अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 43
ऋषिः - यमः
देवता - स्वर्गः, ओदनः, अग्निः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - स्वर्गौदन सूक्त
192
अ॒ग्नी रक्ष॑स्तपतु॒ यद्विदे॑वं क्र॒व्यात्पि॑शा॒च इ॒ह मा प्र पा॑स्त। नु॒दाम॑ एन॒मप॑ रुध्मो अ॒स्मदा॑दि॒त्या ए॑न॒मङ्गि॑रसः सचन्ताम् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्नि: । रक्ष॑: । त॒प॒तु॒ । यत् । विऽदे॑वम् । क्र॒व्य॒ऽअत् । पि॒शा॒च: । इ॒ह । मा । प्र । पा॒स्त॒ । नु॒दाम॑: । ए॒न॒म् । अप॑ । रु॒ध्म॒: । अ॒स्मत् । आ॒दि॒त्या: । ए॒न॒म् । अङ्गि॑रस: । स॒च॒न्ता॒म् ॥३.४३॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्नी रक्षस्तपतु यद्विदेवं क्रव्यात्पिशाच इह मा प्र पास्त। नुदाम एनमप रुध्मो अस्मदादित्या एनमङ्गिरसः सचन्ताम् ॥
स्वर रहित पद पाठअग्नि: । रक्ष: । तपतु । यत् । विऽदेवम् । क्रव्यऽअत् । पिशाच: । इह । मा । प्र । पास्त । नुदाम: । एनम् । अप । रुध्म: । अस्मत् । आदित्या: । एनम् । अङ्गिरस: । सचन्ताम् ॥३.४३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परस्पर उन्नति करने का उपदेश।
पदार्थ
(अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष] (रक्षः) उस राक्षस को (तपतु) जलावे (यत्) जो (विदेवम्) विरुद्धव्यवहारी (क्रव्यात्) मांस खानेवाला है, (पिशाचः) पिशाच [मांस खानेवाला पुरुष] (इह) यहाँ पर (मा प्र पास्त) [जलादि] पान न करे। (एनम्) इस [पिशाच] को (अस्मत्) अपने से (नुदासः) हम हटाते हैं और (अप रुध्मः) निकाले देते हैं, (आदित्याः) आदित्य [अखण्ड ब्रह्मचारी] (अङ्गिरसः) ऋषि लोग (एनम्) इस [तेजस्वी पुरुष] को (सचन्ताम्) मिलते रहें ॥४३॥
भावार्थ
विद्वान् तेजस्वी पुरुष कलहकारी दुराचारियों को निकालें और महात्मा लोग विद्वान् का सहाय करें ॥४३॥
टिप्पणी
४३−(अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी पुरुषः (रक्षः) राक्षसम् (तपतु) दहतु (यत्) (विदेवम्) दिवु व्यवहारे−अच्। विरुद्धव्यवहारिणम् (क्रव्यात्) मांसभक्षकम् (पिशाचः) अ० १।१६।३। मांसभक्षकः (इह) अत्र (मा प्र पास्त) पा पाने−लुङ्। आत्मनेपदं छान्दसम्। जलादिपानं मा कुर्यात् (नुदामः) प्रेरयामः (एनम्) पिशाचम् (अप रुध्मः) बहिष्कुर्मः (अस्मत्) अस्माकं सकाशात् (आदित्याः) अ० १।९।१। अदिति−ण्य। अखण्डब्रह्मचारिणः (एनम्) तेजस्विनं विद्वांसम् (अङ्गिरसः) अ० २।१२।४। ऋषयः (सचन्ताम्) षच समवाये। संगच्छन्तु ॥
विषय
आदित्य अङ्गिरस्, न कि क्रव्यात् पिशाच
पदार्थ
१. (अग्निः) = राष्ट्र का अग्रणी राजा (रक्षः तपतु) = उन राक्षसीवृत्ति के लोगों को दण्डित करे, (यत्) = जोकि (विदेवम्) = सब दिव्यवृत्तियों से रहित हैं। (क्रव्यात्) = मांसाहारी (पिशाच:) = राक्षसीवृत्ति का पुरुष इह-राष्ट्र में मा प्रपास्त-रक्षण को प्राप्त न करे । २. (एनम्) = इस राक्षसीवृत्तिवाले पुरुष को (नुदाम:) = हम अपने से परे प्रेरित करते हैं, इसे (अस्मत् अपरुध्मः) = अपने से दूर ही रोकते हैं। (एनम्) = हमारे राष्ट्र के प्रजाजनों को (आदित्या:) = ज्ञान का आदान करनेवाले (अंगिरस:) = अङ्ग प्रत्यङ्ग में रसवाले-स्वस्थ शरीर पुरुष ही (सचन्ताम्) = मेल प्राप्त करानेवाले हों।
भावार्थ
राजा ऐसी व्यवस्था करे कि प्रजाजनों का सम्पर्क 'क्रव्यात पिशाचों' से न होकर "आदिल्य अङ्गिरसों' से हो।
भाषार्थ
(अग्निः) ज्ञानाग्नि (रक्षः) राक्षसी विचार को (तपतु) तपा दे, भस्मीभूत कर दें (यद् विदेवम्) जो कि देवविरोधी है, परमेश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता, नास्तिकतारूपी है। (क्रव्याद् पिशाचः) मांसभक्षी यह पैशाची विचार (इह) इस हमारे जीवन में (मा प्रपास्त) हमारा रक्त न पीए। (एनं नुदाम) इसे हम दूर करते हैं, (अस्मत्) अपने पास आने का इस का मार्ग (अपरुध्मः) दूर से ही रोक देते हैं। (आदित्याः) आदित्य ब्रह्मचारी (अङ्गिरसः) ज्ञानाग्नि विद्या के जानने वाले (एनम्) इस पैशाची विचार के साथ (सचन्ताम्) अपना सम्बन्ध स्थापित करें [इस के विनाश के लिये]।
टिप्पणी
