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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 51
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - अध्यात्मम् छन्दः - विराड्गायत्री सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    63

    अम्भो॑ अरु॒णं र॑ज॒तं रजः॒ सह॒ इति॒ त्वोपा॑स्महे व॒यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अम्भ॑: । अ॒रु॒णम् । र॒ज॒तम् । रज॑: । सह॑: । इति॑ । त्वा॒ । उप॑ । आ॒स्म॒हे॒ । व॒यम् ॥८.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अम्भो अरुणं रजतं रजः सह इति त्वोपास्महे वयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अम्भ: । अरुणम् । रजतम् । रज: । सह: । इति । त्वा । उप । आस्महे । वयम् ॥८.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 4; मन्त्र » 51
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे परमेश्वर !] तू (अम्भः) व्यापक, (अरुणम्) ज्ञानस्वरूप, (रजतम्) प्रीति का हेतु आनन्दस्वरूप, (रजः) ज्योतिःस्वरूप और (सहः) सहनशील [ब्रह्म] है, (इति) इस प्रकार से (वयम्) हम (त्वा उप आस्महे) तेरी उपासना करते हैं ॥५१॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग सर्वव्यापक सर्वज्ञ आदि परमेश्वर की उपासना बार-बार आदरपूर्वक कर के पुरुषार्थ करें ॥५१॥

    टिप्पणी

    ५१−(अम्भः) म० ५०। व्यापकम् (अरुणम्) अर्त्तेश्च। उ० ३।६०। ऋ गतिप्रापणयोः-उनन्, चित्। ज्ञानस्वरूपम् (रजतम्) पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१—११। रञ्ज रागे-अतच्, कित्। रजति प्रियं भवतीति रजतम्। प्रीतिहेतु। आनन्दस्वरूपम् (रजः) रञ्ज रागे-असुन्। रजो रजतेः, ज्योती रज उच्यते-निरु० ४।१९। तेजःस्वरूपं ब्रह्म। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    प्रभु सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और शत्रुमर्षक

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! (वयम्) = हम (त्वा) = आपको (अम्भः) = सर्वव्यापक [आप् व्याप्तौ] (अमः) = सर्वज्ञ [अम् गतौ] (महः) = पूजनीय व शक्तिसम्पन्न तथा (सहः) = शत्रु-सेना का मर्षण करनेवाले (इति) = के रूप में (उपास्महे) = उपासित करते हैं। २. (अम्भः) = सर्वव्यापक (अरुणम्) = प्रकाशस्वरूप (रजतम्) = आनन्दस्वरूप (रज:) = [ज्योति: रज उच्यते -नि०४.१९] तेज:स्वरूप, (सह:) = शत्रुओं का मर्षण करनेवाले (इति) = के रूप में (वयम्) = हम (त्वा) = हे प्रभो! आपका (उपास्महे) = उपासन करते हैं।

    भावार्थ

    प्रभु सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, पूजनीय, प्रकाशरूप, आनन्दस्वरूप, तेजस्वरूप व शत्रुओं को कुचल देनेवाले हैं।

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    भाषार्थ

    (अम्भः) ज्ञान दीप्ति वाला, (अरुणम्) आरोचमान, (रजतम्) प्रीति के पात्र आनन्द स्वरूप, (रजः) रजोमयी पृथिवी के सदृश क्षमाशील, (सहः) बलवान तू है (इति) इस प्रकार जानकर (वयम्) हम (त्वा उपास्महे) तेरी उपासना करते हैं।

    टिप्पणी

    [अम्भः= अम् (अम) + मा (दीप्तौ), ज्ञान की दीप्ति वाला। अरुणः =आरोचमानः (निरुक्त ५।४।२१, वृकः ६५ की व्याख्या)। रजतम् = रजति प्रियं भवतीति (उणा० ३।१११)। सहः बलनाम (निघं० २।९)]।

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    विषय

    परमेश्वर का वर्णन।

    भावार्थ

    हे परमात्मन् ! (वयम्) हम (अम्भः) जल के समान संब प्राणी के उत्पादक (अरुणम्) प्रकाशस्वरूप (रजतम्) चित्त के अनुरञ्जक, आनन्दस्वरूप, (रजः) समस्त लोकों और ऐर्श्वय विभूतियों से सम्पन्न, (सहः) सब के वश करनेहारे. परम बलस्वरूप (इति) इन गुणों और रूपों से (त्वा उपास्महे) तेरी उपसना करते हैं।

    टिप्पणी

    (। ०। ०॥) उभयोर्विद्वोः स्थाने ‘नमस्ते अस्तु’ इति अन्नाद्येने’तच मन्त्रद्वयं वैदिकैः परिपठ्यते।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ४६ आसुरी गायत्री, ४७ यवमध्या गायत्री, ४८ साम्नी उष्णिक्, ४९ निचृत् साम्नी बृहती, ५० प्राजापत्यानुष्टुप, ५१ विराड गायत्री। षडृचात्मक पञ्चमं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Savita, Aditya, Rohita, the Spirit

    Meaning

    Fathomless as the ocean, flaming as fire and glorious as dawn, pure and spotless as light, dynamic as energy, patient yet unchallengeable, thus do we worship and adore you.

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    Translation

    We worship you as ruddy strength, as silvery emotion and as overpowering force. Homage be to you, O beholder; behold me, O beholder, with edible food, with fame, with radiance, and with intellectual brilliance

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    Translation

    Taking Thee as omnipresent; resplendent,motion of all motions,shining like silver and all-conquering we pay our reverence to Thee. Obeisance to Thee whom all desire to behold.O beholder of all,please see us. With nourishment, prominence, splendor and the knowledge of the master of vedic speech.

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    Translation

    O God, we pay Thee reverence calling Thee Omnipresent, Omniscient, joyful, Refulgent and Patient!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५१−(अम्भः) म० ५०। व्यापकम् (अरुणम्) अर्त्तेश्च। उ० ३।६०। ऋ गतिप्रापणयोः-उनन्, चित्। ज्ञानस्वरूपम् (रजतम्) पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१—११। रञ्ज रागे-अतच्, कित्। रजति प्रियं भवतीति रजतम्। प्रीतिहेतु। आनन्दस्वरूपम् (रजः) रञ्ज रागे-असुन्। रजो रजतेः, ज्योती रज उच्यते-निरु० ४।१९। तेजःस्वरूपं ब्रह्म। अन्यद् गतम् ॥

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