अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 25
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अध्यात्मम्
छन्दः - एकपदासुरी गायत्री
सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
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स ए॒व मृ॒त्युः सो॒मृतं॒ सो॒भ्वं स रक्षः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठस: । ए॒व । मृ॒त्यु: । स: । अ॒मृत॑म् । स: । अ॒भ्व᳡म् । स: । रक्ष॑: ॥६.४॥
स्वर रहित मन्त्र
स एव मृत्युः सोमृतं सोभ्वं स रक्षः ॥
स्वर रहित पद पाठस: । एव । मृत्यु: । स: । अमृतम् । स: । अभ्वम् । स: । रक्ष: ॥६.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थ
(सः एव) वही [परमेश्वर] (मृत्युः) मरण करनेवाला (सः) वही (अमृतम्) अमरपन का कारण, (सः) वही (अभ्वम्) महान् (सः) वही (रक्षः) रक्षा करनेवाला [परब्रह्म] है ॥२५॥
भावार्थ
परमात्मा की उपासना करके मनुष्य क्लेशों से बचकर सुख पाते हुए महान् रक्षक बनें ॥२५॥
टिप्पणी
२५−(सः) परमेश्वरः (एव) (मृत्युः) मारकः। मरणस्य हेतुः (सः) (अमृतम्) अमरणस्य कारणम् (अभ्वम्) अ० ४।१७।५। अशूप्रुषि०। उ० १।१५१। अभि शब्दे-क्वन्, छान्दसो नलोपः। अभ्वो महन्नाम-निघ० ३।३। महत् (सः) (रक्षः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। रक्ष पालने-असुन्। रक्षकं ब्रह्म ॥
विषय
मृत्यु अमृतम्
पदार्थ
१. (सः एव) = वे अद्वितीय प्रभु ही (मृत्युः) = मृत्यु है-जीवों को प्राणों से वियुक्त करनेवाले व नया शरीर प्राप्त करानेवाले हैं। (सः अमृतम्) = वे ही मोक्षधाम को प्राप्त करानेवाले हैं। (सः अभ्वम्) = वे महान् हैं और (स: रक्षः) = वे ही सबके रक्षक हैं। २. (सः रुद्रः) = वे प्रभु ही ज्ञान देनेवाले हैं। (वसुदेये) = सब वस्तुओं के देने के कार्य में (वसुवनिः) = सब वस्तुओं का संभजन करनेवाले हैं [विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः] तथा (नमो वाके) = 'नम:' वचनपूर्वक किये जानेवाले ब्रह्मयज्ञ में (वषट्कार:) = 'स्वाहा' करनेवाले के रूप में (अनुसंहित:) = निरन्तर स्मरण किये जाते हैं। प्रभु ने जीवहित के लिए अपने को दे डाला है-सर्वमहान् त्याग करनेवाले प्रभु ही हैं। वे 'आत्मदा: 'हैं। ३. (इमे सर्वे यातव:) = ये सब गतिशील पिण्ड-सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि (तस्य) = उस प्रभु की (प्रशिषम् उपासते) = आज्ञा का उपासन करते हैं। ये सूर्यादि प्रभु के शासन में गति कर रहे हैं। (अमू सर्वा नक्षत्रा) = वे सब नक्षत्र (चन्द्रमसा सह) = चन्द्रमा के साथ (तस्य वशे) = उसके वश में है। प्रभु सब लोक-लोकान्तरों के अधिपति हैं और सब पिण्ड उस प्रभु के प्रशासन में गतिवाले हो रहे हैं।
भावार्थ
प्रभु ही मृत्यु हैं, वे ही अमृत हैं। वे महान् हैं, रक्षक है, ज्ञानदाता हैं, वसुओं को प्रास करानेवाले हैं। त्यागपुञ्ज वे प्रभु नमस्करणीय हैं। सब पिण्ड प्रभु के शासन में गति कर रहे हैं।
भाषार्थ
(सः) वह सविता परमेश्वर (एव) ही (मृत्युः) मृत्यु है, (सः) वह (अमृतम्) अमृत है, (सः) वह (अभ्वम्) सृष्टि का अभाव करने वाला अर्थात् विनाशक है, (सः) यह (रक्षः) सृष्टि रक्षक है।
