्वाद से जीमें ॥३२॥

    भावार्थ

    जैसे मनुष्य रुचिर भोजन को रमणीक स्थान में ऋतुओं के अनुसार जीमकर प्रसन्न होते हैं, वैसे ही योगी जन शुद्ध अन्तःकरण में परमात्मा के अनुभव से मोक्षसुख पाते हैं ॥३२॥

    टिप्पणी

    ३२−(नवम्) नवीनम् (बर्हिः) आसनम् (ओदनाय) भक्तं जेमितुम् (स्तृणीत) आच्छादयत (प्रियम्) हितकरम् (हृदः) हृदयस्य (चक्षुषः) नेत्रस्य (वल्गु) रमणीयम् (अस्तु) (तस्मिन्) बर्हिषि (देवाः) विद्वांसः (सह) परस्परम् (देवीः) विदुष्यः (विशन्तु) निषीदन्तु (इमम्) ओदनम् (प्राश्नन्तु) स्वादु भक्षयन्तु (ऋतुभिः) समुचितकालैः (निषद्य) उपविश्य ॥

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    विषय

    पवित्रता व प्रसन्नता के वातावरण में

    पदार्थ

    १. (ओदनाय) = भोजन के लिए (नवम्) = नवीन व (प्रशस्य बहि:) = कुशासन को स्तुणीत-बिछाओ। जो आसन (हृदः प्रियम्) = हृदय को प्रिय लगे तथा चक्षुषः वल्ग अस्तु-आँख के लिए सुन्दर हो। २. (तस्मिन्) = उस प्रिय सुन्दर आसन पर (देवा:) = घर के पुरुष तथा (देवी) = -देववृत्ति की स्त्रियाँ (सह) = साथ-साथ (विशन्तु) = बैठे [उपविशन्तु] और (निषद्य) = उस आसन पर बैठकर इमम्-इस ओदन को (ऋतुभिः) = ऋतुओं के अनुसार (प्राश्नन्तु) = खाएँ। भोजन ऋतु के अनुकूल हो । यही भोजन वस्तुत: शरीर का ठीक से पालन करेगा।

    भावार्थ

    भोजन के लिए जो कुशासन बिछाया जाए वह सुन्दर हो। भोजन खाने के समय हृदय में किसी प्रकार के कुविचार न हों, [देवाः दैवीः] इकट्ठे बैठकर भोजन करें। भोजन ऋतु के अनुकूल हो।

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    भाषार्थ

    (ओदनाय) चावल के लिये (नवं बर्हिः) नई कटी कुशाओं को (स्तृणीत) बिछाओं, जो कि (हृदः प्रियम्) हृदय को प्रिय तथा (चक्षुषः वल्गु अस्तु) आंख के लिये रमणीय हो। (तस्मिन्) उस पर (देवाः देवीः) देव और देवियां (सह) साथ-साथ (विशन्तु) प्रवेश करें और (निषद्य) बैठ कर (ॠतुभिः) ऋतु के अनुकूल (इमम् प्राश्नन्तु) इसे खाएं।

    टिप्पणी

    [हरी कुशाओं का आसन प्रिय तथा रमणीय होता है। गृहस्थ के स्त्री पुरुष परस्पर साथ-साथ बैठ कर भोजन करें। भोजन के लिये भोज्य पदार्थ ऋतु-ऋतु के अनुकूल होने चाहियें। स्त्री-पुरुषों को दिव्य विचारों, दिव्य भावनाओं और दिव्य कर्मों वाले होने चाहियें]।

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    विषय

    स्वर्गौदन की साधना या गृहस्थ धर्म का उपदेश।

    भावार्थ

    हे भद्र पुरुषो ! (नवं) नये (बर्हिः) दाभ को (ओदनाय) भात की हांडी रखने के लिये (स्तृणीत) बिछा दो। और (नवं बर्हिः) इस नवीन प्रजा या नये विजित देश को (ओदनाय) वीर्य प्राप्त किये परमेष्ठी रूप राजा के लिये (स्तॄणीत) फैला दो, देश पर फैल कर वश करने दो। और यह राजा और राष्ट्र (हृदः) प्रजा के हृदय को (प्रियं) प्रिय और (चक्षुषः) आंख को (वल्गु) सुन्दर, मनोहर (अस्तु) लगे। (तस्मिन्) और जिस प्रकार भात खाने के लिये आसन रूप में बिछाये कुशा के आसन पर विद्वान् लोग बैठ कर भोजन करते हैं उसी प्रकार (तस्मिन्) उस राष्ट्र में (देवाः) देव गण राजा और विद्वान् लोग (दैवीः सह) अपनी देव रूप रानियों या दिव्य-गुण युक्त प्रजाओं के साथ (विशन्तु) प्रवेश करें। और (निषद्य) उत्तम रीति से स्थिर होकर (इमम्) इस भात के समान ही (इमम्) इस राष्ट्र का भी (ऋतुभिः) ऋतुओं के अनुसार अथवा राजसभा के सदस्यों के साथ (प्र अश्नन्तु) उत्तम रीति से भोग करें।

    टिप्पणी

    ‘बर्हिः’—प्रजा वै बर्हिः। कौ० ५। ७॥ क्षत्रं वै प्रस्तरो विश इतरं बर्हिः। श० १। ३। ४। १०॥ अयं वै लोको बर्हिः। श० १। ४। १२४॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    यम ऋषिः। मन्त्रोक्तः स्वर्गौदनोऽग्निर्देवता। १, ४२, ४३, ४७ भुरिजः, ८, १२, २१, २२, २४ जगत्यः १३ [१] त्रिष्टुप, १७ स्वराट्, आर्षी पंक्तिः, ३.४ विराड्गर्भा पंक्तिः, ३९ अनुष्टुद्गर्भा पंक्तिः, ४४ परावृहती, ५५-६० व्यवसाना सप्तपदाऽतिजागतशाकरातिशाकरधार्त्यगर्भातिधृतयः [ ५५, ५७-६० कृतयः, ५६ विराट् कृतिः ]। षष्ट्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Svarga and Odana

    Meaning

    Strew fresh sheets of grass for the rice feast. Let these be soothing to the heart and pleasing to the eye. On them let divine sages with divine ladies be seated and enjoy this feast of rice according to the seasons.

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    Translation

    Strew you a new barhis for the rice-dish; be it dear to the ‘heart, agreeable to the eye; on it let the gods (and) the divine ones settle together, sitting down, let them partake of this with the seasons.

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    Translation

    O men, stretch new mat this rice, let this be sweet to mind and nice to eye. Here let come the learned men and learn ed ladies together. They sitting there eat it according to Or Here let come learned men and learned ladies accompanied with each other. They sitting there eat it after giving oblations to Yajna devas according to the seasons.

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    Translation

    O men, spread the new mat for eating rice. It should look pleasant to the mind and beautiful to the eye. Let men and women sit on it, and sitting together let them take their food in different seasons!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३२−(नवम्) नवीनम् (बर्हिः) आसनम् (ओदनाय) भक्तं जेमितुम् (स्तृणीत) आच्छादयत (प्रियम्) हितकरम् (हृदः) हृदयस्य (चक्षुषः) नेत्रस्य (वल्गु) रमणीयम् (अस्तु) (तस्मिन्) बर्हिषि (देवाः) विद्वांसः (सह) परस्परम् (देवीः) विदुष्यः (विशन्तु) निषीदन्तु (इमम्) ओदनम् (प्राश्नन्तु) स्वादु भक्षयन्तु (ऋतुभिः) समुचितकालैः (निषद्य) उपविश्य ॥

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