[अग्निः ="ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन” (गीता)। ज्ञानाग्नि सब बुरे कर्मों को भस्मसात् करती है। एतदर्थ अग्निविद्या अर्थात् ज्ञानाग्निविद्या के जानने वाले विज्ञ विद्वानों की सहायता प्राप्त करनी चाहिये। अग्नि को अङ्गिरा भी कहा है। यथा "तं त्वा समिद्भिरङ्गिरः” (यजु० ३।३)। आधिभौतिक दृष्टि में आदित्यकोटि के विद्वान् अङ्गिरसः हैं। नास्तिक जीवन में जीवन निरङ्कुश हो जाता है और पैशाची विचार जीवन में मांस खाने लगते और रक्त पीने लगते हैं। "रुध्मः" द्वारा यह भी सूचित किया है कि यत्नपूर्वक हमें भी ऐसे विचारों को रोकते रहना चाहिये]।
विषय
स्वर्गौदन की साधना या गृहस्थ धर्म का उपदेश।
भावार्थ
(यत्) जो (विदेवं) देव-विद्वानों और देव स्वभाव के उत्तम पुरुषों के और देव, राजा के अर्थात् राजनियम के विपरीत आचरण करने वाला (रक्षः) राक्षस, दुष्ट पुरुष जीव और रोग हैं उसको (अग्निः) अग्नि के समान तापकारी राजा (तपतु) सन्तप्त करे, पीड़ित करे, दण्ड दे। (इह) इस राष्ट्र में (क्रव्यात्) कच्चा मांस खाने वाला और (पिशाचः) मांसभक्षी पुरुष (मा प्र पास्त) कभी जलपान भी प्राप्त न कर पावे। (एनम्) उसको हम (नुदामः) परे भगा दें। (अस्मत्) हम अपने से (अप रुध्मः) परे ही रोक दें, पास न आने दें। (आदित्याः) आदित्य के समान तेजस्वी और (अंगिरसः) शरीर के विज्ञानवेत्ता अथवा अन्य विविध विज्ञानों के वेत्ता लोग (एनम्) उसको (सचन्ताम्) पकड़ें।
टिप्पणी
‘अप रुध्मो’ इति कचित्। (च०) ‘आदित्या नो अङ्गि’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
यम ऋषिः। मन्त्रोक्तः स्वर्गौदनोऽग्निर्देवता। १, ४२, ४३, ४७ भुरिजः, ८, १२, २१, २२, २४ जगत्यः १३ [१] त्रिष्टुप, १७ स्वराट्, आर्षी पंक्तिः, ३.४ विराड्गर्भा पंक्तिः, ३९ अनुष्टुद्गर्भा पंक्तिः, ४४ परावृहती, ५५-६० व्यवसाना सप्तपदाऽतिजागतशाकरातिशाकरधार्त्यगर्भातिधृतयः [ ५५, ५७-६० कृतयः, ५६ विराट् कृतिः ]। षष्ट्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Svarga and Odana
Meaning
May Agni, light of knowledge and fire of passion for life and positive living, light up, burn out and eliminate the negativities of life in humanity and the environment. Let darkness, ignorance and exploitation eating into the vitals of life and sucking the blood of innocents be out by the holy fire of yajna. Let us throw out all such antisocial elements. Let us shut them all out. Let brilliant scholars of Aditya order, and Angirasas, veterans of wisdom, adamantine will, determined action and vibrant spirit of life take these up and deal with them appropriately with justice.
Translation
Let Agni burn the demon that is godless; let the flesh-eating pisaca not have a draught here:, we thrust him, we bar him away from us; let the Adityas, the Angirases, fasten on him.
Translation
Let the fire burn that disease which creates trouble in limbs and organs. The fatal disease which consumes the flesh of diseased let not find even narrow safety here. We drive it away. We keep it far off from us. The physicians knowing treatment from rays, the scientist knowing causes, of disease and their medicines pursue this (disease).
Translation
Let the fiery king punish the God-denying demon. Let no carnivorous, raw meat-eater get water to drink in the state. We drive him off. We keep him at a distance. Let learned persons and sages pursue him.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४३−(अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी पुरुषः (रक्षः) राक्षसम् (तपतु) दहतु (यत्) (विदेवम्) दिवु व्यवहारे−अच्। विरुद्धव्यवहारिणम् (क्रव्यात्) मांसभक्षकम् (पिशाचः) अ० १।१६।३। मांसभक्षकः (इह) अत्र (मा प्र पास्त) पा पाने−लुङ्। आत्मनेपदं छान्दसम्। जलादिपानं मा कुर्यात् (नुदामः) प्रेरयामः (एनम्) पिशाचम् (अप रुध्मः) बहिष्कुर्मः (अस्मत्) अस्माकं सकाशात् (आदित्याः) अ० १।९।१। अदिति−ण्य। अखण्डब्रह्मचारिणः (एनम्) तेजस्विनं विद्वांसम् (अङ्गिरसः) अ० २।१२।४। ऋषयः (सचन्ताम्) षच समवाये। संगच्छन्तु ॥
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