टिप्पणी
[परमेश्वर ही मृत्युरूप से प्राणियों की मृत्यु करता और अमृत रूप में जीवात्मा को मोक्ष प्रदान करता अर्थात् जन्ममरण की शृंखला से मुक्त करता है। वह ही सृष्टि विनाशक और सृष्टि रक्षक है। अभ्वम्=अ + भू (सत्तायाम्) + व (औणादिकः), ऊकारलोपः, क्लीवत्वं च। "सत्ता का अभाव" करने वाला। रक्षः= रक्षतीति, पालकः (उणा० ४।१९०, महर्षि दयानन्द)]।
विषय
परमेश्वर का वर्णन
भावार्थ
(सः एव मृत्युः) वह परमात्मा ही (मृत्युः) सब प्राणियों के प्राणों को देह से जुदा करने वाला ‘मृत्युः’ है। (सः अमृतम्) वही परमेश्वर ‘अमृत’ प्राणप्रद है। (सः अभ्वम्) वह ‘अभ्व’ कभी न पैदा होने वाला या महान् स्तुति योग्य है। (सः रक्षः) वही सब का रक्षक है। (सः रुद्रः) वह ‘रुद्र’ है। (सः वसुवनिः) वह समस्त वास करने हारे जीवों और लोकों का एकमात्र भजन करने और आजीविका देने वाला है। साक्षात् ‘अग्नि’ रूप है, और वही (वसुदेये) यज्ञ में देय = दान करने योग्य आहुति में (नमोवाके) और ‘नमः’ वचन पूर्वक करने योग्य ईश्वरप्रार्थना स्तुति आदि ब्रह्मयज्ञ में भी (वषट्कारः) नमः और ‘स्वाहा’ और वषट वौषट् आदि स्वरूप होकर (अनुसंहितः) निरन्तर स्मरण किया जाता है।
टिप्पणी
‘वसुः’ यज्ञो वै वसुः। श० १। ७। १। ९। १४॥ स एषोऽग्निरत्र वसुः। श० ९। ३। २। १॥ इन्द्रो वसुधेयः। श० १। ८। २। १६॥ अग्निर्वै वसुवनिः। श० १। ८। २। १६॥ यज्ञो वै नमः। श०। ७। ४। १। ३०॥ अन्नं नमः। श० ६। ३। १ १६॥ वाग् वै रेतः रेत एव एतत् सिञ्चति। षट् इति ऋतो वै षट्। तदृतुषु एतद् रेतः सिंचति यदेष वषट्कारः। श० १। ७। २। २१॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
२२ भुरिक् प्राजापत्या त्रिष्टुप्, २३ आर्ची गायत्री, २५ एकपदा आसुरी गायत्री, २६ आर्ची अनुष्टुप् २७, २८ प्राजापत्याऽनुष्टुप्। सप्तर्चं तृतीयं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Savita, Aditya, Rohita, the Spirit
Meaning
He is the Ordainer of annihilation and creation, He is Immortality, He is immense, He is the protector.
Translation
He himself is death. He (is) the immortality; He ‘(is) the horror; He (is) the saviour,
Translation
He is death, He is immortality, He is omnipresent and He is protector.
Translation
He is the Bringer of death, and the Bestower of salvation. Me is unborn, and highly adorable. He is the Protector of all.‘
Footnote
Griffith erroneously translates अभ्वम् as monster and रक्ष: as flend.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२५−(सः) परमेश्वरः (एव) (मृत्युः) मारकः। मरणस्य हेतुः (सः) (अमृतम्) अमरणस्य कारणम् (अभ्वम्) अ० ४।१७।५। अशूप्रुषि०। उ० १।१५१। अभि शब्दे-क्वन्, छान्दसो नलोपः। अभ्वो महन्नाम-निघ० ३।३। महत् (सः) (रक्षः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। रक्ष पालने-असुन्। रक्षकं ब्रह्म ॥
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