अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 37
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - अध्यात्मम्
छन्दः - साम्न्युष्णिक्
सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
61
स वा अ॒द्भ्योजा॑यत॒ तस्मा॒दापो॑ऽजायन्त ॥
स्वर सहित पद पाठस: । वै । अ॒त्ऽभ्य: । अ॒जा॒य॒त॒ । तस्मा॑त् । आप॑: । अ॒जा॒य॒न्त॒ ॥७.९॥
स्वर रहित मन्त्र
स वा अद्भ्योजायत तस्मादापोऽजायन्त ॥
स्वर रहित पद पाठस: । वै । अत्ऽभ्य: । अजायत । तस्मात् । आप: । अजायन्त ॥७.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।
पदार्थ
(सः) वह [कारणरूप ईश्वर] (वै) अवश्य (अद्भ्यः) [कार्यरूप] जल से (अजायत) प्रकट हुआ है, (तस्मात्) उस [कारणरूप] से (आपः) जल [वृष्टि नदी कूप आदि] (अजायत) उत्पन्न हुए हैं ॥३७॥
भावार्थ
मन्त्र २९ के समान है ॥३७॥
टिप्पणी
३७−(अद्भ्यः) जलेभ्यः (आपः) वृष्टिनदीकूपादीनां जलानि। अन्यद् गतम् ॥
पदार्थ
१. (सः) = वह प्रभु (वै) = निश्चय से (भूमे:) = इस भूमि से (अजायत) = प्रादुर्भूत महिमावाला हो रहा है। यह भूमि अपने से उत्पन्न होनेवाले विविध वनस्पतियों के पत्र-पुष्पों में विविध पुण्यगन्धों को प्राप्त करा रही है। किन्हीं भी दो वनस्पतियों की गन्ध एक-सी नहीं, क्या ही अद्भुत चमत्कार-सा है! (भूमिः) = यह भूमि (तस्मात्) = उस प्रभु से ही तो (अजायत) = उत्पन्न हुई है। २. (सः वा) = वह प्रभु निश्चय से (अग्नेः) = अग्नि से (अजायत) = प्रादुर्भूत होता है। मिलाने व फाड़ने [संयुक्त व वियुक्त करने] की विरोधी शक्तियों को लिये हुए यह अग्नि भी विचित्र ही तत्त्व है। तस्मात् उस प्रभु से ही अग्निः (अजायत) = अग्नि उत्पन्न किया गया है। ३. (सः वा) = वह प्रभु निश्चय से (अद्भ्यः) = सब वनस्पतियों में विविध रसों का संचार करनेवाले जलों से (अजायत) = प्रादुर्भत महिमावाला होता है। तस्मात्-उस प्रभु से ही तो (आपः अजायन्त) = जल प्रादुर्भूत हुए हैं। ४. (सः वा) = यह प्रभु निश्चय से (ऋग्भ्यः) = ऋचाओं से (अजायत) = प्रादुर्भूत हो रहा है। किसप्रकार ये ऋचाएँ सम्पूर्ण प्रकृति-विज्ञान को प्रकट कर रही हैं? तस्मात् ऋचा: अजायन्त-उस प्रभु ने सृष्टि के आरम्भ में ही इन ऋचाओं का ज्ञान दिया है। ५. (सः वै) = वह प्रभु निश्चय से (यज्ञात्) = यज्ञ से (अजायत) = प्रकट हो रहा है, किसप्रकार 'यज्ञ' पर्जन्य को उत्पन्न कर वृष्टि द्वारा अन्नों का उत्पादन करके हमारे जीवन का आधार बनता है? तस्मात् यज्ञः (अजायत) = प्रभु से ही प्रजाओं के साथ ही इस यज्ञ का भी प्रादुर्भाव किया गया है। यज्ञ ही जीवन है।
भावार्थ
भूमि, अग्नि, जल, ऋचाओं व यज्ञों' में इस प्रभु की महिमा का प्रादुर्भाव हो रहा है|
भाषार्थ
(सः वै) वह निश्चय से (अदभ्यः) जलों से (अजायत) प्रकट हुआ है, क्योंकि (तस्मात्) उस से (आपः) जल (अजायन्त) पैदा हुए हैं।
विषय
परमेश्वर का वर्णन।
भावार्थ
(सः वा अद्भयः अजायत) वह सूर्य जिस प्रकार जलों से उत्पन्न होता है और (तस्माद् आपः अजायन्त) सूर्य से वे जल वर्षाधारा रूप से उत्पन्न होते हैं। उसी प्रकार वह परमेश्वर (अद्भयः अजायत) जलों से प्रकट होता है और वे जल उस परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
२९, ३३, ३९, ४०, ४५ आसुरीगायत्र्यः, ३०, ३२, ३५, ३६, ४२ प्राजापत्याऽनुष्टुभः, ३१ विराड़ गायत्री ३४, ३७, ३८ साम्न्युष्णिहः, ४२ साम्नीबृहती, ४३ आर्षी गायत्री, ४४ साम्न्यनुष्टुप्। सप्तदशर्चं चतुर्थं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Savita, Aditya, Rohita, the Spirit
Meaning
And he is manifest from the waters, since the waters are born of him through his manifestation.
Translation
He, indeed, is born of the elemental waters; the elemental waters are born of him.
Translation
He (as creator) comes to expression from the waters, therefore, the waters emerge out from Him (as an efficient cause).
Translation
The existence of God is perceived by beholding the waters, which in reality are created by Him.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३७−(अद्भ्यः) जलेभ्यः (आपः) वृष्टिनदीकूपादीनां जलानि। अन्यद् गतम् ॥
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